बुधवार, 3 सितंबर 2025

उत्तम तप धर्म

*🎪 सिद्धम नमः 🔔*
*ॐ वसुनंदी गुरुवे नमःॐ*
*🌞🔑जैनम जयतु शासनम् 🔑🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*

आज हमनें पूर्वाचार्यों की लेखनी व आशीर्वाद से उत्तम तप धर्म के बारे में कुछ जाना है। उसे सभी भव्य जीवों के स्वाध्याय हेतु प्रस्तुत कर रहे है।

उत्तम तप
जाप्य—ॐ ह्रीं उत्तमतपो धर्माङ्गाय नम:

उत्तम तप द्वादश विध माना, बाह्याभ्यंतर के भेदों से।

अनशन ऊनोदर वृत्तपरीसंख्या,' रस त्याग प्रभेदों से॥

एकान्त शयन आसन करना, तनु क्लेश यथा शक्ति तप है।

तपने से स्वर्ण शुद्ध होता, आत्मा भी तप से शुद्धि लहे॥1॥
उत्तम तप धर्म

तन्नमाभि परं ज्योति-रवाड् - मनस् गोचरम्।

उन्मूलयत्य विद्यांयद् विद्यामुन्मीलयत्यपि।।

अर्थ- मैं उस उत्कृष्ट ज्योति स्वरूप केवलज्ञान को नमस्कार करता हूं, जो वचन और मन के अगोचर है, अज्ञान को नष्ट करता है, और ज्ञान को प्रकाशित करता है।

तपो नमोऽक्षकायानां, तपनात् सन्निरोधनात्।

निरूचयते दृगाद्यावि -र्भावयेच्छानिरोधनम्।।1।।

अर्थ- मन और इन्द्रियों के निरोध को और शरीर के तापने को तप कहा जाता है एवं दर्शन आदि की अभिव्यक्ति के लिए इच्छाओं का निरोध करना तप हे।

 अथवा जिन मार्ग के अविरोध पूर्वक कर्मों का उच्छेद करने के लएि जो इन्द्रिय और मन को वश में करता है, वह तप कहलाता है।
 अन्तरंग और बहिरंग मल को जलाकर आत्मा की शुद्धि का कारण जो शारीरिक और मानसिक कर्म है उसे तपोधन तप कहते हैं।

 इन्द्रों द्वारा पूजनीय चार ज्ञान के धारक तीर्थंकरों को मुक्ति निश्चित है फिर भी वे बिल को न छुपाकर शक्ति को बढ़ाकर तप करते हैं।
 चक्रवर्ती तपश्चरण के लिए चक्रवर्तीपने को छोड़ता है तो छोड़ो क्योंकि तपस्या का फल अनुपम आत्मा जनित शाश्वत सुख होता है। अतः यह कार्य तो आश्चर्य जनक नहीं है परंतु इस लोक में यह बड़ा आश्चर्य है कि लोग सुबुद्धिपूर्वक छोड़े हुए विषय रूप विष को पुनः भोगने के लिए बड़ी तपस्या को भी छोड़ बैठते हैं।
तप के समान आत्मा का हितकारी दूसरा नहीं है इसलिए भव्यों को शक्ति के साथ तप में प्रयत्न करना चाहिए।
बुद्धिमानों के द्वारा तप से ही आत्म शुद्धि कही गयी है, क्या अग्नि के बिना स्वर्ण शुद्ध होताहै? अर्थात नहीं ।

पहले जिन कर्मो की उत्तम संहनन के द्वारा हजार वर्षों में निर्जरा होती थी। वर्तमान में हीन संहनन के द्वारा वे कर्म एक वर्ष की तपस्या में निर्जरा को प्राप्त हो जाते हैं।

 दान-पूजा से गृहस्थों का तप सुशोभित होता है एवं ज्ञान, क्षमा तथा राग-द्वेष के त्याग से साधुओं का तप सुशोभित होता है।

 जब तक शरीर स्वस्थ है और इन्द्रियां समर्थ है तब तक तप करना योग्य है वृद्धावस्था में तप करना केवल परिश्रम के लिए होता है।

 जीव ने अज्ञानता पूर्वक जो भयंकर पाप किये थे वे सभी पाप उपवास से उस प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार अग्नि से ईन्धन जल जाता है।

जीवेन यानि पापानि 

रसत्यागो भवेत्तैल-क्षीरेक्षु दधि सर्पिषाम्।

स्वाध्याय सुख सिध्यर्थ, - मक्ष दर्प प्रशान्तये।।

अर्थ- तैल, दूध, मीठा दधि, घी, नमक इन रसों का त्याग सुखपूर्वक स्वाधय की सिद्धि तथा इन्द्रियों को वश में करने के लिए किया जाता है। इस तप से इन्द्रिय मद का निग्रह, निद्राविजय स्वाध्याय आदि की सुख पूर्वक सिद्धि होती है ऐसा जानकर शक्ति अनुसार एक, दो, तीन आदि रसों का त्याग करना चाहिए। रस त्याग करके भी उसकी अभिलाषा रखना दूसरों को सरस आहार कराना उसकी अनुमोदना करना रस परित्याग तप का अतीचार है।
विनयं न विना ज्ञानं, दर्शनं चारित्रं तपः।

कारणेन विना कार्य, जायते कुत्र क थ्यताम्।।

अर्थ- विनय के बिना ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप नहीं होता। क्योंकि कारण के बिना कार्य नहीं होता ? अर्थात् विनय कारण है दर्शन ज्ञान चारित्र तप की प्राप्ति कार्य है।

एषाऽस्ति रीति र्भुवने प्रसिद्धा सन्तापशान्त्यै च जलस्य संग।

शीतोत्थ पीडा परिहार हेतो- रूष्णोपचारः क्रियते यथा हि।।

रोगोपशान्त्यै ह्यगदोपचारो, द्वारप्रयोगो गृह रक्षाणार्थम्।

विद्यादि सिद्धयै विदुषां सुसंगः त्यागः कुबुद्धे परलोक सिद्धयै। 

बल प्रयोगो रिपुरोधनार्थं जगदवशार्थं प्रियसत्य भाषा।

विराग हेता र्जिननाथ सेवा, चित्तोपशान्त्यै निज तत्व चर्या।।

तथैव भव्येन त्वया सदा हि, स्वानन्द सिद्धयै निज ध्यान योगः।

अर्थ- यह रीति जगत में प्रसिद्ध है, कि जिस प्रकार ताप की शांति के लिए जल का प्रयोग, शीत के उपचार के लिए अग्नि का प्रयोग, घर के रक्षा के लिए द्वारा का प्रयोग, विद्या की सिद्धि के लिए विद्वानों की संगति, परलोक की सिद्धि के लिए कुबुद्धि का त्याग, शत्रु के निरोध के लिए बन का प्रयोग, जगत को वश में करने के लिए प्रिय और सत्य भाषा का प्रयोग, वैराग्य के लिए जिनेन्द्र भगवान की सेवा तथा मन की शांति के लिए आत्म तत्व की चर्चा की जाती है उसी प्रकार हे भव्य! तुम्हें निजी आनन्द की प्राप्ति के लिए आत्मा का ध्यान करना चाहिए।  

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*👨‍👨‍👦‍👦🔑💯उत्तम तप धर्म - यहां पर तीन कथानकों के माध्यम से समझ सकते है कि तप का महत्व*

1. माटी का कुंभ जब अग्नि में पक गय तो लोग उसके मंगल कलश के रूप में मान सम्मान देने लगे तो एक दिन माटी ईष्या से जल उइी जमीन में पड़ी मिट्टी सोचती है कि मैं कहां पददलित अंचिन सी बनी हूं और यह कलश कहां मान सम्मान पूर्वक शिरमौर बना हुआ है। कुंभ को इतना मान सम्मान क्यों? जबकि अंश एक सा, वंश एक सा, फिर ऐसा पक्षपात क्यों? तब कुंभ बोला - मैंने साधना के मार्ग को चुना है, तपन को सहा है। साधना की उन्नति ही, सिद्धि का मार्ग है। मेरी कहानी सुनो- पहले कुम्भकार आया और उसने मुझ पर कुदाली चलाना शुरू कर दिया। मैंने उस पीडा को चुपचाप सहन कर लिया फिर उसने मुझे कूटा, दाना और ठंड के दिनों में पानी में गला दिया। मेरा सारा शरीर फूल गया। तब मेरा लौंदा (पिंड) बनाया गया मेरी पीडा का पारावार नहीं था। चुपचाप समर्पण के साथ उस पीडा को सहता रहा। कुंभकार ने मुझेचाक पर चढाया और जारे से घुमाया, मेरा सिर चकराने लगा और उसी चक्कर की दशा में मैंने कुंभ का आकार ले लिया। मुझे प्रखर धूप में तपाया, मेरे अन्दर के जलीय अंश को सुखा दिया। इतने परभी जब संतोष नहीं हुआ तब धधकती हुई आग में रख दिया गया अग्नि की तपन से मेरा सारा शरीर जल गया। मेरे रंग में निखर आ गया। मैं काले रंग से लाल हो गया। इतना कष्ट सहने के बाद मैं कीमती बन पाया हूं। इस प्रकार एक मिट्टी के मुंभ को इतने कष्टों को सहन करने के बाद मंगल कलश नाम प्राप्त हुआ तो हे आत्मन्! विना तप धर्म को स्वीकार किये संसार की तपन कैसे शांत हो सकती है अर्थात नहीं हो सकती।

2. एक बार अकबर ने बीरबल से कहा कि तुम्हें काला कोयला सफेद करके दिखाना है। यह आदेश सुनकर बीरबल कुछ चिन्तित हुये और सोचने लगे ये काला कोयला सफेद कैसे होगा मगर आदेश है बीरबल भी बीरबल को एक सप्ताह के खजाने, उन्होंने कहा हुजूर कुछ दिन का समय दिया जय बीरबल को एक सप्ताह का समय मिला। लोक सोचते थे कि बीरबल नदी में बैठ कर अच्छी-अच्छी साबुनों से कोयले को सफेद करेगा लेकिन बीरबल ने पानी का सहारा लिया न साबुन का सब अपनी युक्ति के साथ बीरबल दरबार में पहुंचे। बीरबल की चतुराई देखने के लिए दरबार में भीड़ लग गयी थी। बीरबल ने काले कोयले को सबके सामने रखा और उसमें आग लगा दी। जलकर अंगार बन गया जब बुझा तो सफेदी के अलावा कुछ नहीं था। अकबर देखकर आश्चर्य चकित हो गये। जैसे कोयला को सफेद करने का उपाय सिर्फ अग्नि संस्कार है इसके अलावा कुछ नहीं। इसी प्रकार यदि आत्मा को शुद्ध स्फटिक के समान बनाना है तो कर्म रूपी कालिमा को तप को अग्नि में जलाना ही होगा।

3. आचार्य शांति सागर जी के पास एक तार्किक व्यक्ति पहुंच और बोला महाराज! यह पंचम काल है इसमें मोक्ष तो है नही तो फिर तपस्या करने की क्या आवश्यकता है जो तपस्या मोक्ष न दिला सके। उसे मैं तपस्या कैसे मानू? शांति सागर जी महाराज ने मुस्कारते हुए उत्तर दिया भैया! यह जो सामने वृक्ष लगा है वह किसका का है? उसने देखा और कहा महाराज! यह तो आम का वृक्ष है। महाराज बोले - आम का पेड कैसे है इसमें तो आम लगे ही नहीं? वह बोला महराज श्री! है तो-आम का ही वृक्ष किंतु अभी अकाल है इसलिए उमसें आम फल नहीं है जब मौसम आयेगा इसमें फल लगेंगे। महाराज बोले - बस भैया! मैं भी यही कहता हूं कि आज की यह तपस्या अकाल की है इस पंचम काल में न सही किंतु जब भी मोक्ष का फल लगेगा तो वह इसी मुनि मुद्रा में ही लगेगा। आम का फल आम के वृक्ष में ही लग सकता है, अन्य किसी में नहीं। इसी तरह मुक्ति मुनि मुद्रा से ही मिल सकती है अन्य किसी मार्ग से नहीं। आचार्य कुन्दकुन्द देव ने दिगम्बरत्व के अलावा शेष सभी मार्गों को मुक्ति के अयोग्य कहा है।
4. 
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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