*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 दादी का अंत ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔👨👨👦👦🐎🔑 पौष शुक्ल 10 , 29 दिसंबर सोमवार 2025 कलि काल के 16 वें तीर्थंकर सर्व सुखकारी श्री शांतिनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से मन के विकल्प शांत हो जाते है और भव्य जीव उत्तम धर्म को धारण कर मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री शांतिनाथ भगवान जी का केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔👨👨👦👦🐎🔑 पौष शुक्ल ग्यारस , 30 दिसंबर मंगलवार 2025 कलि काल के 2 रें तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से गुरु की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से मांगलिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री अजितनाथ भगवान जी का केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔 माह दिसंबर 2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 01,03,04,06,15,18 , 29 व 30 तारीख को कल्याणक महोत्सव है।*
*👨👨👦👦🔔👉 शुद्ध विवाह मुहूर्त दिसंबर माह में 04,05,06 व 11 दिसंबर को है। 🔔👉 वाहन खरीद मुहूर्त 01,04,05,07,08,14,1517,24 व 25🏠👉 प्रापर्टी मुहूर्त 01,05,09,10,119,20,26 ✅👉 गृह प्रवेश मुहूर्त इस माह नहीं है।*
*🐎✍️ पंचक 24 से 29 दिसंबर को है।*
*🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*🪔दादी का अंत 🪔*
*✅यह कहानी एक सच्चाई है इसे कहानी समझकर ना पढ़े। दादी की जगह स्वयं को रखकर विचार करें तो आपका वर्तमान के साथ भविष्य सुरक्षित होगा। सभी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है किंतु जैनदर्शन में उन कर्मों को समाप्त करने का उपाय बताया है।यह आप पर निर्भर करता है कि आप किसी के सहायक बनोगे तो आपका भी कोई सहायक बनकर अंतिम समय सार्थक करेगा।*
समय के साथ घर बड़े होते चले गए, पर दिल छोटे होते गए। तकनीक ने हाथों को व्यस्त कर दिया और रिश्तों को मौन। इसी मौन में सबसे पहले जो आवाज़ दबती है, *वह बुज़ुर्गों की होती है* —जो कभी पूरे घर की धड़कन हुआ करते थे।
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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से कर सकते है ।✍️*
*✍️➡️👨👩👧👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र रजिस्टर संस्था के 📲 W 7891913125 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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शहर की पुरानी गलियों के बीचों-बीच एक दोमंज़िला घर था। कभी यह घर हँसी, बातों और रिश्तों की गर्माहट से भरा रहता था। पर आज उसी घर की पहली मंज़िल के आख़िरी कमरे में 91 वर्ष की एक दादी रहती थीं। उनका दरवाज़ा हमेशा आधा खुला रहता—जैसे वे अब भी किसी के आने की आस लगाए बैठी हों। कमरे में पसरा सन्नाटा उम्र से नहीं, उपेक्षा से उपजा हुआ था।
कभी यही दादी इस घर की आत्मा थीं। सुबह चार बजे पूजा की घंटी, रसोई से उठती मसालों की खुशबू, बच्चों की हँसी और बहुओं की चुहल—हर जगह उनकी मौजूदगी थी। उनकी कहानियों में पूरा मोहल्ला साँस लेता था और उनकी रसोई में सिर्फ़ खाना नहीं, अपनापन पकता था।
लेकिन समय बदला। बदलाव ऐसे चुपचाप आए कि किसी को पता ही नहीं चला कि दादी कब अकेली हो गईं।
धीरे-धीरे सब व्यस्त हो गए। बेटे नौकरी में उलझे, बहुएँ मीटिंग्स और मोबाइल में, पोते-पोतियाँ दादी की कहानियों से ज़्यादा स्क्रीन की रोशनी में खोने लगे। दादी वही थीं, घर वही था—बस रिश्तों का अर्थ बदल गया था।
अब उनकी दुनिया एक कमरे तक सिमट चुकी थी—एक चारपाई, पुरानी अलमारी, तस्वीरों से भरा एलबम और एक खिड़की, जिससे बाहर की दुनिया तो दिखती थी, पर भीतर कोई झाँकता नहीं था। उनके पास अनुभव का सागर था, पर उसे सुनने वाला कोई किनारा नहीं।
बहू रोज़ थाली रख जाती—
“दादी, खा लीजिए, मुझे जल्दी है।”
दादी चुपचाप थाली देखती रह जातीं, जैसे शब्दों से ज़्यादा मौन ही उनका उत्तर बन गया हो।
कभी पोता झाँकता—
“दादी, अभी नहीं… मेरा गेम चल रहा है।”
और पूरा दिन यूँ ही बीत जाता, बिना यह पूछे कि दादी कैसी हैं।
दादी समझ गई थीं— *मौत अचानक नहीं आती। वह पहले रिश्तों से दूर करती है, फिर आवाज़ों से, फिर सवालों से। और एक दिन इंसान अपने ही घर में पराया हो जाता है।* कमरे में घड़ी की टिक-टिक उन्हें याद दिलाती कि समय ही नहीं, लोग भी उनसे आगे निकल चुके हैं।
एक शाम वे चारपाई पर बैठी ढलते सूरज को देख रही थीं। बाहर रोशनी कम हो रही थी, और भीतर उम्मीद भी। उन्होंने धीरे से पुकारा,
“कोई है?”
पर जवाब में टीवी की आवाज़ आई—इंसानों की नहीं।
अगले दिन पोती आई, हाथ में मोबाइल था।
“दादी, आपने सुबह फोन किया था?”
दादी मुस्कराईं, “बस तुमसे थोड़ी बात करनी थी।”
“अभी क्लास है दादी, बाद में,” कहकर वह चली गई।
दादी ने कुछ नहीं कहा, पर भीतर कुछ हमेशा के लिए टूट गया।
दिन सरकते गए... सहेलियाँ एक-एक कर विदा हो गईं... रिश्तेदार कम होते गए.. रात को दादी एलबम खोलकर तस्वीरों से बातें करतीं—क्योंकि तस्वीरें कभी यह नहीं कहती थीं, ‘अभी समय नहीं है।’
एक सर्द रात उनकी तबियत बिगड़ गई। हड्डियाँ दर्द से कराह रही थीं। उन्होंने पानी के लिए आवाज़ लगाई—
“कोई पानी दे दो…”
पर घर जाग रहा था, दादी के लिए नहीं—टीवी, मोबाइल, काम… सब चल रहा था। उनका कमरा पहले से भी ज़्यादा खाली हो गया।
उन्हें समझ आ गया कि अकेलापन शरीर को नहीं, आत्मा को मारता है। और जब आत्मा हार जाती है, तो शरीर का टिके रहना मुश्किल हो जाता है।
सुबह बहू ने दरवाज़ा खोला। दादी तकिये के सहारे शांत लेटी थीं। चेहरे पर अजीब-सी शांति थी और आँखों में हल्की नमी—जैसे किसी का इंतज़ार करते-करते नींद आ गई हो।
घर में रोना-धोना मच गया। सब कह रहे थे—“दादी चली गईं।”
पर सच यह था कि दादी उस दिन नहीं गई थीं…
वे तो बहुत पहले चली गई थीं—उस दिन, जब उनसे बात करना बंद कर दिया गया था।
91 साल की दादी का सबसे बड़ा दर्द उम्र नहीं थी, बीमारी नहीं थी—दर्द था रिश्तों की चुप्पी। उनके पास जीवन था, पर अपनापन नहीं। साँसें थीं, पर सुनने वाला कोई नहीं।
*🔔नोट:-इस कहानी को रिश्तेदार मित्रों व अन्य लोगों तक शेयर अवश्य करे शायद इससे किसी दादा-दादी ,नाना-नानी का भला हो।*
*✅🌞🔔🎪 विशेष :-भव्य आत्माओं,आज हमारे घरों में जो बुज़ुर्ग हैं, वही हमारे अतीत की जड़ और भविष्य का आईना हैं। उन्हें समय, सम्मान और संवाद दीजिए। क्योंकि जो आज किसी की आवाज़ अनसुनी करता है, कल उसकी आवाज़ भी इसी सन्नाटे में खो जाती है।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*