बुधवार, 27 अगस्त 2025

अनमोल फार्मूला

*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 अनमोल फार्मूला ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🐎भाद्रपद शुक्ल 06 , 29 अगस्त शुक्रवार 2025 कलि काल के  सप्तम  तीर्थंकर  सर्व सुखकारी उपसर्ग विजेता श्री सुपार्श्वनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से गुरु की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री  सुपार्श्वनाथ भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🐎भाद्रपद शुक्ल अष्टमी , 31 अगस्त रविवार 2025 कलि काल के  9वें  तीर्थंकर  सर्व सुखकारी  श्री सुविधिनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से शुक्र की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री सुविधिनाथ  भगवान जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*
*🎪 अगस्त  2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 29 व 31 तारीख को है।*
*👉चतुर्दशी तिथि  23 अगस्त को है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔👉 दिनांक  10 अगस्त से 08 सितंबर तक षोडश कारण महापर्व 🔔*
*👨‍👨‍👦‍👦✅ दस लक्षण महापर्व 28 अगस्त से 06 सितंबर तक 👉 अनंत चतुर्दशी 06 सितंबर को 🐎*

*✅🔔⏰🐎 नोट अगस्त  माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह आदि  शुभ कार्यों के मुहूर्त नहीं है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*

  *अनमोल फार्मूला*

स्वयं को करोड़पति बनाने के लिए इस कहानी में बताया है। किस्मत को बदलने का सबसे सरल और आसान तरीका।

 *"थोड़ी मदद, किसी की पूरी दुनिया बदल सकती है"*  यह तो मात्र कहावत है किंतु हमारा अनुभव है कि आप अपनी योग्यता अनुसार योग्य जीवों की जितनी मदद करते है उससे अधिक आप प्राप्त करते है।

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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  कर सकते है ।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र  रजिस्टर संस्था के  📲 W 7891913125 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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लोकल ट्रेन से उतरते ही मैंने घर फोन किया कि कुछ लाना है क्या? 
पत्नी ने कहा: "एक आध किलो वाला छोटा खरबूजा लेते आना।"
जैसे ही मैं स्टेशन से बाहर निकला, सड़क किनारे एक गरीब दिखने वाली बूढ़ी औरत को खरबूजे बेचते देखा। वैसे तो मैं हमेशा "फल" चौरासी घंटे वाले मंदिर के पास की दुकान से ही लेता हूँ, लेकिन आज कुछ अलग करने का मन हुआ।
मैं उसके पास गया और पूछा: "माई, खरबूजा कैसे दिए?" 
वह बोली: "बाबूजी, 50 रुपये किलो।" 
मैंने कहा: "40 रुपये दूँगा।" 
उसने कहा: "45 दे देना, दो पैसे मैं भी कमा लूंगी। 
"40 देने हैं तो बताओ!"
उसके चेहरे की मायूसी देखकर मैं बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया और अपनी पसंदीदा दुकान पर पहुँच गया। वहाँ भाव पूछा तो दुकानदार बोला: "60 रुपये किलो।" मैंने कहा: "पाँच साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ, कुछ तो ठीक करो!" उसने बोर्ड की ओर इशारा कर दिया, जिस पर लिखा था: "मोलभाव करने वाले माफ़ करें।"
इस व्यवहार से मेरा मन खिन्न हो गया। मैंने तुरंत वापस मुड़कर उस बुढ़िया के पास जाने का निश्चय किया।
मैंने मुस्कराकर कहा: "माई, दो किलो दे दो। भाव की चिंता मत करो।"
बुढ़िया का चेहरा खुशी से दमक उठा। वह बोली: "बाबूजी, थैली नहीं है। एक वक्त था जब मेरा पति जिंदा था, तो हमारी छोटी सी दुकान थी। लेकिन उसकी बीमारी में सब चला गया — दुकान भी, आदमी भी। अब कोई सहारा नहीं है। जैसे-तैसे गुज़ारा कर रही हूँ।" कहते-कहते उसकी आंखों में आँसू आ गए।
मैंने 200 रुपये का नोट दिया तो वह बोली: "बाबूजी, छुट्टे नहीं हैं।" मैंने कहा: "रख लो माई, चिंता मत करो। कल मैं तुम्हें 1000 रुपये दूँगा, धीरे-धीरे चुकता कर देना। और मंडी से बाकी फल भी लेकर लाना। अब मैं तुमसे ही फल खरीदूँगा।"
वह कुछ कह पाती, उससे पहले ही मैं घर की ओर निकल पड़ा। रास्ते भर सोचता रहा — हम मोलभाव उन्हीं से क्यों करते हैं, जो दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे होते हैं? और बड़ी दुकानों पर बिना झिझक पूरा पैसा दे आते हैं? 
शायद हमारी सोच ही विकृत हो चुकी है — हम चमक-दमक को गुणवत्ता मान बैठे हैं।
अगले दिन मैंने वादा निभाते हुए बुढ़िया को 1000 रुपये दिए और कहा: "माई, लौटाने की चिंता मत करना, जो फल लूंगा, उन्हीं में से कटता रहेगा।"
जब मैंने यह घटना अपने दोस्तों को सुनाई, तो उन्होंने भी उसी से फल खरीदना शुरू कर दिया। तीन महीने में उसने हाथ ठेला भी खरीद लिया, स्वास्थ्य सुधर गया, और वह अब आत्मनिर्भर हो गई है।
 *चिंतन मनन करने योग्य बातें:* 
- मोलभाव इंसान से मत करो, सामान से करो — गरीब दुकानदारों से मोलभाव कर हम उनकी जीविका छीनते हैं, जबकि बड़ी दुकानों पर चुपचाप पैसे दे आते हैं।
- हर मुस्कराता चेहरा खुश नहीं होता — थोड़ा समझने की कोशिश करें, कभी-कभी दर्द मुस्कान के पीछे छिपा होता है।
- छोटी मदद, बड़ा बदलाव — 1000 रुपये ने एक बेसहारा महिला को फिर से आत्मनिर्भर बना दिया।
- सच्चा संतोष, सेवा में है — दूसरों की भलाई में जो आत्मिक सुख है, वह किसी पुरस्कार से कम नहीं।
- बदलाव की शुरुआत आपसे होती है — एक छोटी सी मदद एक बड़ी प्रेरणा बन सकती है, अगर हम पहल करें। हर इंसान को एक मौका चाहिए — एक सहारा। और यह कोई एक नहीं कर सकता । समाज के लोग अगर थोड़ा संवेदनशील बनें, तो न जाने कितनी जिंदगियां बदल सकते हैं। थोड़ी मदद किसी के लिए पूरी दुनिया बन सकती है।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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मंगलवार, 12 अगस्त 2025

सच्ची मदद

*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒सच्ची मदद✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔👨‍👨‍👦‍👦⏰🔑भाद्रपद कृष्ण सप्तमी , 20 जून शुक्रवार 2025 कलि काल के 16 वें तीर्थंकर  सर्व सुखकारी  श्री  शांतिनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री शांतिनाथ भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*
*🎪 अगस्त  2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव  15,29, व 31 तारीख को है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔🐎  अगस्त माह में अष्टमी तिथि 16 तारीख को है।👉चतुर्दशी तिथि  23 अगस्त को है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔👉 दिनांक  10 अगस्त से 08 सितंबर तक षोडश कारण महापर्व 🔔*
*👨‍👨‍👦‍👦✅ दस लक्षण महापर्व 28 अगस्त से 06 सितंबर तक 👉 अनंत चतुर्दशी 06 सितंबर को 🐎*
*🐎✍️ पंचक 10 से 14 अगस्त तक है।*
*✅🔔⏰🐎 नोट अगस्त  माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह आदि  शुभ कार्यों के मुहूर्त नहीं है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*कवि मैथिलीशरण गुप्त* की एक प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ 
 *"अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे,* 
 *वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए जियें"*  
परोपकार और सेवा की भावना का सार प्रस्तुत करती हैं।  भारतीय संस्कृति में “वसुधैव कुटुम्बकम” का सिद्धांत हमें सिखाता है कि पूरे विश्व को अपना परिवार मानकर सभी की मदद करनी चाहिए, यही सच्ची मनुष्यता है। परोपकार, दया, सहानुभूति और दूसरों की मदद जैसे गुण मानवता की असली पहचान हैं। जो इंसान दूसरों के दुख को अपना समझकर आगे बढ़ता है, वही सच्चे अर्थों में इंसान कहलाता है।
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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  कर सकते है ।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र  रजिस्टर संस्था के  📲 W 7891913125 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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    _*सच्ची मदद*_ 

एक दिन घर लौटते समय मेरी नज़र एक खम्भे पर लगे हाथ से लिखे एक नोटिस पर पड़ी। उत्सुकतावश मैं पास गया और पढ़ा—"मेरे 50 रुपये इस सड़क पर कहीं गिर गए हैं। अगर किसी को मिलें तो कृपया इस पते पर दे दें। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता, कृपया मदद करें।"
.. अम्मा ।
यह पढ़कर मन में विचार आया कि देखो, दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिनके लिए 50 रुपये इतने मायने रखते हैं। मैं उस पते पर पहुँचा, जहाँ एक कमजोर-सी बुज़ुर्ग महिला टूटी झोंपड़ी के बाहर बैठी थी।
मेरे कदमों की आहट सुनकर वह बोली, "कौन है?" मैंने कहा, "अम्मा, आपके 50 रुपये मिले हैं, देने आया हूँ।"
यह सुनते ही वह रोने लगी और बोली, "बेटा, तुमसे पहले 30-40 लोग यही कहकर मुझे पैसे दे चुके हैं। लेकिन मैंने तो कोई नोटिस लिखा ही नहीं। मैं पढ़-लिख नहीं सकती और मुझे साफ दिखाई भी नहीं देता।"
मैं यह सुनकर स्तब्ध रह गया, पर मुस्कराकर कहा, "कोई बात नहीं अम्मा, आप यहां  अकेली यहां रहती है आप मेरे साथ मेरे घर चलिए।  फिर बार बार आग्रह से बुज़ुर्ग महिला ने मुझसे आग्रह स्वीकार कर लिया।
जब मैं अम्मा के साथ घर लौट रहा था, तो सोचने लगा—किसी ने जानबूझकर वह नोटिस लगाया होगा, ताकि इस बेसहारा अम्मा की मदद हो सके। लोगों ने पैसों से तो उनकी मदद कर दी किंतु यह नहीं सोचा कि इस जर्जर शरीर से वह अपने नित्य कार्यो को कैसे करेगी।
मैंने मन ही मन उस भले इंसान को धन्यवाद दिया, जिसने वो नोटिस लिखा और वहाँ चिपकाया। मुझे एहसास हुआ कि अगर हमारे भीतर मदद की सच्ची भावना हो, तो उसे पूरा करने के रास्ते खुद-ब-खुद निकल आते हैं। वह अनजान भला आदमी भी बस इस अम्मा की मदद करना चाहता होगा।
आज उस व्यक्ति विशेष के निमित्त से मुझे व मेरे परिवार के सभी सदस्यों को अम्मा की सेवा करने का मौका प्राप्त हुआ।

*🔔नोट भव्य आत्माओं यह एक सत्य घटनाओं पर आधारित है इसे मात्र कहानी समझकर भूल मत जाना।*
*👨‍👨‍👦‍👦💯◀️▶️🌞विशेष: - भव्य आत्माओं,दूसरों की मदद करने का सच्चा सुख किसी भी व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति से कहीं बड़ा होता है। इच्छाएँ तो बार-बार जन्म लेती हैं और पूरी होने के बाद भी संतोष नहीं देतीं, लेकिन किसी की सहायता कर जो संतोष मिलता है, वह जीवनभर सुकून देता है। अतः स्वयं की योग्यता अनुसार हमें जरुरतमंदो की सेवा करनी चाहिए।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

रक्षाबंधन पर्व की कथा

*🎪सिद्धम नमः 🔔*
*👨‍👨‍👦‍👦जैनम जयतु शासनम् 👨‍👨‍👦‍👦*
*🙏 वसुनंदी गुरुवे नमः 🙏*
*🌞सच्चा साथी🌞*
*✅रक्षाबंधन पर्व की कथा✅*

*🙏 रक्षा बंधन पर्व कथा 🙏* 

🌞ओम नमः 
👨‍👨‍👦‍👦भव्य आत्माओं,
▶️ आज से हजारों वर्ष पहले जैन धर्म के 19 वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ स्वामी के समय की घटना से यह रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है।इस पर्व को वर्तमान के निर्यापक मुनि श्री सुधासागर मुनिराज जी ने दान दिवस के बारे में विस्तार से समझाया है। जैन श्रावक के षट्आवश्यक में एक दान भी आया है। स्वयं के मोक्ष मार्ग को बनाए रखने के लिए हमें प्रतिदिन रत्नत्रय के पथिकों ( दिगंबर मुनि, माताजी, क्षुल्लक-क्षुल्लिका , प्रतिमाधारी श्रावक-श्राविका या जैन-धर्म के अनुयाई) की अपनी शक्ति अनुसार उनके रत्नत्रय में सहायक बनकर जीवन सार्थक करना। अतः आप सभी अपनी योग्यता क्षैत्र के अनुसार अपने श्रावक के कर्तव्यों का पालन अवश्य ही करना चाहिए।

जैन धर्म के 19 वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ स्वामी के समय में हस्तिनापुर में महापद्म नामक चक्रवर्ती का राज्य था तथा उन की रानी लक्ष्मी मति थी. उसके दो पुत्र विष्णुकुमार और पद्म थे|

जब राजा महापद्म को संसार भोगो के प्रति वैराग्य हुआ, तब उन्होंने दीक्षा लेने का विचार किया| फिर राजा ने अपना राज्य अपने बड़े पुत्र को देने का निश्चय किया, तो विष्णु कुमारजी ने राज्य लेने से मना कर दिया|

विष्णु कुमारजी ने अपने पिताजी पूछा कि आप यह चक्रवर्ती का पद, छह खंड का साम्राज्य, पूरा भरत क्षेत्र क्यों छोड़ रहे हो? तब राजा महापद्म ने कहा कि अब मैं जान गया हूँ कि इस संसार में सार नहीं है| तब फिर विष्णु कुमारजी ने पूंछा कि जब इस संसार में कोई सार नहीं है और आप स्वयं भी जब इस संसार को छोड़ रहे है, तो क्या आपको इस तरह की असार वस्तु को अपने बेटे को भेंट करना चाहिए?

जो सच्चे पिता होते हैं, वो अपने बेटे को अच्छी चीज़ ही देते हैं| हे पिता जी, मैं भी समझ रहा हूँ कि इस संसार में कोई सार नहीं है| मुझे भी अब वैराग्य आ गया है| अतः मुझे भी दीक्षा लेने की अनुमति प्रदान करें| तब राजा महापद्म ने अपने छोटे पुत्र पद्म को पूरा राज्य दे दिया| फिर राजा महापद्म तथा उनके सुपुत्र विष्णु कुमार ने जाकर सागरचन्द्र आचार्य से दीक्षा ले ली|

शीघ्र ही महापद्म मुनिराज ने घातिया कर्मो को नष्ट कर केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया और फिर मोक्ष में चले गये| लेकिन मुनि विष्णु कुमारजी घनघोर तपस्या में लीन रहे| तपस्या करते-करते उन्हें बहुत सी ऋद्धिया प्राप्त हो गयी|

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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  कर सकते है ।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र  रजिस्टर संस्था के  📲 W 7891913125 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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इसी बीच उस समय के भारतवर्ष में एक और घटना घटती है, जो इस प्रकार से है –

अवन्ती देश की उज्जयिनी नगरी में राजा श्री वर्मा राज्य करते थे| उसके यहाँ चार मंत्री थे – बलि, ब्रहस्पति, प्रह्लाद और शुक्र|इन चारो की धार्मिक मान्यताये राजा से अलग प्रकार की थी|

एक बार परमयोगी दिगम्बर जैन मुनि अकंपनाचार्य अपने सात सौ मुनि शिष्यों के साथ ससंघ उज्जयिनी पधारे। तब उज्जयिनी के राजा और सारी प्रजा अष्ट द्रव्य का थाल सजा कर अत्यंत उत्साहपूर्वक मुनिराजो के दर्शन के लिए निकलती है| उसी समय मुनिश्री अकंपनाचार्य को अपने अवधिज्ञान से पता चला जाता है कि इस राज्य के सभी मंत्री दूसरे धर्म को मानने वाले हैं, इसलिए इस राज्य में किसी भी तरह का किसी से भी वार्तालाप, चर्चा या संपर्क मुनिसंघ के हित में नहीं है| इसलिए उन्होंने सारे संघ को उन्होंने आदेश दे दिया कि सब मौन धारण करेंगे|

जब राजा और प्रजा ने वहां पर जाकर वंदना करने के पश्चात मुनिराजों से निवेदन किया कि हे ज्ञानवान गुरुवर, हमें धर्म का उपदेश दीजिये, जिससे हम अपने सम्पूर्ण जीवन को सफल बना सके, लेकिन किसी भी मुनिराज ने कोई भी जवाब नहीं दिया, क्योकि सब साधु मौन थे, प्रयास करने पर भी किसी भी मुनिराजों ने अपना मौन नहीं खोला,तब इन चारों मंत्रियो ने राजा को बोला कि अरे ये मुनिराज तो निरे अंगूठे-छाप हैं इनको कुछ आता नहीं है|

अगर इन मुनिराजो को कुछ आता होता, तो ये ऐसे मौन नहीं रहते| बस जैन साधु बनने पर इनको सम्मान, भोजन आदि मिल जाता है| यही कारण इनकी जैनेश्वरी दीक्षा लेने का है इसके सिवा कोई और कारण नहीं है, आप इनसे धर्मं का स्वरुप पूछ रहे हैं लेकिन ये सब मुनि जानते हैं कि इनको कुछ नहीं आता है| हे राजन, जब आपके साथ हमारे सरीखे इतने विद्वान् मंत्री हैं, तो ये कैसे कुछ बोले?

अतः ये चुप ही रह रहे हैं और कुछ नहीं बोल रहे हैं| इसके बाद राजा के साथ वे सब नगर की और लौटने लगे| तब रास्ते में इसी संघ के एक श्रुतसागर नामक मुनिराज को आता देख, इन चारो मंत्रियों में से एक मंत्री बोला –

अरे देखो, कैसा जवान बैल चला आ रहा है इन मुनिराज को पता नहीं था कि आचार्य श्री ने सबको मौन रहने आदेश किया है,अतः इन मुनिराज ने मौन व्रत नहीं लिया था इसलिए इन्होंने “स्यात” शब्द बोला, तो राजा को लगा ये साधु तो मौन नहीं है, तब राजा ने पूछा कि इसका अर्थ क्या है,

तब मुनिराज बोलते हैं कि इस संसार में भ्रमण करने वाला जीव कभी बैल योनी में भी उत्पन्न हो जाता है बैल में जवानी की दशा भी बनती है, तो उस भूतपूर्व अवस्था से आपके मंत्रियों ने सही कहा है| तो एक मंत्री बोलता है कि क्या आप मानते है पुनर्जन्म?

किसने देखा है पुनर्जन्म?

जो आँखों से नहीं देखा सा सकता, वो सत्य कैसे हो सकता है? तब मुनिराज तत्काल उत्तर देते हैं कि तुम्हारे माता, पिता की विवाह विधि हुई थी| क्या वो तुमने देखी थी? वो मंत्री कहता है कि हाँ हुई थी, तब मुनि बोलते हैं कि तुम कैसे कह सकते हो कि विवाह विधि हुई थी| तो मंत्री बोलता है कि हुई तो थी, लेकिन तुम तो बोल रहे हो कि जो आँखों से दिखता है, वही सच होता है| तो मंत्री बोलता है कि मैंने सुना है तो फिर मुनि बोले कि फिर तुम्हारी पहली बात झूठी सिद्ध हो रही है ये सुनते ही उस मंत्री को कुछ जवाब समझ में नहीं आया, तो फिर मुनिराज बोले कि जो हम आत्मा, परमात्मा की धारणा को लेकर चल रहे हैं, वो भी हमने सुनी है, हमने हमारे सदगुरु से, उन्होंने गणधर परमेष्ठी से गणधर परमेष्ठी ने उनके गुरु तीर्थंकर भगवान् – सर्वज्ञ से ये बात सुनी है| इस तरह अनादिकाल से आजतक यह मान्यता चली आ रही है| इसलिए हम भी उस पर अविश्वास नहीं करते हैं| इस प्रकार इन मंत्री के पास अब कोई जवाब नहीं था, अतः ये चारो मंत्री उन मुनिराज से परास्त हो गए, बात तो सच ही है| जो ज्ञानी महात्मा हैं, जिनको चारो अनुयोगो का ज्ञान है, उन आत्मज्ञानी महापुरुष को कोई जीत नहीं सकता है| वाद-विवाद में उनको कोई पराजित नहीं कर सकता है|

जो लोग थोडा बहुत पढ़ कर तर्क-वितर्क करने लग जाते हैं, वो अपनी ही बात से खुद ही पराजित हो जाते हैं | इस तरह स्यादवाद के धारक मुनिराज ने सबको पराजित कर दिया और वो सब मंत्री गण परास्त होकर म्लान मुख हो चले जाते हैं| इसके बाद मुनि श्रुतसागर जी आचार्य अकम्पनाचार्य जी के पास जाते है तथा उनको सब मंत्रियों से हुए समस्त वार्तालाप को बता देते हैं कि रास्ते ये घटना हुई तो मुझे थोड़ा सा शास्त्रार्थ करना पड़ा और वो परास्त हो गये तब वे आचार्य बोलते हैं कि तुमने मुनि संघ के ऊपर संकट ला दिया है, अब इस संकट से बचने का एक मात्र उपाए यही हो सकता है कि तुम पुनः उसी स्थान पर चले जाओ और कायोत्सर्ग मुद्रा में मौन होकर खड़े हो जाओ इससे संकट भी टल जायेगा और कायोत्सर्ग करने से तुमसे गुरु की आज्ञा की अनजाने में जो भूल हो गयी है, उसका भी प्रायश्चित हो जायेगा| 

तब वे मुनि श्रुतसागर आचार्यश्री को नमस्कार कर चले गए और उसी स्थान पर जाकर कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़े हो गये| उधर उन चारो मंत्रियो ने बैठक में विचार किया कि इन साधुओं के कारण हमारी ऐसी बदनामी हुई है, अतः हम अब इन सब मुनियों को मार डालेंगे, तो दूसरा बोला कि सब मुनियों की हत्या करना व्यर्थ है|

अंत में निर्णय यह निकलता है कि जिस मुनि के कारण हमको इतनी बदनामी हुई है, उसी मुनि की हत्या करनी चाहिए अतः अब हम रातो-रात उस मुनि को मार डालेंगे| फिर चारो मंत्रीगण रात को उसी मार्ग से निकलते हैं रास्ते में चांदनी रात में श्रुतसागर मुनिराज को कायोत्सर्ग मुद्रा में देख कर पहचान लेते हैं और सोचते हैं कि चलो अच्छा हुआ, हमारा दुश्मन तो यही खड़ा है चारो मंत्रियों ने तलवार उठा ली और जैसे ही वो मारने को होते हैं, तब उस जगह का वन देवता उनके हाथो को कीलित कर देता है, जिससे उनके शरीर जकड़ जाते हैं और वे रात भर इसी मुद्रा में खड़े रह जाते हैं|

सुबह जब जनता मुनिराजो को वंदना के लिए निकलती है, तब रास्ते में इन दुष्टों को मुनिराज को मारने के लिए तलवार उठाये कीलित मुद्रा में देख कर अत्यंत क्रोधित होकर राजा को बताती है तब राजा बहुत कुपित होता है कि इन दुष्टों ने इतना नीचा कार्य करने की कोशिश की फिर राजा उन चारो मंत्रियो को अपमान पूर्वक देश निकाले का दंड देकर अवन्ती देश से निष्काषित कर देते हैं |

इसी बीच हस्तिनापुर के राजा पद्म पर सिंहबल नामक राजा चढ़ाई करता है, तब ये चारो मंत्री अपने छल-बल से सिंहबल राजा को बंदी बनाकर राजा पद्म के सामने ले आते हैं तब राजा पद्म बहुत प्रसन्न होता है, और बोलता है कि तुम सभी को मैं मंत्री बनाता हूँ और साथ में तुमको अगर कोई वरदान मांगना हो, तो मांग़ लो|

बलि मंत्री बोला, जब वक़्त होगा तब मागेंगे और इस तरह वो सभी हस्तिनापुर राज्य के मंत्री बन जाते हैं एक बार इस राज्य में भी अकम्पनाचार्य आदि सात सौ मुनिराजो का संघ चौमासा के लिए आता है| अब जैसे ही इन मंत्रियों को इस बात का पता चलता है, वे सभी राजा पद्म के पास जाते हैं और राजा से वरदान में सात दिन का राज्य मानते हैं| अब ये चारो मंत्री राजा बनते ही मुनिसंघ के चारो ओर एक बाड़ी लगा देते है फिर उसमे अग्नि जलाकर यज्ञ प्रारंभ करते हैं और लकड़ी आदि जलाने लगते हैं तब चारो ओर बहुत सारा धुवाँ फ़ैल जाता है. यह धुवां मुनिराजों के गले, नासिका में चले जाने से मुनिराजो को अत्यंत कष्ट हो जाता है लेकिन फिर भी वो सभी मुनिराज समता धारण कर वही पर अपने आत्म चिन्तन में लीन हो जाते हैं और आहार-जल का त्याग कर देते हैं| इधर इस यज्ञ का धुवाँ दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था और मुनिराजों का दर्द भी बढ़ता जा रहा था| छठी रात को इस अत्यंत पीड़ादायक घटना से श्रवण नक्षत्र भी कम्पायमान हो उठता है|

इस स्थल से बहुत दूर विराजमान अवधिज्ञान के धारी आचार्य सागरचन्द्रजी ने इस कम्पित नक्षत्र को देखकर जाना कि ये बहुत अमंगलकारी अशुभ संकेत है और फिर वे मुनिराज अपने अवधिज्ञान से जान गए कि अकम्पनाचार्य आदि सात सौ मुनिराजों पर प्राण संकट आया हुआ है तब एकदम से उनके मुख से “आह… !” ये शब्द निकलते हैं|

तब उन्होंने संघ में एक क्षुल्लकजी जिनके पास आकाशगामिनी विद्या थे, उनको आधी रात को ही बुलाया और बोला कि तुम तत्काल जाकर धरणीभूषण पर्वत पर विराजमान विष्णु कुमार मुनि को जाकर बता देना कि वे विक्रिया ऋद्धिधारी मुनि हैं और इन 700 मुनिराजों पर आये इस भीषण संकट का निवारण सिर्फ वे ही कर सकते हैं|

तब वे क्षुल्लक जी आकाश मार्ग से चले जाते है और विष्णु कुमार मुनि को सब बताते हैं. तब इन मुनिराज को याद आता है कि हस्तिनापुर का राज्य तो मेरे पूर्व भाई का राज्य है. फिर उनके राज्य में 700 मुनिराजों पर यह विकट संकट कैसे आया? साथ ही उनको खुद की कठोर तपस्या में लीन रहने से यह पता ही नहीं चला था कि उनको विक्रिया ऋद्धि प्राप्त हो गयी है अतः वे मुनिराज इस ऋद्धि को जांचने के लिए अपना हाथ आगे बढाते हैं, तो वो उनका हाथ पर्वतो को पार करता हुआ, समुद्रो को पार करता हुआ, मनुष्य लोक की अंतिम सीमा तक चला गया और फिर उन्होंने अपने हाथ को वापस कर लिया और समझ गए कि मुझे ये ऋद्धि तो प्राप्त हो गयी है फिर वे विष्णुकुमार मुनि तत्काल वहां से आकाश मार्ग से हस्तिनापुर आ जाते हैं और अपने पूर्व के छोटे भाई राजा पद्म से पूंछते हैं कि तुम्हारे राजा होते हुए इन 700 मुनिराजों पर इतना बड़ा संकट क्यों आया?

राजा पद्म बताता है कि अगर मैं राजा होता तो कभी ये नहीं होने देता लेकिन अभी मेरा राज्य सात दिनों के लिए उन मंत्रियो के पास है. अतः मैं कुछ भी नहीं कर सकता हूँ| कृपया आप कुछ उपाय करे क्योकि इस वीभत्स कार्य से हम सब अत्यंत दुखी और परेशान हैं तब विष्णुकुमार मुनि विक्रिया ऋद्धि से अपना रूप बदल कर वामन का रूप धारण करते हैं. फिर वे वहां जाकर बड़ी सुन्दर आवाज में वीणा को लेकर वेदपाठ प्रारम्भ करते हैं तब बलि राजा बहुत अच्छे से उस वामन का स्वागत करते है और पूछते हैं कि हे विप्र आप क्या चाहते हो?

आपका इतना सुन्दर वेदपाठ सुनकर हम प्रसन्न हो गये हैं आज किमिचिक दान का दिन है आपको जो भी माँगना है, वो मांग लो तब वह वामन ऋषि कहते हैं कि हमें संपत्ति तो नहीं चाहिए, लेकिन तीन डग जमीन चाहिए तब राजा बलि उसे तीन डग जमीन देने का वादा करते हैं तब विष्णु कुमार मुनि बोलते है “लो बलि राजा, मैं तीन डग जमीन नापता हूँ ”

ऐसा बोलते ही उनके शरीर का आकर बढ़ना प्रारंभ हो जाता है,और इतना विशाल हो जाता है कि ज्योतिष पटल [ तारा मंडल ] से उनका सर टकराता है, फिर वो एक पैर तो जम्बूदीप की वेदी पर रखते है, दूसरा सुमेरु पर्वत पर रखते हैं यानी दो पैर में उन्होंने सुमेरु पर्वत से मानुषोत्तर पर्वत तक सम्पूर्ण मनुष्य लोक को नाप लिया, अब तीसरा पैर के लिए उनके लिए कोई स्थान बचा ही नहीं था अतः उनका पैर हवा पर लहरा रहा था तब देव लोक में हलचल मच गयी, मध्य लोक के देवता लोग भी घबरा गये, उन सबने विचार किया कि अगर अभी इन मुनिराज को शांत नहीं किया, तो उनकी नज़र मात्र से तीनो लोक कंपित हो सकते हैं और असमय में प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो सकती है तब देवता गण उनको शांत करने के लिए चार वीणा मंगवाते है, और फिर वीणा से इतना सुन्दर संगीत बजाते हुए क्षमा के गीत गाते हैं तब मुनिराज शांत होकर फिर से सामान्य रूप में दिगंबर मुद्रा में खड़े हो जाते हैं तब राजा बलि आश्चर्य में पड़ जाता है कि जैन साधु में इतनी क्षमता कि दो डग में पूरा मनुष्य लोक नाप लिया और मैं बड़ा दान वीर बना फिरता था|

सभी देवताओ ने फिर बलि आदि मंत्रियों को बाँध दिया और इन मुनिराजो के चरणों में डाल दिया तब ये सभी मंत्री समस्त 700 मुनिराजों से माफ़ी मांगते हैं, तब मुनिराज उसको क्षमा कर देते हैं| साथ ही उन मुनिराजो का उपसर्ग भी देवता लोग मिटा देते हैं और वातावरण को भी सुमुधर तथा सुगंधित बना देते हैं लेकिन जो धुवां उन मुनिराजो के अन्दर चला गया था, उससे उनको बहुत तकलीफ हो रही थी फिर सुबह जब पूर्णिमा का यह रक्षाबंधन का दिन उदित होता है, तब सभी 700 मुनिराजजी आहार के लिए जाते हैं, तो पूरी हस्तिनापुर नगरी के श्रावक लोग ऐसा सुमुधर आहार निर्माण करते हैं जिससे इन सभी 700 मुनिराजों की कंठ की पीड़ा ठीक हो जाए फिर इन सभी 700 मुनिराजों को खीर में घी डालकर उसका आहार देते हैं. इस आहार से मुनि महाराजो के गले में शांति होती है और वे सभी लोगो को उनके कल्याण का उपदेश देते हैं|

इस दिन पूरे राज्य और देश में एक अद्भुत वात्सल्य का, एक दूसरे के प्रति सम्मान और आदर का भावुक वातावरण बन गया फिर सभी लोगो ने एक दूसरे के हाथो में पतला सा धागा सूत्र बांधा और संकल्प लिया, कसम खायी कि कभी भी देव-शास्त्र-गुरु पर संकट आयेगा, तो हम सब मिलकर उनका सामना करेगे| इसके बाद वे विष्णुकुमार मुनि अपने गुरु के पास जाते हैं और अपने इस रूप बदलने का प्रायश्चित लेते हैं और अंत में वे विष्णुकुमार मुनिराज भी उसी जन्म में सभी धातिया और अधातिया कर्मो का नाश कर उसी भव से मोक्ष चले जाते हैं|
इस तरह चैतन्यदेव की सर्वोच्च शक्ति को दर्शाने वाले आत्म धर्म के शास्त्रों में परमपूज्य मोक्षगामी विष्णुकुमार मुनिराज की यह अद्भुत कथा जैन शास्त्रों में रक्षाबंधन पर्व के रूप में मनायी जाती है|

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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गुरुवार, 7 अगस्त 2025

स्वयं को सुरक्षित करने हेतु

*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 स्वयं के कर्मों का फल ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔   श्रावण शुक्ल  पौर्णिमा , शनिवार 09 अगस्त  2025 कलि काल के 11वें तीर्थंकर  क्षेयांसनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक शक्ति प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करवाने वाले  श्री  क्षेयांसनाथ भगवान जी का  मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔श्रावण शुक्ल  पौर्णिमा , शनिवार 09 अगस्त  2025 के ही दिन 700 मुनिराजों का पारना हुआ था इस कारण से रक्षाबंधन पर्व याने दान दिवस स्व व पर के उपकार के लिए मनाया जाता है।🙏*
*🎪 अगस्त  2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 09, 15,29, व 31 तारीख को है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔🐎  अगस्त माह में अष्टमी तिथि 16 तारीख को है।👉चतुर्दशी तिथि 08 व 23 अगस्त को है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔👉 दिनांक  10 अगस्त से 08 सितंबर तक षोडश कारण महापर्व 🔔*
*👨‍👨‍👦‍👦✅ दस लक्षण महापर्व 28 अगस्त से 06 सितंबर तक 👉 अनंत चतुर्दशी 06 सितंबर को 🐎*
*🐎✍️ पंचक 10 से 14 अगस्त तक है।*
*✅🔔⏰🐎 नोट अगस्त  माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह आदि  शुभ कार्यों के मुहूर्त नहीं है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
हमारे स्वयं के कर्म सदा न्यायकारी हैं, अर्थात वह  जीव को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं। अच्छे कर्मों का अच्छा और बुरे कर्मों का बुरा फल देना ही ईश्वरीय न्याय कहलाता है। मनुष्य कभी-कभी बिना कर्म के सुख चाहता है या दूसरों को दुःख देकर स्वयं सुखी होना चाहता है, जो कर्मों की न्याय व्यवस्था में असंभव है। संसार में मानव न्याय व्यवस्था दोषपूर्ण हो सकती है, परंतु स्वयं के कर्मों का न्याय सदा निष्पक्ष और पूर्ण होता है। जो छल-कपट से सुख या सुविधाएं प्राप्त करते हैं, वे अंततः भय, तनाव व ग्लानि से घिर जाते हैं। इसलिए ईमानदारी से परिश्रम करें, दूसरों को सुख दें, तभी सच्चा सुख प्राप्त होगा। यही स्वयं के कर्मों न्याय ही जीवन का सार है।

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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  कर सकते है ।✍️*
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   *कर्मों का न्याय* 
अब हम प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इस कहानी के माध्यम से कर्म व्यवस्था को समझते है।

एक दिन एक महात्मा अपने शिष्य के साथ यात्रा पर निकले। गुरु ज्ञान के भंडार होने से उनका शांत स्वभाव था और व्यर्थ की बातों से दूर रहते थे, जबकि शिष्य अत्यंत चंचल और जिज्ञासु स्वभाव का था। चलते-चलते वे एक तालाब के पास पहुँचे जहाँ एक धीवर (मछुआरा) मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल डाल रहा था। यह दृश्य देखकर शिष्य के भीतर करुणा उमड़ पड़ी और वह उसे अहिंसा का उपदेश देने लगा।
धीवर ने पहले टालने की कोशिश की, पर जब शिष्य की बातें बढ़ती गईं, तो दोनों में विवाद होने लगा। यह देखकर महात्मा वापस लौटे और शिष्य को समझा-बुझाकर वहाँ से ले गए। उन्होंने कहा, "बेटा, हमारा कार्य केवल समझाना है, न्याय करना यह स्वयं के कर्मों का कार्य है। हमें दंड देने के लिए नहीं, मार्ग दिखाने के लिए इस धरती पर जन्म प्राप्त हुआ है।"
शिष्य ने पूछा, "गुरुदेव, अगर न कोई राजा और न ही हम उसे दंड देंगे तो उसे दंड कौन देगा?" गुरुजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया, "स्वयं के कर्मों का चक्र चोबीस घंटे निरंतर चल रहा है बस इस बात को समझ कर जो जीवन व्यतीत करता है वहीं सच्चा मोक्ष का राही कहलाता  है। वह हर जीव के कर्मों का लेखा-जोखा रखता है और उसका न्याय अचूक होता है। हर प्राणी को उसके कर्मों का फल आज नहीं तो कल अवश्य ही मिलता है।"
समय बीता। दो वर्ष बाद वही गुरु-शिष्य फिर उसी तालाब के पास से गुज़रे। इस बार उन्होंने देखा कि एक ज़ख्मी साँप को चींटियाँ काट-काट कर खा रही थीं। यह देख शिष्य का मन द्रवित हो गया और वह साँप की सहायता को दौड़ पड़ा, परंतु गुरुजी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले, "बेटा, इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो। यदि तुम इसे बचाओगे तो यह दुःख इसे अगले जन्म में भोगना पड़ेगा।"
शिष्य चकित होकर बोला, "गुरुदेव! यह कौन है और कौन से कर्म का फल भोग रहा है?" गुरुजी ने उत्तर दिया, "यह वही धीवर है जिसे तुमने दो वर्ष पूर्व समझाने का प्रयास किया था। यह वही मछलियाँ हैं जो आज चींटियों का रूप लेकर इसका प्रतिकार कर रही हैं।"
शिष्य यह सुनकर स्तब्ध रह गया और बोला, "गुरुदेव, यह तो बहुत ही गहरा और रहस्यमय न्याय है!" गुरुजी बोले, 
 "स्वयं के कर्मों का न्याय गूढ़ अवश्य है, परंतु अन्याय कभी नहीं होता। इसी जीवन में स्वर्ग और नरक दोनों के दर्शन होते हैं। मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है – चाहे वह शुभ हो या अशुभ। इसलिए हमेशा सत्कर्मों का चयन करो।"
शिष्य की आँखें खुल चुकी थीं। उसने निश्चय किया कि जीवन के हर क्षण को श्रेष्ठ कर्मों में लगाएगा, क्योंकि अब उसे समझ आ गया था कि स्वयं के कर्म फल न्यायकारी है, और न्याय का आधार केवल और केवल हमारे कर्म हैं।

*🔔👨‍👨‍👦‍👦🌞🐎विशेष: -भव्य आत्माओं, स्वयं के कर्मों के न्याय से कोई बच नहीं सकता। अतः हमेशा ऐसा कर्म करें जो न केवल हमें, बल्कि दूसरों को भी सुख दे, क्योंकि वही सच्चा धर्म और ईश्वर की सच्ची पूजा है।▶️हां हम सभी जीवों ने चौरासी लाख योनियों में असंख्यात बार भ्रमण करते हुए अनेक प्रकार के कर्मों की गठरी बांध ली है।उस गठरी को समाप्त करने के लिए हमें सच्चे देव शास्त्र गुरु की शरण जाना आवश्यक है। सच्चे गुरु का मार्गदर्शन व स्वयं का प्रायश्चित ही सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा हमारा तीन काल में आत्मकल्याण संभव नहीं है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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