सोमवार, 29 सितंबर 2025

शिक्षा व शिक्षक का महत्व

*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
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*💪👩‍🚒 शिक्षा व शिक्षक का महत्व ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔👨‍👨‍👦‍👦🐎🔑 आश्विन शुक्ल अष्टमी , 30 सितंबर मंगलवार 2025 कलि काल के  10वें तीर्थंकर  सर्व सुखकारी  श्री शीतलनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से गुरु की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से मांगलिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री शीतलनाथ   भगवान जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*

*✅🔔⏰🐎 नोट सितंबर  माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह आदि  शुभ कार्यों के मुहूर्त नहीं है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*

*शिक्षा और शिक्षक का महत्व* 

शिक्षा ही वह प्रकाश है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर समाज और देश की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। आज हमारे देश की बहुत-सी समस्याएँ – भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, अंधविश्वास और नेताओं की झूठी राजनीति – तभी कम होंगी जब जनता सचेत और शिक्षित होगी। 
 एक जागरूक नागरिक ही सही-गलत का निर्णय कर सकता है और समाज को सही दिशा दे सकता है।
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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  कर सकते है ।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र  रजिस्टर संस्था के  📲 W 7891913125 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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 अब इस कहानी के माध्यम से सच्चाई समझते है।

आरव एक छोटे से गाँव का लड़का था, जो शिक्षा की अहमियत को समझता था। उसके गाँव में ज्यादातर लोग खेतों में काम करते थे और पढ़ाई को व्यर्थ समझते थे। लेकिन आरव बचपन से ही मानता था कि जीवन की सच्ची सफलता और समस्याओं से समाधान का मार्ग केवल शिक्षा से ही निकलता है।

आरव का आदर्श उसके शिक्षक सागर गुरुजी थे। वे केवल किताबों तक सीमित शिक्षा नहीं देते थे, बल्कि बच्चों को जीवन जीने का सही ढंग भी सिखाते थे। 

एक दिन उन्होंने बच्चों को बताया – “शिक्षा वह ताक़त है जो हमें ठग नेताओं के बहकावे से बचाती है, भ्रष्टाचार को पहचानने की बुद्धि देती है और सच्चे लोकतंत्र की रक्षा करती है। अगर जनता शिक्षित होगी तो कोई भी नेता हमें झूठे वादों से भ्रमित नहीं कर पाएगा।”

इन बातों ने आरव के मन को गहराई से छू लिया। उसने समझ लिया कि शिक्षा केवल रोजगार पाने के लिए ही नहीं, बल्कि समाज को बदलने और देश को मजबूत बनाने का सबसे बड़ा साधन है।

धीरे-धीरे परिस्थितियाँ कठिन हुईं। पिता बीमार हो गए और घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। लेकिन सागर गुरुजी ने आरव को समझाया – “कठिनाइयाँ स्थायी नहीं होतीं। अगर तुम्हारे पास ज्ञान है, मेहनत है और शिक्षा का साथ है, तो कोई मुश्किल तुम्हें रोक नहीं सकती।” 

आरव ने इन शब्दों को आत्मसात किया और निरंतर पढ़ाई में जुटा रहा।
उसकी मेहनत रंग लाई। वह न केवल पढ़ाई में सफल हुआ, बल्कि उसने गाँव के बच्चों को भी शिक्षा के महत्व के बारे में प्रेरित किया। 

समय बीतने के साथ गाँव में भी बदलाव आया – लोग समझने लगे कि शिक्षा ही गरीबी, अंधविश्वास और अन्याय से लड़ने का असली हथियार है।
 आज जब आरव पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे अपने शिक्षक  सागर गुरुजी की बातें याद आती हैं। उसने महसूस किया कि एक सच्चा शिक्षक न केवल जीवन बदल देता है, बल्कि पूरे समाज की दिशा भी तय कर सकता है। शिक्षा सचमुच देश की रीढ़ है, जो राष्ट्र को मजबूत खड़ा रखती है। यह वह नींव है, जिस पर भविष्य की इमारत खड़ी होती है। यदि जनता शिक्षित होगी तो कोई भी समस्या बड़ी नहीं होगी, और कोई भी नेता जनता को भ्रमित नहीं कर पाएगा।

*👨‍👨‍👦‍👦⏰🌞✅विशेष:- भव्य आत्माओं, आज वर्तमान में भ्रष्टाचार युक्त राजनेताओं ने शिक्षा को व्यापार बना लिया है। शिक्षा में बहुत कुछ अपने मनमानी से फेरबदल कर शिक्षा के स्वरुप को बदल दिया है। अंग्रेज तो भारत छोड़कर चले गए किंतु वर्तमान के राजनेताओं ने शिक्षा में अंग्रेजी आवश्यक कर दी। अंग्रेजी यह भाषा अधूरे 26 वर्णों की होने से इसमें अनेक प्रकार की गलतियां है। हिंदी यह 52 वर्णों की होने से पूर्ण है। हिंदी में सभी को सम्मान पूर्वक बोलने के लिए शब्दों का समावेश है। हिंदी भाषा में कोई भी शब्द का उच्चारण करने पर एक विशेष ध्वनि निर्माण होती है वह ध्वनि ही हमारे लिए उपयोगी है।उस ध्वनि के माध्यम से हम सबकुछ समझ जाते है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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सोमवार, 8 सितंबर 2025

हमारा दृष्टिकोण

*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 हमारा दृष्टिकोण ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔👨‍👨‍👦‍👦🐎🔑 आश्विन कृष्ण 2, 09 सितंबर मंगलवार 2025 कलि काल के  21वें  तीर्थंकर  सर्व सुखकारी  श्री नमिनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से मांगलिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री नमिनाथ   भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*

*🎪 सितंबर  2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 09, 22, व 30 तारीख को है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔🐎  सितंबर माह में अष्टमी तिथि 14 व 30 तारीख को है।👉चतुर्दशी तिथि  20 सितंबर को है।*


*🐎✍️ पंचक 06 से 10 सितंबर तक है।*
*✅🔔⏰🐎 नोट सितंबर  माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह आदि  शुभ कार्यों के मुहूर्त नहीं है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*

*🌞 हमारा दृष्टिकोण 🌞* 

*👨‍👨‍👦‍👦आज इस कहानी के माध्यम से हम अपने मन को कंट्रोल करना सीख कर जीवन सुखमय बना सकते हैं।*

किसी भी परिस्थिति या घटना को देखने का तरीका यानी दृष्टिकोण हमारे जीवन को गहराई से प्रभावित करता है। दो व्यक्ति एक ही घटना को देखकर भिन्न निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं — यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे उसे किस नज़र से देखते हैं। 
सकारात्मक दृष्टिकोण जहाँ उम्मीद और समाधान देता है, वहीं 
नकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्ति को निराशा की ओर ले जाती है और वह जीव पतन को प्राप्त होता है।
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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  कर सकते है ।✍️*
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 *दो दृष्टिकोण, एक घटना* 

प्राचीन समय की बात है। एक गुरुकुल में कई बालक शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। उनमें से गुर्वित और तन्विक नामक दो बालकों में गहरी मित्रता थी। दोनों ही बहुत मेधावी थे और गुरुकुल के प्रिय छात्र माने जाते थे।
एक दिन उनके आचार्य उन्हें सैर कराने के लिए बाहर ले गए। चलते-चलते वे तीनों एक सुंदर बाग में पहुँच गए। वहाँ की प्राकृतिक छटा अत्यंत मनोहारी थी। बाग में भ्रमण करते समय उनकी नज़र एक आम के पेड़ पर पड़ी। उन्होंने देखा कि एक बालक डंडा लेकर पेड़ के तने पर प्रहार करके आम तोड़ने की कोशिश कर रहा है।

आचार्य मुस्कुराए और अपने दोनों शिष्यों से बोले, "वत्सों, क्या तुमने यह दृश्य देखा?"

दोनों ने एक स्वर में उत्तर दिया, "हाँ गुरुदेव, वह बालक डंडे से आम तोड़ रहा है।"

आचार्य ने पहले गुर्वित से पूछा, "बताओ, इस दृश्य को देखकर तुम्हारे मन में क्या विचार आया?"

गुर्वित बोला, "गुरुदेव, मैं सोच रहा हूँ कि जब एक वृक्ष भी बिना डंडा खाए फल नहीं देता, तो मनुष्य से बिना दबाव डाले कोई काम कैसे लिया जा सकता है? यह दृश्य मुझे सिखाता है कि समाज को अपनी बात मनवाने के लिए दबाव की आवश्यकता होती है।"

गुरु ने फिर तन्विक की ओर देखा, "वत्स तन्विक, तुम्हें क्या प्रतीत हुआ?"

तन्विक ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "गुरुदेव, मुझे यह दृश्य बिल्कुल भिन्न रूप में दिखाई दिया। आम का पेड़, डंडे खाकर भी उस बालक को मीठे फल दे रहा है।
इससे मुझे यह सीख मिलती है कि हमें भी दूसरों की कटुता, अपमान या आघात सहकर भी उन्हें प्रेम और उपकार देना चाहिए। यही सज्जनता का धर्म है।"

यह सुनकर आचार्य प्रसन्न हो गए और बोले, "बच्चों, यही है *दृष्टिकोण का अंतर।* 
घटना एक ही थी, पर तुम दोनों की व्याख्या भिन्न रही, क्योंकि तुम दोनों की सोच अलग है। *मनुष्य जिस दृष्टिकोण से किसी घटना को देखता है, वह उसी के    अनुसार प्रतिक्रिया करता है और जानते हो बच्चों वहपरिणाम भी उसी अनुरूप ही भोगता है।"*
आचार्य ने फिर कहा, "गुर्वित, तुम अधिकार और बल से काम निकालने की बात कर रहे हो, जबकि तुम्हारा मित्र तन्विक प्रेम और सहिष्णुता से। दोनों के विचारों में वही अंतर है, जो दृष्टिकोण में होता है। जीवन में सच्ची समझ उसी की होती है, जिसकी दृष्टि सकारात्मक और करुणामयी होती है।"

 *सीख:*  *"दृष्टिकोण बदलो, जीवन बदल जाएगा।"* यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारे जीवन की दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि हम परिस्थितियों को किस नज़र से देखते हैं। जब हम एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से व्याख्यायित कर सकते हैं, तो हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि हम अपने विचारों और दृष्टिकोण को कैसा बना रहे हैं।
कई बार हम विपरीत परिस्थितियों में घिर जाते हैं — तनाव, असफलता, अपमान या संघर्ष सामने खड़े हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोग इन्हीं हालातों में भी शांत और प्रसन्न रहते हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि उनके जीवन में समस्याएँ नहीं होतीं, बल्कि इसलिए कि वे उन्हें देखने और सुलझाने का तरीका जानते हैं।
वहीं कुछ लोग छोटी-छोटी बातों से विचलित होकर टूट जाते हैं, क्योंकि उनका दृष्टिकोण नकारात्मक होता है। जो व्यक्ति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है, वह हर परिस्थिति में समाधान खोजता है; और जो नकारात्मक सोचता है, वह हर समाधान में भी समस्या ढूँढ लेता है। 
*👨‍👨‍👦‍👦🌞🐎🔔विशेष:- भव्य आत्माओं, अतः जीवन में सुखी और सफल रहना है तो अपनी सोच, अपना दृष्टिकोण बदलिए — क्योंकि वही आपकी वास्तविकता का निर्माण करता है। आज इस तीन लोक में सबसे खराब है हमारे मन की सोच। इसलिए अपने मन को सही करने के लिए हमें सच्चे देव शास्त्र गुरु की शरण लेना आवश्यक है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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बुधवार, 3 सितंबर 2025

उत्तम तप धर्म

*🎪 सिद्धम नमः 🔔*
*ॐ वसुनंदी गुरुवे नमःॐ*
*🌞🔑जैनम जयतु शासनम् 🔑🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*

आज हमनें पूर्वाचार्यों की लेखनी व आशीर्वाद से उत्तम तप धर्म के बारे में कुछ जाना है। उसे सभी भव्य जीवों के स्वाध्याय हेतु प्रस्तुत कर रहे है।

उत्तम तप
जाप्य—ॐ ह्रीं उत्तमतपो धर्माङ्गाय नम:

उत्तम तप द्वादश विध माना, बाह्याभ्यंतर के भेदों से।

अनशन ऊनोदर वृत्तपरीसंख्या,' रस त्याग प्रभेदों से॥

एकान्त शयन आसन करना, तनु क्लेश यथा शक्ति तप है।

तपने से स्वर्ण शुद्ध होता, आत्मा भी तप से शुद्धि लहे॥1॥
उत्तम तप धर्म

तन्नमाभि परं ज्योति-रवाड् - मनस् गोचरम्।

उन्मूलयत्य विद्यांयद् विद्यामुन्मीलयत्यपि।।

अर्थ- मैं उस उत्कृष्ट ज्योति स्वरूप केवलज्ञान को नमस्कार करता हूं, जो वचन और मन के अगोचर है, अज्ञान को नष्ट करता है, और ज्ञान को प्रकाशित करता है।

तपो नमोऽक्षकायानां, तपनात् सन्निरोधनात्।

निरूचयते दृगाद्यावि -र्भावयेच्छानिरोधनम्।।1।।

अर्थ- मन और इन्द्रियों के निरोध को और शरीर के तापने को तप कहा जाता है एवं दर्शन आदि की अभिव्यक्ति के लिए इच्छाओं का निरोध करना तप हे।

 अथवा जिन मार्ग के अविरोध पूर्वक कर्मों का उच्छेद करने के लएि जो इन्द्रिय और मन को वश में करता है, वह तप कहलाता है।
 अन्तरंग और बहिरंग मल को जलाकर आत्मा की शुद्धि का कारण जो शारीरिक और मानसिक कर्म है उसे तपोधन तप कहते हैं।

 इन्द्रों द्वारा पूजनीय चार ज्ञान के धारक तीर्थंकरों को मुक्ति निश्चित है फिर भी वे बिल को न छुपाकर शक्ति को बढ़ाकर तप करते हैं।
 चक्रवर्ती तपश्चरण के लिए चक्रवर्तीपने को छोड़ता है तो छोड़ो क्योंकि तपस्या का फल अनुपम आत्मा जनित शाश्वत सुख होता है। अतः यह कार्य तो आश्चर्य जनक नहीं है परंतु इस लोक में यह बड़ा आश्चर्य है कि लोग सुबुद्धिपूर्वक छोड़े हुए विषय रूप विष को पुनः भोगने के लिए बड़ी तपस्या को भी छोड़ बैठते हैं।
तप के समान आत्मा का हितकारी दूसरा नहीं है इसलिए भव्यों को शक्ति के साथ तप में प्रयत्न करना चाहिए।
बुद्धिमानों के द्वारा तप से ही आत्म शुद्धि कही गयी है, क्या अग्नि के बिना स्वर्ण शुद्ध होताहै? अर्थात नहीं ।

पहले जिन कर्मो की उत्तम संहनन के द्वारा हजार वर्षों में निर्जरा होती थी। वर्तमान में हीन संहनन के द्वारा वे कर्म एक वर्ष की तपस्या में निर्जरा को प्राप्त हो जाते हैं।

 दान-पूजा से गृहस्थों का तप सुशोभित होता है एवं ज्ञान, क्षमा तथा राग-द्वेष के त्याग से साधुओं का तप सुशोभित होता है।

 जब तक शरीर स्वस्थ है और इन्द्रियां समर्थ है तब तक तप करना योग्य है वृद्धावस्था में तप करना केवल परिश्रम के लिए होता है।

 जीव ने अज्ञानता पूर्वक जो भयंकर पाप किये थे वे सभी पाप उपवास से उस प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार अग्नि से ईन्धन जल जाता है।

जीवेन यानि पापानि 

रसत्यागो भवेत्तैल-क्षीरेक्षु दधि सर्पिषाम्।

स्वाध्याय सुख सिध्यर्थ, - मक्ष दर्प प्रशान्तये।।

अर्थ- तैल, दूध, मीठा दधि, घी, नमक इन रसों का त्याग सुखपूर्वक स्वाधय की सिद्धि तथा इन्द्रियों को वश में करने के लिए किया जाता है। इस तप से इन्द्रिय मद का निग्रह, निद्राविजय स्वाध्याय आदि की सुख पूर्वक सिद्धि होती है ऐसा जानकर शक्ति अनुसार एक, दो, तीन आदि रसों का त्याग करना चाहिए। रस त्याग करके भी उसकी अभिलाषा रखना दूसरों को सरस आहार कराना उसकी अनुमोदना करना रस परित्याग तप का अतीचार है।
विनयं न विना ज्ञानं, दर्शनं चारित्रं तपः।

कारणेन विना कार्य, जायते कुत्र क थ्यताम्।।

अर्थ- विनय के बिना ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप नहीं होता। क्योंकि कारण के बिना कार्य नहीं होता ? अर्थात् विनय कारण है दर्शन ज्ञान चारित्र तप की प्राप्ति कार्य है।

एषाऽस्ति रीति र्भुवने प्रसिद्धा सन्तापशान्त्यै च जलस्य संग।

शीतोत्थ पीडा परिहार हेतो- रूष्णोपचारः क्रियते यथा हि।।

रोगोपशान्त्यै ह्यगदोपचारो, द्वारप्रयोगो गृह रक्षाणार्थम्।

विद्यादि सिद्धयै विदुषां सुसंगः त्यागः कुबुद्धे परलोक सिद्धयै। 

बल प्रयोगो रिपुरोधनार्थं जगदवशार्थं प्रियसत्य भाषा।

विराग हेता र्जिननाथ सेवा, चित्तोपशान्त्यै निज तत्व चर्या।।

तथैव भव्येन त्वया सदा हि, स्वानन्द सिद्धयै निज ध्यान योगः।

अर्थ- यह रीति जगत में प्रसिद्ध है, कि जिस प्रकार ताप की शांति के लिए जल का प्रयोग, शीत के उपचार के लिए अग्नि का प्रयोग, घर के रक्षा के लिए द्वारा का प्रयोग, विद्या की सिद्धि के लिए विद्वानों की संगति, परलोक की सिद्धि के लिए कुबुद्धि का त्याग, शत्रु के निरोध के लिए बन का प्रयोग, जगत को वश में करने के लिए प्रिय और सत्य भाषा का प्रयोग, वैराग्य के लिए जिनेन्द्र भगवान की सेवा तथा मन की शांति के लिए आत्म तत्व की चर्चा की जाती है उसी प्रकार हे भव्य! तुम्हें निजी आनन्द की प्राप्ति के लिए आत्मा का ध्यान करना चाहिए।  

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*👨‍👨‍👦‍👦🔑💯उत्तम तप धर्म - यहां पर तीन कथानकों के माध्यम से समझ सकते है कि तप का महत्व*

1. माटी का कुंभ जब अग्नि में पक गय तो लोग उसके मंगल कलश के रूप में मान सम्मान देने लगे तो एक दिन माटी ईष्या से जल उइी जमीन में पड़ी मिट्टी सोचती है कि मैं कहां पददलित अंचिन सी बनी हूं और यह कलश कहां मान सम्मान पूर्वक शिरमौर बना हुआ है। कुंभ को इतना मान सम्मान क्यों? जबकि अंश एक सा, वंश एक सा, फिर ऐसा पक्षपात क्यों? तब कुंभ बोला - मैंने साधना के मार्ग को चुना है, तपन को सहा है। साधना की उन्नति ही, सिद्धि का मार्ग है। मेरी कहानी सुनो- पहले कुम्भकार आया और उसने मुझ पर कुदाली चलाना शुरू कर दिया। मैंने उस पीडा को चुपचाप सहन कर लिया फिर उसने मुझे कूटा, दाना और ठंड के दिनों में पानी में गला दिया। मेरा सारा शरीर फूल गया। तब मेरा लौंदा (पिंड) बनाया गया मेरी पीडा का पारावार नहीं था। चुपचाप समर्पण के साथ उस पीडा को सहता रहा। कुंभकार ने मुझेचाक पर चढाया और जारे से घुमाया, मेरा सिर चकराने लगा और उसी चक्कर की दशा में मैंने कुंभ का आकार ले लिया। मुझे प्रखर धूप में तपाया, मेरे अन्दर के जलीय अंश को सुखा दिया। इतने परभी जब संतोष नहीं हुआ तब धधकती हुई आग में रख दिया गया अग्नि की तपन से मेरा सारा शरीर जल गया। मेरे रंग में निखर आ गया। मैं काले रंग से लाल हो गया। इतना कष्ट सहने के बाद मैं कीमती बन पाया हूं। इस प्रकार एक मिट्टी के मुंभ को इतने कष्टों को सहन करने के बाद मंगल कलश नाम प्राप्त हुआ तो हे आत्मन्! विना तप धर्म को स्वीकार किये संसार की तपन कैसे शांत हो सकती है अर्थात नहीं हो सकती।

2. एक बार अकबर ने बीरबल से कहा कि तुम्हें काला कोयला सफेद करके दिखाना है। यह आदेश सुनकर बीरबल कुछ चिन्तित हुये और सोचने लगे ये काला कोयला सफेद कैसे होगा मगर आदेश है बीरबल भी बीरबल को एक सप्ताह के खजाने, उन्होंने कहा हुजूर कुछ दिन का समय दिया जय बीरबल को एक सप्ताह का समय मिला। लोक सोचते थे कि बीरबल नदी में बैठ कर अच्छी-अच्छी साबुनों से कोयले को सफेद करेगा लेकिन बीरबल ने पानी का सहारा लिया न साबुन का सब अपनी युक्ति के साथ बीरबल दरबार में पहुंचे। बीरबल की चतुराई देखने के लिए दरबार में भीड़ लग गयी थी। बीरबल ने काले कोयले को सबके सामने रखा और उसमें आग लगा दी। जलकर अंगार बन गया जब बुझा तो सफेदी के अलावा कुछ नहीं था। अकबर देखकर आश्चर्य चकित हो गये। जैसे कोयला को सफेद करने का उपाय सिर्फ अग्नि संस्कार है इसके अलावा कुछ नहीं। इसी प्रकार यदि आत्मा को शुद्ध स्फटिक के समान बनाना है तो कर्म रूपी कालिमा को तप को अग्नि में जलाना ही होगा।

3. आचार्य शांति सागर जी के पास एक तार्किक व्यक्ति पहुंच और बोला महाराज! यह पंचम काल है इसमें मोक्ष तो है नही तो फिर तपस्या करने की क्या आवश्यकता है जो तपस्या मोक्ष न दिला सके। उसे मैं तपस्या कैसे मानू? शांति सागर जी महाराज ने मुस्कारते हुए उत्तर दिया भैया! यह जो सामने वृक्ष लगा है वह किसका का है? उसने देखा और कहा महाराज! यह तो आम का वृक्ष है। महाराज बोले - आम का पेड कैसे है इसमें तो आम लगे ही नहीं? वह बोला महराज श्री! है तो-आम का ही वृक्ष किंतु अभी अकाल है इसलिए उमसें आम फल नहीं है जब मौसम आयेगा इसमें फल लगेंगे। महाराज बोले - बस भैया! मैं भी यही कहता हूं कि आज की यह तपस्या अकाल की है इस पंचम काल में न सही किंतु जब भी मोक्ष का फल लगेगा तो वह इसी मुनि मुद्रा में ही लगेगा। आम का फल आम के वृक्ष में ही लग सकता है, अन्य किसी में नहीं। इसी तरह मुक्ति मुनि मुद्रा से ही मिल सकती है अन्य किसी मार्ग से नहीं। आचार्य कुन्दकुन्द देव ने दिगम्बरत्व के अलावा शेष सभी मार्गों को मुक्ति के अयोग्य कहा है।
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