शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

नववर्ष पर विशेष लेख

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒नववर्ष पर विशेष लेख*

महाभारत का युद्ध हो चुका था| महाराज युधिष्ठिर राजा बन चुके थे| अपने चारों छोटे भाइयों की सहायता से वह  राजकाज चला रहे थे प्रजा की भलाई के लिए पाँचों भाई मिलजुल कर जुटे रहते| जो कोई दीन-दुखी फरियाद लेकर आता, उसकी हर प्रकार से सहायता की जाती|

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

एक दिन युद्धिष्ठिर् राजभवन में बैठे एक मंत्री से बातचीत कर रहे थे| किसी समस्या पर गहन विचार चल रहा था| तभी एक ब्राह्मण वहाँ पहुँचा| कुछ दुष्टों ने उस ब्राह्मण को सताया था| उन्होंने ब्राह्मण की गाय उससे छीन ली थी| वह ब्राह्मण महाराज युधिष्ठिर के पास फरियाद लेकर आया था| मंत्री जी के साथ बातचीत में व्यस्त होने के कारण महाराज युधिष्ठिर उस ब्राह्मण की बात नहीं सुन पाए| उन्होंने ब्राह्मण से बाहर इन्तजार करने के लिए कहा|ब्राह्मण मंत्रणा भवन के बाहर रूक कर महाराज युधिष्ठिर का इंतज़ार करने लगाl 

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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मंत्री से बातचीत समाप्त करने के बाद महाराज ने ब्राहमण को अन्दर बुलाना चाहा, लेकिन तभी वहाँ किसी अन्य देश का दूत पहुँच गया| महाराज फिर बातचीत में उलझ गए| इस तरह एक के बाद एक कई महानुभावों से महाराज युधिष्ठिर ने बातचीत की| अंत में सभी को निबटाकर जब महाराज भवन से बाहर आये तो उन्होंने ब्राहमण को इंतज़ार करते पाया| काफी थके होने के कारण महाराज युधिष्ठिर ने उस ब्राहमण से कहा, “अब तो मैं काफी थक गया हूँ| आप कल सुबह आइयेगा| आपकी हर संभव सहायता की जाएगी|” इतना कहकर महाराज अपने विश्राम करने वाले भवन की ओर बढ़ गए|

ब्राह्मण को महाराज युधिष्ठिर के व्यवहार से बहुत निराशा हुई| वह दुखी मन से अपने घर की ओर लौटने लगा| अभी वह मुड़ा ही था की उसकी मुलाकात महाराज युधिष्ठिर के छोटे भाई भीम से हो गई| भीम ने ब्राहमण से उसकी परेशानी का कारण पूछा| ब्राह्मण ने भीम को सारी बात बता दी| साथ ही वह भी बता दिया की महाराज ने उसे अगले दिन आने के लिए कहा है|

ब्राह्मण की बात सुनकर भीम बहुत दुखी हुआ| उसे महाराज युधिष्ठिर के व्यवहार से भी बहुत निराशा हुई| उसने मन ही मन कुछ सोचा और फिर द्वारपाल को जाकर आज्ञा दी, “सैनिकों से कहो की विजय के अवसर पर बजाये जाने वाले नगाड़े बजाएं,” आज्ञा का पालन हुआ| सभी द्वारों पर तैनात सैनिकों ने विजय के अवसर पर बजाये जाने वाले नगाड़े बजाने शुरू कर दी| महाराज युधिष्ठिर ने भी नगाड़ों की आवाज़ सुनी| उन्हें बड़ी हैरानी हुई| नगाड़े क्यों बजाये जा रहे हैं, यह जानने के लिए वह अपने विश्राम कक्ष से बाहर आये|

कक्ष से बाहर निकलते ही उनका सामना भीम से हो गया| उन्होंने भीम से पूछा, “विजय के अवसर पर बजाये जाने वाले नगाड़े क्यों बजाये जा रहे हैं? हमारी सेनाओं ने किसी शत्रु पर विजय प्राप्त की है?”

भीम ने नम्रता से उत्तर दिया, “महाराज, हमारी सेनाओं ने तो किसी शत्रु पर विजय प्राप्त नहीं की|”

“तो फिर ये नगाड़े क्यों बज रहें हैं?| महाराज ने हैरान होते हुए पूछा|

“क्योंकि पता चला है की महाराज युधिष्ठिर ने काल पर विजय प्राप्त कर ली है|” भीम ने उत्तर दिया|

भीम की बात सुनकर महाराज की हैरानी और बढ़ गई| उन्होंने फिर पुछा, “मैंने काल पर विजय प्राप्त कर ली है| आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?|

भीम ने महाराज की आँखों में देखते हुए कहा, “महाराज, अभी कुछ देर पहले आपने एक ब्राहम्ण से कहा था की वह आपको कल मिले| इससे साफ़ जाहिर है की आपको पता है की आज आपकी मृत्यु नहीं हो सकती, आज काल आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता| यह सुनने के बाद मैंने सोचा की अवश्य अपने काल पर विजय प्राप्त कर ली होगी, नहीं तो आप उस ब्राहमण को कल मिलने के लिए न कहते| यह सोच कर मैंने विजय के अवसर पर बजाये जाने वाले नगाड़े बजने की आज्ञा दी थी|”

भीम की बात सुनकर महाराज युधिष्ठिर की आँखे खुल गई| उन्हें अपनी भूल का पता लग चुका था| तभी उन्हें पीछे खड़ा हुआ ब्राहमण दिखाई दे गया| उन्होंने उसकी बात सुनकर एकदम उसकी सहायता का आवश्यक प्रबंध करवा दिया|

दोस्तों हमारे अंदर एक बहुत बुरी आदत है काम को टाल देने की। अपनी इसी आदत के कारण हम कभी-कभी अपने बनते हुए कामों को बिगाड़ बैठते हैं, जिससे हमारी बड़ी भारी हानि हो जाती है और कभी-कभी तो अपनी मंजिल पर पहुँचते-पहुँचते रह जाते हैं।

जो काम हमें आज करने हैं, वह कल भी उतने ही महत्व के रहेंगे, यह नहीं कहा जा सकता। परिस्थितियाँ क्षण-क्षण पर बदलती रहती हैं और उनके अनुसार पिछड़े हुए कार्यों का कोई महत्व नहीं रह जाता।

संभव है आज किसी कार्य के सम्मुख आते ही हम उसे ताजा जोश में कर डालें, परन्तु कल पर टालते ही उस कार्य के प्रति दिलचस्पी भी कम हो सकती है और इस प्रकार वह कार्य सदा के लिए ही टल सकता है।

जिस व्यक्ति में टालमटोल का यह रोग लग जाता है वह अपने जीवन में अनेक काम नहीं कर पाता। बल्कि उसके सब काम अधूरे पड़े रह जाते हैं। यद्यपि ऐसे लोग हर समय व्यस्त रहते दिखाई पड़ते हैं, फिर भी अपना काम पूरा नहीं कर पाते। 

कामों का बोझ उनके सिर पर लदा रहता है और वे उससे डरते हुए कामों को धकेलने की कोशिश करते रहते हैं।

टालने की आदत वाला मनुष्य परिस्थितियों का शिकार भी हो सकता है। स्वास्थ्य का खराब होना, मस्तिष्क की निर्बलता, आर्थिक या दूसरे प्रकार की चिन्ता आदि कारण भी कार्य को टालना पड़ता है।

अतः जहाँ तक हो सके आज के काम को कल पर कभी न छोड़ें क्यूंकि वर्तमान क्षण ही हमारा है।
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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गुरुवार, 30 दिसंबर 2021

माँ का पल्लू

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒माँ का पल्लू*

गुरुजी ने कहा कि "मां के पल्लू"
पर निबन्ध लिखो..
तो लिखने वाले छात्र ने क्या खूब लिखा
     *👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*
       आदरणीय गुरुजी जी...
 
   माँ के पल्लू का सिद्धाँत माँ को गरिमामयी
 छवि प्रदान करने के लिए था.

  इसके साथ ही ... यह गरम बर्तन को 
   चूल्हा से हटाते समय गरम बर्तन को 
      पकड़ने के काम भी आता था.
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        पल्लू की बात ही निराली थी.
           पल्लू पर तो बहुत कुछ
              लिखा जा सकता है.

 पल्लू ... बच्चों का पसीना, आँसू पोंछने, 
   गंदे कान, मुँह की सफाई के लिए भी 
          इस्तेमाल किया जाता था.

   माँ इसको अपना हाथ पोंछने के लिए
           तौलिया के रूप में भी
           इस्तेमाल कर लेती थी.

         खाना खाने के बाद 
     पल्लू से  मुँह साफ करने का 
      अपना ही आनंद होता था.

      कभी आँख में दर्द होने पर ...
    माँ अपने पल्लू को गोल बनाकर, 
      फूँक मारकर, गरम करके 
        आँख में लगा देतीं थी,
   दर्द उसी समय गायब हो जाता था.

माँ की गोद में सोने वाले बच्चों के लिए 
   उसकी गोद गद्दा और उसका पल्लू
        चादर का काम करता था.

     जब भी कोई अंजान घर पर आता,
           तो बच्चा उसको 
  माँ के पल्लू की ओट ले कर देखता था.

   जब भी बच्चे को किसी बात पर 
    शर्म आती, वो पल्लू से अपना 
     मुँह ढक कर छुप जाता था.

    जब बच्चों को बाहर जाना होता,
          तब 'माँ का पल्लू' 
   एक मार्गदर्शक का काम करता था.

     जब तक बच्चे ने हाथ में पल्लू 
   थाम रखा होता, तो सारी कायनात
        उसकी मुट्ठी में होती थी.

       जब मौसम ठंडा होता था ...
  माँ उसको अपने चारों ओर लपेट कर 
    ठंड से बचाने की कोशिश करती.
          और, जब वारिश होती,
      माँ अपने पल्लू में ढाँक लेती.

  पल्लू --> एप्रन का काम भी करता था.
  माँ इसको हाथ तौलिया के रूप में भी 
           इस्तेमाल कर लेती थी.

 पल्लू का उपयोग पेड़ों से गिरने वाले 
  जामुन और मीठे सुगंधित फूलों को
     लाने के लिए किया जाता था.

     पल्लू में धान, दान, प्रसाद भी 
       संकलित किया जाता था.

       पल्लू घर में रखे समान से 
 धूल हटाने में भी बहुत सहायक होता था.

      कभी कोई वस्तु खो जाए, तो
    एकदम से पल्लू में गांठ लगाकर 
          निश्चिंत हो जाना ,  कि 
             जल्द मिल जाएगी.

       पल्लू में गाँठ लगा कर माँ 
      एक चलता फिरता बैंक या 
     तिजोरी रखती थी, और अगर
  सब कुछ ठीक रहा, तो कभी-कभी
 उस बैंक से कुछ पैसे भी मिल जाते थे.

       मुझे नहीं लगता, कि विज्ञान पल्लू का विकल्प ढूँढ पाया है.

पल्लू कुछ और नहीं, बल्कि
एक जादुई एहसास है. 

     सस्नेह संबंध रखने वाले अपनी माँ के इस प्यार और स्नेह को हमेशा महसूस करते हैं, जो आज की पीढ़ी को समझना होगा । 
*आज वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति के कारण यहां के माँताओ ओर बहनों के पहनावे पर विशेष प्रभाव पड़ने से भारतीय पोषाक लुप्त हो रही है।यह हम सभी भारतीयों के लिए सबसे बड़ा प्रश्न है।इस प्रश्न का अतिशीघ्र हल हो तो आज भी भारतीय नारी माँ के साथ देवी के स्थान को प्राप्त होगी । हम उनसभी माता ओर बहनों को नमन करते है जिन्होंने आज भी प्राचीन भारतीय संस्कृति को जीवित रखा है।इस विश्व को अच्छे संस्कार कोई दे सकता है तो वह मां ही है, जो बालक को गर्भ में आने पर अच्छे संस्कारों से जिससे घर,परिवार, समाज,राष्ट्र व विश्व को संस्कारवान बनाती है।*

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*जैनम् जयतु शासनम्*
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संस्कार

बुधवार, 29 दिसंबर 2021

सच्चा कर्तव्य

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सच्चा कर्तव्य*

▶️✍️👨‍👩‍👧‍👦प्राचीन समय की बात है, एक राज्य में एक राजा राज करता था। उसका राज्य सुख वैभव से संपन्न था।
धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी।राजा और प्रजा ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन-यापन कर रहे थे।

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एक वर्ष उस राज्य में भयंकर अकाल पड़ा. पानी की कमी से फ़सलें सूख गई। ऐसी स्थिति में किसान राजा को लगान नहीं दे पाए।लगान प्राप्त न होने के कारण राजस्व में कमी आ गई और राजकोष खाली होने लगा. यह देख राजा चिंता में पड़ गया. हर समय वह सोचता रहता कि राज्य का खर्च कैसे चलेगा?

अकाल का समय निकल गया. स्थिति सामान्य हो गई. किंतु राजा के मन में चिंता घर कर गई।हर समय उसके दिमाग में यही रहता कि राज्य में पुनः अकाल पड़ गया, तो क्या होगा? इसके अतिरिक्त भी अन्य चिंतायें उसे घेरने लगी। पड़ोसी राज्य का भय, मंत्रियों का षड़यंत्र जैसी कई चिंताओं ने उसकी भूख-प्यास और रातों की नींद छीन ली।

वह अपनी इस हालत से परेशान था. किंतु जब भी वह राजमहल के माली को देखता, तो आश्चर्य में पड़ जाता. दिन भर मेहनत करने के बाद वह रूखी-सूखी रोटी भी छक्कर खाता और पेड़ के नीचे मज़े से सोता. कई बार राजा को उससे जलन होने लगती।

एक दिन उसके राजदरबार में एक सिद्ध साधु पधारे. राजा ने अपनी समस्या साधु को बताई और उसे दूर करने सुझाव मांगा।

साधु राजा की समस्या अच्छी तरह समझ गए थे. वे बोले, “राजन! तुम्हारी चिंता की जड़ राज-पाट है. अपना राज-पाट पुत्र को देकर चिंता मुक्त हो जाओ।”

इस पर राजा बोला, ”गुरुवर! मेरा पुत्र मात्र पांच वर्ष का है. वह अबोध बालक राज-पाट कैसे संभालेगा?”

“तो फिर ऐसा करो कि अपनी चिंता का भार तुम मुझे सौंप दो.” साधु बोले।

राजा तैयार हो गया और उसने अपना राज-पाट साधु को सौंप दिया. इसके बाद साधु ने पूछा, “अब तुम क्या करोगे?”

राजा बोला, “सोचता हूँ कि अब कोई व्यवसाय कर लूं।”

“लेकिन उसके लिए धन की व्यवस्था कैसे करोगे? अब तो राज-पाट मेरा है. राजकोष के धन पर भी मेरा अधिकार है।”

“तो मैं कोई नौकरी कर लूंगा.” राजा ने उत्तर दिया।

“ये ठीक है लेकिन यदि तुम्हें नौकरी ही करनी है, तो कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं। यहीं नौकरी कर लो. मैं तो साधु हूँ. मैं अपनी कुटिया में ही रहूंगा. राजमहल में ही रहकर मेरी ओर से तुम ये राज-पाट संभालना।”

राजा ने साधु की बात मान ली और साधु की नौकरी करते हुए राजपाट संभालने लगा. साधु अपनी कुटिया में चले गए।

कुछ दिन बाद साधु पुनः राजमहल आये और राजा से भेंट कर पूछा, “कहो राजन! अब तुम्हें भूख लगती है या नहीं और तुम्हारी नींद का क्या हाल है?”

“गुरुवर! अब तो मैं खूब खाता हूँ और गहरी नींद सोता हूँ। पहले भी मैं राजपाट का कार्य करता था, अब भी करता हूँ. फिर ये परिवर्तन कैसे? ये मेरी समझ के बाहर है.” राजा ने अपनी स्थिति बताते हुए प्रश्न भी पूछ लिया।

साधु मुस्कुराते हुए बोले, “राजन! पहले तुमने काम को बोझ बना लिया था और उस बोझ को हर समय अपने मानस-पटल पर ढोया करते थे. किंतु राजपाट मुझे सौंपने के उपरांत तुम समस्त कार्य अपना कर्तव्य समझकर करते हो. इसलिए चिंतामुक्त हो।”

*मित्रों" जीवन में जो भी कार्य करें, अपना कर्त्तव्य समझकर करें. न कि बोझ समझकर. यही चिंता से दूर रहने का एकमात्र उपाय है।*
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मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

अपने अपने मन की बात

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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आज भी हर बार की तरह सोमवार को सब्जी मंडी आई थी। टहलते-टहलते निकल आती पर फल सब्जी से भरे दो-दो थैले लेकर चलना उसके बस का नहीं। रिक्शा लेना ही पड़ता। हर बार रिक्शे वालों से किच-किच भी जरुर होती,वो तीस माँगते ये बीस से ज्यादा देने को तैयार नहीं होती।

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आज भी यही सब हो रहा था। तीन रिक्शे जा चुके थे, चौथे की राह देख रही थी। एक रिक्शा नज़र आया। चलाने वाले के एकदम चट्टे बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा, कृशकाय वृद्ध। रोका, पूछा "सेक्टर बारह जाना है, चलोगे?" वो बोला "तीस रुपये लेंगें।" ये सब्जी भाजी की तरह मोल भाव करने लगी और जीत गई। वो बीस रुपये में चलने को राज़ी हो गया, सवारी भी कम मिलती थी उसे।

बैठे-बैठे बोली "दादा कहाँ से हो?" उसने बताया "उन्नाव के हैं हम।"
"अच्छा वहाँ तो मेरा ननिहाल है।"चहक उठी।
"फिर तो जाती होंगी?"उसने पूछा।
"नहीं अब टाईम कहाँ वहाँ जाने का, बस-बस यहीं रोक दो।" घर आ गया था।

रिक्शा रुकते ही वृद्ध चालक फुर्ती से उतरा और दोनों थैले उठाने लगा। ये बोली " अरे रहने दो मैं रख दूँगी।" सोचने लगी, क्यूँ कर रहा है ये सब, अब जरुर कुछ ना कुछ मांगेगा, बेकार में ही पूछताछ करने बैठ गई।

उतरी और बीस रूपये देने लगी। वृद्ध ने पैसे लेने से मना कर दिया, बोला " तुम से पैसे नहीं ले सकते बिटिया, तुम्हारा तो ननिहाल है हमारे यहाँ। कभी घूम आना,खूब खुश रहो।"

लाख कहने पर भी उसने पैसे नहीं लिये और चला गया। ये खड़ी-खड़ी सोच रही थी अपनी और उस रिक्शेवाले की मन की बात  को।
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सोमवार, 27 दिसंबर 2021

परिश्रम का महत्व

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*💪👩‍🚒परिश्रम का महत्त्व💐💐*
*✍️▶️एक गांव में एक धनी मनुष्य रहता था | उसका नाम भैरोमल था | भैरोमल के पास बहुत खेत थे| उसने बहुत से नौकर और मजदूर रख छोड़े थे | भैरोमल बहुत सुस्त और आलसी था | वह कभी अपने खेतों को देखने नहीं जाता था | अपने मजदूर और नौकरों को भेजकर ही वह काम कराता था |*

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मजदूर और नौकर मनमाना काम करते थे | वे लोग खेत पर तो थोड़ी देर काम करते थे , बाकी घर बैठे रहते थे | इधर-उधर घूमते या गप्पे उड़ाया करते थे ,खेत न तो ठिकाने से जोते जाते थे | न सिंचे जाते थे और न उनमें ठीक से खाद पडती थी | खेतों में बीज भी ठिकाने से नहीं पडते थे और उनकी घास(खरपतवार) तो कोई निकालता ही नहीं था | इसका नतीजा यह हुआ कि उपज धीरे-धीरे घटने लगी | थोड़े दिनों में भैरोमल गरीब होने लगा|
उसी गांव में रामप्रसाद नामक एक दूसरा किसान था | उसके पास खेत नहीं थे | वह भैरोमल के ही कुछ खेत लेकर खेती करता था | किंतु; था ! परिश्रमी | अपने मजदूरों के साथ वह खेत पर जाता था | डटकर परिश्रम करता था उसके खेत भली प्रकार जोते और सींचे जाते थे | अच्छी खाद पडती थी, घास निकाली जाती थी और बीज भी समय पर बोए जाते थे | उसके घर के लोग भी खेत पर काम करते थे | खेत में उपज अच्छी होती थी, लगान देखकर और खर्च करके भी वह बहुत अन्न बचा लेता था | थोड़े दिनों में रामप्रसाद धनी हो गया |

जब भैरोमल बहुत गरीब हो गया | उसके ऊपर महाजनों का ऋण हो गया तो उसे अपने खेत बेचने की आवश्यकता जान पड़ी | यह समाचार पाकर रामप्रसाद उसके पास और बोला – ” मैंने सुना है! कि आप अपने खेत बेचना चाहते हैं | कृपया करके आप मेरे हाथ अपने खेत बेचे मैं दूसरों से कम मुल्य नहीं दूंगा |”

भैरोमल ने आश्चर्य से पूछा – ” भाई रामप्रसाद मेरे पास इतने खेत भी मैं ऋणी हो गया किंतु: तुम्हारे पास धन कहां से आ गया है | तुम तो मेरे  थोड़े से खेत लेकर खेती करते हो उन खेतों की लगान भी तुम्हें देनी पड़ती है  और घर का भी काम चलाना पड़ता है | मेरे खेत खरीदने के लिए तुम्हें  किसने रुपये दिए?

रामप्रसाद ने कहा – ” मुझे रुपए किसी ने नहीं दिए! रुपए तो मैंने खेतों की उपज से ही बचा कर ही इकट्ठे किए हैं | आप की खेती और मेरी खेती में एक अंतर है | आप नौकरों मजदूरों आदि सब से काम करने के लिए जाओ-जाओ कहते हैं | आपकी संपत्ति भी चली गई | मैं मजदूरों और नौकरों से पहले काम करने को तैयार होकर उन्हें अपने साथ काम करने के लिए सदा “आओ” कह कर बुलाता हूं | इससे मेरे यहां संपत्ति आती है |”

अब भैरोमल बात समझ गया | उसने थोड़े से खेत रामप्रसाद के हाथ बेच कर अपना ऋण चुका दिया | और बाकी खेतों में परिश्रमपूर्वक खेती करने लगा | थोड़े ही दिनों में उसकी दशा सुधर गई | वह फिर सुखी और संपन्न हो गया |

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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रविवार, 26 दिसंबर 2021

अनुभवी जौहरी

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒अनुभवी जौहरी*

एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने के भी लाले पड़ गए। एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ। कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया।

चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा- बेटा, मां से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना, अच्छे दाम मिलेंगे। 

उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से दुकान पर आकर बैठना।

अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहां हीरों, रत्नों की परख का काम सीखने लगा।

एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने आने लगे।

एक दिन उसके चाचा ने कहा, बेटा अपनी मां से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।

मां से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है। वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया।

चाचा ने पूछा, हार नहीं लाए?

उसने कहा, वह तो नकली था।

तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार हार लेकर आये थे, तब मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचाजी हमारी चीज़​ को भी नकली बताने लगे। 

आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।

*शिक्षा* - *आज विश्व में अनेक धर्मों की स्थापना होते जा रही है।सभी लोग अपनी सुविधाओं के अनुसार सत्यधर्म को तोड़कर एक नये धर्म की स्थापना कर रहे है।इसीकारण से आज विश्व में विषमताओं के पहाड़ दिखाई दे रहे है।अतः आप सभी से नम्र निवेदन है कि आप इस दौड़ में सम्मिलित ना हो।आप अपनी शक्ति अनुसार सत्य को परखकर उस मार्ग पर चले।इसी से आप सच्चे सुख को प्राप्त कर पायेंगे।सच यह है कि सच्चेज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है। और ऐसे ही गलतफहमी का शिकार होकर रिश्ते,समाज, देश व विश्व बिगड़ते जा रहे है।*

ज़रा सी रंजिश पर,ना छोड़ो किसी अपने का दामन ज़िंदगी बीत जाती है अपनो को अपना बनाने में।
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शनिवार, 25 दिसंबर 2021

हृदय परिवर्तन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒हृदय परिवर्तन* 

"अबे देख------

चिड़ियाघर में, अपने तीन साल के बच्चे के साथ घूम रही एक गांव की खूबसूरत नवयुवती को दिखा, वो पांच-सात कॉलेज के लड़के यही बातें कर रहे थे। वो उस खूबसूरत, अकेली देहाती युवती के पीछे हो लिए। युवती अपने बच्चे को कभी गोद में तो कभी उंगली पकड़े उसे बारी बारी से जानवरों को दिखा रही थी। पीछे लगे आवारा लड़कों से बिल्कुल बेखबर...
*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*
"चलती है क्या नौ से बारह"  फिल्मी गाने गाते वो उसे कट मारकर अट्टहास करते आगे निकल गए। युवती ने उनपर ध्यान नहीं दिया। वो हिरन के बाड़े के पास अपने बच्चे को उन्हें दिखा रही थी। बच्चा चहकता हुआ उन्हें देख रहा था। आवारा लड़के उस युवती को घूर रहे थे। वो लड़के बगल में ही शेर के बाड़े के पास जोर से उसे देख फब्तियां कस रहे थे। 
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उनमें से एक लड़का पूरे जोश में था। बाड़े के ऊपर लगे ग्रिल पर बैठ भद्दे गाने गा रहा था। युवती बच्चे को लिए शेर को दिखाने बढ़ चली थी। युवती को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसे उन लड़कों से तनिक भी भय नहीं या वो उन्हें अनदेखा अनसुना कर रही है,युवक अतिउत्साहित हो उठा। सभी ठहाके लगा रहे थे। युवती बाड़े के पास पहुंच चुकी थी। तभी बाड़े के ऊपर चढ़ा लड़का,लड़खड़ाते हुए, बाड़े के अंदर गिर पड़ा। लोगों के होश फाख्ता हो गए। 

      बाड़े से दूर  बैठा शेर उठ चुका था। उसने गुर्राते हुए कदम धीरे धीरे लड़के की तरफ बढ़ा दिया। उसके दोस्त असहाय होकर खड़े थे और सिर्फ चिल्ला रहे थे। भागता हुआ एक गार्ड आकर शेर को आवाज देकर जाने को कह रहा था। एक मिनट के भीतर अफरा तफरी मच चुकी थी। शेर को आता देख गिरा हुआ लड़का डर से कांप रहा था। उसके जोश के साथ शायद होश भी ठंढे पड़ चुके थे ।" माँ.. माँ.. बचाओ..बचाओ" की आवाज लगातार तेज हो रही थी और शेर की चाल भी। 

तभी उस देहाती युवती ने, अपने बदन से साढ़े पांच मीटर लंबी सूतीसाड़ी उतारकर बाड़े में लटका दिया। बाड़े में गिरे लड़के ने तुरंत उस साडी का सिरा मजबूती से पकड़ लिया फिर लोगों की मदद से उसे निकाल लिया गया। गार्ड युवक को संभालता हुआ बोल पड़ा..."पहले तुम्हारी माँ ने जन्म दिया था, आज इस युवती ने तुम्हें दुबारा जन्म दिया है" 

सिर्फ ब्लाउज और पेटिकोट में खड़ी वो अर्ध-नग्न युवती अब उन लड़कों को उनकी माँ नज़र आ रही थी.. !!

हमें युवा पीढ़ी को बताना होगा । यह कहानी उन्हें सुनाने या पढ़ाने की जरूरत है। जैसी सोच वैसी दुनिया दिखेगी ।
अतः हमें बाहरी सुंदरता को देखकर उसमें आशक्त ना होते हुए अपने कर्तव्यों को ख्याल रखकर जीवन सफल बनाना चाहिए।
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

बंदर का जन्मदिन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒बन्दर का जन्मदिन*

*आज बन्दर का जन्मदिन और बन्दरिया के विवाह की वर्षगांठ थी। बन्दरिया बड़ी खुश थी। एक नज़र उसने अपने परिवार पर डाली। तीन प्यारे - प्यारे बच्चे , नाज उठाने वाला साथी , हर सुख-दु:ख में साथ देने वाली बन्दरों  की टोली। पर फिर भी मन उदास है।*

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सोचने लगी - "काश ! मैं भी मनुष्य होती तो कितना
अच्छा होता ! आज केक काटकर सालगिरह मनाते , दोस्तों के साथ पार्टी करते। हाय ! सच में कितना मजा मआता !

बन्दर ने अपनी बन्दरिया को देखकर तुरन्त भांप लिया कि इसके दिमाग में जरुर कोई ख्याली पुलाव पक रहा है।

उसने तुरन्त टोका - "अजी , सुनती हो ! ये दिन में सपने देखना बन्द करो। जरा अपने बच्चों को भी देख लो , जाने कहाँ भटक रहे हैं.?

मैं जा रहा हूँ बस्ती में कुछ खाने का सामान लेकर आऊँगा तेरे लिए। आज तुम्हें कुछ अच्छा खिलाने का मन कर रहा है मेरा।

बन्दरिया बुरा सा मुँह बनाकर चल दी अपने बच्चों के पीछे जैसे-जैसे सूरज चढ़ रहा था , उसका पारा भी चढ़ रहा था अच्छे पकवान के विषय में सोचती तो मुँह में पानी आ जाता।

पता नहीं मेरा बन्दर आज मुझे क्या खिलाने वाला है ?
अभी तक नहीं आया। जैसे ही उसे अपना बन्दर आता दिखा झट से पहुँच गई उसके पास।

बोली - क्या लाए हो जी ! मेरे लिए। दो ना , मुझे बड़ी भूख लगी है। ये क्या तुम तो खाली हाथ आ गये।

बन्दर ने कहा :-- हाँ , कुछ नहीं मिला।
यहीं जंगल से कुछ लाता हूँ।

बन्दरिया नाराज होकर बोली :-- नहीं चाहिए मुझे कुछ भी सुबह तो मजनू बन रहे थे , अब साधु क्यों बन गए..??

बन्दर :-- अरी भाग्यवान ! जरा चुप भी रह लिया करो।
पूरे दिन किच-किच करती रहती हो।

बन्दरिया :-- हाँ - हाँ ! क्यों नहीं , मैं ही ज्यादा बोलती हूँ।
पूरा दिन तुम्हारे परिवार की देखरेख करती हूँ , तुम्हारे बच्चों के आगे-पीछे दौड़ती रहती हूँ। इसने उसकी टांग खींची , उसने इसकी कान खींची , सारा दिन झगड़े सुलझाती रहती हूँ।

बन्दर :-- अब बस भी कर , मुँह बन्द करेगी तभी तो मैं कुछ बोलूँगा। गया था मैं तेरे लिए पकवान लाने जैनसाहबजी की छत पर। रसोई की खिड़की से एक मैथी  का परांठा झटक भी लिया था मैंने पर तभी  जैनसाहबजी  की बड़ी बहू की आवाज़ सुनाई पड़ी . .

अरी अम्मा जी ! अब क्या बताऊँ , ये और बच्चे नाश्ता कर चुके हैं। मैंने भी खा लिया है और आपके लिए भी एक मैथीका नमकीन चटपटा परांठा रखा था मैंने पर खिड़की से बन्दर उठा ले गया। अब क्या करुँ , फिर से चुल्हा चौंका तो नहीं कर सकती मैं। आप देवरानी जी के वहाँ जाकर खा लें।

अम्मा ने रुँधाए से स्वर में कहा :- - पर मुझे दवा खानी है , बेटा.!

बहू ने तुरन्त पलटकर कहा :-- तो मैं क्या करुँ.? अम्मा जी ! वैसे भी आप शायद भूल गयीं हैं आज से आपको वहीं खाना है। एक महीना पूरा हो गया है आपको मेरे यहाँ खाते हुए।

देवरानी जी तो शुरु से ही चालाक है वो नहीं आयेंगी
आपको बुलाने। पर तय तो यही हुआ था कि एक महीना आप यहाँ खायेंगी और एक महीना वहाँ।

अम्मा जी की आँखों में आँसू थे , वे बोल नहीं पा रहीं थीं।

बड़ी बहू फिर बोली :-- ठीक है , अभी नहीं जाना चाहती तो रुक जाईये। मैं दो घण्टे बाद दोपहर का भोजन बनाऊँगी तब खा लीजिएगा।

बन्दर ने बन्दरिया से कहा :-- भाग्यवान ! मुझसे यह सब देखा नहीं गया और मैंने परांठा वहीं अम्माजी के सामने गिरा दिया।

बन्दरिया की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे अपने बन्दर पर बड़ा गर्व हो रहा था और बोली :-- ऐसे घर का अन्न हम नहीं खायेंगे जहाँ माँ को बोझ समझते हैं। अच्छा हुआ जो हम इन्सान नहीं हुए। हम जानवर ही ठीक हैं।।

*👨‍👩‍👧‍👦▶️🙎शिक्षा : - वर्तमान में आज पढ़ें लिखे शिक्षित लोगों को अपने आप को मन के आईने मे देखकर विचार करना चाहिए कि हम किस प्रकार अपनी गलतियों को सुधार कर यह जन्मदिन सफल बनायें।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

पोटली का रहस्य

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒पोटली का रहस्य*

एक बार कर्मो ने जब सृष्टि की रचना की तो उसे दो पोटली दी। कहा एक पोटली को आगे की तरफ लटकाना और दूसरी को कंधे के पीछे पीठ पर। आदमी दोनों पोटलियां लेकर चल पड़ा।

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हां, कर्मो ने उसे ये भी कहा था कि आगे वाली पोटली पर नजर रखना पीछे वाली पर नहीं। समय बीतता गया। वह आदमी आगे वाली पोटली पर बराबर नजर रखता। आगे वाली पोटली में उसकी कमियां थीं और पीछे वाली में दुनिया की।

वे अपनी कमियां सुधारता गया और तरक्की करता गया। पीछे वाली पोटली को इसने नजरंदाज कर रखा था।

एक दिन तालाब में नहाने के पश्चात, दोनों पोटलियां अदल बदल हो गई। आगे वाली पीछे और पीछे वाली आगे आ गई।

अब उसे दुनिया की कमियां ही कमियां नजर आने लगी। ये ठीक नहीं, वो ठीक नहीं। बच्चे ठीक नहीं, पड़ोसी बेकार है, सरकार निक्कमी है आदि-आदि। अब वह खुद के अलावा सब में कमियां ढूंढने लगा।

परिणाम ये हुआ कि कोई नहीं सुधरा, पर उसका पतन होने लगा। वह चक्कर में पड़ गया कि ये क्या हुआ है? वो वापस कर्मों के ज्ञानी पुरूष आचार्य परमेष्ठी पास गया। आचार्य भगवन ने उसे समझाया कि जब तक तेरी नजर अपनी कमियों पर थी, तू तरक्की कर रहा था। जैसे ही तूने दूसरों में मीन-मेख निकालने शुरू कर दिए, वहीं से तेरा पतन शुरू हो गया।

*शिक्षा:-*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️▶️सच्चाई यही है कि हम किसी को नहीं सुधार सकते, हम अपने आपको सुधार लें इसी में हमारा कल्याण है।इसलिए सभी मानवता रखने वाले भव्य आत्माओं को अपने कर्तव्य को (रत्नकरंड श्रावकाचार ग्रंथ ▶️यह ग्रंथ सरल हिन्दी भाषा में यू ट्यूब पर दिया है।)जानकर उसके अनुसार आचरण करते हुए यह मनुष्य भव सफल करना चाहिए। हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। हम यही सोचते हैं कि सबको ठीक करके ही शांति प्राप्त होगी, जबकि खुद को ठीक नहीं करते, यही हमारी सबसे पहली भूल है।जिसके कारण हम संसार रुपी समुद्र में भटकते है..!!*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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बुधवार, 22 दिसंबर 2021

सबके भगवान राम

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सबके भगवान राम*

*सिर्फ मेरा राम मुझे वापिस दे दो।।*

खचाखच भरी बस में कंडक्टर को एक गिरा हुआ बटुआ मिला जिसमे एक पांच सौ का नोट और भगवान् राम की एक फोटो थी।

वह जोर से चिल्लाया , ” अरे भाई! किसी का बटुआ गिरा है क्या?”

अपनी जेबें टटोलने के बाद सीनियर सिटीजन सीट पर बैठा एक आदमी बोला, “हाँ, बेटा शायद वो मेरा बटुआ होगा… जरा दिखाना तो.”

“दिखा दूंगा- दिखा दूंगा, लेकिन चाचाजी पहले ये तो बताओ कि इसके अन्दर क्या-क्या है?”

कुछ नहीं इसके अन्दर थोड़े पैसे हैं और मेरे राम की एक फोटो है.”, चाचाजी ने जवाब दिया।

पर राम  की फोटो तो किसी के भी बटुए में हो सकती है, मैं कैसे मान लूँ कि ये आपका है.”, कंडक्टर ने सवाल किया।

अब चाचाजी उसके बगल में बैठ गए और बोले, “बेटा ये बटुआ तब का है जब मैं हाई स्कूल में था. जब मेरे बाबूजी ने मुझे इसे दिया था तब मेरे राम  की फोटो इसमें थी।

लेकिन मुझे लगा कि मेरे माँ-बाप ही मेरे लिए सबकुछ हैं इसलिए मैंने राम  की फोटो के ऊपर उनकी फोटो लगा दी…।

जब युवा हुआ तो लगा मैं कितना हैंडसम हूँ और मैंने माँ-बाप के फोटो के ऊपर अपनी फोटो लगा ली…।

फिर मुझे एक लड़की से प्यार हो गया, लगा वही मेरी दुनिया है, वही मेरे लिए सबकुछ है और मैंने अपनी फोटो के साथ-साथ उसकी फोटो लगा ली… सौभाग्य से हमारी शादी भी हो गयी।

कुछ दिनों बाद मेरे बेटे का जन्म हुआ, इतना खुश मैं पहले कभी नहीं हुआ था…सुबह-शाम, दिन-रात मुझे बस अपने बेटे का ही ख़याल रहता था…।

अब इस बटुए में मैंने सबसे ऊपर अपने बेटे की फोटो लगा ली…

पर अब जगह कम पड़ रही थी, सो मैंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम  और अपने माँ-बाप की फोटो निकाल कर बक्से में रख दी…

और विधि का विधान देखो, फोटो निकालने के दो-चार साल बाद माता-पिता का देहांत हो गया… और दुर्भाग्यवश उनके बाद मेरी पत्नी भी एक लम्बी बीमारी के बाद मुझे छोड़ कर चली गयी।

इधर बेटा बड़ा हो गया था, उसकी नौकरी लग गयी, शादी हो गयी…बहु-बेटे को अब ये घर छोटा लगने लगा, उन्होंने अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया और वहां चले गए।

अब मैं अपने उस घर में बिलकुल अकेला था जहाँ मैंने तमाम रिश्तों को जीते-मरते देखा था…

पता है, जिस दिन मेरा बेटा मुझे छोड़ कर गया, उस दिन मैं बहुत रोया… इतना दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था…कुछ नहीं सूझ रहा था कि मैं क्या करूँ और तब मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी जिसमे सालों पहले मैंनेमर्यादा पुरुषोत्तम राम  की फोटी अपने बटुए से निकाल कर रख दी थी…

मैंने फ़ौरन वो फोटो निकाली और उसे अपने सीने से चिपका ली…अजीब सी शांति महसूस हुई…लगा मेरे जीवन में तमाम रिश्ते जुड़े और टूटे… लेकिन इन सबके बीच में मेरे भगवान् से मेरा रिश्ता अटूट रहा… मेरा मर्यादा पुरुषोत्तम राम कभी मुझसे रूठा नहीं…

और तब से इस बटुए में सिर्फ मेरे मर्यादा पुरुषोत्तम राम  की फोटो है और किसी की भी नहीं… और मुझे इस बटुए और उसमे पड़े पांच सौ के नोट से कोई मतलब नहीं है, मेरा स्टॉप आने वाला है…तुम बस बटुए की फोटो मुझे दे दो…सबके रखवाले  मर्यादा पुरुषोत्तम राम  मुझे दे दो…

*कंडक्टर ने फौरन बटुआ चाचाजी के हाथ में रखा और उन्हें एकटक देखता रह गया।*

*हम चाहे कितने भी बड़े क्यो ना हो जाये हमारा मर्यादा पुरुषोत्तम राम के प्रति त्याग और प्रेम हमेशा बना रहता है।*
*👨‍👩‍👧‍👦नोट :- जिसप्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम रामजी ने सभी जीवों की मदत करते हुए अपनी आत्मा को परमात्मा बनाया।उसी प्रकार हम भी अपना आचरण राममय बनाकर जीवन सफल करें।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त  करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

बिन मांगे मिले

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒बिन मांगे मिले....*
      एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवों में घूम रहा था।

घूमते-घूमते उसके कुर्ते के सोने के बटन की झालर टूट गई, उसने अपने मंत्री से पूछा, कि इस गांव में कौन सा सुनार है, जो मेरे कुर्ते में नया बटन बना सके?

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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      उस गांव में सिर्फ एक ही सुनार था, जो हर तरह के गहने बनाता था, उसको राजा के सामने ले जाया गया।
     राजा ने कहा, कि तुम मेरे कुर्ते का बटन बना सकते हो ?
     सुनार ने कहा, हुज़ूर यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है ! उसने, कुर्ते का दूसरा बटन देखकर, नया बना दिया। और राजा के कुर्ते में फिट कर दिया।।
     राजा ने खुश होकर सुनार से पूछा, कि कितने पैसे दूं ?

      सुनार ने कहा :- "महाराज रहने दो, छोटा सा काम था।"
     उसने, मन में सोचा, कि सोना राजा का था, उसने तो सिर्फ मजदूरी की है। और राजा से क्या मजदूरी लेनी है...!
     राजा ने फिर से सुनार को कहा कि, नहीं-नहीं, बोलो कितने दूं ?
      सोनार ने सोचा, की दो रूपये मांग लेता हूँ। फिर मन में विचार आया, कि कहीं राजा यह न सोच ले कि एक बटन बनाने का मेरे से दो रुपये ले रहा है, तो गाँव वालों से कितना लेता होगा, और कोई सजा न दे दे। क्योंकि उस जमाने में दो रुपये की कीमत बहुत होती थी।
     सुनार ने सोच-विचार कर, राजा से कहा कि :- "महाराज जो भी आपकी इच्छा हो, दे दो।"
     अब राजा तो राजा था। उसको अपने हिसाब से देना था। कहीं देने में उसकी इज्जत ख़राब न हो जाये और, उसने अपने मंत्री को कहा, कि इस सुनार को दो गांव दे दो, यह हमारा हुक्म है।
      यहाँ सोनी जी, सिर्फ दो रुपये की मांग का सोच रहे थे, मगर, राजा ने उसको दो गांव दे दिए।
      इसी तरह, जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता है और मांगते हैं तो सिर्फ हम मांगने में कमी कर जाते हैं। देने वाला तो पता नहीं क्या देना चाहता है, लेकिन, हम अपनी हैसियत से बड़ी तुच्छ वस्तु मांग लेते हैं.।
     *इसलिए संत-महात्मा कहते है, भगवान को सब कुछ अपनी शक्ति के अनुसार भक्ति पूर्वक समर्पण कर दो, उनसे कभी कुछ मत मांगों, जिस प्रकार जीव की भक्ति होगी उसके अनुरूप फल की प्राप्ति होगी।  बस उसी से संतुष्ट रहो। फिर देखो उसकी लीला। वारे के न्यारे हो जाएंगे। जीवन मे धन के साथ "सन्तुष्टि" का होना जरूरी है..!!*
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सोमवार, 20 दिसंबर 2021

मानवधर्म

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒मानवधर्म*

पारस अपने काम में बहुत होशियार होने के बावजूद बड़ा ही आलसी था। जब देखो आलस के मारे सोता रहता था। उसकी इस आदत से उसकी पत्नी पूनम बड़ी दुखी थी। वह अकसर उसे समझाती, “तुम अपने हर काम में इतनी देर करते हो, तभी तो आज तक तुम्हारे पास एक दुकान तक नहीं है। मुझे तो डर है, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे आलसीपन की वजह से भूखे मरने की नौबत आ जाए।” 

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एक दिन पारस   और पूनम  में झगड़ा हुआ तो पारस  गुस्से से बोला, “मैं आज ही शहर जाकर कोई काम ढूंढूगा और एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा, देखना। फिर मेरे पास आलीशान मकान-दुकान सब कुछ होगा। लोग तब मेरे जैसा बनना चाहेंगे।” 

सच में उस दिन पारस  ने जो कहा वही किया। वह घर छोड़कर स्टेशन की तरफ चल दिया। वहां उसने टिकट लिया। तभी उसे सामने से एक पूरी-छोले बेचने वाला नजर आया। उसके मुंह में पानी आ गया। उसने पूरी-छोले खरीदे और जमकर खाया। पेट भरने के बाद उसे नींद सताने लगी। वहीं अपनी गठरी सिर के नीचे दबाकर वह खर्राटे भरने लगा। 

ट्रेन कब आई और कब चली गई, पारस  को कुछ पता नहीं चला। तभी दिगबंर काका उधर से गुजरे। उन्होंने पारस को सोते देखा। उन्होंने जाकर पूनम को बताया। पूनम  स्टेशन पर पहुंची और पारस को जगाकर बोली, “काश, तुम बड़े बोल न बोलते।” नींद का मारा पारस  अब भी कुछ समझ नहीं पाया। वह पूछने लगा, “क्या ट्रेन आ गई?”

उसकी बात सुनकर दिगबंर  काका बोले, “पूनम , इसे कुछ कहने-सुनाने से तो अच्छा है, तुम पंचपरमेष्ठी भगवान से इसके लिए प्रार्थना करो कि यह आलस्य छोड़ दे। यह नहीं समझ पा रहा कि आलस्य घुन की तरह जीवन को खोखला कर देता है। जब पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।” 

पारस ने कहा, “दिगबंर काका, मैं खुद बदलना चाहता हूं, लेकिन पता नहीं मुझे क्या हो जाता है। मुझे उस समय ध्यान नहीं रहता कि क्या ठीक है और क्या गलत, जब कुछ करने का मौका आता है तब!” 

दिगबंर काका ने समझाया, “यह भी आदत है। इसे खत्म करने के लिए भी खुद से थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़ेगी। लोहे की सलाख टेढ़ी हो जाए, तो उसे आग में डालकर ठोकना-पीटना पड़ता है। तुम भी ऐसा ही करो। तुम्हारी जीत होगी। बहुत से लोगों ने ऐसा किया है । इसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई। सोचो, पक्का इरादा करो, अपनाओ और सब हो जाएगा। छोटी-सी बात है यह।” 

पारस  ने दिगबंर काका की बात मानी। छोटी-छोटी बातों को समझकर स्वयं का सुधार  किया और जो श्रावकधर्म के अंतर्गत सही था वही कार्य करते हुए उसने अपना जीवन सार्थक कर  लिया।
यह सभी कार्य धर्मपत्नी पूनम के श्राविका व्रतों के पालन से शीघ्रता से संभव हुआ।
आज वे अपनी आमदनी का छँठवा हिस्सा (साधु सेवा, आहारदान,पंचकल्याणक, अन्य उपयोगी कार्य)धर्म कार्यों में खर्च करते है।इससे उन्हें दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि होती गई।आज उनके संस्कारवान सातों पुत्र उच्च पदों पर सेवा देते हुए अपने श्रावकधर्म का पालन कर रहे है।
*नोट:- घर में 👨‍👩‍👧‍👦पति ओर पत्नी के श्रावकधर्म के पालन से आने वाली विषम परिस्थितियों में भी हमेशा शांत परिणामों से समस्या का निराकरण होता है।*
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रविवार, 19 दिसंबर 2021

ऋण मुक्ति

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒ऋण मुक्ति💐💐*

👨‍👩‍👧‍👦▶️✍️एक धर्मशाला में पति-पत्नी अपने छोटे-से नन्हें-मुन्ने बच्चे के साथ रुके। धर्मशाला कच्ची थी। दीवारों में दरारें पड़ गयी थीं आसपास में खुला जंगल जैसा माहौल था। पति-पत्नी अपने छोटे-से बच्चे को प्रांगण में बिठाकर कुछ काम से बाहर गये। वापस आकर देखते हैं तो बच्चे के सामने एक बड़ा नाग कुण्डली मारकर फन फैलाये बैठा है। यह भयंकर दृश्य देखकर दोनों हक्के-बक्के रह गये। बेटा मिट्टी की मुट्ठी भर-भरकर नाग के फन पर फेंक रहा है और नाग हर बार झुक-झुककर सहे जा रहा है।

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माँ चीख उठी ,
बाप चिल्लायाः-

 "बचाओ... बचाओ... हमारे लाड़ले को बचाओ।"
लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। उसमें एक निशानेबाज था। ऊँट गाड़ी पर बोझा ढोने का धंधा करता था। 

वह बोलाः "मैं निशाना तो मारूँ, सर्प को ही खत्म करूँगा लेकिन निशाना चूक जाय और बच्चे को चोट लग जाय तो मैं जिम्मेदार नहीं। आप लोग बोलो तो मैं कोशिश करूँ?"

पुत्र के आगे विषधर बैठा है ! ऐसे प्रसंग पर कौन-सी माँ-बाप इनकार करेगे? 
वह सहमत हो गये और माँ बोलीः "भाई ! साँप को मारने की कोशिश करो,अगर गलती से बच्चे को चोट लग जायेगी तो हम कुछ नहीं कहेंगे।"

 ऊँटवाले ने निशाना मारा। साँप जख्मी होकर गिर पड़ा, मूर्च्छित हो गया। लोगों ने सोचा कि साँप मर गया है। उन्होंने उसको उठाकर बाड़ में फेंक दिया। 
रात हो गयी। वह ऊँटवाला उसी धर्मशाला में अपनी ऊँटगाड़ी पर सो गया। 
रात में ठंडी हवा चली। मूर्च्छित साँप सचेतन हो गया और आकर ऊँटवाले के पैर में डसकर चला गया। सुबह लोग देखते हैं तो ऊँटवाला मरा हुआ था।
दैवयोग से सर्पविद्या जानने वाला एक आदमी वहाँ ठहरा हुआ था। वह बोलाः "साँप को यहाँ बुलवाकर जहर को वापस खिंचवाने की विद्या मैं जानता हूँ। यहाँ कोई आठ-दस साल का निर्दोष बच्चा हो तो उसके चित्त में साँप के सूक्ष्म शरीर को बुला दूँ और वार्तालाप करा दूँ। 
गाँव में से आठ-दस साल का बच्चा लाया गया। उसने उस बच्चे में साँप के जीव को बुलाया। 

उससे पूछा गया - "इस ऊँटवाले को तूने काटा है ?" बच्चे में मौजूद जीव ने कहा - "हाँ।"

फिर पूछा कि ,- "इस बेचारे ऊँट वाले को क्यों काटा?"

 बच्चे के द्वारा वह साँप बोलने लगाः "मैं निर्दोष था। मैंने इसका कुछ बिगाड़ा नहीं था। इसने मुझे निशाना बनाया तो मैं क्यों इससे बदला न लूँ?"

 वह बच्चा तुम पर मिट्टी डाल रहा था उसको तो तुमने कुछ नहीं किया !"
बालक रूपी साँप ने कहा- " बच्चा तो मेरा तीन जन्म पहले का लेनदार है। 
तीन जन्म पहले मैं भी मनुष्य था, वह भी मनुष्य था। मैंने उससे तीन सौ रुपये लिए थे लेकिन वापस नहीं दे पाया। अभी तो देने की क्षमता भी नहीं है। ऐसी भद्दी योनियों में भटकना पड़ रहा है,आज संयोगवश वह सामने आ गया तो मैं अपना फन झुका -झुकाकर उससे माफी मांग रहा था। उसकी आत्मा जागृत हुई तो धूल की मुट्ठियाँ फेंक-फेंककर वह मुझे फटकार दे रहा था कि 'लानत है तुझे ! कर्जा नहीं चुका सका....' उसकी वह फटकार सहते-सहते मैं अपना ऋण अदा कर रहा था। 

हमारे लेन-देन के बीच टपकने वाला वह ऊँट वाला कौन होता है? मैंने इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था फिर भी इसने मुझ पर निशाना मारा। मैंने इसका बदल लिया।"

 सर्प-विद्या जाननेवाले ने साँप को समझाया, "देखो, तुम हमारा इतना कहना मानों, इसका जहर खींच लो।उस सर्प ने कहा - "मैं तुम्हारा कहना मानूँ तो तुम भी मेरा कहना मानो। मेरी तो वैर लेने की योनि है। और कुछ नहीं तो न सही,मुझे यह ऊँटवाला पाँच सौ रुपये देवे तो अभी इसका जहर खींच लूँ। उस बच्चे से तीन जन्म पूर्व मैंने तीन सौ रुपये लिये थे, दो जन्म और बीत गये, उसके सूद के दौ सौ मिलाकर कुल पाँच सौ लौटाने हैं।
"किसी सज्जन ने पाँच सौ रूपये उस बच्चे के माँ-बाप को दे दिये। साँप का जीव वापस अपनी देह में गया, वहाँ से सरकता हुआ मरे हुए ऊँटवाले के पास आया और जहर वापस खींच लिया। ऊँटवाला जिंदा हो गया।
   
 इस कथा से स्पष्ट होता है कि इतना व्यर्थ खर्च नहीं करना चाहिए कि सिर पर कर्जा चढ़ाकर मरना पड़े और उसे चुकाने के लिए फन झुकाना पड़े, मिट्टी से फटकार सहनी पड़े। 

*_जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक कर्मों का ऋणानुबंध चुकाना ही पड़ता है। अतः निष्काम कर्म करके ईश्वर को संतुष्ट करें। अपने आत्मा- परमात्मा का अनुभव करके यहीं पर, इसी जन्म में शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त करें।।*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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शनिवार, 18 दिसंबर 2021

ह्रदय में भगवान

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒हृदय में भगवान💐💐*
🌞▶️👨‍👩‍👧‍👦यह घटना जयपुर के एक वरिष्ठ डॉक्टर की आपबीती है, जिसने उनका जीवन बदल दिया। वह हृदय रोग विशेषज्ञ  हैं। उनके द्वारा बताई प्रभु कृपा की कहानी के अनुसार:-
 
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एक दिन मेरे पास एक दंपत्ति अपनी छः साल की बच्ची को लेकर आए। निरीक्षण के बाद पता चला कि उसके हृदय में रक्त संचार बहुत कम हो चुका है।
          मैंने अपने साथी डाक्टर से विचार करने के बाद उस दंपत्ति से कहा - 30% संभावना है बचने की ! दिल को खोलकर ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी, नहीं तो बच्ची के पास सिर्फ तीन महीने का समय है ! 
*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार संस्था के नंबर पर व्हाट्सएप करते हुए अवश्य ही भेजे।संस्था का एकमात्र उद्देश्य यह है कि इस भव मे आपसभी के रत्नत्रय मे दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि हो ओर समाधि मरण करके जीवन को सफल बनायें  ।*

          माता पिता भावुक हो कर बोले, "डाक्टर साहब ! इकलौती बिटिया है। ऑपरेशन के अलावा और कोई चारा नहीं है,
मैंने अन्य कोई विकल्प के लिए मना कर दिया
दंपति ने कहा आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिये।"

          सर्जरी के पांच दिन पहले बच्ची को भर्ती कर लिया गया। बच्ची मुझ से बहुत घुलमिल चुकी थी, बहुत प्यारी बातें करती थी। उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था। वह सुबह शाम बच्ची को यही कहती, बेटी घबराना नहीं। भगवान बच्चों के हृदय में रहते हैं। वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।

          सर्जरी के दिन मैंने उस बच्ची से कहा, "बेटी ! चिन्ता न करना, ऑपरेशन के बाद आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे।" बच्ची ने कहा, "डाक्टर अंकल मैं बिलकुल नहीं डर रही क्योंकि मेरे हृदय में भगवान रहते हैं, पर आप जब मेरा हार्ट ओपन करोगे तो देखकर बताना भगवान कैसे दिखते हैं ?" मै उसकी बात पर मुस्कुरा उठा।

          ऑपरेशन के दौरान पता चल गया कि कुछ नहीं हो सकता, बच्ची को बचाना असंभव है, दिल में खून का एक कतरा भी नहीं आ रहा था। निराश होकर मैंने अपनी साथी डाक्टर से वापिस दिल को स्टिच करने का आदेश दिया।

          तभी मुझे बच्ची की आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त भरे हाथों को जोड़ कर प्रार्थना करने लगा, "हे ईश्वर ! मेरा सारा अनुभव तो इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है, पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हो तो आप ही कुछ कीजिए।" 

          मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े। यह मेरी पहली अश्रु पूर्ण प्रार्थना थी। इसी बीच मेरे जूनियर डॉक्टर ने मुझे कोहनी मारी। मैं चमत्कार में विश्वास नहीं करता था पर मैं स्तब्ध हो गया यह देखकर कि दिल में रक्त संचार पुनः शुरू हो गया।

          मेरे 60 साल के जीवन काल में ऐसा पहली बार हुआ था। आपरेशन सफल तो हो गया पर मेरा जीवन बदल गया। होश में आने पर मैंने बच्ची से कहा, "बेटा ! हृदय में भगवान दिखे तो नहीं पर यह अनुभव हो गया कि वे हृदय में मौजूद हर पल रहते हैं।

          इस घटना के बाद मैंने अपने आपरेशन थियेटर में प्रार्थना का नियम निभाना शुरू किया। मैं यह अनुरोध करता हूँ कि सभी को अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार डालना ही चाहिए।
           हे परम् पिता तुम ही- सुधि ले रहे जन जन की।
कुछ कहने से पहले ही - सब जानते हो मन की।।
 
बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भजन सिमरन में ढील देनी हैं। वह मालिक अपने आप ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगा।

*इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए जी।*
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शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

भावों की पवित्रता

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒भावों की पवित्रता*

एक राजा को अपने लिए सेवक की आवश्यकता थी। उसके मंत्री ने दो दिनों के बाद एक योग्य व्यक्ति को राजा के सामने पेश किया। राजा ने उसे अपना सेवक बना तो लिया पर बाद में मंत्री से कहा, ‘‘वैसे तो यह आदमी ठीक है पर इसका रंग-रूप अच्छा नहीं है।’’ मंत्री को यह बात अजीब लगी पर वह चुप रहा।

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एक बार गर्मी के मौसम में राजा ने उस सेवक को पानी लाने के लिए कहा। सेवक सोने के पात्र में पानी लेकर आया। राजा ने जब पानी पिया तो पानी पीने में थोड़ा गर्म लगा। राजा ने कुल्ला करके फेंक दिया। वह बोला, ‘‘इतना गर्म पानी, वह भी गर्मी के इस मौसम में, तुम्हें इतनी भी समझ नहीं।’’ मंत्री यह सब देख रहा था। मंत्री ने उस सेवक को मिट्टी के पात्र में पानी लाने को कहा। राजा ने यह पानी पीकर तृप्ति का अनुभव किया।

इस पर मंत्री ने कहा, ‘‘महाराज, बाहर को नहीं, भीतर को देखें। सोने का पात्र सुंदर, मूल्यवान और अच्छा है, लेकिन शीतलता प्रदान करने का गुण इसमें नहीं है। मिट्टी का पात्र अत्यंत साधारण है लेकिन इसमें ठंडा बना देने की क्षमता है। कोरे रंग-रूप को न देखकर गुण को देखें।’’ उस दिन से राजा का नजरिया बदल गया।

सम्मान, प्रतिष्ठा, यश, श्रद्धा पाने का अधिकार चरित्र को मिलता है, चेहरे को नहीं। चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य गुणों से उत्तम बनता है न कि ऊंचे आसन पर बैठने से या पदवी से। जैसे ऊंचे महल के शिखर पर बैठ कर भी कौवा, कौवा ही रहता है; गरुड़ नहीं बन जाता। उसी तरह अमिट सौंदर्य निखरता है मन की पवित्रता से, क्योंकि सौंदर्य रंग-रूप, नाक-नक्श, चाल-ढाल, रहन-सहन, सोच-शैली की प्रस्तुति मात्र नहीं होता। यह व्यक्ति के मन, विचार, चिंतन और कर्म का आइना है। कई लोग बाहर से सुंदर दिखते हैं मगर भीतर से बहुत कुरूप होते हैं। जबकि ऐसे भी लोग हैं जो बाहर से सुंदर नहीं होते मगर उनके भीतर भावों की पवित्रता इतनी ज्यादा होती है कि उनका व्यक्तित्व चुंबकीय बन जाता है। सुंदर होने और दिखने में बहुत बड़ा अंतर है।

*शिक्षा:-*
आपका चरित्र ही आपका सबसे बड़ा गुण है।
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

जीत

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒बुराई पर अच्छाई की जीत💐💐*

✍️▶️प्रबुद्ध नाम का बटेर था जो कि स्वभाव से बड़ा दयालु और परोपकारी था | वह हर एक जीव को अपने समान ही मानता है और इसलिए कभी किसी कीट – पतंग को मारकर अपना भोजन नहीं बनाता था तथा दूसरे पशु – पक्षियों को भी ऐसा करने से मना किया करता था |

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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वह प्रतिदिन पक्षियों को उपदेश भी देता था कि किसी जीव – जंतु को मारकर पेट भरना अच्छा नहीं है |प्रकृति ने पेट भरने के लिए तरह – तरह के फल और अनाज दिए है तो क्यों न हम उनसे अपना पेट भरे |

बटेर का उपदेश दूसरे पक्षियों को तो बहुत अच्छा लगता था, पर चील को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था | वह मन ही मन बटेर से जला करती थी और उसको नुकसान पहुचाने की दृष्टि से बाकि पक्षियों से उसकी बुराई किया करती थी |

बटेर जानता था कि चील उससे जलती है और उसके विरुद्ध पक्षियों को भड़काती है | किन्तु फिर भी वह उसकी बातों का बुरा नहीं मानता था और न ही अच्छाई का साथ छोड़ता |

एक दिन दोपहर के समय सभी पक्षी दाने – चारे के लिए बाहर चले गए | घोसले में केवल उनके अंडे और छोटे – छोटे बच्चे रह गए थे | उस वक्त बटेर भी अपने घोंसले में आराम कर रहा था | तभी सहसा उसके कानों में चीखने और चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी | वह तुरंत अपने घोंसले से बाहर निकला और इधर – उधर देखने लगा |

वह यह देखकर स्तब्ध हो गया कि चील के घोंसले की ओर धीरे – धीरे एक काला साप बढ़ रहा है | बच्चे उसी को देखकर चीख – चिल्ला रहे है |

बटेर तीव्र गति से उड़कर नाग के पास जा पहुंचा और बोला, “अपनी कुशलता चाहते हो तो भाग जाओ ! अगर घोंसले के अंदर घुसने की कोशिश की तो मैं शोर मचा दूंगा और तब तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है |”

नाग ने उत्तर दिया, “चील तुम्हारे साथ इतना बुरा व्यवहार करती है फिर भी तुम उसके बच्चों की रक्षा कर रहे हो | जाओं तूप आराम करों | मुझे चील के बच्चों को खाने दो क्योंकि चील बड़ी दुष्ट प्रकृति की है |”

बटेर ने कहा, “चील मेरी बुराई चाहती है तो चाहने दो लेकिन मैं तो केवल भला करना चाहता हूँ | चील अपना काम करती है, और मैं अपना काम करूँगा | मेरे रहते तुम चील के बच्चों को नहीं खा सकते | इसके लिए मुझे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़े, पर मैं चील के बच्चों की रक्षा अवश्य करूँगा |

बटेर की बात सुनकर नाग क्रुद्ध हो उठा | वह फुफकारता हुआ बोला, “ मुझसे बैर मोल ले रहे हो, तुम्हे पछताना पड़ सकता है | एक बार फिर सोच लो |”

बटेर ने उत्तर दिया, “सोच लिया है | बहुत करोगो, काट ही लोगो न | मरना तो एक दिन है ही ! अच्छा है, बुराई को मार कर मरू | तुम्हें जो कुछ करना है कर लेना मगर मैं तुम्हे चील के बच्चों को खाने नहीं दूंगा |”

हार मानकार नाग को वहां से जाना पड़ा | संध्या होने पर जब चील अपने घोंसले में वापस लौटी तो उसके बच्चों ने बटेर की बड़ी प्रसंशा करते हुए बोले अगर आज बटेर चाचा न होते तो दुष्ट नाग हम लोगों को निगल जाता |

अपने बच्चों के मुंह से बटेर की तारीफ सुनकर चील क्रुद्ध हो बोली उसकी इतनी हिम्मत कि वह मेरे घोंसले तक आ पहुंचा | मैं उस बटेर से इसका बदला ले कर रहूंगी |

चील कई दिनों तक मन – ही – मन सोच विचार करती रही | आखिर उसे बटेर से बदला लेने का एक उपाय सूझा कि क्यों न गिद्ध को ही बटेर के खिलाफ भड़का दे तो वह जरुर मेरी मदद करेगा |

चील एक दिन गिद्ध के घर गई और थोड़ी देर इधर – उधर की बाते करने के बाद बोली – हे गिद्धराज ! बटेर इस तरह का प्रचार कर रहा है कि किसी को भी जीव की हत्या नहीं करनी चाहिए | लेकिन महाराज अगर उसका प्रचार सफल हो गया तो आपको भूखा मरना पड़ेगा | क्योंकि जीवों को मारे बिना आप का काम नहीं चल सकता |

चील की बात सुनकर गिद्ध आवेश में आ गया और बोला, “अच्छा बटेर ऐसा कहता है तब तो उसका प्रबंध करना ही पड़ेगा |”

चील और गिद्ध ने बटेर को मार डालने का निश्चय किया | दोनों ने तय किया कि कल अर्धरात्रि में जब सभी पक्षी सोते रहेंगे, तो वे दोनों बटेर के घोंसले पर हमला कर उसे मार देंगे |

दूसरे दिन अर्धरात्रि को जब सभी पक्षी अपने – अपने घोंसले में सो रहे थे तब गिद्ध और चील दबे पांव बटेर के घोंसले के पास जा पहुंचे | दोनों ने बड़े आश्चर्य के साथ देखा कि उनसे पहले ही एक काला नाग धीरे – धीरे बटेर के घोंसले की ओर बढ़ रहा था | यह वही काला नाग था जिसे बटेर ने चील के बच्चों को खाने से रोका था | संयोग की बात, वह भी उसी वक्त बटेर से बदला लेने के लिए आया था |

चुकि चील, गिद्ध और नाग की पहले से ही शत्रुता है | अत: जैसे ही उन्होंने एक दूसरे को देखा तो बटेर को हानि पहुंचना भूल गए और तीनों आपस में ही लड़ने लगे |

तीनों की चीख – पुकार सुनकर सभी पक्षी अपने – अपने घोंसले से बाहर आ गए | लड़ाई इतना भयंकर था कि कोई भी उन्हें बचा न सका और तीनो आपस में लड़कर मर गए |
*शिक्षा :-किसी भी जीव के बारे में बुरा सोचने से ही पाप का बंध होता है।जिससे हम नरक आदि पर्यायों को प्राप्त करते है।अतः हमें हमेशा सभी जीवों के लिये परोपकार की भावना रखनी चाहिए।*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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बुधवार, 15 दिसंबर 2021

कर्म का उदय

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒कर्म का उदय*

 एक भक्त सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और मंदिर (जिनालय) की तरफ चल दिया ताकि भगवान की भक्ति का आनंद प्राप्त कर आज का दिन सार्थक कर सके।
 
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चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा, कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया।

कपड़े बदलकर वापस    मंदिर की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले, फिर  जिनमंदिर की तरफ रवाना हो गया।

जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक अज्ञात व्यक्ति लाठी हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।

इस तरह वो शख्स उसे जिनमंदिर  के दरवाज़े तक ले आया। 

पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर मंदिर मे भक्ति कर लें।

लेकिन वो शख्स डंडा हाथ में थामे खड़ा रहा और  मंदिर में दाखिल नही हुआ।

दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है ...?

दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया "इसलिए क्योंकि मैं इस क्षेत्र का क्षेत्रपाल हूँ।

 आपके कर्मफल ने आपके धर्म कार्य मे अंतराय डाला किंतु आपके धर्म पुरषार्थ ने आपकी मदद करने मुझे कहाँ। 

ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा।

काल कर्म फल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था।

जब आपने घर जाकर दुबारा मंदिर की तरफ रवाना हुए तो भगवान   की भक्ति से पुण्य बंध होने से आपके कुछ पाप पुण्य मे बदल गये ।

जब  आपको आपके अंतराय कर्म ने दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो आपकी पंच परमेष्ठी के प्रति दृढता ने आपके पापकर्म को पुण्य मे परिवर्तन कर दिया।

 इसलिए मैं आपके पुण्य कर्म से आपको यहाँ तक  खुद पहुंचाने आया हूँ।

अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर  पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम मंदिर  छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं। 

*क्यों....?*

क्योंकि हम  अपने भगवान से ज्यादा दुनिया की चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं।

उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर मंदिर  चला गया।

क्यों...?

क्योंकि उसे अपने दिल में जिनधर्म के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपने श्रावकधर्म का नियम टूटने नहीं देना चाहता था।

इसीलिए पुण्यकर्म ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, अंतराय कर्म ने उसे दो बार कीचड़ में गिराया और पंचपरमेष्ठी की भक्ति में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था ! 

इसी तरह हम जीव भी जब हम भक्ति भजन करें तब हमारा मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित करे, हमें हार नहीं माननी चाहिए और मन का डट कर मुकाबला करना चाहिए।

एक न एक दिन हमारा मन स्वयं हमें भक्तिभजन  के लिए उठायेगा और उसमें रस भी लेगा।
 
बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भक्तिभजन  में ढील देनी हैं। वह पंचपरमेष्ठी की भक्ति  ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगी।

*इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए हम पंचपरमेष्ठी की भक्ति दिखावे केलिये नकरें। पंचपरमेष्ठी की भक्ति उनके गुणों की प्राप्ति के लिए करें इससे आपको आजतक जो प्राप्त नहीं हुआ उससे भी अधिक मात्रा में प्राप्ति होगी जो आपसे कोई भी नहीं छुडा सकता ।आप अपने श्रावकधर्म का ध्यान रखें।विश्व की कोई भी शक्ति आपका कुछ अनर्थ नहीं कर सकती।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

बुढापा

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒👨‍👩‍👧‍👦हम दोनों का बुढ़ापा 👨‍👩‍👧‍👦*
जम्बू साहब पिछले बीस मिनट से पूरे घर में हड़बड़ाए से घूम रहे थे।
पहले उन्होंने अपनी स्टडी टेबल  की सारी किताबों को इधर-उधर किया, फिर वहां से निराश हो ड्रेसिंग टेबल के सामने पहुंच गए।  ड्रेसिंग टेबल के लगभग सारे सामानों को बिखेरने के बाद उनका ध्यान डाइनिंग टेबल पर गया। पूरी मेहनत के बाद भी उन्हें वांछित वस्तु नहीं मिली। इसके बाद जम्बू  साहब अपनी अलमारी की और बढ़े और उन्होंने अलमारी को खोलकर तलाशी लेनी शुरु की।

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"यह सुबह-सुबह क्या घर में कोहराम मचा रखा है ??चेन से सोने भी नहीं देते!!

इतनी देर शोर शराबे से बेखबर सो रही मिसेज जम्बू  की आंखें खुल गईं और वे उठकर किचन में चली गई।

बदन पर ट्रैक सूट, सर पर कैप , पैरों में नई नवेले स्पोर्ट्स शूज, पूरी तरह मॉर्निंग वॉक को तैयार जम्बू  साहब  के चेहरे पर पसरी परेशानियां पत्नी के उठ जाने पर कुछ कम हुई। वे मिसेस जम्बू  के पीछे पीछे किचन में पहुंचे।

"मेरा दूर का चश्मा नहीं मिल रहा है! पता नहीं कहां रख दिया! क्या तुमने कहीं देखा था?"

अब तक चाय का पानी चढ़ा चुकी मिसेज जम्बू  ने उन्हें घूरा, "तुम्हारा रोज-रोज का यही हाल है!  कभी जूते, कभी कैप, कभी वॉकिंग स्टिक!! इधर-उधर रख  कर भूल जाते हो ! मुझे क्या पता तुम्हारा चश्मा कहां है?"

"यार,  मैं लेट हो रहा हूं!  प्लीज,  ढूंढ के दे दो ना !! तुम्हें पता है कि बिना चश्मे मुझे 10 फिट भी साफ नहीं दिखता।"

"किस बात के लिए लेट हो रहे हो?  उन्ही बुढ्ढे दोस्तों से गप्पे लड़ाने के लिए,  जो तुमने बगीचे में  नए-नए बनाएं हैं।"

"तुम्हें मेरे दोस्तों से जलन क्यों हो रही है? ढूंढो  तो  ठीक, वरना मैं ऐसे ही चला जाऊंगा।" 

"तो जाओ और फिर कहीं ठोकर खाकर गिर जाना और इस बुढ़ापे में हड्डियां तुड़वा कर मेरी छाती पर मूंग दलना।"
कहते हुए मिसेज जम्बू  में ने चाय छानी, एक कप  जम्बू साहब को पकड़ा कर दूसरा कप हाथ में लेकर लिविंग रूम में  आकर बैठ गई ।

" पहले चाय,  फिर तुम्हारा चश्मा ढूंढूंगी।"

बेबस   जम्बू साहब भी साथ आकर बैठे ।

"सारी जिंदगी बाहर नौकरी करने के बाद अपने शहर में शिफ्ट हुए, लेकिन क्या पता था 30 वर्ष बाद शहर का रंग रूप ही बदल जाता है। सारी इमारतें  बदल चुकी होती है, परिचित शहर छोड़ चुके होते हैं और अपरिचित शहर के बाशिंदे बन जाते हैं।"

"तुम्हारे रिटायरमेंट के बाद बेटे ने तो कितने शौक से तुम्हें बैंगलोर खुद के साथ हमेशा के लिए रहने के लिए बुलाया था। लेकिन तुम ही नहीं माने!"

"क्यों हम वहां दो महीने रहे नहीं थे क्या? लेकिन वहां ना तो तुम्हारा मन लगा ना ही मेरा । यहां आकर बसने का फैसला हम दोनों का था।  यहां हमें  भव्य जैन मंदिर ओर दिगबंर साधुओं के साथ त्यागी व्रतियों का सानिध्य मिल रहा है।"

"अपनो की छोड़ो!! यहां तो परायें भी मॉर्निंग  में  भगवान के अभिषेक व पूजन मे कंपनी  देते है!" मिसेज जम्बू ने इशारों ही इशारों में  जम्बू साहब को मुस्कुराते हुए कहा ।

"भई!  मेरी आंख सुबह साढ़े तीन बजे खुल जाती है, तुम 5:30 से पहले उठती नहीं तो बताओ मैं क्या करूं बस तैयार होकर 5:00 बजे घूमने निकल जाता हूं।"
"फिर 6 बजे से अभिषेक व पूजन के साथ मुनिराज के उपदेश द्वारा हमारी आत्मा को भोजन मिल जाता है।"
"तुम्हें तो पता ही है कि मुझे रात को देर तक नींद नहीं आती तो मैं तुम्हारे साथ भला कैसे उठ सकती हूं।"

"पता नहीं क्या, मुझे समाधि मरण करना है ?  अगर एक दिन भी अभिषेक पूजन व मुनिराज के उपदेश नहीं प्राप्त होते है‌ तो मुझे बैचेनी होने लगती है।"

"वह तो ठीक है, लेकिन तुम तो बाहर से कुंडी लगा कर चले जाते हो!  पीछे से जब मेरी आंख खुलती है तो पूरा घर वीरान लगता है और मुझे लगता है कि अगर मुझसे पहले तुम चले गए तो यही वीराना जिंदगी बन जाएगा।"कहते हुए मिसेज जम्बू  चाय का कप रख उठी और उन्होंने दो ही मिनट में चश्मा ढूंढ जम्बू  साहब के हाथ में रख दिया।

"लो, मत पियो चाय मेरे साथ, बस!!! "

उस सुबह  जम्बू साहब का मन ना तो बग़ीचे में लगा न ही नये नये बनाए हम उम्र दोस्तों के साथ।

उस रात उन्होंने नींद का बहाना किया लेकिन आंखें बंद किए जागते रहे।

कुछ ही देर में वह जान गए कि मिसेज जम्बू  ने आज उनकी वाकिंग स्टिक उठाकर वॉशिंग मशीन के पीछे रख दी है।
वे मुस्कुराए और यह प्रण कर सो गए कि कल सुबह मिसेज जम्बू  के साथ चाय पीने के बाद ही घूमने जाना है।

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सोमवार, 13 दिसंबर 2021

गुरु का संभोधन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒गुरु का शिष्य को संबोधन*

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले।
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उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तैयारी कर रहा था। शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा, “ गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!” शिक्षक गंभीरता से बोले, “ किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है।

शिक्षक ने कहा क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!” शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।
 मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया।
उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी  से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे , उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट-पलट कर देखने लगा। फिर उसने इधर -उधर देखने लगा, दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए।

अब उसने दूसरा जूता उठाया, उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – “हे भगवान् , समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद। उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवाई और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी. "मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं ।

शिक्षक ने शिष्य से कहा – “ क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?”

*शिक्षा :-*
शिष्य बोला, “आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा।
 आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने  की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है, देने का आनंद असीम है,देना देवत्त है।अतः हमें आवश्यकता के अनुसार मोक्ष मार्ग के राही की नि:स्वार्थ सेवा कर अपना मनुष्य भव सार्थक करना चाहिए।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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