सोमवार, 31 जनवरी 2022

वर्तमान की सच्चाई

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*🌳🦚वर्तमान की सच्चाई💐💐*

सर्दियों के मौसम में एक बूढ़ी औरत अपने घर के कोने में ठंड से तड़प रही थी। जवानी में उसके पति का देहांत हो गया था। घर मे एक छोटा बेटा था। बेटे के उज्ज्वल भविष्य के लिये उस माँ ने घर-घर जाकर काम किया,

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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काम करते करते बहुत थक जाती थी लेकिन फिर भी आराम नही करती थी। हमेशा एक बात याद करके फिर काम मे लग जाती थी कि जिस दिन बेटा लायक हो जाएगा तभी आराम करेगी।
 
देखते देखते समय बीत गया माँ बूढ़ी हो गयी और बेटे को एक अच्छी नौकरी मिल गयी कुछ समय बाद बेटे की शादी कर दी और एक बच्चा हो गया । 

अब बूढ़ी माँ बहुत खुश थी उसके जीवन का सबसे बड़ा सपना पूरा हो गया उसका बेटा लायक हो गया अब उसका बेटा उसकी हर ख्वाहिश पूरी करेगा।

लेकिन ये क्या ...


बेटे और बहू के पास माँ से बात करने तक का वक्त नही होता था।

बस इतना फर्क पड़ा था माँ के जीवन मे कि पहले वो बाहर के लोगो के जूठे बर्तन धोती थी अब अपने बेटे और बहू के। 

पहले वो बाहर के लोगो के कपड़े धोती थी अब अपनी बहू और बेटे के फिर भी खुश थी 

क्योंकि ...

औलाद तो उसकी थी। सर्दियों का मौसम आ गया था एक टूटी चार पाई पर घर के बिल्कुल बाहर वाले कमरे में एक फ़टे कम्बल में सिमटकर माँ लेटी थी और सोच रही थी कि आज बेटा आएगा तो उससे कहूंगी कि तेरी माँ को बहुत ठंड लगती है एक नया कम्बल लाकर दे दे।

 शाम को बेटा घर आया तो माँ ने बोला- बेटा ! ठंड बहुत है, मुझे बहुत ठंड लगती है और बात ठंड की नही है मैं बूढ़ी हो गयी हु इसलिए शरीर मे जान नही है इस फ़टे कम्बल में ठंड रुकती नही है बेटा कल एक कम्बल लाकर दे दे। 

बेटा गुस्से से बोला इस महीने घर के राशन में और बच्चे के एडमीशन में बहुत खर्चा हो गया है, पोते को स्कूल में एडमिशन कराना है कुछ पैसे है लेकिन उससे बच्चे का स्वेटर लाना है, 

तुम्हारी बहु के लिए एक शॉल लाना है तुम तो घर मे ही रहती हो सहन कर सकती हो, हमे बाहर काम करने के लिए जाना होता है सिर्फ दो महीने की सर्दी निकाल लो अगली सर्दी में देखेंगे। 

बेटे की बात सुनकर माँ चुपचाप उस कम्बल में सिमटकर सो गई।

 अगली सुबह देखा तो माँ अब इस दुनिया मे नही थी बेटे ने सबको खबर दी कि माँ अब इस दुनिया मे नही है सभी रिश्तेदार, दोस्त पड़ोसी इकठ्ठे हो गए बेटे ने मां की अंतिम यात्रा में कोई कमी नही छोड़ी थी। 

माँ की बहुत बढ़िया अर्थी सजाई थी बहुत महंगा शाल माँ को ओढाया था।सारी दुनिया माँ का अंतिम संस्कार देखकर कह रही थी हमें भी हर जन्म में भगवान ऐसा ही बेटा दे *_मगर उनलोगों को क्या पता कि मरने के बाद भी एक माँ ठंड से तड़प रही थी सिर्फ एक कम्बल के लिए..._*

*मित्रों अगर आपके माँ बाप आज आपके साथ है तो आप बहुत भाग्यशाली है आज आप जो कुछ भी हो वो उन्ही की मेहनत और आशीर्वाद से हो। जीते जी अपने माँ बाप की सेवा करना आपका पहला कर्तव्य है क्योंकि उन्होंने आपके लिए अपना पूरा जीवन दे दिया है ।*
*अपने माता पिता की जीते जी इज्जत करें,प्रेम करें!*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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रविवार, 30 जनवरी 2022

सच्ची तपस्या


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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सच्ची तपस्या💐💐*

भगवान शंकर को पति के रूप में पाने हेतु माता-पार्वती कठोर तपस्या कर रही थी। उनकी तपस्या पूर्णता की ओर थी। एक समय वह भगवान के चिंतन में ध्यान मग्न बैठी थी। उसी समय उन्हें एक बालक के डुबने की चीख सुनाई दी। माता तुरंत उठकर वहां पहुंची। उन्होंने देखा एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है।

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बालक अपनी जान बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, तथा मगरमच्छ उसे आहार बनाने का। करुणामयी मां को बालक पर दया आ गई। उन्होंने मगरमच्छ से निवेदन किया कि बालक को छोड़ दीजिए इसे आहार न बनाएं। मगरमच्छ बोला माता यह मेरा आहार है मुझे हर छठे दिन उदर पूर्ति हेतु जो पहले मिलता है, उसे मेरा आहार ब्रह्मा ने निश्चित किया है। माता ने फिर कहा आप इसे छोड़ दे इसके बदले मैं अपनी तपस्या का फल दुंगी। ग्राह ने कहा ठीक है। माता ने उसी समय संकल्प कर अपनी पूरी तपस्या का पुण्य फल उस ग्राह को दे दिया।

ग्राह तपस्या के फल को प्राप्त कर सूर्य की भांति चमक उठा। उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो गई। उसने कहां माता आप अपना पुण्य वापस ले लें। मैं इस बालक को यू हीं छोड़ दुंगा। माता ने मना कर दिया तथा बालक को गोद में लेकर ममतामयी माता दुलारने लगी। बालक को सुरक्षित लौटाकर, माता ने अपने स्थान पर वापस आकर तप शुरु कर दिया।

भगवान शिव तुरंत ही वहां प्रकट हो गए, और बोले पार्वती अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है। हर प्राणी में मेरा ही वास है, तुमने उस ग्राह को तप का फल दिया वह मुझे ही प्राप्त हुआ। अत: तुम्हारा तप फल अनंत गुना हो गया। तुमने करुणावश द्रवित होकर किसी प्राणी की रक्षा की अत: मैं तुम पर प्रसन्न हूं तथा तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूं।

मित्रों" कथा का सारंश यही है कि जो परहित की कामना करता है। उस पर परमात्मा की असीम कृपा होती है। जो व्यक्ति असहायों की सहायता, दयालु प्रेमी करुणाकारी होता है। ईश्वर उसको स्वीकार करते हैं। यह कथा शिवपुराण में उल्लेखित है।
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*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शनिवार, 29 जनवरी 2022

सामान्य ज्ञान

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सामान्य ज्ञान*

*☘️माँसाहारी या शाकाहारी☘️* -
    *कैसे पहचानेंगे??*

☘️असम में एक शिशु मन्दिर में जाना हुआ तो बच्चों में बड़ा उत्साह था जैसे किसी जादूगर के आने पर होता है,,

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

बात शुरू हुई तो मैंने बच्चों से पूछा – आप लोग कहीं जा रहे हैं, सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा, तो प्रश्न यह है कि आप कैसे पहचानेंगे कि वह जीव *अंडे* देता है *या  बच्चे*?  क्या पहचान है उसकी?

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बच्चे मौन रहे बस आंतरिक खुसर फुसर चलती रही..... 

मिनट दो मिनट बाद मैंने ही बताया कि बहुत आसान है,, जिनके भी *कान बाहर* दिखाई देते हैं *वे सब बच्चे देते हैं* और जिन जीवों के *कान बाहर नहीं* दिखाई देते *वे अंडे* देते हैं.... 

फिर दूसरा प्रश्न पूछा – ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया,, आप कैसे पहचानेंगे की यह *शाकाहारी है या मांसाहारी?*  क्योंकि आपने तो उसे भोजन करते देखा नहीं है, बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें..... 

मैंने कहा – देखो भाई बहुत आसान है,, जिन जीवों की *आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल है वे सब माँसाहारी हैं*  जैसे कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील,, या अन्य कोई भी आपके आस पास का जीव जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी है,, ठीक उसी तरह जिसकी *आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए है, वे सब शाकाहारी हैं*  जैसे हिरन,, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है  .... 

अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली,,, सब बच्चों ने कहा कि लंबाई वाली,, मैंने फिर पूछा कि यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी??सबका उत्तर था #शाकाहारी,,

फिर दूसरी बात यह बताई कि जिन भी *जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं वे सब माँसाहारी* होते हैं  जैसे शेर बिल्ली, कुत्ता बाज गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव.... 

जिनके *नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब शाकाहारी* होते हैं  जैसे गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, बकरी..... 

अब ये बताओ बालकों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले हैं या चौड़े चपटे??

बालकों ने कहा कि चौड़े चपटे,, अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौनसे जीवों की श्रेणी में हुआ??सब बालकों ने कहा कि शाकाहारी,,,

फिर तीसरी बात बताई,, जिन भी *जीवों पशु प्राणियों को पसीना आता है वे सब शाकाहारी* होते हैं जैसे घोड़ा बैल गाय भैंस खच्चर आदि अनेकों प्राणी... 

*माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी #जीभ निकालकर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं* इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं.... 

तो प्रश्न यह है कि मनुष्य को पसीना आता है या जीभ से एडजस्ट करता है??

बालकों ने कहा कि पसीना आता है,अच्छा यह बताओ कि इस बात से मनुष्य कौनसा जीव सिद्ध हुआ, सबने एकसाथ कहा – शाकाहारी... 

*☘️अब आप ही डिसाइड करें कि मनुष्य को नॉनवेज खाना चाहिए या नही☘️*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

आज की आवश्यकता

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒*आज की आवश्यकता 💐💐*

छोटे ने कहा," भैया, दादी कई बार कह चुकी हैं कभी मुझे भी अपने साथ होटल ले जाया करो."
गौरव बोला, " ले तो जायें पर चार लोगों के खाने पर कितना खर्च होगा।
 
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याद है, पिछली बार जब हम तीनों ने डिनर लिया था, तब सोलह सौ का बिल आया था।

 हमारे पास अब इतने पैसे कहाँ बचे हैं।

 पिंकी ने बताया," मेरे पास पाकेटमनी के कुछ पैसे बचे हुए हैं।

 तीनों ने मिलकर तय किया कि इस बार दादी को भी लेकर चलेंगे।

 इस बार मँहगी पनीर की सब्जी की जगह मिक्सवैज मँगवायेंगे और आइसक्रीम भी नहीं खायेंगे।

छोटू, गौरव और पिंकी तीनों दादी के कमरे में गये और बोले,दादी इस' संडे को लंच बाहर लेंगे, चलोगी हमारे साथ।
दादी ने खुश होकर कहा," तुम ले चलोगे अपने साथ."
 "हाँ दादी "

*संडे को दादी सुबह से ही बहुत खुश थी.*
 आज उन्होंने अपना सबसे बढिया वाला सूट पहना, हल्का सा मेकअप किया, बालों को एक नये ढंग से बाँधा.।
आँखों पर सुनहरे फ्रेमवाला नया चश्मा लगाया।
यह चश्मा उनका मँझला बेटा बनवाकर दे गया था जब वह पिछली बार लंदन से आया था।
 किन्तु वह उसे पहनती नहीं थी, कहती थी, इतना सुन्दर फ्रेम है, पहनूँगी तो पुराना हो जायेगा।

 आज दादी शीशे में खुद को अलग अलग एंगिल से कई बार देख चुकी थी और संतुष्ट थी।

बच्चे दादी को बुलाने आये तो पिंकी बोली,"अरे वाह दादी, आज तो आप बडी क्यूट लग रही हैं"।

गौरव ने कहा," आज तो दादी ने गोल्डन फ्रेम वाला चश्मा पहना है. क्या बात है दादी किसी ब्यायफ्रैंड को भी बुला रखा है क्या."दादी शर्माकर बोली, " धत."

होटल में सैंटर की टेबल पर चारो बैठ गए,
 थोडी देर बाद वेटर आया, बोला, " आर्डर प्लीज ".
अभी गौरव बोलने ही वाला था कि दादी बोली," आज आर्डर मैं करूँगी क्योंकि आज की स्पेशल गैस्ट मैं हूँ."
 
दादी ने लिखवाया- दालमखनी, कढाईपनीर, मलाईकोफ्ता, रायता वैजेटेबिल वाला, सलाद, पापड, नान बटरवाली और मिस्सी रोटी.*
हाँ खाने से पहले चार सूप भी.

तीनों बच्चे एकदूसरे का मुँह देख रहे थे.
थोडी देर बाद खाना टेबल पर लग गया.
खाना टेस्टी था,
 जब सब खा चुके तो वेटर फिर आया, "डेजर्ट में कुछ सर".
 दादी ने कहा,  " हाँ चार कप आइसक्रीम ". 
तीनों बच्चों की हालत खराब, अब क्या होगा, दादी को मना भी नहीं कर सकते पहली बार आईं हैं।

*बिल आया,*
इससे पहले गौरव उसकी तरफ हाथ बढाता,
बिल दादी ने उठा लिया और कहा," आज का पेमेंट मैं करूँगी।
*बच्चों मुझे तुम्हारे पर्स की नहीं,*
*तुम्हारे समय की आवश्यकता है,*
 *तुम्हारी कंपनी की आवश्यकता है.* 
*मैं पूरा दिन अपने कमरे में अकेली पडे पडे बोर हो जाती हूँ.*
*टी.वी. भी कितना देखूँ,,*
*मोबाईल पर भी चैटिंग कितना करूँ.*
*बोलो बच्चों क्या अपना थोडा सा समय मुझे दोगे,"*
*कहते कहते दादी की आवाज भर्रा गई.* 

*पिंकी अपनी चेयर से उठी,*
*उसने दादी को अपनी बाँहों में भर लिया और फिर दादी के गालों पर किस करते हुए बोली," मेरी प्यारी दादी जरूर."*
गौरव ने कहा, " यस दादी, हम प्रामिस करते हैं, कि रोज आपके पास बैठा करेंगे
और तय रहा कि हर महीने के सैकंड संडे को लंच या डिनर के लिए बाहर आया करेंगे और पिक्चर भी देखा करेंगे."

दादी के होठों पर 1000 वाट की मुस्कुराहट तैर गई,
*आँखों में फ्लैशलाइट सी चमक आ गई और चेहरे की झुर्रियाँ खुशी के कारण नृत्य सा करती महसूस होने लगीं...-*
*मित्रों,*
*बूढ़े मां-बाप रूई के गठठर समान होते है,*
*शुरू में उनको बोझ नहीं महसूस होता, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ जैसे रुई भीग कर बोझिल होने लगती है. वैसे जिंदगी की थकान बोझ लगती है।*
*बुजुर्ग समय चाहते हैं पैसा नही,*
*पैसा तो उन्होंने सारी जिंदगी आपके लिए कमाया-की बुढ़ापे में आप उन्हें समय देंगे।* 
*यदि वृक्ष से फल न मिले,*
*तो कोई बात नहीं,*
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गुरुवार, 27 जनवरी 2022

आत्मनिर्भर

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒आत्मनिर्भर💐💐*

दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले, साथ में उनकी पत्नी भी थी, सज्जन की उम्र लगभग 80 की रही होगी,मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 के पार ही होंगी, पत्नी खिड़की की ओर बैठी थी, सज्जन बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था, प्लेन के उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने खाने का कुछ सामान निकाला और पति की ओर किया, पति कांपते हाथों से धीरे धीरे खाने लगे...

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 फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व हुआ तो उन लोगों ने राजमा चावल का आर्डर किया, दोनों आराम से राजमा चावल खा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक में उन सज्जन ने कोई जूस लिया था... 

 खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल का ढक्कन खोलना शुरु किया तो ढक्कन उनसे खुला ही नहीं, सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे और मैं लगातार उन्हें देखे जा रहा था, मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें दिक्कत हो रही थी तो शिष्टाचार वश मैंने कहा :- लाइए, मैं खोल देता हूं !

 सज्जन ने मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और बोले :- बेटा जी, ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा ! मैंने कुछ कहा नहीं लेकिन प्रश्नभरी निगाहों से उन्हें देखता रहा...

 ये सज्जन ने कहा :- बेटा जी, आज तो आप खोल देंगे लेकिन अगली बार कौन खोलेगा, इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए, पत्नी भी पति की ओर देख रही थी, जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था, लेकिन सज्जन उसे खोलने की कोशिश में लगे रहे और बहुत कोशिशों के बाद अंततः उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया, दोनों आराम से जूस पी रहे थे...

 मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में जिंदगी का *एक सबक मिला,* सज्जन ने मुझे बताया :- हमने एक नियम बना रखा है अपना हर काम खुद ही करना है..., घर में बच्चे हैं, हंसता खेलता परिवार है, सब साथ ही रहते हैं लेकिन अपनी रोज की जरूरतों के लिए केवल पत्नी की ही मदद लेते हैं, बाकी किसी की नहीं, दोनों एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं...

 सज्जन ने मुझसे कहा :- *जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए,* एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो बेटा, समझो बिस्तर पर ही पड़ जाउंगा, फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं वो काम उससे, फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा, अभी चलने में पांव कांपते हैं,खाने में भी हाथ कांपते हैं लेकिन जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए... 

  हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे, हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं,बेटे बहू कहते हैं कि अकेले आपको दिक्कत होगी लेकिन उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना फिरना बंद करके खुद को घर में बंद कर लेंगे, सारी जिंदगी खूब काम किया, अब सब कुछ बेटों को देकर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं और हम दोनों उसी से आराम से घूमते हैं, जहां जाना होता है, एजेंट टिकट बुक करा देता है, टैक्सी घर पर आ जाती है,वापसी में एयरपोर्ट पर ही टैक्सी आ जाती है ! होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है, स्वास्थ्य व उम्र के अनुसार सब एकदम ठीक है, बस, कभी कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती लेकिन थोड़ा दम लगाओ तो वो भी खुल जाती है...

*मेरी तो आंखें ही खुली रह गई, मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा लेकिन यहां तो कुछ ही पलों में मैंने पूरे जीवन की ही फिल्म देख ली ! एक ऐसी फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था...*

*दोस्तो, जब तक हो सके "आत्मनिर्भर" रहो, जहां तक संभव हो, अपना काम स्वयं ही करें...*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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बुधवार, 26 जनवरी 2022

संस्कारवान परिवार

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒संस्कारवान परिवार💐💐*

सात वर्षीय बेटी दूसरी कक्षा में प्रवेश पा गयी..... 
क्लास में  हमेशा से अव्वल आती रही है पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गया....

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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बेटी ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है वो अभी इस साल काम दे सकते हैं..... 
अपने जूतों की बजाए उसने मुझे अपने दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा... 
मैंने सोचा बेटी अपने दादा से शायद बहुत प्यार करती है इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रही है....

खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा.....
दुकानदार ने बेटी के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली... डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी फिर भी बेटी ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा....

मैंने बेटी से कहा....आराध्या बेटा.... ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है तो फिर और लम्बी क्यों ....
बेटी ने कहा .... पापा जी मुझे शर्ट स्कर्ट के अंदर ही डालनी होती है इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा.....
लेकिन यही शर्ट मुझे अगली क्लास में भी काम आ जाएगी....पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी ही पड़ी है लेकिन छोटी होने की वजह से मैं उसे पहन नहीं पा रही 

मैं खामोश रहा....

घर आते वक़्त मैंने बेटी से पूछा.... तुम्हे ये सब बातें कौन सिखाता है आराध्या....

आराध्या बोली....पापा जी मैं अक्सर देखती हूँ कि कभी माँ अपनी साडी छोड़कर तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पर पैसे खर्च कर दिया करते है

गली- मोहल्ले में सब लोग कहते हैं के आप बहुत ईमानदार आदमी हैं और हमारे साथ वाले दीपक के पापा को सब लोग चोर, कुत्ता, बे-ईमान, रिश्वतखोर और जाने क्या क्या कहते है जबकि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं......
जब सब लोग आपकी तारीफ़ करते हैं तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है ..., मम्मी और दादा जी भी आपकी तारीफ करते है

पापा जी मैं चाहती हूँ कि मुझे कभी जीवन में नए कपडे, नए जूते मिले या ना मिले..... लेकिन कोई आपको चोर, बे-ईमान, रिश्वतखोर या कुत्ता न कहे..... 
मैं आपकी ताक़त बनना चाहती हूँ पापा जी...आपकी कमजोरी नहीं

बेटी की बात सुनकर मैं निरुतर था

आज मुझे पहली बार मुझे मेरी ईमानदारी का इनाम मिला था....
आज बहुत दिनों बाद आँखों में ख़ुशी, गर्व और सम्मान के आंसू थे....
दोस्तो .....दुनिया में सबसे बडा  खूबसूरत इनाम स्वयं संस्कारों का पालन करते हुए अपने परिवार अपने बच्चों के आत्मा में सच्चे संस्कारों को स्थापित करना। तीन लोक में स्वयं को एक हीरो की तरह देखना ....आपके बच्चे आपको अपना आदर्श मानते है आपको प्यार और सम्मान देते है मेरी नजर में इससे बडा इनाम आपकी मेहनत लग्न का नहीं हो सकता ......अपने अपनो के लिए आदर्श बनिए ताकि वह भी गर्वित होकर कहे ....ये है मेरे मम्मी पापा...
"दोस्तो #मान और #सम्मान पैसो से नही #सच्चे जैनसंस्कारो से मिलता है.."
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

अनमोल सीख

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒अनमोल सीख 💐💐*

दादा जी गली में ही टहल रहे थे,

निशा भी उनके साथ हो ली बस अभी चार कदम ही चले थे कि करीब चालीस  पैंतालीस की उम्र का एक भिखारी  गली में रुक रुक कर आते जाते लोगों से कुछ माँगता दिखाई दिया ..।

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निशा ने दादाजी से पूछा-"दादाजी, क्या इस उम्र तक आते-आते भी इस व्यक्ति ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की कि  इसे मांगना ना पड़े..?

दादा जी कुछ कह पाते इसके पहले ही वह उनके पास आ चुका था, उनकी  तरफ हाथ बढ़ाकर कुछ माँगने लगा... दादा जी अपने पाजामे की जेब टटोलने लगे... हाथ में दो रुपये का सिक्का लगा उन्होंने वह उसे दे दिया...., 

परंतु यह क्या! 

उस भिखारी ने जैसे ही देखा कि सिक्का दो रुपए का है... 

बड़ी हिकारत से दादाजी की तरफ देखा और उस सिक्के को जमीन पर फेंक दिया।

निशा को यह दादाजी के अपमान जैसा लगा उसका चेहरा तमतमा उठा, 

उसने भिखारी को कुछ  कहने के लिए मुँह खोला....तो दादाजी ने उसे रोक दिया और उसका हाथ पकड़ कर आगे बढ़ गए। 

अब दादा जी ने कहा-" निशा बेटा,जो कण की कीमत नहीं समझता धन उसके पास कभी नहीं आता.....

उसने खुद बता दिया कि वह भिखारी क्यों है।"

निशा को जीवन की एक अनमोल सीख मिल गई थी।
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सोमवार, 24 जनवरी 2022

सच्ची शिक्षा

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒*सच्ची शिक्षा💐💐*

एक संन्यासी घूमते-फिरते एक दुकान पर आये, दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, संन्यासी के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए संन्यासी ने दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है ?

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दुकानदार ने कहा - इसमे नमक है ! संन्यासी ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है ? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है ! इसी प्रकार संन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा, अंत में पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, संन्यासी ने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है ? दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है !

संन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा राम-राम ? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई ? मैंने तो इस नाम के किसी सामान के बारे में कभी नहीं सुना। दुकानदार संन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला - महात्मन ! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं ! संन्यासी की आंखें खुली की खुली रह गई !

जिस बात के लिये मैं दर-दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यापारी से समझ आ रही है। वो संन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा,,, ओह, तो खाली में राम रहता है !

सत्य है भाई भरे हुए में राम को स्थान कहाँ ? काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ? राम यानी ईश्वर तो खाली याने साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है !

*एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी ! आज संन्यासी अपने आनंद में था।*
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रविवार, 23 जनवरी 2022

मिथ्या गर्व का परिणाम

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒मिथ्या गर्व का परिणाम💐💐*
समुद्र तट के किसी नगर में एक धनवान वैश्य के पुत्रों ने एक कौआ पाल रखा था | वह उस कोए को बार-बार अपने भोजन से बचें अन्न देते थे | उनकी जूठन खाने वाला वह कौआ स्वादिष्ट और पौष्टिक भोजन खाकर खूब मोटा हो गया था | इससे उसका अहंकार बहुत बढ़ गया | वह अपने से श्रेष्ठ पक्षियों को भी तुच्छ समझने और उनका अपमान करने लगा |
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एक दिन समुद्र तट पर कहीं से उड़ते हुए आकर कुछ हंस उतरे | वैश्य के पुत्र उन हसों की प्रशंसा कर रहे थे | यह बात कौए से सही नहीं गई | वह उन हसों के पास गया और उसे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हंस प्रतीत हुआ | उससे बोला -” मैं तुम्हारे साथ प्रतियोगिता करके उड़ना चाहता हूं |”

हैंस ने उसे समझाया – ” भैया ! हम तो दूर-दूर उड़ने वाले हैं | हमारा निवास मानसरोवर यहां से बहुत दूर है | हमारे साथ प्रतियोगिता करने से तुम्हें क्या लाभ होगा | तुम हंसो के साथ कैसे उड़ सकते हो |”

कोए ने गर्व में आकर कहा – ” मैं उड़ने की सो गतियां जानता हूं | और प्रत्येक से सो योजन तक उड़ सकता हूं | उडीन, अवडीन, प्रडीन, डीन आदि अनेकों गतियों के नाम गिनाकर वह बकवादी कोआ बोला – ” बतलाओ ! इनमें से तुम किस गति से उड़ना चाहते हो |”

तब श्रेष्ठ हंस ने कहा – ” काक ! तुम तो बड़े निपुण हो | परंतु मैं तो एक ही गति जानता हूं | जिसे सब पक्षी जानते हैं, मैं उसी गति से उडूगा |

गर्वित कोए का गर्व और बढ़ गया – ” वह बोला अच्छी बात तुम जो गति जानते हो उसी से उड़ो |”

उस समय कुछ पंछी वहां और आ गए थे | उनके सामने ही हंस और कौआ दोनों समुद्र की ओर उड़े | समुद्र के ऊपर आकाश में वह कौआ नाना प्रकार की कलाबाजियां दिखाता, पूरी शक्ति से उड़ा और हस से कुछ आगे निकल गया | हंस अपनी स्वाभाविक मंद गति से उड़ रहा था | यह देखकर दूसरे कोए प्रसन्नता प्रकट करने लगे |

थोड़ी देर में ही कौए के पंख थकने लगे | वह विश्राम के लिए इधर-उधर वृक्ष युक्त द्वीपों की खोज करने लगा | परंतु उसे उस अनंत सागर के अतिरिक्त कुछ दिख नहीं पड़ता था | इतने समय में हंस उड़ता हुआ उससे आगे निकल गया था | कोए की गति मंद हो गई | वह अत्यंत थक गया, और ऊंची तरंगों वाले भयंकर जीवों से भरे समुंद्र की लहरों के पास गिरने की दशा में पहुंच गया |

हंस ने देखा कि कौआ बहुत पीछे रह गया है, तो रुक गया | उसने कौए के समीप आकर पूछा – ” काक ! तुम्हारी चौच और पंख बार-बार पानी में डूब रहे हैं | यह तुम्हारी कौन सी गति है |

हंस की व्यंग्य भरी बात सुनकर कौआ बड़ी दीनता से बोला – ” हंस ! हम कोए केवल कांव-कांव करना जानते हैं | हमें भला दूर तक उड़ना क्या आएगा | मुझे अपनी मूर्खता का दंड मिल गया | कृपया करके अब मेरे प्राण बचा लो |

जल से भीगे अचेत और अधमरे कोए पर हंस को दया आ गई | पैरों से उसे उठाकर हंस ने उसे पीठ पर रख लिया और उसे लादे हुए उड़कर वहां आया जहां से दोनों उड़े थे | हंस ने कौए को उसके स्थान पर छोड़ दिया |
*🕉️🌞▶️👨‍👩‍👧‍👦✍️विशेष सत्य :- आज वर्तमान में हममें से 90% लोग अपने पदों का व अन्य बातों का अभिमान करते हैं। अपने क्रियाकलापों से  आप स्वयं का आकलन करके  निर्धारित कर सबसे पहले अपना मनुष्य भव सार्थक करें। कोई भी व्यक्ति विशेष अपना कल्याण न करते हुए दुनिया को सुधारने की चिंता में प्रयास कर रहा है।बस यही असफलता व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या है।समस्या व्यक्ति स्वयं है, समाधान भी बाहर नहीं है।अतः इस समस्या का चिंतन अवश्य करें।स्वयं का सुधार ही विश्व का सुधार है।*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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शनिवार, 22 जनवरी 2022

दया व व्यापार

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒*दया व व्यापार👨‍👩‍👧‍👦✍️*

*जब मैं छोटा था तो मेरी मां एक प्रौढ़ सब्ज़ीवाली से हमेशा घर के लिए सब्जियां लिया करती थीं...जो लगभग रोज ही हमारे घर एक बड़े टोकरे में ढेर सारी सब्जियां लेकर आया करती थी...इस रविवार को वह पालक के बंडल भी लेकर आयी और दरवाज़े पर बैठ गई...मां ने पालक के दो चार बंडल हाथ में लेकर सब्ज़ीवाली से पूछा :- पालक कैसे दी"...?*
 *👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*
                 *"सस्ता है दीदी एक रुपया बंडल"...सब्ज़ीवाली ने कहा :-  माँ ने कहा "ठीक है दो रुपये में चार बंडल दे दे"...इसके बाद कुछ देर तक दोनों अपने-अपने ऑफर पर झिकझिक खिटपिट करते रहे...सब्ज़ीवाली कुछ नाराज़गी जताते हुए बोली-इतनी तो मेरी खरीदी भी नहीं है...दीदी फिर उसने एक झटके के साथ अपना टोकरा उठाया और उठ कर जाने लगी...*
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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*लेकिन चार कदम आगे बढ़ने के साथ ही पीछे मुड़ी और चिल्लायी...चलो चार बंडल के 3 रु दे देना दीदी आप से ज़्यादा क्या कमाऊंगी मेरी माँ ने अपना सिर "नहीं" में हिलाया...2 रु में 4 बंडल मैं बिल्कुल ठीक बोल रही हूं...क्योंकि तू हमेशा की पुरानी सब्जीवाली है...चल अब दे भी दे परंतु सब्जीवाली रुकी नहीं आगे बढ़ गई...शायद वे दोनों एक-दूसरे की रणनीतियों को भली-भांति जानते थे और यह खरीदने और बेचने वालों के बीच रोज ही होता होगा...*
              *8-10 कदम जाकर सब्ज़ीवाली मुड़ी और हमारे दरवाजे पर वापस आ गई माँ दरवाजे पर ही इंतज़ार कर रही थी...सब्ज़ीवाली अपना टोकरा सामने रख कर कुछ ऐसे बैठ गयी जैसे कि वह किसी सम्मोहन की समाधि में हो...*

 *मेरी माँ ने अपने दाहिने हाथ से प्रत्येक बंडल को टोकरे से निकाल-निकाल कर कर दूसरे हाथ की खुली हथेली पर हल्के से मारा...और इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी के सीखे हुए मात्रात्मक व गुणात्मक और आलोचनात्मक मानदंडों से प्रत्येक बंडल की जाँच करके अपनी संतुष्टि से चार बंडलों का चयन किया...सब्जी वाली ने पालक के बाकी बंडलों को फिर से अपने टोकरे में सजाया और भुगतान लेकर अपने बटुए में डाल लिए...*
                 *सब्जीवाली ने बैठे ही बैठे टोकरा अपने सर पर रखा और उठने लगी लेकिन टोकरा सिर पर रखकर जैसे ही वह उठने लगी वह उठ न सकी और धप से नीचे बैठ गई...मेरी माँ ने उसका हाथ थाम लिया और पूछा...*

 *क्या हुआ...? चक्कर आ गया क्या...? क्या सुबह कुछ नहीं खाया था"...? सब्जी-वाली ने कहा नहीं दीदी...चावल कल खत्म हो गया था...आज की कमाई से ही मुझे कुछ चावल खरीदना है...घर जाकर पकाना है...उसके बाद ही हम सब खाना खाएंगे...*

                *मेरी माँ ने उसे बैठने के लिए कहा...फिर फुर्ती से अंदर चली गई चपाती व सब्ज़ी के साथ तेजी से वापस आई और सब्ज़ीवाली को दी...एक गिलास में पानी उसके सामने रखा और सब्जीवाली से कहा धीरे-धीरे खाना मैं तेरे लिए चाय बना रही हूं...सब्जी वाली भूखी थी...उसने कृतज्ञतापूर्वक रोटी खायी व पानी पिया और चाय समाप्त की...*
   
*मेरी माँ को बार-बार दुआएं देने लगी...माँ ने टोकरा उनके सिर पर रखने में उसकी सहायता की। फिर वह सब्ज़ीवाली चली गई...मैं हैरान था...मैंने माँ से कहा :-*

                  *माँ...आप ने दो रुपये की पालक की भाजी के लिए मोलभाव करने में इतनी कठोरता दिखाई...लेकिन उस सब्जीवाली को इतने अधिक मूल्य का भोजन देने में कई गुना अधिक उदार बन गयी...यह मेरे समझ में नहीं आया..मेरी माँ मुस्कुराई और बोली :-*
 
*बेटा एक बात ध्यान रखना...*

               *व्यापार में कोई दया नहीं होती और दया में कोई व्यापार नही होता"...*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

ज्ञानपूर्वक आचरण

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 किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे। सन्यासियों वाली वेश भूषा थी और बातों में सदाचार का भाव, चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी इंसान उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था।
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*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे। वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि आप अमीर भी नहीं है, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं, आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं ? महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार के दी और कहा कि आप इसे बाजार में बेच कर आएं और इसके बदले एक सोने माला लेकर आना। अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जाके उस अंगूठी के बदले सोने की माला मांगने लगा। लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था।थकहार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला कि इस अंगूठी की तो कोई कीमत ही नहीं है। महात्मा जी मुस्कुराये और बोले कि अब इस अंगूठी को पीछे वाली एक गली में सुनार की दुकान पर ले जाओ।व्यक्ति जब सुनार की दुकान पर गया तो सुनार ने एक माला नहीं बल्कि पांच माला अंगूठी के बदले देने को कहा। व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि इस मामूली से अंगूठी के बदले कोई पीतल की माला देने को तैयार नहीं हुआ लेकिन ये सुनार कैसे 5 सोने की माला दे रहा है। व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास गया और उनको सारी बातें बतायीं। अब महात्मा जी बोले कि चीजें जैसी ऊपर से दिखती हैं, अंदर से वैसी नहीं होती। ये कोई मामूली अंगूठी नहीं है बल्कि ये एक हीरे की अंगूठी है जिसकी पहचान केवल सुनार ही कर सकता था। इसलिए वह 5 माला देने को तैयार हो गया। ठीक वैसे ही मेरी वेशभूषा को देखकर तुम मुझसे प्रभावित नहीं हुए। लेकिन ज्ञान का प्रकाश लोगों को मेरी ओर खींच लाता है। व्यक्ति महात्मा जी की बातें सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ। 

कपड़ों से व्यक्ति की पहचान नहीं💐💐*

 किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे। सन्यासियों वाली वेश भूषा थी और बातों में सदाचार का भाव, चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी इंसान उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था।
 
एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे। वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि आप अमीर भी नहीं है, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं, आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं ? महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार के दी और कहा कि आप इसे बाजार में बेच कर आएं और इसके बदले एक सोने माला लेकर आना। अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जाके उस अंगूठी के बदले सोने की माला मांगने लगा। लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था।थकहार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला कि इस अंगूठी की तो कोई कीमत ही नहीं है। महात्मा जी मुस्कुराये और बोले कि अब इस अंगूठी को पीछे वाली एक गली में सुनार की दुकान पर ले जाओ।व्यक्ति जब सुनार की दुकान पर गया तो सुनार ने एक माला नहीं बल्कि पांच माला अंगूठी के बदले देने को कहा। व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि इस मामूली से अंगूठी के बदले कोई पीतल की माला देने को तैयार नहीं हुआ लेकिन ये सुनार कैसे 5 सोने की माला दे रहा है। व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास गया और उनको सारी बातें बतायीं। अब महात्मा जी बोले कि चीजें जैसी ऊपर से दिखती हैं, अंदर से वैसी नहीं होती। ये कोई मामूली अंगूठी नहीं है बल्कि ये एक हीरे की अंगूठी है जिसकी पहचान केवल सुनार ही कर सकता था। इसलिए वह 5 माला देने को तैयार हो गया। ठीक वैसे ही मेरी वेशभूषा को देखकर तुम मुझसे प्रभावित नहीं हुए। लेकिन ज्ञान का प्रकाश लोगों को मेरी ओर खींच लाता है। व्यक्ति महात्मा जी की बातें सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ। 

कपड़ों से व्यक्ति की पहचान नहीं होती बल्कि आचरण और ज्ञान से व्यक्ति की पहचान होती है। 

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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गुरुवार, 20 जनवरी 2022

ईश्वर की पूजा


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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒ईश्वर की पूजा💐💐*
     
मन को वश करके प्रभु चरणों मे लगाना बडा ही कठिन है ।शुरुआत मे तो यह इसके लिये तैयार  ही नहीं होता है । लेकिन इसे मनाए कैसे?

       एक शिष्य थे किन्तु उनका मन किसी भी भगवान की साधना में नही लगता था और साधना करने की इच्छा भी मन मे थी ।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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वे सतगुरु  महाराज के पास गये और कहा कि गुरुदेव मेरा मन लगता नहीं और साधना करने का मन होता है ।कोई ऐसी साधना बताए जो मन भी लगे और साधना भी हो जाये । 

गुरु ने कहा तुम कल आना ।दुसरे दिन वह गुरु के पास पहुँचा तो गुरु ने कहा सामने रास्ते मे कुत्ते के छोटे बच्चे हैं उसमे से दो बच्चे उठा ले आओ और उनकी हफ्ताभर  देखभाल करो ।

गुरु के इस अजीब आदेश सुनकर वह भक्त चकरा गया लेकिन क्या करे, गुरु का आदेश जो था।

उसने 2 पिल्लों को पकड कर लाया लेकिन जैसे ही छोडा वे भाग गये।उसने फिरसे पकड लाया लेकिन वे फिर भागे ।

अब उसने उन्हे पकड लिया और दुध रोटी खिलायी ।अब वे पिल्ले उसके पास रमने लगे। 

हप्ताभर उन पिल्लो की ऐसी सेवा यत्न पूर्वक की कि अब वे उसका साथ छोड नही रहे थे ।वह जहा भी जाता पिल्ले उसके पीछे-पीछे भागते, यह देख  गुरु ने दुसरा आदेश दिया कि इन पिल्लों को भगा दो।

भक्त के लाख प्रयास के बाद भी वह पिल्ले नहीं भागे तब गुरु ने कहा देखो बेटा शुरुआत मे यह बच्चे तुम्हारे पास रुकते नही थे लेकिन जैसेही तुमने उनके पास ज्यादा समय बिताया ये तुम्हारे बिना रहनें को तैयार नही है। 

ठीक इसी प्रकार खुद  जितना ज्यादा वक्त भगवान के पास बैठोगे, मन धीरे-धीरे भगवान की सुगन्ध,आनन्द से उनमे रमता जायेगा।

       हम अक्सर चलती-फिरती पूजा करते है तो भगवान में मन कैसे लगेगा? 

जितनी ज्यादा देर ईश्वर के पास बैठोगे उतना ही मन ईश्वर रस का मधुपान करेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि उनके बिना आप रह नही पाओगे ।*

शिष्य को अपने मन को वश में करने का मर्म समझ में आ गया और वह गुरु आज्ञा से पंचपरमेष्ठी का भजन सुमिरन करने चल दिया।

     *बिन सतगुरु सत्यज्ञान कहां से पाऊं*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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बुधवार, 19 जनवरी 2022

सफलताओं के महत्वपूर्ण सूत्र

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒"सफलताओं के कुछ रहस्यमय-सूत्र"*

*यह सभी संवाद गांधीजी के शिष्यों की डायरी से लिया गया है।*
स्वतन्त्रता संग्राम के प्रारम्भिक दिनों की बात है। तब तक मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार नहीं हुआ था। एक उत्साही स्वयं सेवक के रूप में गाँव में ही  सामाजिक कार्यकर्ता था। उन दिनों देहातों में गांधीजी को 'करामाती बाबा' मानते थे और कहते थे अंग्रेज पकड़कर जेल में बन्द करते हैं, और वे अपनी करामात से बाहर निकल जाते हैं। हम तो उन्हें स्वतन्त्रता हेतु भारत में अवतरित देवदूत मानते थे ।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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ऐसी ही योगियों की कथा-किवदन्तियां और भी सुन रखी थीं। मन में आया कि योग सीखने के लिए गांधी जी के पास ही चलना चाहिए। साबरमती अहमदाबाद के पते पर पत्र व्यवहार किया। कुछ समय आश्रम में रहने की आज्ञा माँगी। इसे सुयोग ही कहना चाहिए कि मुझे आज्ञा मिल गई, और दैनिक उपयोग के वस्त्र बिस्तर साथ लेकर अहमदाबाद जा पहुंचा। साबरमती आश्रम में अपना नाम दर्ज करा दिया।

दूसरे दिन से अपने लिए काम पूछा- ड्यूटी टट्टियाँ साफ करने एवं आँगन बुहारने की सभी प्रायः प्रथम आगन्तुक को यहाँ यही शिक्षा दी जाती थी, गन्दगी दूर करना और उसके स्थान पर स्वच्छता बनाना।

मैंने टट्टियाँ अपनी बुद्धि के अनुरूप साफ कीं। पर जब निरीक्षक आये तो उन्हें काम पसन्द नहीं आया। जो त्रुटियां रह गई थीं, सो बताई और कहा कि सफाई ऐसी होनी चाहिए, जैसी रसोई घर में होती है। दूसरी बार मैंने उनकी मर्जी जैसा काम कर दिया। नित्य का सिलसिला यही चलता। निरीक्षक की पसन्दगी का काम करने लगा। सूत कातने सम्बन्धी अन्य काम तो दिनचर्या में सम्मिलित थे ही।

एक दिन लकड़ी चीरने का काम दिया गया। चीर दी। निरीक्षक आये। उनने छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे देखे और कहा—यह किसी के पैर में चुभ सकते हैं। सभी को उठाओ और पतले टुकड़ों को ईंधन में रखो, वैसा कर दिया। वह काम कई दिन हमसे कराया गया।

इसके बाद सूत सम्बन्धी काम, प्रार्थना, सफाई, व्यवस्था आदि के काम कराये जाते रहे। प्रातः सायं जो सामूहिक प्रार्थना होती उसमें सम्मिलित होता रहा।

एक दिन मैंने पेड़ पर से दतौन के लिए लम्बी दातौन तोड़ ली और दाँत घिसने लगा। निरीक्षक थीं मीरा बहना वे दूर से इसे देख रही थीं। पास आकर बोलीं-"इतनी लम्बी दातौन नहीं तोड़नी चाहिए। तोड़नी थी तो उसे ऐसे ही कूड़े की तरह नहीं डालना चाहिए। बचे टुकड़े को किसी और की आवश्यकता पूरी करने के लिए देना चाहिए था। पत्तियाँ कूड़े दान में डालनी चाहिए थीं और घिसते समय जो पानी मुह से निकलता है वह फर्श पर नहीं, नाली में डाला जाना चाहिए। अन्यथा मुंह में कोई छूत/बीमारी हो तो दूसरे को लग सकती है। पानी अधिक खर्च नहीं करना चाहिए था।" मैंने भूल मानी और सुधारी और भविष्य में सावधानी बरतने का आश्वासन दिया, पर इस घटना से बड़ी सिखावन हाथ लग गयी। डायरी रोज लिखता और वह गाँधी जी के पास पहुँचती रहती।

इसी प्रकार के कार्यक्रमों में तीन महीने होने को आये। करामाती योगी बनने के उद्देश्य से आया था। दूसरा गांधी बनना चाहता था, पर वैसी कोई. साधना सीखने का कोई अवसर न मिला। जाने के दिन समीप आने पर बहुत बेचैनी रहने लगी। एक दिन हिम्मत बांधकर गांधीजी के सेक्रेटरी महादेव भाई देसाई के दफ्तर में गया और संकोच पर नियन्त्रण करके आने का उद्देश्य कह सुनाया। देसाई जी हंसे और बोले—"भाई ! हम तो करामाती योगी हैं नहीं। गांधीजी हो सकते हैं। सो कल प्रातःकाल तुम उनके साथ टहलने चले जाना और योगी बनने का राज पूछकर अपना समाधान कर लेना।" इस उत्तर से मुझे सन्तोष हो गया।

गांधीजी प्रातःकाल नित्य टहलते समय किसी को साथ ले जाते थे। उसका समाधान भी हो जाता था व गाँधी जी का भ्रमण भी। प्रातःकाल ५ बजे मैं दरवाजे पर जा खड़ा हुआ और जैसे ही गांधी जी जाये उनके पीछे-पीछे चलने लगा। महादेव भाई ने उन्हें मेरी बात बता दी थी। गाँधी जी ने मुड़ कर पीछे देखा और अपनी टहलने वाली चाल में चल पड़े। रास्ते में पूछा "तुम्हीं गाँधी जी बनने की योग साधना सीखने आये थे!" मैंने हाँ कह दिया। दूसरा प्रश्न पूछा गया -"वैसा कुछ सिखाया गया या नहीं?" मैंने तीन महीने का कार्य विवरण संक्षेप में सुना दिया। *वे बोले- यही है गाँधी बनने की विद्या, जो तुम सीखते रहे।* जिज्ञासा समाधान न होते देख कर उनने टहलते टहलते मुझे एक ऐतिहासिक घटना सुनाई। वैज्ञानिक थामस डेवी की एक घटना। वह लड़का एक गरीब घर में जन्मा। वैज्ञानिक बनने की इच्छा थी। विधिवत् वैज्ञानिक शिक्षा दिलाने की परिवार में परिस्थितियाँ न थीं।

डेवी ने सुझाया, मुझे किसी वैज्ञानिक के यहाँ छोड़ दो।

उसका घरेलू काम काज करता रहूँगा और जो वे सिखा दिया करेंगे, सीखता रहूँगा? ऐसा सुयोग देखने के लिए उसकी माँ कितने ही वैज्ञानिकों के पास ले गई पर सभी ने ऐसा झंझट सिर पालने से स्पष्ट मना कर दिया। एक वैज्ञानिक ने कहा "इसे कल लाना, काम का होगा तो रख लेंगे।"

डेवी की माँ उसे लेकर दूसरे दिन पहुंची। उस वैज्ञानिक ने हाथ में बुहारी थमाई और घर की सफाई करने को कहा। डेवी ने इतनी दिलचस्पी से बुहारी लगाई कि कोई कोना, छत, फर्नीचर, सामान गन्दा न रहा। सब वस्तुए सफाई के बाद इस तरह रखी कि वे सुसज्जित जैसी लगती थी। वैज्ञानिक ने ताड़ लिया कि इसमें काम के प्रति दिलचस्पी तन्मयता और व्यवस्था का माद्दा है। इसे सिखाना सार्थक हो सकता है। यह इस गुण के कारण ही उपयोगी हो सकता है और वैज्ञानिक बन सकता है। लड़के को उनने पास में रख लिया। घरेलू काम करता रहा और पढ़ता रहा क्रमशः उसकी मौलिक जिज्ञासु बुद्धि विकसित होने लगी एवं वह अन्ततः उच्च कोटि का वैज्ञानिक बन गया। उसने कितने ही आविष्कार किये।

*यह प्रसंग सुनाते हुए गाँधी जी ने कहा "यहाँ जो भी काम तुम से कराये गये हैं वे सभी ऐसे थे जिसमें काम के प्रति जिम्मेदारी और दिलचस्पी बढ़े। हमारे अन्दर यही विशेषता है। इसी के सहारे हमारी आदर्शवादिता उठाकर हमें यहाँ तक ले आई है। हमारी सफलता का इतना ही रहस्य है। तुम इस रास्ते पर चलोगे तो जो भी कार्य अपनाजोगे उसमें प्रवीण और सफल होकर रहोगे। चाहे धर्मक्षेत्र हो, राजनीति अथवा अपना पारिवारिक जीवन, सफलता का यही एक राजमार्ग है।"*

बात समाप्त हो गई। *सच्चे योगाभ्यास का रहस्य मेरे हाथ लग गया कि मनुष्य को आदर्शवादी कार्यक्रम हाथ में लेने चाहिए। जो करना है उसे पूरी दिलचस्पी और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।* तीन महीने साबरमती आश्रम में रहकर मैंने इसी प्रक्रिया का अभ्यास किया। निरीक्षकों ने उसमें जो त्रुटियाँ रहती थीं वे ठीक कराई ।

मैं करामाती योगी बनने का उद्देश्य लेकर आया था। वह बचपन जैसी उमँग हवा में उड़ गई। ऐसा कोई योगी नहीं होता जो जादूगरों जैसी करामात दिखा सके । गाँधीजी भी वसे नहीं थे। वे महापुरुष थे ।

तीन महीने का समय पूरा हुआ, मैं सभी को विदाई का प्रणाम, अभिवादन करके घर लौट आया। गांधीजी के बताए सूत्र गिरह बांध लिए। आदशों को अपनाया जो काम हाथ में लिया उसे प्राण-पण से किया हमारी सफलताओं के मूल में दैवीय अनुदानों साथ वैयक्तिक पराक्रम की भी भूमिका रही है। इसी को विविध सफलताओं का रहस्य कहा जा सकता है।

*"अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।"*

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मंगलवार, 18 जनवरी 2022

निस्वार्थ सेवा का फल

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒निस्वार्थ सेवा का फल 💐💐*

कबीर नाम का मल्लाह नदी किनारे अपनी नाव ठीक कर रहा था। अचानक एक बच्चा उसके पास रोता हुआ आया और उससे बोला, “क्या तुम मेरी मदद कर सकते हो?” कबीर ने पूछा, “क्या हुआ है?” बच्चा बोला, “मेरी मां बहुत बीमार है, उस पार तक उसे ले जाना है।” कबीर को उस बच्चे पर दया आई और उसने उन दोनों को नदी पार पहुंचा दिया। बच्चे ने उसे धन्यवाद दिया। कबीर घर लौट आया।  
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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शाम ढले जैसे ही वह खाना-खाने बैठा कि बाहर दरवाजे पर उसे आवाज आई, “भूखा हूं, कुछ खाने को दे दो।” कबीर ने अपनी पत्नी से कहा, “जाओ, उस भूखे को खाने को दे दो।” लेकिन वह गुस्से से बोली, “मेरी समझ में नहीं आता कि तुम लोगों के साथ जरूरत से ज्यादा हमदर्दी क्यों करते हो? अब बेटी की शादी आने वाली है, देखती हूं कौन मदद करता है तुम्हारी।”

कबीर मुस्कराते हुए बोला, “भाग्यवान ! मैं सोचता हूं कि मैं उनकी जगह होता, तो उनसे क्या उम्मीद करता।”

बात आई-गई हो गई। बेटी की शादी सिर पर आ गई। चार दिन रह गए थे। मन थोड़ा परेशान था। रोज की तरह सुबह कबीर नदी किनारे पहुंचा। जैसे ही वह नाव लेकर पानी की तरफ बढ़ा कि उसकी नजर नाव में पड़ी एक लाल कपड़े की थैली पर गई। उसने थैली खोली, तो हैरान रह गया उसमें सोने के सिक्के थे। वह सोच में पड़ गया, आख़िर इसे यहां कौन रख गया? तभी उसे आवाज आई, “कुछ दिन पहले जिस बच्चे की तुमने मदद की थी, उसी ने तुम्हें ईनाम भेजा है। वह बच्चा कोई आम इंसान नहीं था। बच्चे के रूप में एक अदृश्य शक्ति थी वह । वह जानना चाहती थी कि कितने दयालु हो तुम। प्रत्येक की परीक्षा होती है एक दिन ऐसी ही।” 

सच ही कहा है किसी ने, जिसका हृदय दया से भरा है, भगवान हर समय उसके साथ रहते हैं। उसकी सारी आवश्यकताए पूरी होती जाती हैं।
*🕉️👨‍👩‍👧‍👦🌐🌞✍️सीख:: - हमें अपने जीवन में सभी लोगों की आवश्यकताओं को देखते हुए अपनी शक्तिनुसार निस्वार्थ सेवा करना चाहिए।कब हमारा पुण्यप्रबल हो ओर हमें इस जीवन में सन्मार्ग मिल जाये या कोई सच्चा मार्ग बता दें।*
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सोमवार, 17 जनवरी 2022

सतकर्मो की जीत

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सतकर्मों की जीत💐💐*

वह दिल्ली के लोधी कॉलोनी में एक मध्यम वर्गीय परिवार में पले-बढ़ें।
उनके पिता एक सरकारी सेवक थे और उनका निवास स्थान भी सरकारी था।
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वह दयाल सिंह कॉलेज गए और पढ़ाई पूरी होने के बाद, अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया। एक समय ऐसा भी था, जब वह 'रसना' ब्रांड के इकलौते वितरक थे। उनका लाजपत नगर में एक बड़ा गोदाम भी था, जिसमें 7-8 ऑटो थे, पूरे दिल्ली में रसना की डिलीवरी करते। उनका नाम, हर बाजार में लोग जानते थे। ज़िन्दगी खुशनुमा थी।
फिर वक्त ने करवट बदली और 1984 के दंगे हुए। उन्होंने अपना गोदाम, 8 ऑटो और यहां तक ​​कि डीलरशिप भी खो दी। कई खाद्य कंपनियों के साथ काम करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। इसलिए उन्होंने एक टैक्सी खरीदी,, और उसे चलाकर जीवन फिर से शुरू किया।
छह-सात साल बाद मसूरी से लौटते समय उनका एक भयानक एक्सीडेंट हो गया।
13 दिन से कोमा में थे। देहरादून के एक अस्पताल में होश आया, तो पता चला घुटने, रिब केज और एक हाथ की हालत बहुत बुरी थी।
सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों की कोशिश से, वह 3 महीने में ठीक हो गए। इसके बाद, 3.5 महीने तक फिजियो और व्यायाम चला। इतने महीनों की निरंतर कोशिशों के बाद वह अपने पैरों पर तो खड़े हो गए, लेकिन गाड़ी की हालत अब भी पंचर थी। इसलिए उन्होंने एक ऑटो खरीदी। लेकिन कुछ साल बाद फिर उन्हें दिल का दौरा पड़ा।
समय लगा, लेकिन वह पूरी तरह से ठीक हो गए। अब वह ऑटो चलाते हैं, कभी किसी यात्री को मना नहीं करते, कभी-कभी ग्राहकों से ठगे भी जाते हैं। लेकिन फिर भी मुस्कुराते हैं और विनम्रता से कहते हैं, "वाहे गुरु"!
उनकी कहानी को पढ़ने के बाद, मुझे यह एहसास हुआ, *चाहे आपका जीवन कितना भी कठिन क्यों न हो, हौसला रखिए और इच्छाशक्ति को मजबूत रखिए। क्योंकि अँधेरा चाहे कितना भी घना हो, बस एक रौशनी की किरण उसे मिटा सकती है।इसलिये जीवन में सतकर्म करते हुए जीवन व्यतीत किजिये, आपसभी का वर्तमान व भविष्य भी सुखमय होता जायेगा।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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रविवार, 16 जनवरी 2022

सकारात्मकता का उपाय

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👨‍👩‍👧‍👦सकारात्मकता का उपाय💐💐*

सरला नाम की एक महिला थी। रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे। दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की ‘डेडलाइन’ से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था। बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी-कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था।
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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पत्नी सरला भी एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी। वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी। ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है। खाना बनाती है। शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों नाकारा होने के लिए डाँटते थे पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है। घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।

थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा है। बच्चे विद्रोही हो चले हैं। एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में देर कर दी। पूछने पर बताया कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया, ड्रिल मशीन खराब हो गई, जेब से पर्स गिर गया...।इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।

काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई और वह उसे गाड़ी में छोड़ने चली गई। प्लंबर ने उसे बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया। प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया। घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया, मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा। 

सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया - यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ।चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता। सुबह जब थैला उतारता हूं तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है- मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं। प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है, तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ। उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था...! 

यह घर-घर की हकीकत है। गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है। *सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है।* क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ लें ताकि घर की दहलीज पार करने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ।
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शनिवार, 15 जनवरी 2022

सहयोग की गुल्लक

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सहयोग की गुल्लक💐💐*

रिटायर हुए उन्हें अभी अधिक समय नहीं हुआ था । 65 बरस के बाबूजी रिटायर्ड शिक्षक थे । उनकी बातचीत व आवाज़ में अलग ही रौब दिखता था।
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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अम्मा तो आठ साल पहले गुजर गयीं थीं। परिवार में तीन बेटे बहुएं व कुल सात पोते पोती थे। संयुक्त परिवार था । बाबूजी घर के मुखिया थे , सब उनका कहा मानतें थे ।

बाबूजी अपने पास एक बड़ी सी गुल्लक रखा करते थे । सभी को सख्त हिदायत थी कि अपनीं बचत के पैसे गुल्लक में अवश्य डाला करें ।

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

जब गुल्लक पूरी तरह से भर जाती तो उसे तोड़कर बाबूजी सबसे जरूरतें पूछते , आकलन कर तय करते कि राशि किसे देनी है। बाबूजी के निर्णय पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता . अगली बार फिर नई गुल्लक रख दी जाती।
 
इस बार जब गुल्लक तोड़ी गयी तो सबने अपनीं जरूरतें बढ़ा चढ़ा कर गिनाईं ! तभी बाबूजी की नज़र कामवाली ललिता पर पड़ी जो बड़ी उम्मीद भरी नजरों से पैसों को एकटक देख रही थी।

बाबूजी ने पूछा, ललिता तेरी क्या जरूरत है , चल तू बता ? घर के लोग आश्चर्य से बाबूजी ओर देखने लगे। ये तो उनकी कमाई का हिस्सा है कामवाली से क्यों पूछा जा रहा है ?

"बोल ललिता " ! जब दोबारा जोर से बाबू जी ने कहा तो ललिता बड़े ही बुझे स्वर में बोली , "बाबूजी मेरी तो कोई जरूरत ना है ", पर बिटिया पूजा के स्कूल में ऑन लाइन पढ़ाई हो रही है । मेरे पास ऐसा मोबाइल नहीं , जिसमें वो पढ़ सके। सुनते ही बाबू जी बोले स्मार्ट फोन चाहिए ?
इधर आ बबलू , अपने छोटे बेटे से बाबूजी बोले । इन पैसों से स्मार्ट फोन लेते आना । सुनकर ललिता की आँख डबडबा गईं ! झट बाबूजी के चरणों पर मत्था टेक दिया। एक बच्ची पढ़ लिख जाए , इससे अच्छा और क्या हो सकता है ?
 
आजकल की मतलबी दुनियां में किसी के लिए दो पैसा  खर्च करना भारी लगता है इसलिए बच्चों मैं इस दुनियाँ में रहूँ या ना रहूँ , तुम अपनीं आय के एक छोटे हिस्से से "सहयोग व साझेदारी" की एक गुल्लक जरूर बनाये रखना। इससे बचत की प्रवृत्ति तो बनेगी ही , किसी एक के ऊपर कोई भार भी नहीं आएगा....! यदि परपीड़ा महसूस कर , उसका सदुपयोग करोगे तो अलग से धर्म कर्म की आवश्यकता भी ना होगी...! !!

इस बूढ़े पिता की यह बात यदि अपनें "मन की गुल्लक" में सदा के लिए संचित कर लो तो मेरा जीवन सफल हो जाये....! सुनकर सब एक स्वर में बोल पड़े , जी बाबूजी ! इस घर में प्यार व सम्मान की गुल्लक हमेशां बनी रहेगी...! 

*आज के युवा भविष्य की वित्तीय जरूरतों के प्रति सचेत और गंभीर नहीं हैं। वे इसके महत्व को नहीं जानते। बढ़ती उम्र में जब आय के साधन सीमित हो जाते हैं या कहें खत्म हो जाते हैं, तो न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने और जीवन शैली को बनाये रखने के लिए बढ़ते खर्च को पूरा करना मुश्किल होता है इसलिए यह जरूरी है कि हम आप अपने बच्चों को शुरू से ही बचत और निवेश करना सीखाएं।*

*भारतीय परिवार में छोटी बचत का रिवाज बहुत पुराना है। लगभग हर घर में मिट्टी के गुल्लक होते थे और बच्चे उनमें पैसे जमा करते थे। यह चलन अब बहुत कम ही देखने को मिलता है। नयी पीढ़ी, जिसे मिलेनियम भी कहा जाता है, बचत और अपनी आर्थिक जिम्मेवारियों के प्रति लापरवाह दिखती है। यह भविष्य के लिए ज्यादा चिंतित नहीं रहती और आज में ही जीवन व्यतीत करने में विश्वास करती है अगर आनेवाली पीढ़ी के भविष्य को सुखमय बनाना चाहते हैं, तो यह जरूरी है कि बच्चों में बचत करने की प्रवृत्ति को विकसित करना होगा, ताकि निवेश करने के तरीके को वे समझें।*
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शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

तिल गुड़ का रहस्य

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒तिल-गुड़ का रहस्य💐💐*

एक आश्रम में गुरु जब अपने शिष्य को आशीर्वाद दे रहे थे कि थोड़ी ही दूर पर आपस में लड़ते दो शिष्यों की आवाज उन्हें सुनाई दी। उन्हें आश्रम में आए अधिक समय नहीं हुआ था।

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शिष्यों के पास पहुंचकर उन्होंने पूछा- क्या बात है? क्यों झगड़ रहे हो तुम दोनों?

एक शिष्य बोला- गुरुजी! आज मकर संक्रांति के दिन में आपको तिल के लड्डू खिलाना चाहता था। लेकिन मेरा यह सहपाठी कहता है कि पहले में खिलाऊंगा। जब विचार पहले मेरे मन में आया है तो मुझे पहले खिलाने का अधिकार है। लेकिन यह बेईमानी कर रहा है। इसे मुझसे ईर्ष्या है। आप ही बताएं कि उचित क्या है?

गुरुजी बोले- बच्चों में तुम दोनों की भावना समझता हूं। लेकिन तुम्हारी भावना में अभी इस त्योहार की सच्ची भावना सम्मिलित नहीं है। इसलिए तुम आपस में झगड़ रहे हो।

मकर संक्रांति के दिन तिल के लड्डू इसी भाव से खिलाए जाते हैं कि हमारे बीच जो भी मतभेद या मनभेद हैं वे नष्ट हो और हम बैर भाव भुलाकर मीठा-मीठा बोलें। इसलिए लड्डू देते वक्त हम कहते हैं- 'तिळ गुळ घ्या आणि गोड गोड बोला' यानी 'तिल गुड लो और मीठा मीठा बोलो' और तुम कितना मीठा बोल रहे हो, यह तुम स्वयं निर्णय करो।

अतः मकर संक्रांति के सच्चे भाव को आत्मसात करते हुए पहले मुझे नहीं एक-दूसरे को तिल के लड्डू खिलाओं गुरु की बात सुनकर शिष्यों ने उनके कहे का अनुसरण किया और एक-दूसरे को सच्चे हृदय से लड्डू खिलाने के बाद गले लगा लिया।

क्या बात है कितना अनोखा अंदाज था गुरु का अपने शिष्यों को सिखाने का। वे न केवल अपने शिष्यों को सिखा गए बल्कि आज भी हम जैसे लोगों को सिखा रहे हैं। तो मकर संक्रांति पर आपसे भी एक आग्रह है कि आज जब आप काम पर जाएं तो तिल के लड्डू साथ ले जाएं और सभी स्नेहीजनों के साथ ही उस सहकर्मी को अवश्य खिलाए जिसके साथ आजकल आपकी पटरी नहीं बैठ रही है।

हा, शर्त यह है कि भाव भी शुद्ध होना चाहिए। लड्डू खिलाने के साथ ही आज से उससे मीठी-मीठी बातें भी करना शुरू कर दें। कुछू समय बाद निश्चित ही आपको चमत्कारिक परिणाम मिलने लगेंगे और आपके दफ्तर की हवा भी बदलेगी। लेकिन याद रहे कि आप अपनी इस सफलता पर फूल मत जाना। वरना वही होगा जो पतंग और गुब्बारे के साथ होता है। यही है आज का गुरुमंत्र।
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गुरुवार, 13 जनवरी 2022

निंदा करने का फल

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒निंदा करने का फल💐💐*

एक बार एक व्यक्ति ने फैसला लिया कि वह प्रतिदिन 100 अंधे लोगों को खीर खिलाया करेगा।

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एक दिन खीर वाले दूध में सांप ने मुंह डाला और दूध में विष डाल दी। ज़हरीली खीर को खाकर 100 के 100 अंधे व्यक्ति मर गए।  व्यक्ति  बहुत परेशान हुआ कि मुझे 100 आदमियों की हत्या का पाप लगेगा।

वह  व्यक्ति परेशानी की हालत में अपने राज्य को छोड़कर जंगलों में भक्ति करने के लिए चल पड़ा, ताकि इस पाप की माफी मिल सके। रास्ते में एक गांव आया।  व्यक्ति  ने चौपाल में बैठे लोगों से पूछा कि क्या इस गांव में कोई भगवान की भक्ति भाव वाला परिवार है  ताकि उसके घर रात्रि को विश्राम किया जा सके?

चौपाल में बैठे लोगों ने बताया कि इस गांव में दो बहन भाई रहते हैं जो नियम से रामजी भगवान की खूब पूजा करते हैं।समय के अनुसार रामभक्ति से सभी के कष्टों को दूर करने में सहयोगी भी बनते है।  वह व्यक्ति उन दोनों की स्वीकृति लेकर उनके घर रात में ठहर गया।

सुबह जब  वह व्यक्ति  उठा तो लड़की पूजा पर बैठी हुई थी। इससे पहले लड़की का नित्य कर्म था कि वह दिन निकलने से पहले ही पूजापाठ करती  थी और सूर्योदय होने पर ही जलपान तैयार करती थी।

लेकिन उस दिन वह लड़की बहुत देर तक पूजा पर बैठी रही। जब लड़की उठी तो उसके भाई ने कहा कि बहन तू इतनी देर से उठी है। अपने घर मुसाफिर आया हुआ है और उसे जलपान करके दूर जाना है।

लड़की ने जवाब दिया कि भैया ऊपर एक मामला उलझा हुआ था। धर्मराज को किसी उलझन भरी स्थिति पर कोई फैसला लेना था और मैं वह फैसला सुनने के लिए रुक गयी थी। इसलिए देर तक ध्यान करती रही।

तो उसके भाई ने पूछा ऐसी क्या बात थी? तो लड़की ने बताया कि फलां  राज्य का व्यक्ति विशेष अंधे व्यक्तियों को खीर खिलाया करता था। लेकिन सांप के दूध में विष डालने से 100 अंधे व्यक्ति मर गए। अब धर्मराज को समझ नहीं आ रहा कि अंधे व्यक्तियों की मौत का पाप उस व्यक्ति विशेष को लगे, सांप को लगे या दूध बिना ढ़के छोड़ने वाले रसोइये को लगे।

 व्यक्ति  भी सुन रहा था।  व्यक्ति  को अपने से संबंधित बात सुन कर दिलचस्पी हो गई और उसने उस बहन से पूछा कि फिर क्या फैसला हुआ ?

लड़की ने बताया कि अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया था। तो व्यक्ति   ने पूछा कि क्या मैं आपके घर एक रात के लिए और रुक सकता हूं ? दोनों बहन भाइयों ने खुशी से उसको हां कर दी।

  व्यक्ति अगले दिन के लिए रुक गया, लेकिन चौपाल में बैठे लोग दिन भर यही चर्चा करते रहे कि कल जो व्यक्ति हमारे गांव में एक रात रुकने के लिए आया था और कोई भक्ति भाव वाला घर पूछ रहा था, उसकी भक्ति का नाटक तो सामने आ गया है।

 रात काटने के बाद वह इसलिए नहीं गया क्योंकि जवान लड़की को देखकर उस व्यक्ति की नियत खोटी हो गई। इसलिए वह उस सुन्दर और जवान लड़की के घर पक्के तौर पर ही ठहरेगा या फिर लड़की को लेकर भागेगा।
 
दिनभर चौपाल में उस  व्यक्ति विशेष की निंदा होती रही।

अगली सुबह लड़की फिर ध्यान पर बैठी और रूटीन के टाइम अनुसार उठ गई। तो  व्यक्ति  ने पूछा- "बेटी अंधे व्यक्तियों की हत्या का पाप किसको लगा ?"

तो लड़की ने बताया कि- "वह पाप तो हमारे गांव के चौपाल में बैठने वाले लोग बांट के ले गए।"

*शिक्षा:- आज वर्तमान में हमसभी दु:खी है।क्या इसका कारण हम किसी की निंदा करने में या निंदा सुनने में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।स्वयं इस बात का अंतरंग से विचार करें। निंदा करना कितना घाटे का सौदा है? निंदक हमेशा दूसरों के पाप अपने सर पर ढ़ोता रहता है। और दूसरों द्वारा किये गए उन पाप-कर्मों के फल को भी भोगता है। अतः हमें सदैव निंदाकरने व निंदा सुनने से बचना चाहिए।*
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बुधवार, 12 जनवरी 2022

निस्वार्थ सेवाफल

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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एक धनी राजा ने सड़क के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा पत्थर रखवा दिया और चुपचाप नजदीक के एक पेड़ के पीछे जाकर छुप गया। 

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दरअसल वो देखना चाहता था कि कौन व्यक्ति बीच सड़क पर पड़े उस भारी-भरकम पत्थर को हटाने का प्रयास करता है। 

कुछ देर इंतजार करने के बाद वहां से राजा के दरबारी गुजरते हैं। लेकिन वो सब उस पत्थर को देखने के बावजूद नजरअंदाज कर देते हैं। 

इसके बाद वहां से करीब बीस से तीस लोग और गुजरे लेकिन किसी ने भी पत्थर को सड़क से हटाने का प्रयास नहीं किया। 

करीब डेढ़ घंटे बाद वहां से एक गरीब किसान गुजरा। किसान के हाथों में सब्जियां और उसके कई औजार थे। किसान रुका और उसने पत्थर को हटाने के लिए पूरा दम लगाया। 

आखिर वह सड़क से पत्थर हटाने में सफल हो गया। पत्थर हटाने के बाद उसकी नजर नीचे पड़े एक थैले पर गई। इसमें कई सोने के सिक्के और जेवरात थे। 

उस थैले में एक खत भी था जो राजा ने लिखा था कि ये तुम्हारी ईमानदारी, निष्ठा, मेहनत और अच्छे स्वभाव का इनाम है। 

जीवन में भी इसी तरह की कई रुकावटें आती हैं। उनसे बचने की बजाय उनका डटकर सामना करना चाहिए। 

*शिक्षा :-*
हमें भी अपने जीवन में इसी प्रकार निस्वार्थ सेवा करके यह मनुष्य जन्म सार्थक करना होगा।मुसीबतों से डर कर भागे नहीं, उनका डटकर सामना करें।
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*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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