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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 संस्कारवान परिवार ✍️🐒*
*🔔🎪🔊 तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना*
*🕉️1. मार्गशीर्ष शुक्ल 14, दिनांक 6 दिसंबर 2022 मंगलवार को अठारवे तीर्थंकर अरनाथ सभी के मोक्ष प्रदाता 1008 श्री अरनाथ भगवान जी का जन्म कल्याणक महोत्सव हैं।*
*🔔1. मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा, दिनांक 7 दिसंबर 2022 बुधवार को तीसरे तीर्थंकर संभवनाथ सभी के मोक्षसुख प्रदाता 1008 श्री संभवनाथ भगवान जी का तप कल्याणक महोत्सव हैं।*
*👨👩👦👦आप सभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्ति अनुसार उत्सव मनाकर जीवन सार्थक करें।*
एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय अख़बार देने आता था, उस समय रमेश बाबू उसको अपने मकान की गैलरी में टहलते हुए मिल जाते थे ।
प्रतिदिन वह रमेश बाबू के आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए अख़बार फेंकता और उनको 'नमस्ते बाबू जी' बोलकर अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।
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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से करें।✍️*
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क्रमश: समय बीतने के साथ रमेश बाबू के सोकर उठने का समय बदलकर प्रात: 7:00 बजे हो गया।
जब कई दिनों तक रमेश बाबू उस अखबार वाले को प्रात: टहलते नहीं दिखे तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह उनका कुशल-क्षेम लेने उनके आवास पर आ गया।
तब उसे ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, रमेश बाबू बस यूँ ही देर से उठने लगे थे ।
वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, "बाबू जी! एक बात कहूँ?"
रमेश बाबू ने कहा... "बोलो"
वह बोला... "आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आपके लिए ही मैं सुबह तड़के विधानसभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चलाकर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ...सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"
रमेश बाबू ने विस्मय से पूछा...अरे तुम ! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हो....इतनी दूर से ?"
“हाँ ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है ," उसने उत्तर दिया।
“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?" रमेश बाबू ने पूछा ।
“ढाई बजे.... फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।"
“फिर ?" रमेश बाबू ने जानना चाहा ।
“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँटकर घर वापस आकर सो जाता हूँ..... फिर दस बजे कार्यालय...... अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”
रमेश बाबू कुछ पलों तक उसकी ओर देखते रह गए और फिर बोले, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को अवश्य ध्यान में रखूँगा।"
घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये।
एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह अखबार वाला रमेश बाबू के आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “बाबू जी! बिटिया का विवाह है..... आप को सपरिवार आना है।“
निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को रमेश बाबू ने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे उनके मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की ?"
उसने भी जाने उनके इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, बाबू जी! मेरी ही बेटी।"
रमेश बाबू अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोले , “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“
“हाँ बाबू जी! मेरी लड़की ने एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी एमडी है ....... और बाबू जी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”
रमेश बाबू किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े सोच रहे थे कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा बाबू जी! अब चलता हूँ..... अभी और कई कार्ड बाँटने हैं...... आप लोग आइयेगा अवश्य।"
रमेश बाबू ने भी फिर सोचा... आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर उन्होंने उसे विदाई दे दी।
उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह पुनः रमेश बाबू के आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी के किसी नामी कंपनी में कहीं कार्यरत था। हां जर्मनी में भी जैन भोजन की व्यवस्था है।प्लेन में भी जैन भोजन आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
उत्सुक्तावश रमेश बाबू ने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?
उसने कहना शुरू किया....“बाबू जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है , फिर भी कुछ आपको बताए देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था । साथ ही अपने दैनिक जीवन में हम प्रतिदिन भगवान की पूजा अभिषेक अर्चना करते हुए नियम से मोक्ष मार्गीयो के लिए अपनी आमदनी का दस प्रतिशत दान करते है। व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि अनावश्यक किसी भी वस्तु का परिग्रह नहीं हां कोई भी अतिथि के अलावा निर्धन लोगों की आवश्यकता के अनुसार सहयोग। हां जब से परिवार में नियम का पालन करने से हमें किसी भी प्रकार की तकलीफों का सामना नहीं करना पड़ा।
हां बच्चों को जन्म से हमने आलू प्याज लहसुन आदि जमीकंद व तामसिक भोजन नहीं खिलाया। परिवार के सभी सदस्यों का रात्रि भोजन का त्याग आजीवन का नियम है।
बच्चों ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रखी । बाबू जी! आज का दिन मेरे बच्चों के उसी त्याग औऱ तपस्या का परिणाम है।
उसकी बातों को रमेश बाबू बड़ी तन्मयता के साथ लगातार चुपचाप सुनते रहे औऱ बस यही सोचते रहे कि आज के बच्चों की कैसी मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर लगातार अपनी ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं....।
*🕉️🎪🔔⏰👪विशेष :- भव्य आत्माओं,अपने माता पिता के साथ हमेशा सच्चे धर्म के अच्छे व्यवहार करके ही आप अपने जीवन के लक्ष्यों को हासिल कर सकते है।उनसे ऐसी किसी प्रकार की मांग ना करें जो वो पूरी नही कर सकते,साथ ही माता पिता की भी जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों पर ध्यान देवे की जब बालक गर्भ में आने वाला है तब से ही जैन धर्म के संस्कारों को मजबूत बनाते हुए संस्कारों में दृढ़ संकल्प पूर्वक जीवन सार्थक करें। जबतक देव शास्त्र गुरु पर अटूट श्रृद्धा नहीं होगी तब तक कुछ नहीं होगा। आज वर्तमान में भगवान को मानने वालों की संख्या 90 प्रतिशत है जबकि भगवान की कहीं गयी बातें मानने वालों की संख्या मात्र तीन प्रतिशत है। आप स्वयं का आकलन करें कि आप कहां है।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जीत कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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