*🔔 पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी 🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 मन की सच्चाई ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 चैत्र अमावस्या, शनिवार 29 मार्च 2025 कलि काल के 14 वें तीर्थंकर अनंत गुणों को प्रदान करने की शक्ति प्रदाता श्री अनंतनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री अनंतनाथ भगवान जी का केवल ज्ञान व मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 चैत्र अमावस्या , शनिवार 29 मार्च 2025 कलि काल के 18 वें तीर्थंकर सर्व सुखकारी सुख प्रदाता श्री अरनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से सुखकारी संस्कार प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री अरनाथ भगवान जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 चैत्र शुक्ल एकम, रविवार 30 मार्च 2025 कलि काल के 19 वें तीर्थंकर अनंत गुणों को प्रदान करने की शक्ति प्रदाता श्री मल्लिनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से केतु की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री मल्लिनाथ भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 चैत्र शुक्ल तृतीया , सोमवार 31मार्च 2025 कलि काल के 17 वें तीर्थंकर सर्व सुखकारी सुख प्रदाता श्री कुंथुनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से सुखकारी संस्कार प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री कुंथुनाथ भगवान जी का केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव है।🔔 नोट :- आज के दिन दूज व तृतीया तिथि समाहित है।*
*👨👨👦👦🔔🐎 इस मार्च माह में चतुर्दशी तिथि 28 मार्च को है।*
*🔔🐎 सोलह कारण शाश्वत पर्व व व्रत 15 मार्च से 14 अप्रेल तक है।*
*👨👨👦👦🔔👉 14 मार्च शाम 6:50 से मल मास प्रारंभ होने से शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि पर 14 अप्रैल तक पाबंदी रहेगी । 🔔*
*🐎✍️ पंचक 26,27,28,29,30 मार्च को है।*
*🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*👨👨👦👦हम सभी के मन की सच्चाई इस कहानी से कुछ सीखो🔔*
हमारे पास पाँच ज्ञानेंद्रियाँ हैं—चक्षु (आँखें), कर्ण (कान), नासिका (नाक), जिह्वा (जीभ) और त्वचा। लेकिन इनके अतिरिक्त एक और शक्ति है—मन महा-इंद्रिय। यह मन ही है जो हमें भोगों की ओर आकर्षित करता है। जो व्यक्ति वासना के वशीभूत होता है, वह इन्हीं पाँच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से भोगों का अनुभव करता है। लेकिन क्या भोग वास्तव में भोगे जा सकते हैं? नहीं, क्योंकि भोगों की कोई निश्चित परिसीमा नहीं होती।
आइए, इसे एक पुराण प्रसंग के माध्यम से समझते हैं।
राजा ययाति की कथा
राजा ययाति की कथा भागवत पुराण, महाभारत, और मत्स्य पुराण में वर्णित है। वे चंद्रवंशी राजा नहुष के पुत्र थे। उनकी कथा में वासना, महत्वाकांक्षा, तपस्या और वैवाहिक जीवन से जुड़े अनेक प्रसंग मिलते हैं।
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ययाति के सौ पुत्र थे। जब उनके मृत्यु का समय आया, तो यमदूत उनके प्राण लेने पहुँचे। यह सुनकर राजा ययाति भयभीत हो गए और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगे—
"कृपया मेरे प्राण मत लीजिए। मैंने अभी तक भोगों का पूर्णतः आनंद नहीं लिया है। मुझे कुछ और समय दीजिए ताकि मैं अच्छे से भोग-विलास कर सकूँ।"
यमदूतों ने उत्तर दिया—
"यह संभव नहीं है, तुम्हें अब चलना ही होगा।"
ययाति ने विनती की—
"बस और सौ वर्ष दे दो।"
यमदूतों ने शर्त रखी—
"यदि तुम्हारे पुत्रों में से कोई अपने जीवन के सौ वर्ष तुम्हें दे दे, तो तुम्हें समय मिल सकता है।"
यह सुनकर राजा ययाति अत्यंत प्रसन्न हो गए। उन्होंने अपने सबसे ज्येष्ठ पुत्र को बुलाकर सारा प्रसंग बताया। परंतु ज्येष्ठ पुत्र ने सोच-विचार कर उत्तर दिया—
"पिताजी, आपकी उम्र सौ वर्ष हो चुकी है, अब तो भोग-विलास की मेरी अवस्था है। मैं अपना जीवन आपको नहीं दे सकता।"
ययाति ने अन्य पुत्रों से भी आग्रह किया, लेकिन सभी ने जाने से इंकार कर दिया।
किन्तु उनका सबसे कनिष्ठ पुत्र इस प्रस्ताव को स्वीकार कर यमदूतों के साथ जाने के लिए तैयार हो गया। यह देखकर यमदूत आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने पूछा—
"तुम तो अभी बालक हो, तुम्हारे भोग-विलास के दिन हैं। तुम क्यों मरना चाहते हो?"
कनिष्ठ पुत्र ने उत्तर दिया—
"मैंने यह समझ लिया है कि भोगों से तृप्ति नहीं होती। जब मेरे पिता, जिन्होंने इतने वर्षों तक भोग-विलास किया, अभी भी अतृप्त हैं, तो मैं कैसे तृप्त हो सकता हूँ? इसीलिए मैं सहर्ष अपना जीवन त्याग रहा हूँ।"
मन की वासना की सीमा नहीं होती
यह तो एक कथा है, लेकिन क्या यह पूर्णतः सत्य नहीं है?
जो व्यक्ति मन को खुली छूट दे देता है, उसकी वासना कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि निरंतर बढ़ती जाती है। यदि कामनाओं पर नियंत्रण पाना है, तो मन को नियंत्रित करना सीखना होगा।
*जिस व्यक्ति का मन पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है,*
🐎* उसका जीवन श्रद्धा, आत्मज्ञान और धर्म से भर जाता है।
🌞* वह अपने शरीर को निष्क्रिय भाव से देखता है।
🎪* उसके सभी कर्म प्रमेय (समता में स्थित) हो जाते हैं।
*🪔वह शून्य से शिखर की यात्रा करता है।
✅* आत्मा और शरीर का भेद समाप्त हो जाता है।
*🌞परम तत्व से उसका अनायास ही जुड़ाव हो जाता है।
*✅धर्म की स्थापना ही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाती है।
👨👨👦👦* जन्म-मरण के बंधनों से वह मुक्त हो जाता है।
*⏰वह पाप और पुण्य दोनों से विरक्त हो जाता है।
*↔️उसके शरीर के कण-कण में दिव्यता प्रकट होती है।
*💯माया का प्रभाव भी उसके सूक्ष्म शरीर को छू नहीं पाता।
*⛳वह संसार में रहते हुए भी उससे परे होता है, जैसे जल में कमल।
⏰* उसका रोम-रोम परम तत्व से एकाकार हो जाता है।
> _*वासना और इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। जितना इन्हें पोषित किया जाता है, ये उतनी ही अधिक प्रबल हो जाती हैं। अतः जीवन में सच्चा आनंद पाने के लिए, आत्मिक उन्नति के लिए मन पर नियंत्रण आवश्यक है। यही सच्ची साधना और परम सुख की कुंजी है।*_
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*