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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩🚒मानवधर्म*
पारस अपने काम में बहुत होशियार होने के बावजूद बड़ा ही आलसी था। जब देखो आलस के मारे सोता रहता था। उसकी इस आदत से उसकी पत्नी पूनम बड़ी दुखी थी। वह अकसर उसे समझाती, “तुम अपने हर काम में इतनी देर करते हो, तभी तो आज तक तुम्हारे पास एक दुकान तक नहीं है। मुझे तो डर है, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे आलसीपन की वजह से भूखे मरने की नौबत आ जाए।”
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एक दिन पारस और पूनम में झगड़ा हुआ तो पारस गुस्से से बोला, “मैं आज ही शहर जाकर कोई काम ढूंढूगा और एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा, देखना। फिर मेरे पास आलीशान मकान-दुकान सब कुछ होगा। लोग तब मेरे जैसा बनना चाहेंगे।”
सच में उस दिन पारस ने जो कहा वही किया। वह घर छोड़कर स्टेशन की तरफ चल दिया। वहां उसने टिकट लिया। तभी उसे सामने से एक पूरी-छोले बेचने वाला नजर आया। उसके मुंह में पानी आ गया। उसने पूरी-छोले खरीदे और जमकर खाया। पेट भरने के बाद उसे नींद सताने लगी। वहीं अपनी गठरी सिर के नीचे दबाकर वह खर्राटे भरने लगा।
ट्रेन कब आई और कब चली गई, पारस को कुछ पता नहीं चला। तभी दिगबंर काका उधर से गुजरे। उन्होंने पारस को सोते देखा। उन्होंने जाकर पूनम को बताया। पूनम स्टेशन पर पहुंची और पारस को जगाकर बोली, “काश, तुम बड़े बोल न बोलते।” नींद का मारा पारस अब भी कुछ समझ नहीं पाया। वह पूछने लगा, “क्या ट्रेन आ गई?”
उसकी बात सुनकर दिगबंर काका बोले, “पूनम , इसे कुछ कहने-सुनाने से तो अच्छा है, तुम पंचपरमेष्ठी भगवान से इसके लिए प्रार्थना करो कि यह आलस्य छोड़ दे। यह नहीं समझ पा रहा कि आलस्य घुन की तरह जीवन को खोखला कर देता है। जब पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।”
पारस ने कहा, “दिगबंर काका, मैं खुद बदलना चाहता हूं, लेकिन पता नहीं मुझे क्या हो जाता है। मुझे उस समय ध्यान नहीं रहता कि क्या ठीक है और क्या गलत, जब कुछ करने का मौका आता है तब!”
दिगबंर काका ने समझाया, “यह भी आदत है। इसे खत्म करने के लिए भी खुद से थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़ेगी। लोहे की सलाख टेढ़ी हो जाए, तो उसे आग में डालकर ठोकना-पीटना पड़ता है। तुम भी ऐसा ही करो। तुम्हारी जीत होगी। बहुत से लोगों ने ऐसा किया है । इसके बाद उनकी जिंदगी बदल गई। सोचो, पक्का इरादा करो, अपनाओ और सब हो जाएगा। छोटी-सी बात है यह।”
पारस ने दिगबंर काका की बात मानी। छोटी-छोटी बातों को समझकर स्वयं का सुधार किया और जो श्रावकधर्म के अंतर्गत सही था वही कार्य करते हुए उसने अपना जीवन सार्थक कर लिया।
यह सभी कार्य धर्मपत्नी पूनम के श्राविका व्रतों के पालन से शीघ्रता से संभव हुआ।
आज वे अपनी आमदनी का छँठवा हिस्सा (साधु सेवा, आहारदान,पंचकल्याणक, अन्य उपयोगी कार्य)धर्म कार्यों में खर्च करते है।इससे उन्हें दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि होती गई।आज उनके संस्कारवान सातों पुत्र उच्च पदों पर सेवा देते हुए अपने श्रावकधर्म का पालन कर रहे है।
*नोट:- घर में 👨👩👧👦पति ओर पत्नी के श्रावकधर्म के पालन से आने वाली विषम परिस्थितियों में भी हमेशा शांत परिणामों से समस्या का निराकरण होता है।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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