शुक्रवार, 30 सितंबर 2022

हमारा परिवार

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 हमारा परिवार ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️ 1. आश्विन शुक्ल अष्टमी 03 अक्टूबर 2022   सोमवार  को 10 वें तीर्थंकर 1008 श्री शीतलनाथ भगवानजी का मोक्ष कल्याणक  महोत्सव हैं।*

*🕉️✍️यह कल्याणक की तिथि उत्तर पुराण के अनुसार प्रमाणित है। इस तिथि के अनुसार विश्व के सभी देशों में दिगंबर आम्नाय वाले 99.90% लोग उत्सव मनाकर जीवन सार्थक करते  है।🐒✍️*
*👨‍👩‍👧‍👦आपसभी सपरिवार , इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार उत्सव कर जीवन सफल करें।*

तीज का त्यौहार आने वाला था।  निशाजी की दोनों बहुओं के पीहर से तीज का सामान भर भर के उनके भाइयों द्वारा पहुंचा दिया गया था। छोटी बहू मीरा का यह शादी के बाद पहला त्यौहार था। चूँकि मीरा के माता पिता का बचपन में ही देहांत हो जाने के कारण, उसके चाचा चाची ने ही उसे पाला था इसलिए और हमेशा हॉस्टल में रहने के कारण उसे यह सब रीति-रिवाजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️

 पढ़ने में होशियार मीरा को कॉलेज के  बाद जॉब मिल गई। आकाश और वो दोनों एक ही कंपनी में थे। जहां दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया और घरवालों ने भी बिना किसी आपत्ति के दोनों की शादी करवा दी।

 आज जब मीरा ने देखा कि उसकी जेठानियों के पीहर से शगुन में ढ़ेर सारा सुहाग का सामान, साड़ियां, मेहंदी, मिठाईयां इत्यादि आया है तो उसे अपना कद बहुत छोटा लगने लगा। पीहर के नाम पर उसके चाचा चाची का घर तो था, परंतु उन्होंने मीरा के पिता के पैसों से बचपन में ही हॉस्टल में एडमिशन करवा कर अपनी जिम्मेदारी निभा ली थी और अब शादी करवा कर उसकी इतिश्री कर ली थी। आखिर उसका शगुन का सामान कौन लाएगा, ये सोच सोचकर मीरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी।

 जेठानियों को हंसी ठहाका करते देख उसे लगता शायद दोनों मिलकर उसका ही मजाक उड़ा रही हैं। आज उसे पहली बार मां बाप की सबसे ज्यादा कमी खल रही थी।
 
अगले दिन मीरा की सास निशाजी  ने उसे आवाज लगाते हुए कहा, "मीरा बहू, जल्दी से नीचे आ जाओ, देखो तुम्हारे पीहर से तीज का शगुन आया है।" यह सुनकर मीरा भागी भागी नीचे उतरकर आँगन में आई और बोली, "चाचा चाची आए हैं क्या मम्मी जी? कहां हैं? मुझे बताया भी नहीं कि वे लोग आने वाले हैं!"मीरा एक सांस में बोलती चली गई। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके चाचा चाची भी कभी आ सकते हैं।

 तभी निशाजी  बोलींं, "अरे नहीं, तुम्हारे चाचा चाची नहीं आए बल्कि भाई और भाभियां सब कुछ लेकर आए हैं।"  मीरा चौंंककर बोली, "पर मम्मी जी मेरे तो कोई भाई नहीं हैं फिर...??"

"ड्रॉइंग रूम में जाकर देखो, वो लोग तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं"।निशाजी ने फिर आँखे चमकाते हुए कहा। मीरा कशमकश में उलझी धीरे धीरे कदम बढ़ाती हुई, ड्रॉइंग रूम में घुसी तो देखा उसके दोनों जेठ जेठानी वहां पर सारे सामान के साथ बैठे हुए थे।पीछे-पीछे निशाजी  भी आ गईंं और बोलींं, "भई तुम्हारे पीहर वाले आए हैं, खातिरदारी नहीं करोगी क्या?" मीरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो कभी सास को देखती तो कभी बाकी सभी लोगों को। उसके मासूम चेहरे को देख कर सबकी हंसी छूट पड़ी। 

निशाजी  बोलींं, "कल जब तुम्हारी जेठानियों के पीहर से शगुन आया था तो हम सबने ही तुम्हारी आंखों में वह नमी देख ली थी। जिसमें माता पिता के ना होने का गहरा दुःख समाया था। पीहर की महत्ता हम औरतों से ज्यादा कौन समझ सकता है भला!इसलिए हम सबने तभी तय कर लिया था कि आज हम सब एक नया रिश्ता कायम करेंगे और तुम्हें तुम्हारे पीहर का सुख जरूर देंगे।
"मीरा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिन रिश्तोंं से उसे कल तक मजाक बनने का डर सता रहा था। उन्हीं रिश्तों ने आज उसे एक नई सोच अपनाकर उसका पीहर लौटा दिया था। मीरा की आंखों से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे।।
समाज में एक नई सोच को जन्म देने वाले उसके ससुराल वालों ने मीरा का कद बहुत ऊंचा कर दिया था। साथ ही साथ अपनी बहू के ससुराल को ही अपना पीहर बनाकर समाज में उनका कद बहुत ऊंचा उठ चूका था।

*🎪करने योग्य🎪*
*👪➡️🔔आज हम सभी अपने परिवार को हमारा परिवार बनाकर संस्कारों को जीवंत बनाकर एक बार दुबारा से अखंड भारत की शुरुआत करें ।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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गुरुवार, 29 सितंबर 2022

बुराइयों को जितने के लिए

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒 बुराइयों को जितने के लिए ✍️🐒*

बहुत पुरानी बात है मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था।इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था।

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डाकू अंगुलीमाल मगध के जंगलों की गुफा में रहता था। वह लोगों को लूटता था और जान से भी मार देता था। लोगों को डराने के लिए वह जिसे भी मारता उसकी एक ऊँगली काट लेता और उन उँगलियों की माला बनाकर पहनता। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा। गाँव के सभी लोग परेशान थे कैसे इस डाकू के आतंक से छुटकारा मिले।

एक दिन गौतम बुद्ध उस गाँव में आये। गाँव के लोग उनकी आवभगत करने लगे। गौतम बुद्ध ने देखा कि गाँव के लोगों में किसी बात को लेकर दहशत फैली है ।

तब गौतम बुद्ध ने गाँव वालों से इसका कारण पूछा- ये सुनते ही गाँव वालों ने अंगुलिमाल के आतंक का पूरा किस्सा उन्हें सुनाया।

अगले ही दिन गौतम बुद्ध जंगल की तरफ निकल गये, गाँव वालों ने उन्हें बहुत रोका पर वो नहीं माने। बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसके  सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को  पकड़ नहीं पा रहा था।

थक हार कर उसने कहा- “रुको”

बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले- मैं तो कबका रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे।

अंगुलिमाल ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ।

बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो। तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा।

अंगुलिमाल बोला बताओ- “कैसे साबित करना होगा?”।

बुद्ध ने कहा- “तुम उस पेड़ से दस पत्तियां तोड़ कर लाओ”।

अंगुलिमाल ने कहा- बस इतनी सी बात, “मैं तो पूरा पेड़ उखाड़ सकता हूँ”।

अंगुलिमाल ने दस पत्तियां तोड़कर ला दीं।

बुद्ध ने कहा- अब  इन पत्तियों को वापस पेड़ पर जाकर लगा दो।

अंगुलिमाल ने हैरान होकर कहा- टूटे हुए पत्ते कहीं वापस लगते हैं क्या ?


तो बुद्ध बोले – जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए ?

यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मृत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है।

ये सुनकर अंगुलीमाल को अपनी गलती का एहसास हो गया। और वह बुद्ध का शिष्य बन गया। और उसी गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने लगा।

आगे चलकर यही अंगुलिमाल बहुत बड़ा सन्यासी बना और अहिंसक के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

*करने योग्य*
*इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी इन्सान कितना ही बुरा क्यों न हो, वह बदल सकता है। दोस्तों, अंगुलिमाल बुराई का एक प्रतीक है, और हम सबमें छोटे-बड़े रूप में कोई न कोई बुराई है। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने अन्दर की बुराइयों को पहचाने और उन्हें ख़त्म करें। इसके लिए सबसे आवश्यक है कि हमारा भोजन सात्विक हो।हमारी दृष्टि किसी भी प्राणी के दोषों को न देखकर उसके गुणों पर होना चाहिए।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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बुधवार, 28 सितंबर 2022

राजपुरूष का चयन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒राजपुरूष का चयन  ✍️🐒*

राजा महेन्द्रनाथ हर वर्ष अपने राज्य में एक प्रतियोगिता का आयोजन करते थे, जिसमें हजारों की संख्या में प्रतियोगी भाग लिया करते थे और विजेता को पुरुस्कार से सम्मानित किया जाता है।

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एक दिन राजा ने सोचा कि प्रजा की सेवा को बढ़ाने के लिए उन्हें एक राजपुरूष की आवश्यकता है जो बुद्धिमान हो और समाज के कार्य में अपना योगदान दे सके। उन्होंने राजपुरूष की नियुक्ति के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित करने का फैसला किया ।

दूर-दूर से इस बार लाखों की तादात में प्रतियोगी आये हुए थे।

राजा ने इस प्रतियोगिता के लिए एक बड़ा-सा उद्यान बनवाया था, जिसमें राज-दरबार की सभी कीमती वस्तुएं थीं, हर प्रकार की सामग्री उपस्थित थी, लेकिन किसी भी वस्तु के सामने उसका मूल्य निश्चित नहीं किया गया था।

राजा ने प्रतियोगिता आरम्भ करने से पहले एक घोषणा की, जिसके अनुसार जो भी व्यक्ति इस उद्यान से सबसे कीमती वस्तु लेकर राजा के सामने उपस्थित होगा उसे ही राजपुरूष के लिए स्वीकार किया जाएगा। प्रतियोगिता आरम्भ हुई।

सभी उद्यान में सबसे अमूल्य वस्तु तलाशने में लग गए, कई हीरे-जवाहरात लाते, कई सोने-चांदी, कई लोग पुस्तकें, तो कोई भगवान की मूर्ति, और जो बहुत गरीब थे वे रोटी, क्योंकि उनके लिए वही सबसे अमूल्य वस्तु थी।

सब अपनी क्षमता के अनुसार मूल्य को सबसे ऊपर आंकते हुए राजा के सामने उसे प्रस्तुत करने में लगे हुए थे। तभी एक नौजवान राजा के सामने खाली हाथ उपस्थित हुआ।

राजा ने सबसे प्रश्न करने के उपरान्त उस नौजवान से प्रश्न किया- अरे! नौजवान, क्या तुम्हें उस उद्यान में कोई भी वस्तु अमूल्य नजर नहीं आई? तुम खाली हाथ कैसे आये हो?

“राजन! मैं खाली हाथ कहाँ आया हूँ, मैं तो सबसे अमूल्य धन उस उद्यान से लाया हूँ।” – ‘नौजवान बोला।

“तुम क्या लाये हो?”- राजा ने पूछा।

“मैं संतोष लेकर आया हूँ महाराज!”- नौजवान ने कहा।

क्या, “संतोष”, इनके द्वारा लाये गए इन अमूल्य वस्तुओं से भी मूलयवान है?- राजा ने पुनः प्रश्न किया।

जी हाँ राजन! इस उद्यान में अनेकों अमूल्य वस्तुएं हैं पर वे सभी इंसान को क्षण भर के लिए सुख की अनुभूति प्रदान कर सकती हैं। इन वस्तुओं को प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य कुछ और ज्यादा पाने की इच्छा मन में उत्पन्न कर लेता है अर्थात इन सबको हासिल करने के बाद इंसान को ख़ुशी तो होगी लेकिन वह क्षण भर के लिए ही होगी। लेकिन जिसके पास संतोष का धन है, संतोष के हीरे-जवाहरात हैं वही इंसान अपनी असल जिंदगी में सच्चे सुख की अनुभूति और अपने सभी भौतिक इच्छाओं पर नियंत्रण कर सकेगा।” – नौजवान ने शांत स्वर में उत्तर देते हुए कहा।

नौजवान को लाखों लोगों में चुना गया और उसे राजपुरूष के लिए सम्मानित किया गया।

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मंगलवार, 27 सितंबर 2022

क्षमताओं का विकास

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
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*💪👩‍🚒 क्षमताओं का विकास  ✍️🐒*

एक दार्शनिक अपने एक शिष्य के साथ कहीं से गुजर रहा था। चलते-चलते वे एक खेत के पास पहुंचे। खेत अच्छी जगह स्थित था लेकिन उसकी हालत देखकर लगता था मानो उसका मालिक उस पर जरा भी ध्यान नहीं देता है।

खैर, दोनों को प्यास लगी थी सो वे खेत के बीचो-बीच बने एक टूटे-फूटे घर के सामने पहुंचे और दरवाज़ा खटखटाया।

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अन्दर से एक आदमी निकला, उसके साथ उसकी पत्नी और तीन बच्चे भी थे। सभी फटे-पुराने कपड़े पहने हुए थे।

दार्शनिक बोला, “ श्रीमान, क्या हमें पानी मिल सकता है? बड़ी प्यास लगी है!”

“ज़रूर!”, आदमी उन्हें पानी का जग थमाते हुए बोला।

“मैं देख रहा हूँ कि आपका खेत इनता बड़ा है पर इसमें कोई फसल नही बोई गयी है, और ना ही यहाँ फलों के वृक्ष दिखायी दे रहे हैं…तो आखिर आप लोगों का गुजारा कैसे चलता है?”, दार्शनिक ने प्रश्न किया।

“जी, हमारे पास एक भैंस है, वो काफी दूध देती है ।उसका दूध पास के गाँव में बेच कर कुछ पैसे मिल जाते हैं और बचे हुए दूध का सेवन कर के हमारा गुजारा चल जाता है।”, आदमी ने समझाया।

दार्शनिक और शिष्य आगे बढ़ने को हुए तभी आदमी बोला, “ शाम काफी हो गयी है, आप लोग चाहें तो आज रात यहीं रुक जाएं!”

दोनों रुकने को तैयार हो गए।

आधी रात के करीब जब सभी गहरी नींद में सो रहे थे तभी दार्शनिक ने शिष्य को उठाया और बोला, “चलो हमें अभी यहाँ से चलना है, और चलने से पहले हम उस आदमी की भैंस को चट्टान से गिराकर मार डालेंगे।”

शिष्य को अपने गुरु की बात पर यकीन नहीं हो रहा था पर वो उनकी बात काट भी नहीं सकता था।

दोनों भैंस को मार कर रातों-रात गायब हो गए!

यह घटना शिष्य के जेहन में बैठ गयी और करीब 10 साल बाद जब वो एक सफल उद्यमी बन गया तो उसने सोचा क्यों न अपनी गलती का पश्चाताप करने के लिए एक बार फिर उसी आदमी से मिला जाए और उसकी आर्थिक मदद की जाए।

अपनी चमचमाती कार से वह उस खेत के सामने पहुंचा।

शिष्य को अपनी आँखों पे यकीन नहीं हो रहा था। वह उजाड़ खेत अब फलों के बागीचे में बदल चुका था… टूटे-फूटे घर की जगह एक शानदार बंगला खड़ा था और जहाँ अकेली भैंस बंधी रहती थी वहां अच्छी नस्ल की कई गाएं और भैंस अपना चारा चर रही थीं।

शिष्य ने सोचा कि शायद भैंस के मरने के बाद वो परिवार सब बेच-बाच कर कहीं चला गया होगा और वापस लौटने के लिए वो अपनी कार स्टार्ट करने लगा कि तभी उसे वो दस साल पहले वाला आदमी दिखा।

“ शायद आप मुझे पहचान नहीं पाए, सालों पहले मैं आपसे मिला था।”, शिष्य उस आदमी की तरफ बढ़ते हुए बोला।

“नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, मुझे अच्छी तरह याद है, आप और आपके गुरु यहाँ आये थे…कैसे भूल सकता हूँ उस दिन को; उस दिन ने तो मेरा जीवन ही बदल कर रख दिया। आप लोग तो बिना बताये चले गए पर उसी दिन ना जाने कैसे हमारी भैंस भी चट्टान से गिरकर मर गयी। कुछ दिन तो समझ ही नहीं आया कि क्या करें, पर जीने के लिए कुछ तो करना था, सो लकड़ियाँ काट कर बेचने लगा, उससे कुछ पैसे हुए तो खेत में बोवाई कर दी… सौभाग्य से फसल अच्छी निकल गयी, बेचने पर जो पैसे मिले उससे फलों के बगीचे लगवा दिए और यह काम अच्छा चल पड़ा और इस समय मैं आस-पास के हज़ार गाँव में सबसे बड़ा फल व्यापारी हूँ…सचमुच, ये सब कुछ ना होता अगर उस भैंस की मौत ना हुई होती !

“लेकिन यही काम आप पहले भी कर सकते थे?”, शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।

आदमी बोला, “ बिलकुल कर सकता था! पर तब ज़िन्दगी बिना उतनी मेहनत के आराम से चल रही थी, कभी लगा ही नहीं कि मेरे अन्दर इतना कुछ करने की क्षमता है सो कोशिश ही नहीं की पर जब भैंस मर गयी तब हाथ-पाँव मारने पड़े और मुझ जैसा गरीब-बेहाल इंसान भी इस मुकाम तक पहुँच पाया।”

आज शिष्य अपने गुरु के उस निर्देश का असली मतलब समझ चुका था और बिना किसी पश्चाताप के वापस लौट पा रहा था।

*करने योग्य*
*भव्य आत्माओं, कई बार हम परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि बस उसी में जीना सीख लेते हैं, फिर चाहे वो परिस्थितियां बुरी ही क्यों न हों!*
*हम अपनी जॉब से नफरत करते हैं पर फिर भी उसे पकड़े-पकड़े ज़िन्दगी बिता देते हैं, तो कई बार हम बस इसलिए नये व्यवसाय के बारे में नहीं सोचते क्योंकि हमारा मौजूदा बिजनेस दाल-रोटी भर का खर्चा निकाल देता है! पर ऐसा करने में हम कभी भी अपनी पूरी क्षमता का आभास नहीं कर पाते हैं और बहुत सी ऐसी चीजें करने से चूक जाते हैं जिन्हें करने की हमारे अन्दर क्षमता है और जो हमारी जिंदगी को कहीं बेहतर बना सकती हैं।*
*सोचिये, कहीं आपकी ज़िन्दगी में भी तो कोई ऐसी भैंस नहीं जो आपको एक बेहतर ज़िन्दगी जीने से रोक रही है…कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको लग रहा है कि आपने उस भैंस को बाँध कर रखा है जबकि असलियत में उस भैंस ने आपको बाँध रखा है! और अगर आपको लगे कि ऐसा है, तो आगे बढिए…हिम्मत करिए, अपनी रस्सी को काटिए; आजाद होइए… आपके पास खोने के लिए बहुत थोड़ा है पर पाने के लिए पूरा जहान है! जाइए उसे पाकर दिखाइए! ।आपको अपनी क्षमताओं को पहचान कर सभी प्रकार की योजनाओं को समझकर अपनी शक्तिनुसार कार्य प्रारंभ करना चाहिए।*

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सोमवार, 26 सितंबर 2022

परिस्थितियों का राक्षस

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महाभारत काल की बात है। एक बार कृष्ण और बलराम किसी जंगल से गुजर रहे थे। चलते-चलते काफी समय बीत गया और अब सूरज भी लगभग डूबने वाला था। अँधेरे में आगे बढना संभव नहीं था, इसलिए कृष्ण बोले, “ बलराम, हम ऐसा करते हैं कि अब सुबह होने तक यहीं ठहर जाते हैं, भोर होते ही हम अपने गंतव्य की और बढ़ चलेंगे।”

बलराम बोले, “ पर इस घने जंगल में हमें खतरा हो सकता है, यहाँ सोना उचित नहीं होगा, हमें जाग कर ही रात बितानी होगी।”

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️

“अच्छा, हम ऐसा करते हैं कि पहले मैं सोता हूँ और तब तक तुम पहरा देते रहो, और फिर जैसे ही तुम्हे नींद आये तुम मुझे जगा देना; तब मैं पहरा दूंगा और तुम सो जाना।”, कृष्ण ने सुझाव दिया।

बलराम तैयार हो गए।

कुछ ही पलों में कृष्ण गहरी नींद में चले गए और तभी बलराम को एक भयानक आकृति उनकी ओर आती दिखी, वो कोई राक्षस था।

राक्षस उन्हें देखते ही जोर से चीखा और बलराम बुरी तरह डर गए  ।

इस घटना का एक विचित्र असर हुआ- भय के कारण बलराम का आकार कुछ छोटा हो गया और राक्षस और विशाल हो गया।

उसके बाद राक्षस एक बार और चीखा और पुन: बलराम डर कर काँप उठे, अब बलराम और भी सिकुड़ गए और राक्षस पहले से भी बड़ा हो गया।

राक्षस धीरे-धीरे बलराम की और बढ़ने लगा, बलराम पहले से ही भयभीत थे, और उस विशालकाय राक्षस को अपनी और आता देख जोर से चीख पड़े –“कृष्णा…” ,और चीखते ही वहीँ मूर्छित हो कर गिर पड़े।

बलराम की आवाज़ सुन कर कृष्ण उठे, बलराम को वहां देख उन्होंने सोचा कि बलराम पहरा देते-दते थक गए और सोने से पहले उन्हें आवाज़ दे दी।

अब कृष्ण पहरा देने लगे।

कुछ देर बाद वही राक्षस उनके सामने आया और जोर से चीखा।

कृष्ण जरा भी घबराए नही और बोले, “बताओ तुम इस तरह चीख क्यों रहे हो, क्या चाहिए तुम्हे?”

इस बार भी कुछ विच्त्र घटा- कृष्ण के साहस के कारण उनका आकार कुछ बढ़ गया और राक्षस का आकर कुछ घट गया।

राक्षस को पहली बार कोई ऐसा मिला था जो उससे डर नहीं रहा था। घबराहट में वह पुन: कृष्ण पर जोर से चीखा!


इस बार भी कृष्ण नहीं डरे और उनका आकर और भी बड़ा हो गया जबकि राक्षस पहले से भी छोटा हो गया।

एक आखिरी प्रयास में राक्षस पूरी ताकत से चीखा पर कृष्ण मुस्कुरा उठे और फिर से बोले, “ बताओ तो क्या चाहिए तुम्हे?”

फिर क्या था राक्षस सिकुड़ कर बिलकुल छोटा हो गया और कृष्ण ने उसे हथेली में लेकर अपनी धोती में बाँध लिया और फिर  कमर में खोंस कर रख लिया।

कुछ ही देर में सुबह हो गयी, कृष्ण ने बलराम को उठाया और आगे बढ़ने के लिए कहा! वे धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे तभी बलराम उत्तेजित होते हुए बोले, “पता है कल रात में क्या हुआ था, एक भयानक राक्षस हमे मारने आया था!”

“रुको-रुको”, बलराम को बीच में ही टोकते हुए कृष्ण ने अपनी धोती में बंधा राक्षस निकाला  और बलराम को दिखाते हुए बोले, “कहीं तुम इसकी बात तो नहीं कर रहे हो?”

“हाँ, ये वही है। पर कल जब मैंने इसे देखा था तो ये बहुत बड़ा था, ये इतना छोटा कैसे हो गया?”, बलराम आश्चर्यचकित होते हुए बोले।

कृष्ण बोले, “ जब जीवन में तुम किसी ऐसी चीज से बचने की कोशिश करते हो जिसका तुम्हे सामना करना चाहिए तो वो तुमसे बड़ी हो जाती है और तुम पर नियंत्रण करने लगती है लेकिन जब तुम उस चीज का सामना करते हो जिसका सामना तुम्हे करना चाहिए तो तुम उससे बड़े हो जाते हो और उसे नियंत्रित करने लगते हो!”

*🔔⏰करने योग्य ⏰🔔*

 *🕉️🌞👪↔️🪜 भव्य आत्माओं, ये राक्षस दरअसल, हमारे जीवन में आने वाले संघर्ष हैं, विपरीत स्थितियां हैं, जीवन की समस्यायें हैं! अगर हम इन परिस्थितियों को नजरअंदाज करते रहते हैं तो ये समस्याएं और भी बड़ी होती चली जाती हैं और अपने आप हमें नियंत्रित करने लगती हैं लेकिन अगर हम इनका सामना करते हैं, हिम्मत के साथ इनका सामना करते हैं तो यही समस्याएं धीरे-धीरे छोटी होती चली जाती हैं और अंत मैं हम उनपर काबू पा लेते हैं। आज हमनें अपने विचारों के माध्यम से स्वयं की कामयाबी में अनेक प्रकार के पहाड़ खड़े कर लिए है।उन पहाड़ों के कारण हमारे अंदर जो शक्ति विद्यमान है उसे हम प्रगट नहीं होने दे रहे।इन पहाड़ों को समाप्त करने के लिए आप आप प्रतिदिन 24 मिनट ओम का नाद करें।इसलिए जब कभी भी जीवन में ऐसी समस्या आएं जिनका सामना आपको करना ही चाहिए तो उसे अवॉयड मत करिए…जिसे फेस करना है उसे फेस करिए, उससे बचने की कोशिश मत करिए, जब आप ऐसा करेंगे तो देखते-देखते ही वे समस्याएं इतनी छोटी हो जायेंगी कि आप आराम से उनपर नियंत्रण कर सकेंगे और उन्हें हमेंशा-हमेशा के लिए ख़त्म कर सकेंगे!*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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रविवार, 25 सितंबर 2022

प्रेरणादायक प्रसंग

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒 प्रेरणादायक प्रसंग ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️ 1.कल आश्विन शुक्ल एकम 26 सितम्बर 2022   सोमवार  को 22 वें तीर्थंकर 1008 श्री नेमिनाथ भगवान का ज्ञान कल्याणक  महोत्सव हैं।*

*🕉️✍️यह कल्याणक की तिथि उत्तर पुराण के अनुसार प्रमाणित है।इस तिथि के अनुसार विश्व के सभी देशों में दिगंबर आम्नाय वाले उत्सव मनाते है।🐒✍️*

*👨‍👩‍👧‍👦आपसभी सपरिवार , इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार उत्सव कर जीवन सफल करें।*

छोटी-छोटी घटनाएं कई बार बहुत बड़ी सीख दे जाती हैं। आज हम आपके साथ ऐसे ही तीन प्रेरक प्रसंग share कर रहे हैं जो हमें बहुत अच्छी सीख देते हैं।

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-भव्य महान आत्माओं आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कहानियों से कुछ धर्म के आत्मकल्याण के संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से शुभफल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक शुभफल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

*प्रेरक प्रसंग १ –  स्वर्ग- नरक*
शास्त्रों में निपुण, प्रसिद्ध ज्ञानी एवं प्रख्यात संत श्री देवाचार्य के शिष्य का नाम महेन्द्रनाथ था। एक शाम महेन्द्रनाथ अपने साथियों के साथ उद्यान में टहल रहे थे। और आपस में वे किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। चर्चा का विषय था- स्वर्ग-नरक। किसी एक साथी ने महेन्द्रनाथ से पूछा- “क्यों मित्र! क्या मैं स्वर्ग जाऊंगा?”

महेन्द्रनाथ ने उत्तर देते हुए कहा- “जब मैं जायेगा, तभी आप स्वर्ग जाओगे।” उसके मित्र ने सोचा कि महेन्द्रनाथ को अभिमान हो गया है और सारे मित्रों ने मिलकर महेन्द्रनाथ की शिकायत अपने गुरु श्री देवाचार्य से कर दी।

गुरुदेव को पता था कि उनका शिष्य महेन्द्रनाथ न केवल निरहंकारी है बल्कि अल्प शब्दों में गंभीर ज्ञान की बातें बोलने वाला है। उन्होंने महेन्द्रनाथ को बुलाकर इस घटना के बारे में पूछा, और उसने अपना सिर हिलाकर इस बात की पुष्टि की। अन्य शिष्यों में इस घटना को देखने के बाद कानाफूसी शुरू हो गयी। श्री देवाचार्य ने मुस्कुराते हुए दोबारा वही प्रश्न पूछा- “अच्छा ये बताओ महेन्द्रनाथ! क्या तुम स्वर्ग जाओगे?” महेन्द्रनाथ ने कहा- “गुरुदेव! जब मैं जायेगा, तभी तो मैं स्वर्ग जा पाउँगा। “

श्री देवाचार्य शिष्यों को समझाते हुए बोले- “शिष्यों, इनके कहने का मतलब है जब “मैं” जाएगा यानि जब अहंकार जायेगा, तभी तो हम स्वर्ग के अधिकारी बन पाएंगे। जब-जब आपके मन में ये बातें आएंगी कि मैंने ऐसा किया, मैंने इतने पुण्य किये, मैंने सब किया। उस स्थिति में स्वर्ग के बारे में सोचना भी गलत है।

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*प्रेरक प्रसंग २ –  माँ की सीख*
ईश्वरचंद विद्यासागर के बचपन की यह एक सच्ची घटना है। एक सवेरे उनके घर के द्वार पर एक भिखारी आया। उसको हाथ फैलाये देख उनके मन में करुणा उमड़ी। वे तुरंत घर के अंदर गए और उन्होंने अपनी माँ से कहा कि वे उस भिखारी को कुछ दे दें। माँ के पास उस समय कुछ भी नहीं था सिवाय उनके कंगन के। उन्होंने अपना कंगन उतारकर ईश्वरचंद विद्यासागर के हाथ में रख दिया और कहा-” जिस दिन तुम बड़े हो जाओगे, उस दिन मेरे लिए दूसरा बनवा देना अभी इसे बेचकर जरूरतमंदों की सहायता कर दो।”

बड़े होने पर ईश्वरचंद विद्यासागर ने अपनी पहली कमाई से अपनी माँ के लिए सोने के कंगन बनवाकर ले गए और उन्होंने माँ से कहा- माँ! आज मैंने बचपन का तुम्हारा कर्ज उतार दिया । उनकी माँ ने कहा- “बेटे! मेरा कर्ज तो उस दिन उतर पायेगा, जिस दिन किसी और जरूरतमंद के लिए मुझे ये कंगन दोबारा नहीं उतारने होंगे। “
*https://t.me/Hindishayriya*
माँ की सीख ईश्वरचंद विद्यासागर के दिल को छू गयीं और उन्होंने प्रण किया कि वे अपना जीवन गरीब-दुखियों की सेवा करने और उनके कष्ट हरने में व्यतीत करेंगे और उन्होंने अपना सारा जीवन ऐसा ही किया।

महापुरूषों के जीवन कभी भी एक दिन में तैयार नहीं होते। अपना व्यक्तित्व गढ़ने के लिए वे कई कष्ट और कठिनाइयों के दौर से गुजरते हैं और हर महापुरूष का जीवन कहीं न कहीं अपनी माँ की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित रहता है।

*प्रेरक प्रसंग ३ – बरगद का पेड़*
किसी गांव में बरगद का एक पेड़ बहुत वर्षों से खड़ा था। गांव के सभी लोग उसकी छाया में बैठते थे, गांव की महिलाएं त्यौहारों पर उस वृक्ष की पूजा किया करती थीं। ऐसे ही समय बीतता गया। और कई वर्षों बाद वृक्ष सूखने लगा। उसकी शाखाएं टूटकर गिरने लगीं और उसकी जड़ें भी अब कमजोर हो चुकी थीं। गांववालों ने विचार किया कि अब इस पेड़ को काट दिया जाये और इसकी लकड़ियों से गृहविहीन लोगों के लिए झोपड़ियों का निर्माण किया जाये।

गांववालों को आरी-कुल्हाड़ी लाते देख, बरगद के पास खड़ा एक वृक्ष बोला- “दादा! आपको इन लोगों की प्रवृत्ति पर जरा भी क्रोध नहीं आता, ये कैसे स्वार्थी लोग हैं, जब इन्हें आपकी आवश्यकता थी तब ये आपकी पूजा किया करते थे, लेकिन आज आपको टूटते हुए देखकर काटने चले हैं।”

बूढ़े बरगद ने जवाब दिया- “नहीं बेटे! मैं तो यह सोचकर बहुत प्रसन्न हूँ कि मरने के बाद भी मैं आज किसी के काम आ सकूंगा। ” असल बात यह है कि परोपकारी व्यक्ति सदा दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं और उनकी ख़ुशी और उनके सुख में अपना सुख समझते हैं।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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शनिवार, 24 सितंबर 2022

असली गुण

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒असली गुण  ✍️🐒*
*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️ 1. आश्विन शुक्ल एकम 26 सितम्बर 2022   सोमवार  को 22 वें तीर्थंकर 1008 श्री नेमिनाथ भगवान का ज्ञान कल्याणक  महोत्सव हैं।*

*🕉️✍️यह कल्याणक की तिथि उत्तर पुराण के अनुसार प्रमाणित है।इस तिथि के अनुसार विश्व के सभी देशों में दिगंबर आम्नाय वाले उत्सव मनाते है।🐒✍️*

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👉🏾एक _नौजवान_ शिष्य अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला , ” गुरु जी एक बात समझ नहीं आती , आप इतने साधारण वस्त्र क्यों पहनते हैं …इन्हे देख कर लगता ही नहीं कि आप एक ज्ञानी व्यक्ति हैं जो सैकड़ों शिष्यों को शिक्षित करने का महान कार्य करता है ।

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गुरु जी मुस्कुराये ।फिर उन्होंने अपनी ऊँगली से एक अंगूठी निकाली और शिष्य को देते हुए बोले , ” मैं तुम्हारी जिज्ञासा अवश्य शांत करूँगा लेकिन पहले तुम मेरा एक छोटा सा काम कर दो … इस अंगूठी को लेकर बाज़ार जाओ और किसी सब्जी वाले या ऐसे ही किसी दुकानदार को इसे बेच दो … बस इतना ध्यान रहे कि इसके बदले कम से कम सोने की एक अशर्फी ज़रूर लाना ।

शिष्य फ़ौरन उस अंगूठी को लेकर बाज़ार गया पर थोड़ी देर में अंगूठी वापस लेकर लौट आया ।

“क्या हुआ , तुम इसे लेकर क्यों लौट आये ?”, गुरु जी ने पुछा .

” गुरु जी , दरअसल , मैंने इसे सब्जी वाले , किराना वाले , और अन्य दुकानदारों को बेचने का प्रयास किया पर कोई भी इसके बदले सोने की एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ …”

गुरु जी बोले , ” अच्छा कोई बात नहीं अब तुम इसे लेकर किसी जौहरी के पास जाओ और इसे बेचने की कोशिश करो …”

शिष्य एक बार फिर अंगूठी लेकर निकल पड़ा , पर इस बार भी कुछ ही देर में वापस आ गया .

“क्या हुआ , इस बार भी कोई इसके बदले एक अशर्फी भी देने को तैयार नहीं हुआ ?”, गुरूजी ने पुछा .

शिष्य के हाव -भाव कुछ अजीब लग रहे थे , वो घबराते हुए बोला , ” अरे … नहीं गुरु जी , इस बार मैं जिस किसी जौहरी के पास गया सभी ने ये कहते हुए मुझे लौटा दिया की यहाँ के सारे जौहरी मिलकर भी इस अनमोल हीरे को नहीं खरीद सकते इसके लिए तो लाखों अशर्फियाँ भी कम हैं …”

“यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है ” , गुरु जी बोले , ” जिस प्रकार ऊपर से देखने पर इस अनमोल अंगूठी की कीमत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता उसी प्रकार किसी व्यक्ति के वस्त्रों को देखकर उसे  आँका नहीं जा सकता ‌।व्यक्ति की विशेषता जानने के लिए उसे भीतर से देखना चाहिए , बाह्य आवरण तो कोई भी धारण कर सकता है लेकिन आत्मा की शुद्धता और ज्ञान का भण्डार तो अंदर ही छिपा होता है। “

शिष्य की जिज्ञासा शांत हो चुकी थी . वह समझ चुका था कि बाहरी वेश-भूषा से व्यक्ति की सही पहचान नहीं हो सकती , जो बात मायने रखती है वो ये कि व्यक्ति भीतर से कैसा है !

*🔔करने योग्य🔔*
*⏰↔️👪🙏भव्य आत्माओं, हमें कभी भी किसी को सिर्फ इसलिए छोटा नहीं समझना चाहिए क्योंकि उसने अच्छे कपड़े नहीं पहने या किसी को सिर्फ इसलिए बहुत बड़ा नहीं समझना चाहिए क्योंकि वो बहुत अच्छे से कपड़ें पहन रखे  है । इंसान का असली गुण तो उसके भीतर होता है और वही उसे अच्छा या बुरा बनाता है । अतः हमसभी को अपने असली गुणों को अपने सदाचारी आचरण से प्रगट कर स्वयं का विश्व में स्थान सुरक्षित करना चाहिए।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

मित्रता ऐसी हो

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒 मित्रता ऐसी हो ✍️🐒*

एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि, बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है।
सुबह हुई। राजा सोकर उठा। और सपने की बात अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा।


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*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवास स्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️

सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया।
शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें।
रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था।
इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते।
यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया।
राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सदव्यवहार  ने मुझे परास्त कर दिया।
अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया।
*⏰करने योग्य🪜*
*🔔🪜👪↔️यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने का उपाय रखता है। यदि व्यक्ति का व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है। अतः हमसभी को अपने अंदर से अन्य जीवों के प्रति जो हमनें शत्रुता बनाई है।उसे यथाशीघ्र अपने अंतर मन से समाप्त करें।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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गुरुवार, 22 सितंबर 2022

नन्ही चिड़िया का प्रयास

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 नन्ही चिड़िया का प्रयास*

सर्दियाँ आने को थीं और चिंकी चिड़िया का घोंसला पुराना हो चुका था। उसने सोचा चलो एक नया घोंसला बनाते हैं ताकि ठण्ड के दिनों में कोई दिक्कत न हो।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचांकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्षमार्ग को सुरक्षित करें ।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️

अगली सुबह वो उठी और पास के एक खेत से चुन-चुन कर तिनके लाने लगी। सुबह से शाम तक वो इसी काम में लगी और अंततः एक शानदार घोंसला तैयार कर लिया। पर पुराने घोंसले से अत्यधिक लगाव होने के कारण उसने सोचा चलो आज एक आखिरी रात उसी में सो लेते हैं और कल से नए घोंसले में अपना आशियाना बनायेंगे। रात में चिंकी चिड़िया वहीँ सो गयी।

अगली सुबह उठते ही वो अपने नए घोंसले की तरफ उड़ी, पर जैसे ही वो वहां पहुंची उसकी आँखें फटी की फटी रही गयीं; किसी और चिड़िया ने उसका घोंसला तहस-नहस कर दिया था। चिंकी की आँखें भर आयीं, वो मायूस हो गयी, आखिर उसने बड़े मेहनत और लगन से अपना घोंसला बनाया था और किसी ने रातों-रात उसे तबाह कर दिया था।

पर अगले ही पल कुछ अजीब हुआ, उसने गहरी सांस ली, हल्का सा मुस्कुराई और एक बार फिर उस खेत से जाकर तिनके चुनने लगी। उस दिन की तरह आज भी उसने सुबह से शाम तक मेहनत की और एक बार फिर एक नया और बेहतर घोंसला तैयार कर लिया।

जब हमारी मेहनत पर पानी फिर जाता है तो हम क्या करते हैं – शिकायत करते हैं,  दुनिया से इसका रोना रोते हैं,  लोगों को कोसते हैं और अपनी भड़ास  निकालने के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं पर हम एक चीज नहीं करते – हम फ़ौरन उस बिगड़े हुए काम को दुबारा सही करने का प्रयास नहीं करते। और चिंकी चिड़िया की ये छोटी सी कहानी हमें ठीक यही करने की सीख देती है।

घोंसला उजड़ जाने के बाद वो चाहती तो अपनी सारी उर्जा औरों से लड़ने, शिकायत करने और बदला लेने का सोचने में लगा देती। पर उसने ऐसा नहीं किया, बल्कि उसी उर्जा से फिर से एक नया घोंसला तैयार कर लिया।

*🔔करने योग्य 🔔*
*🕉️🔔↔️ भव्य आत्माओं, जब हमारे साथ कुछ बहुत बुरा हो तो हम न्याय पाने का प्रयास ज़रुर करें, पर साथ ही ध्यान रखें कि कहीं हम अपनी सारी ऊर्जा; निराशा, गुस्से और शिकायत में ही न गँवा दें। ऐसा करना हमें हमारे original loss से कहीं ज्यादा नुक्सान पहुंचा सकता है। और मैं तो ये भी कहूँगा कि अगर कोई बहुत बड़ी बात न हुई हो तो उसे अनदेखा करते हुए अपने काम में पुन: लग जाएं। क्योंकि बड़े काम करने के लिए ये ज़िन्दगी छोटी है, इसे बेकार की चीजों में नहीं गंवाया जाना चाहिए।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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बुधवार, 21 सितंबर 2022

भारतीय राजनीति

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒 भारतीय राजनीति✍️🐒*

एक छोटे से गाँव में भोलू नाम का एक गधा रहता था। वह गाँव बाकी दुनिया से बिलकुल कटा हुआ था, न वहां कोई आता था और न वहां से कोई कहीं जाता था।

एक बार गधे ने सोचा क्यों ना जंगल के उस पार जाकर देखा जाए कि आखिर उस तरफ है क्या?

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अगले दिन भोर में ही वह जंगल की ओर बढ़ चला।

जंगल घना था और गधा मूर्ख। बिना सोचे समझे उसे जिधर मन करता उधर चल पड़ता। जैसे-तैसे करके उसने जंगल पार किया और दूसरी छोर पर स्थित एक और गाँव पहुँच गया।

उधर गाँव में हल्ला मच गया कि भोलू गधा गाँव छोड़ कर चला गया है, सब बात करने लगे कि वो कितना भाग्यशाली है, और अब कितनी आराम की ज़िन्दगी जी रहा होगा। लोगों की बात सुनकर कुत्तों  के एक झुण्ड ने भी जंगल पार करने का निश्चय किया।

अगली सुबह वह गधे की गंध का पीछा करते हुए उसी रास्ते से जंगल के उस पार चले गए।

फिर क्या था, गाँव के अन्य पशुओं में भी जंगल पार करने की होड़ सी लग गयी और सभी गधे द्वारा खोजे गए रास्ते पर चलते हुए जंगल पार करने लगे।

बार-बार उस रास्ते पर चलने से एक पगडण्डी सी बन गयी और कुछ सालों बाद इंसान भी उसी रास्ते को पकड़ कर जंगल पार करने लगे । समय बीतता गया और धीरे-धीरे  गाँव की आबादी काफी बढ़ गयी। तब सरकार ने जंगल पार करने के लिए एक रोड बनाने का निर्णय लिया गया।

शहर से इंजीनियरों का एक दल आया और इलाके की स्टडी करने लगा।

गाँव वालों ने बताया कि जंगल पार करने के लिए एक पगडण्डी बनी हुई है उसी पर अगर रोड बना दी जाए तो अच्छा रहेगा।

उनकी बात सुनकर चीफ इंजीनियर थोडा मुस्कुराया और बोला, “ क्या मैं जान सकता हूँ ये पगडण्डी किसने बनायी ?”

गाँव के एक बुजुर्ग बोले, “जहाँ तक मुझे पता है ये रास्ता किसी गधे ने खोजा था !”, और उसने पूरी कहानी कह सुनाई ।

उनकी बात सुनने के बाद चीफ इंजीनियर बोले, “मुझे यकीन नहीं होता कि आप सब इंसान होंते हुए भी इतने सालों से एक गधे के बनाये रास्ते पर चल रहे थे…पता है ये रास्ता कितना कठिन और लम्बा है जबकि हमने जो रास्ता खोजा है वो इसका एक चौथाई भी नहीं है और उसे पार करना भी कहीं आसान है। ”

आज गाँव वालों को अपनी गलती का एहसास हो रहा था, वे सोच रहे थे कि काश उन्होंने एक नया रास्ता खोजने का प्रयास किया होता!

*हमारा आवश्यक कार्य*
*भव्य आत्माओं, जो गलती उन गाँव वालों ने की कहीं वही गलती हम भी तो नहीं कर रहे हैं? कहीं हम किसी गधे के दिखाए रास्ते पर चल कर अपना जीवन बर्वाद तो नहीं कर रहे हैं? क्या आज हम जो भी काम या पढाई कर रहे हैं वो हमारे अपने लगाव के मुताबिक है या बस समाज और घरवालों के दबाव में हम अपना रास्ता ढूँढने से हिचक रहे हैं? कहीं हमें भी अपना रास्ता खोजने की आवश्यकता तो नहीं?*
*अगर हमे एक अर्थ पूर्ण जीवन जीना है तो हमें इन प्रश्नों का उत्तर देना होगा, वरना उस इंजीनियर की तरह एक दिन हमें भी कोई मिलेगा और बताएगा कि हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी एक गधे का रास्ता पकड़े-पकड़े बर्बाद कर दी।आज हमें स्वयं को, परिवार को,समाज को,राष्ट्र को सुरक्षित करना है तो हमें अपने किमती वोट को पार्टी या व्यक्ति विशेष को ना देकर जो हमारी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करें ।उसे देकर भारत के विकास में सहयोगी बनना चाहिए।वह चुनाव वार्ड , नगर पालिका या किसी भी स्तर का हो हमें सजगता पूर्वक अपने भारत के विकास में बहुमूल्य स्वयं के वोट का इस्तेमाल सोच समझकर करना है। योग्य उम्मीदवार ना हो तो हमें नोटा बटन का इस्तेमाल करना चाहिए।*

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*जैनम जयतु शासनम*
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हमारे बाबूजी

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒हमारे बाबूजी↔️👳‍♀️*


दौड़ते-भागते  बाबूजी जैसे ही ऑफिस पहुँच डायरेक्टर के मुंहलगे चपरासी ने उन्हें बताया- “सर ने आपको आते ही मिलने के लिए कहा है.”डरते-डरते जैसे ही वे कैबिन में घुसे, डायरेक्टर साहब एकदम से बरस पड़े- ”  बाबूजी, इससे पहले कि आप एक नई कहानी सुनाएँ, मैं अपको स्पष्ट कह देता हूँ कि आप आज आराम करिए। छुट्टी का एप्लीकेशन दीजिए और जितनी समाजसेवा करनी है, कीजिए। तंग आ चुका हूँ मैं आपकी परोपकार कथा सुन-सुनकर। क्या फ़र्क पड़ता है आपकी समाजसेवा से ? यदि नौकरी करनी है तो ढंग से कीजिए।”

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शर्मा जी डायरेक्टर साहब के आदेशानुसार उस दिन की छुट्टी का एप्लीकेशन देकर ऑफिस से बाहर आकर सोचने लगे- “अभी से घर जाकर क्या कर लूँगा। क्यों न हॉस्पीटल जाकर उस बच्चे की हालचाल पता कर लूँ, जिसे किसी दुर्घटना के कारण सड़क में पड़े हालत में देखकर अस्पताल पहुँचाने के चक्कर में ऑफिस देर से पहुँचा और साहब की डाँट खाई। शायद अब तक उसे होश भी आ गया हो।” अनायस ही उनके कदम अस्पताल की ओर चल पडे। जैसे ही वे अस्पताल पहुँचे, डॉक्टर ने उन्हें बताया कि बच्चे को होश आ गया है और उसके मम्मी-पापा भी आ चुके हैं।

“आइए, आपको मिलवाता हूँ उनसे… इनसे मिलिए,  बाबूजी, जिन्होंने आज सुबह आपके बच्चे को यहाँ एडमिट कराया है। यदि समय पर ये बच्चे को यहां नहीं लाते और अपना खून नहीं दिये होते, तो कुछ भी हो सकता था।”

“सर आप… ? ये आपका बेटा…?”

सामने डायरेक्टर साहब थे, हाथ जोड़कर खड़े। काटो तो खून नहीं। बोले- “ बाबूजी, हो सके तो मुझे माफ कर दीजिएगा। मैंने आपको बहुत गलत समझा पर अब मैं जान चुका हूँ कि फ़र्क तो बहुत पड़ता है आपकी समाजसेवा से।

#और कहा भी है...

*"परोपकार के लिए ही वृक्ष फल देते हैं,नदीयाँ परोपकार के लिए ही बहती हैं और गाय परोपकार के लिए ही दूध देती हैं अर्थात् यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है !"*

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*जैनम जयतु शासनम*
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बुधवार, 14 सितंबर 2022

मेरी वाणी

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒मेरी  वाणी👨‍👩‍👧‍👦🔔*

*🔔आज हम सभी इस कहानी के माध्यम से स्वयं को 84 लाख योनियों मे कहा ले जा रहे है।इस बात को स्वयं समझ सकते है।*

दास प्रथा के दिनों में एक मालिक के पास अनेकों गुलाम हुआ करते थे। उन्हीं में से एक था लुक़मान।

लुक़मान था तो सिर्फ एक गुलाम लेकिन वह बड़ा ही चतुर और बुद्धिमान था। उसकी ख्याति दूर दराज़ के इलाकों में फैलने लगी थी।

एक दिन इस बात की खबर उसके मालिक को लगी, मालिक ने लुक़मान को बुलाया और कहा- सुनते हैं, कि तुम बहुत बुद्धिमान हो। मैं तुम्हारी बुद्धिमानी की परीक्षा लेना चाहता हूँ। अगर तुम इम्तिहान में पास हो गए तो तुम्हें गुलामी से छुट्टी दे दी जाएगी। अच्छा जाओ, एक मरे हुए बकरे को काटो और उसका जो हिस्सा बढ़िया हो, उसे ले आओ।

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लुक़मान ने आदेश का पालन किया और मरे हुए बकरे की जीभ लाकर मालिक के सामने रख दी।

कारण पूछने पर कि जीभ ही क्यों लाया ! लुक़मान ने कहा- अगर शरीर में जीभ अच्छी हो तो सब कुछ अच्छा-ही-अच्छा होता है।

मालिक ने आदेश देते हुए कहा- “अच्छा! इसे उठा ले जाओ और अब बकरे का जो हिस्सा बुरा हो उसे ले आओ।”

लुक़मान बाहर गया, लेकिन थोड़ी ही देर में उसने उसी जीभ को लाकर मालिक के सामने फिर रख दिया।

फिर से कारण पूछने पर लुक़मान ने कहा- “अगर शरीर में जीभ अच्छी नहीं तो सब बुरा-ही-बुरा है। “

उसने आगे कहते हुए कहा- “मालिक! वाणी तो सभी के पास जन्मजात होती है, परन्तु बोलना किसी-किसी को ही आता है…क्या बोलें? कैसे शब्द बोलें, कब बोलें.. इस एक कला को बहुत ही कम लोग जानते हैं। एक बात से प्रेम झरता है और दूसरी बात से झगड़ा होता है।

कड़वी बातों ने संसार में न जाने कितने झगड़े पैदा किये हैं। इस जीभ ने ही दुनिया में बड़े-बड़े कहर ढाये हैं।जीभ तीन इंच का वो हथियार है जिससे कोई छः फिट के आदमी को भी मार सकता है तो कोई मरते हुए इंसान में भी प्राण फूंक सकता है । संसार के सभी प्राणियों में वाणी का वरदान मात्र मानव को ही मिला है। उसके सदुपयोग से स्वर्ग पृथ्वी पर उतर सकता है और दुरूपयोग से स्वर्ग भी नरक में परिणत हो सकता है। भारत के विनाशकारी महाभारत का युद्ध वाणी के गलत प्रयोग का ही परिणाम था। “

मालिक, लुक़मान की बुद्धिमानी और चतुराई भरी बातों को सुनकर बहुत खुश हुए ; आज उनके गुलाम ने उन्हें एक बहुत बड़ी सीख दी थी और उन्होंने उसे आजाद कर दिया।

*🤝ग्रहण करने योग्य🤝*
*👨‍👩‍👧‍👦↔️🔔भव्य आत्माओं, मधुर वाणी एक वरदान है जो हमें लोकप्रिय बनाती है वहीँ कर्कश या तीखी बोली हमें अपयश दिलाती है और हमारी प्रतिष्ठा को कम करती है। आपकी वाणी कैसी है ? यदि वो तीखी है या सामान्य भी है तो उसे मीठा बनाने का प्रयास करिये। आपकी वाणी आपके व्यत्कित्व का प्रतिबिम्ब है , उसे अच्छा होना ही चाहिए।*

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मंगलवार, 13 सितंबर 2022

स्वशक्ती से चमत्कार

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒स्वशक्ती से चमत्कार👨‍👩‍👧‍👦💫*

*➡️🖥️👩‍🦰जबतक हम अपनी स्वशक्ती के  निमित्त से अपना पुरषार्थ नहीं करेंगे तबतक हमें योग्य सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।यही सृष्टि का नियम है।💪*

बरसात का मौसम था। एक बैलगाड़ी कच्ची सड़क पर जा रही थी। यह बैलगाड़ी श्यामू की थी। वह बड़ी जल्दी में था। हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी। श्यामू वर्षा के तेज़ होने से पहले घर पहुँचना चाहता था। बैलगाड़ी में अनाज के बोरे रखे हुए थे। बोझ काफ़ी था इसलिए बैल भी ज्यादा तेज़ नहीं दौड़ पा रहे थे।अचानक बैलगाड़ी एक ओर झुकी और रूक गई। हे भगवान, ये कौन-सी नई मुसीबत आ गई अब! श्यामू ने मन में सोचा।

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उसने उतरकर देखा। गाड़ी का एक पहिया गीली मिट्टी में धँस गया था। सड़क पर एक गड्ढ़ा था, जो बारिश के कारण और बड़ा हो गया था। आसपास की मिट्टी मुलायम होकर कीचड़ जैसी हो गई थी और उसी में पहिया फँस गया था। श्यामू ने बैलों को खींचा और खींचा फिर पूरी ताक़त से खींचा। बैलों ने भी पूरा ज़ोर लगाया लेकिन गाड़ी बाहर नहीं निकल पाई।

श्यामू को बहुत गुस्सा आया। उसने बैलों को पीटना शुरू कर दिया। इतने बड़े दो बैल इस गाड़ी को बाहर नहीं निकाल पा रहे हैं, यह बात उसे बेहद बुरी लग रही थी। हारकर वह ज़मीन पर ही बैठ गया। उसने ईश्वर से कहा,हे ईश्वर! अब आप ही कोई चमत्कार कर दो, जिससे कि यह गाड़ी बाहर आ जाए।

तभी उसे एक आवाज़ सुनाई दी, श्यामू ! ये तू क्या कर रहा है ?अरे, बैलों को पीटना छोड़ और अपने दिमाग का इस्तेमाल कर। गाड़ी में से थोड़ा बोझ कम कर। फिर थोड़े पत्थर लाकर इस गड्ढे को भर। तब बैलों को खींच। इनकी हालत तो देख। कितने थक गए हैं बेचारे!

श्यामू ने चारों ओर देखा। वहाँ आस-पास कोई नहीं था। श्यामू ने वैसा ही किया, जैसा उसने सुना था। पत्थरों से गड्ढा थोड़ा भर गया और कुछ बोरे उतारने से गाड़ी हल्की हो गई।

श्यामू ने बैलों को पुचकारते हुए खींचा - ज़ोर लगा के और एक झटके के साथ बैलगाड़ी बाहर आ गई। वही आवाज़ फिर सुनाई दी, देखा श्यामू, यह चमत्कार ईश्वर ने नहीं, तुमने खुद किया है।

*👉🏼ग्रहण करने योग्य:-*
*👨‍👩‍👧‍👦↔️भव्य आत्माओं , ईश्वरीय शक्ति का आशीर्वाद उन्हें ही प्राप्त होता है , जो अपनी स्वशक्ती का सकारात्मक प्रयोग स्वयं की सुरक्षा के लिए  करते हैं।*

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*जैनम जयतु शासनम*
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सोमवार, 12 सितंबर 2022

सकारात्मक शिक्षा

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒सकारात्मक शिक्षा🤝😛*

एक नन्हा परिंदा अपने परिवार-जनों से बिछड़ कर अपने आशियाने से बहुत दूर फुदकते हुए  आ गया था । उस नन्हे परिंदे को अभी उड़ान भरने अच्छे से नहीं आता था… उसने उड़ना सीखना अभी शुरू ही किया था ! उधर नन्हे परिंदे के परिवार वाले बहुत परेशान थे और उसके आने की राह देख रहे थे । इधर नन्हा परिंदा भी समझ नहीं पा रहा था कि वो अपने आशियाने तक कैसे पहुंचे?

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वह उड़ान भरने की काफी कोशिश कर रहा था पर बार-बार कुछ ऊपर उठ कर गिर जाता।

कुछ दूर से एक अनजान परिंदा अपने मित्र के साथ ये सब दृश्य बड़े गौर से देख रहा था । कुछ देर देखने के बाद वो दोनों परिंदे उस नन्हे परिंदे के करीब आ पहुंचे । नन्हा परिंदा उन्हें देख के पहले घबरा गया फिर उसने सोचा शायद ये उसकी मदद करें और उसे घर तक पहुंचा दें ।

अनजान परिंदा – क्या हुआ नन्हे परिंदे काफी परेशान हो ?

नन्हा परिंदा – मैं रास्ता भटक गया हूँ और मुझे शाम होने से पहले अपने घर लौटना है । मुझे उड़ान भरना अभी अच्छे से नहीं आता । मेरे घर वाले बहुत परेशान हो रहे होंगे । आप मुझे उड़ान भरना सीखा सकते है ? मैं काफी देर से कोशिश कर रहा हूँ पर कामयाबी नहीं मिल पा रही है ।

अनजान परिंदा – (थोड़ी देर सोचने के बाद )- जब उड़ान भरना सीखा नहीं तो इतना दूर निकलने की क्या जरुरत थी ? वह अपने मित्र के साथ मिलकर नन्हे परिंदे का मज़ाक उड़ाने लगा ।

 उन लोगो की बातों से नन्हा परिंदा बहुत क्रोधित हो रहा था ।

अनजान परिंदा हँसते हुए बोला – देखो हम तो उड़ान भरना जानते हैं और अपनी मर्जी से कहीं भी जा सकते हैं । इतना कहकर अनजान परिंदे ने उस नन्हे परिंदे के सामने पहली उड़ान भरी । वह फिर थोड़ी देर बाद लौटकर आया और दो-चार कड़वी बातें बोल पुनः उड़ गया । ऐसा उसने पांच- छः बार किया👍 और जब इस बार वो उड़ान भर के वापस आया तो नन्हा परिंदा वहां नहीं था ।

अनजान परिंदा अपने मित्र से- नन्हे परिंदे ने उड़ान भर ली ना? उस समय अनजान परिंदे के चेहरे पर ख़ुशी झलक रही थी ।

मित्र परिंदा – हाँ नन्हे परिंदे ने तो उड़ान भर ली लेकिन तुम इतना खुश क्यों हो रहे हो मित्र? तुमने तो उसका कितना मज़ाक बनाया ।

अनजान परिंदा – मित्र तुमने मेरी सिर्फ नकारात्मकता पर ध्यान दिया । लेकिन नन्हा परिंदा मेरी नकारात्मकता पर कम और सकारात्मकता पर ज्यादा ध्यान दे रहा था । इसका मतलब यह है कि उसने मेरे मज़ाक को अनदेखा करते हुए मेरी उड़ान भरने वाली चाल पर ज्यादा ध्यान दिया और वह उड़ान भरने में सफल हुआ ।

मित्र परिंदा – जब तुम्हे उसे उड़ान भरना सिखाना ही था तो उसका मज़ाक बनाकर क्यों सिखाया ?

अनजान परिंदा – मित्र, नन्हा परिंदा अपने जीवन की पहली बड़ी उड़ान भर रहा था और मैं उसके लिए अजनबी था । अगर मैं उसको सीधे तरीके से उड़ना सिखाता तो वह पूरी ज़िंदगी मेरे एहसान के नीचे दबा रहता और आगे भी शायद ज्यादा कोशिश खुद से नहीं करता ।

मैंने उस परिंदे के अंदर छिपी लगन देखी थी। जब मैंने उसको कोशिश करते हुए देखा था तभी समझ गया था इसे बस थोड़ी सी दिशा देने की जरुरत है और जो मैंने अनजाने में उसे दी और वो अपने मंजिल को पाने में कामयाब हुआ ।अब वो पूरी ज़िंदगी खुद से कोशिश करेगा और दूसरों से कम मदद मांगेगा । इसी के साथ उसके अंदर आत्मविश्वास भी ज्यादा बढ़ेगा ।

मित्र परिंदे ने अनजान परिंदे की तारीफ करते हुए बोला तुम बहुत महान हो, जिस तरह से तुमने उस नन्हे परिंदे की मदद की वही सच्ची मदद है !

*✅👨‍👩‍👧‍👦ग्रहण करने योग्य 👨‍👩‍👧‍👦✅*
*👨‍👩‍👧‍👦🔔➡️भव्य आत्माओं , सच्ची  मदद  वही  है  जो  मदद  पाने  वाले  को  ये  महसूस  न  होने  दे  कि  उसकी  मदद  की  गयी  है । बहुत  बार  लोग सहायता तो  करते  हैं  पर  उसका  ढिंढोरा  पीटने  से  नहीं  चूकते। ऐसी सहायता किस  काम की  ! परिंदों  की  ये  कहानी  हम  इंसानो  के  लिए  भी  एक  सीख  है  कि  हम  लोगों  की  मदद  तो  करें  पर  उसे  स्वयं के सिर का ताज न बनायें !*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात की चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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रविवार, 11 सितंबर 2022

मेरा दोस्त कौन?

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒मेरा दोस्त कौन?🤝🔔*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की  सूचना🔔*
*🕉️🔔 1.आज आश्विन कृष्ण पक्ष दोज। 12 सप्टेम्बर 2022 सोमवार  को 22 वें तीर्थंकर 1008 श्री नमिनाथ भगवान का गर्भ कल्याणक  महोत्सव हैं।यह कल्याणक की तिथि उत्तर पुराण के अनुसार प्रमाणित है।*
*👨‍👩‍👧‍👦आपसभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार उत्सव कर जीवन सफल करें।*

गुरु नाम के एक लड़के को पैसों की सख्त ज़रुरत थी ,उसने अपने मालिक से मदद मांगी । मालिक पैसे देने को तैयार हो गया पर उसने एक शर्त रखी , शर्त ये थी कि गुरु को बिना आग जलाये कल की रात पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर बितानी थी, अगर वो ऐसा कर लेता तो उसे एक बड़ा इनाम मिलता और अगर नहीं कर पाता तो उसे मुफ्त में काम करना होता।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्षमार्ग को सुरक्षित करें ।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️

गुरु जब दुकान से निकला तो उसे एहसास हुआ कि वाकई कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है और बर्फीली हवाएं इसे और भी मुश्किल बना रही हैं . उसे मन ही मन लगा कि शायद उसने ये शर्त कबूल कर बहुत बड़ी बेवकूफी कर दी है . घबराहट में वह तुरंत अपने दोस्त तेजल के पास पहुंचा और सारी बात बता दी ।

तेजल ने कुछ देर सोचा और बोला, “ चिंता मत करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा . कल रात, जब तुम पहाड़ी पर होगे तो ठीक सामने देखना मैं तुम्हारे लिए सामने वाली पहाड़ी पर सारी रात आग जल कर बैठूंगा .

तुम आग की तरफ देखना और हमारी दोस्ती के बारे में सोचना ; वो तुम्हे गर्म रखेगी।

और जब तुम रात बिता लोगे तो बाद में मेरे पास आना, मैं बदले में तुमसे कुछ लूंगा .”

गुरु अगली रात पहाड़ी पर जा पहुंचा, सामने वाली पहाड़ी पर तेजल भी आग जला कर बैठा था ।

अपने दोस्त की दी हुई हिम्मत से गुरु ने वो बर्फीली रात किसी तरह से काट ली ।मालिक ने शर्त के मुताबिक उसे ढेर सारे पैसे इनाम में दिए ।

इनाम मिलते ही वो तेजल के पास पहुंचा, और बोला,  “ तुमने कहा था कि मेरी मदद के बदले में तुम कुछ लोगे … कितने पैसे चाहिएं तुम्हे ..”

तेजल बोला, “ हाँ मैंने कुछ लेने को कहा था, पर वो पैसे नहीं हैं . मैं तो तुमसे एक वादा लेना चाहता हूँ … वादा करो कि अगर कभी मेरी ज़िन्दगी में भी बर्फीली हवाएं चलें तो तुम मेरे लिए दोस्ती की आग जलाओगे ।”

गुरु ने फ़ौरन उसे गले लगा लिया और हमेशा दोस्ती निभाने का वादा किया ।

*👨‍👩‍👧‍👦ग्रहण करने योग्य 🤝*

*👨‍👩‍👧‍👦🫠↔️भव्य आत्माओं, कहते हैं दोस्ती ही वो पहला रिश्ता होता है जो हम खुद बनाते हैं, बाकी रिश्तों के साथ तो हम पैदा होते हैं . सचमुच अगर हम अपनी जिंदगी से “दोस्तों ” को छोड़ दें तो ज़िन्दगी कितनी खाली लगे … दोस्त होने का मतलब सिर्फ खुशियां बांटना नहीं होता …दोस्ती का असली मतलब अपने दोस्त का उस समय साथ देना होता है जब कोई भी धर्म के रास्ते से विचलित हो रहा है। जब उसे हमारी सबसे ज्यादा ज़रुरत है। सच्चा दोस्त हमारा केवल धर्म ही है।बाकी जो भी है वे सभी स्वार्थ के साथी है।इसलिए आप सच्चे धर्म को समझकर उसके अनुसार आचरण करें।विश्व की कोई भी शक्ति आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती।यही प्रकृति का नियम है।इसे आजतक जितने भी भगवान हुए वे भी इस नियम को पालन करने के बाद ही भगवान बने।अत: हमसभी मोक्ष के मार्ग पर चलने वाले पथिक को जो हमें समय समय पर मार्गदर्शन दे उसे अपना दोस्त मानना चाहिए।* …

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात की चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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शनिवार, 10 सितंबर 2022

जैसा अन्न वैसा मन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒जैसा अन्न वैसा मन👨‍👩‍👧‍👦👑*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️🔔 1. आश्विन कृष्ण पक्ष दोज। 12 सप्टेम्बर 2022   ् सोमवार  को 22 वें तीर्थंकर 1008 श्री नमिनाथ भगवान का गर्भ कल्याणक  महोत्सव हैं।*
*👨‍👩‍👧‍👦आपसभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार उत्सव कर जीवन सफल करें।*

आज की कहानी से हमसभी शिक्षा लेकर अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त कर सकते है।वर्तमान में कुछ जैनसमुदाय के लोग गरीब हो रहे है।वे धर्म में पैसा तो खर्च करते है किंतु अभक्ष्य भोजन सेवन करने से पात्र(शरीर) अशुध्द होने से वे निम्नता को प्राप्त होते है ।

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-भव्य महान आत्माओं आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कहानियों से कुछ धर्म के आत्मकल्याण के संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से शुभफल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक शुभफल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

एक साधु ने देशाटन की योजना बनाई। वह एक गांव से दूसरे गांव चले जा रहे थे। इसी तरह सिलसिला शुरू हुआ।

जहां रात हो जाती उसी गांव में किसी घर में आसरा ले लेते।

एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। गांव की सीमा पर जो पहला घर दिखा वहां पहुंचे आश्रय मांगने। 

घर बड़ा था और उस घर में बस दो जन रहते थे। घर के मालिक ने साधु को रात बिताने की अनुमति दे दी।

गृहस्वामी ने साधु को भोजन के लिए भी कहा। वैसे तो साधु स्वयं पकाकर ही खाते थे लेकिन उस दिन उन्होंने उसके घर का भोजन स्वीकार कर लिया और फिर बरामदे में पड़ी खाट पर लेट गए।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्षमार्ग को सुरक्षित करें ।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
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घर के अहाते में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा भी बंधा था ।साधु उसे निहारने लगे। 

साधु के मन में विचार आया- यदि यह घोड़ा मेरा हो जाए तो देशाटन कितना सरल हो जाता। एक दिन में कई-कई गांव सरलता से घूम लेता।

इन्हीं विचारों में डूबे थे। उन्होंने तय किया कि जैसे गृहस्वामी सो जाता है, मैं आधी रात को घोड़ा लेकर चुपके से निकल लूंगा। 

जैसा सोचा वैसा ही किया भी। साधु वह घोड़ा ले उडा।

गांव से काफी आगे निकल जाने पर साधु ने पेड़ से घोड़ा बांधा और फिर सो गया 

प्रातः उठकर उसने नित्यकर्म निपटाया और वापस घोड़े के पास आया तो फिर उसे रात की बातें याद आने लगीं।

उन्हें पछतावा हुआ-अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्यों सुझी? 

उसने घोड़ा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा।

गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोड़ां लौटा दिया। 

साधु ने सोचा कल मैंने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं?

जिज्ञासा से गृहस्वामी से पूछा- आप काम क्या करते हैं, आपकी आजिविका क्या है?’ 

सकुचाते हुए गृहस्वामी ने पहले टालने की कोशिश की फिर साधु जानकर सच्चाई बता दी।

वह बोला- महात्माजी मैं लूटखोर व चोर हूँ और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूं’। 

साधु की शंका का समाधान हो गया। चोरी से जुटाया अन्न पेट में पहुंचा तो उसने मन में कुबुद्धि पैदा कर दी। 

प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के अंश बाहर आते ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

जैसा आहार लेंगे, वैसा व्यवहार हो जाएगा। जो सात्विक भोजन करते हैं उनके विचार सात्विक रहते हैं। बात-बात पर क्रोध नहीं आता, किसी का बुरा करने के विचार नहीं आते।

जिनका आहार दूषित होता है उनकी बुद्धि नीति-अनीति का अंतर कुशलता से नहीं कर पाती। 

इसे ऐसे समझें कि मांस-मदिरा के सेवन के पश्चात स्वभाव में उग्रता आती है किंतु जैसे ही वह आहार शरीर से बाहर जाता है व्यवहार पर पछतावा होने लगता है..!!

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2022

क्षमावाणी का महत्व

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒क्षमावाणी पर्व का महत्व👨‍👩‍👧‍👦👏*
 

हमसभी आज समझते है कि क्षमावाणी पर्व क्या है क्षमावाणी पर्व और क्या है इसकी  विशेषताएं 

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्षमार्ग को सुरक्षित करें ।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
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दसलक्षण महापर्व एक आध्यात्मिक शुद्धि का दिव्य त्यौहार है। इस दौरान ऐसा लगता है मानो जैसे किसी ने दस धर्मों की माला बना दी हो। दसलक्षण धर्म की संपूर्ण साधना के बिना मनुष्य को मुक्ति का मार्ग नहीं मिल सकता।

पर्युषण पर्व का पहला दिन ही ‘उत्तम क्षमा’ भाव का दिन होता है। धर्म के दस लक्षणों में ‘उत्तम क्षमा’ की शक्ति अतुल्य है। क्षमा भाव आत्मा का धर्म कहलाता है। यह धर्म किसी व्यक्ति विशेष का नहीं होता, बल्कि समूचे प्राणी जगत का होता है।

क्षमा शब्द मानवीय जीवन की आधारशिला है। सिर्फ जैन धर्म ही हमें क्षमाभाव रखना नहीं सिखाता है, सभी धर्म यही कहते हैं कि हमें सबके प्रति अपने मन में दया और क्षमा का भाव रखना चाहिए। इसका उदाहरण इन निम्न बातों से सिद्ध होता है…

*सिख गुरु गोविंद सिंह जी एक जगह कहते हैं- ‘यदि कोई दुर्बल मनुष्य तुम्हारा अपमान करता है, तो उसे क्षमा कर दो, क्योंकि क्षमा करना वीरों का काम है।’* *ईसा मसीह ने भी सूली पर चढ़ते हुए कहा यही कहा था कि- ‘हे ईश्वर! इन्हें क्षमा करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।’*  * *कुरान शरीफ में भी लिखा है- ‘जो वक्त पर धैर्य रखे और क्षमा कर दे, तो निश्चय ही यह बड़े साहस के कामों में से एक है।’*   * *स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि- तमाम बुराई के बाद भी हम अपने आपको प्यार करना नहीं छोड़ते तो फिर दूसरे में कोई बात नापसंद होने पर भी उससे प्यार क्यों नहीं कर सकते?* 
*इसी तरह भगवान महावीर स्वामी और हमारे अन्य संत-महात्मा भी प्रेम और क्षमा भाव की शिक्षा देते हैं। अत: यही सत्य है कि हर मनुष्य के अंदर क्षमा भाव का होना बहुत जरूरी है। जिसके जीवन में क्षमा है, वही महानता को प्राप्त कर सकता है।*
 *क्षमावाणी हमें झुकने की प्रेरणा देती है। दसलक्षण पर्व हमें यही सीख देता है कि क्षमावाणी के दिन हमें अपने जीवन से सभी तरह के बैर भाव-विरोध को मिटाकर प्रत्येक व्यक्ति से क्षमा मांगनी चाहिए। यही क्षमावाणी है।चाहे छोटा हो या बड़ी क्षमा पर्व पर सभी से दिल से क्षमा मांगी जानी चाहिए।क्षमा सिर्फ उससे नहीं मांगी जानी चाहिए, जो वास्त‍व में हमारा दुश्मन है। बल्कि हमें हर छोटे-बड़े जीवों से क्षमा मांगनी चाहिए। जब हमें क्रोध आता है तो हमारा चेहरा लाल हो जाता है और जब क्षमा मांगी जाती है तो चेहरे पर हंसी-मुस्कुराहट आ जाती है। क्षमा हमें अहंकार से दूर करके झुकने की कला सीखाती है। क्षमावाणी पर्व पर क्षमा को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची मानवता है।हम क्षमा उससे मांग‍ते हैं, जिसे हम धोखा देते है। जिसके प्रति मन में छल-कपट रखते है। जीवन का दीपक तो क्षमा मांग कर ही जलाया जा सकता है। अत: हमें अपनी प‍त्नी, बच्चों, बड़े-बुजुर्गों सभी से क्षमा मांगना चाहिए।क्षमा मांगते समय मन में किसी तरह का संकोच, किसी तरह का खोट नहीं होना चाहिए। हमें अपनी आत्मा से क्षमा मांगनी चाहिए, क्योंकि मन के कषायों में फंसकर हम तरह-तरह के ढ़ोंग, स्वांग रचकर अपने द्वारा दूसरों को दुख पहुंचाते हैं। उन्हें गलत परिभाषित करने और नीचा दिखाने के चक्कर में हम दूसरों की भावनाओं का ध्यान नहीं रखते जो कि सरासर गलत है।दसलक्षण पर्व के दिनों में किया गया त्याग और उपासना हमें जीवन की सच्ची राह दिखाते हैं। हमें तन, मन और वचन से चोरी, हिंसा, व्याभिचार, ईर्ष्या, क्रोध, मान, छल, गाली, निंदा और झूठ इन दस दोषों से दूर रहना चाहिए।*

*क्षमावाणी पर्व पर हमें क्षमा को अपने मन-वचन-काया से स्वयं के आचरण में धारण करना आवश्यक है।जबतक हमारे अंदर समता के परिणाम नहीं आये तब तक समझलो कि अभी मुझे बहुत कुछ सीखना बाकी है। जब हमारे अंदर प्रत्येक जीव के प्रति समता के परिणाम नहीं होते तब तक समझलो स्वयं का रत्नत्रय अभी मलिन है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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गुरुवार, 8 सितंबर 2022

उत्तम ब्रह्मचर्य

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️जैनधर्म की सच्चाई*
*💪👩‍🚒उत्तम ब्रह्मचर्य👨‍👩‍👧‍👦👑*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की  सूचना🔔*
*🕉️ 1. आज भादो शुक्ल चौदस 9 सप्टेम्बर 2022   शुक्रवार  को 12 वें तीर्थंकर 1008 श्री वासुपूज्य भगवान का मोक्ष कल्याणक  महोत्सव हैं।*
*दशलक्षण महामहोत्सव पर्व के ब्रम्हचर्य धर्म के शुभ अवसर पर आप सभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार महोत्सव कर जीवन सफल करें।*

➡️कामसेवन का मन से, वचन से तथा शरीर से परित्याग करके अपने आत्मा में स्थित होना ब्रह्मचर्य है।

संसार में समस्त वासनाओं में तीव्रतम कामवासना है। इसी कारण अन्य इन्द्रियों का दमन करना तो बहुत सरल है किन्तु कामवासना की साधन भूत काम इन्द्रिय का वश में करना बहुत कठिन है। छोटे-छोटे जीव जन्तुओं से लेकर बड़े से बड़े जीव तक में विषयवासना स्वाभाविक (वैभाविक) रूप से पाई गई है। सिद्धांत ग्रन्थों ने भी मैथुन स्ंज्ञा एकेन्द्रिय जीवों में भी प्रतिपादन की है।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्षमार्ग को सुरक्षित करें ।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️

कामातुर जीव का मन अपने वश में नहीं रहता। उसकी विवेकशक्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है। पशु तो कामवासना के शिकार होकर माता, बहिन, पुत्री, स्त्री आदि का भेदभाव करते ही नहीं। सभी को समान समझ कर सबसे अपनी कामवासना तृप्त करते रहते हैं। इसी कारण उन्हें पशु (समान पश्यति इति पशु) कहते हैं। परंतु कामातुर मनुष्य भी कभी कभी पशु सा बन जाता है। कवि ने कहा है-

दिवा पश्यति नीलूको मनुजो रात्रि न पश्यति।
अपूर्वः कोपि कामान्धो दिवारात्रं न पश्यति।।
*अर्थात्- दिन में उल्लू को दिखाई नहीं देता और मनुष्य को रात में नहीं दिखाई देता। परंतु कामान्ध पुरुष न रात में कुछ देखता है न दिन में। उसके नेत्र कामवासना के कर्तव्य अकर्तव्य को कुछ नहीं देख पाते।*
कभी-कभी संसार सम्पर्क से दूर रहने वाले इन्द्रिय विजेता ऋषि लोग भी कामवासना के शिकार होकर अपनी तपस्या नष्ट कर डालते हैं। इस कारण कामदेव पर विजय प्राप्त करके ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना बहुत कठिन है। अतः कामवासना को जीतने वाला व्यक्ति संसार में सबसे अधिक पूज्य और बलवान् माना जाता है।जैन शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रमाण दिये हैं।

*1.यह ब्रह्मचर्य का ही प्रताप है कि श्री नेमिनाथ तीर्थंकर अपना विवाह करने राजा उग्रसेन के घर बड़ी भारी बारात के साथ पधारे, किन्तु अहिंसा व्रत के कारण अपनी बारात में आये हुए माँस भक्षी लोगों के भोजन के लिये एकत्र किये गये पशु-पक्षियों पर करुणा करके उनको छोड़ दिया और अति रूपवती, नवतरुणी राजकुमारी के साथ विवाह करना त्याग कर साधु बन गये। देवागंना समान सुंदरी राजमती ने नेमिनाथ से अपने साथ विवाह करने की अनेक प्रार्थनायें की, किन्तु ब्रह्मचारी नेमिकुमार पर कामदेव का रंचमात्र भी प्रभाव न हुआ।*

*2.अतिशय रूपवान सुदर्शन सेठ स्वदारसन्तोष (अपनी विवाहित स्त्री के सिवाय अन्य सब स्त्रियों से मैथुन का त्याग) व्रत के धारक थे। उनके सुंदर रूप पर आसक्त होकर रानी ने छल से अपनी धूर्त दासी के द्वारा उनको अपने महल में बुलवा लिया, और अपनी कामाग्नि शांत कर देने के लिये सुदर्शन सेठ से बड़ी विनय प्रार्थना की, परंतु अटल ब्रह्मचारी सुदर्शन सेठ विषय-वासना के शिकार न हो सके। तदनन्तर कामविह्ल-कामपीडि़त रानी ने सुदर्शन सेठ द्वारा अपनी कामवसना तृप्त कराने के लिये उनके साथ बलात्कार करना चाहा। सुदर्शन सेठ को अपनी कोमल पुष्प शैया पर लिटाकर अपने वस्त्र उतार कर उसके साथ आलिंगन किया तथा अन्य सभी काम चेष्टाएं की परंतु सुदर्शन सेठ आत्मनिमग्न रहे आये, रानी के आलिंग से न तो उनके शरीर में जरा भी रोमांच हुआ और न उनकी काम इन्द्रिय (लिंग) पर लेशमात्र काम विकार आया। तब निराश होकर रानी ने सुदर्शन सेठ पर असत्य दोष आरोपण करके राजा को भड़काया और सुदर्शन सेठ को प्राणदंड दिलवाया। किन्तु ब्रह्मचर्य की महिमा से शूली भी सुदर्शन सेठ के लिये सिंहासन हो गई।*

बहुत से कामी पुरुष अपनी कामवासना शांत करने के लिये स्त्रियों पर बलात्कार (स्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक मैथुन करना) किया करते हैं। स्त्रियों द्वारा पुरुषों के साथ बलात्कार की बात किसी ने न सुनी होगी वैसा विपरीत बलात्कार रानी ने सुदर्शन सेठ के साथ करना चाहा जिसमें कि उनको सफलता न मिल सकी।

*सुदर्शन सेठ के समान ब्रह्मचर्य व्रत का पालन प्रत्येक पुरुष को करना चाहिए। तथा सीता कितने ही दिनों तक रावण के कब्जे में रही आई, रावण ने सब तरह के प्रलोभन सीता के सामने रक्खे, अपनी बड़ी भारी विभूति और विद्याधरों के प्रभाव से उसे प्रभावित करना चाहा तथा बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करके रावण ने सीता केा अपने साथ विवाह करने के लिए अनेक भयानक दृश्य दिखलाये परंतु सीता के अटल ब्रह्मचर्य को वह जरा भी न डिगा सका।*

*यौवन में पर्दापण करने वाली, राज सुखों में पली हुई तरुणी राजुलमती को उसके माता पिता ने नेमिनाथ के विरागी हो जाने पर अन्य राजकुमारों के साथ विवाह करने के लिए झुकना चाहा किन्तु राजुल अपने व्रत से चलायमान न हुई और उसने विषय-कामना को दबा कर अपना यौवन तपश्चर्या में लगा दिया।*

सब स्त्रियों को भी सीता राजुल सरीखा दृढ़ ब्रह्मचर्य व्रत पालन करना चाहिये।

जिस कामवासना से मनुष्य का वीर्य नष्ट होता है वह वीर्य मनुष्य के शरीर में सबसे उत्तम धातु है। जो कुछ भोजन मनुष्य करता है। उनका पाचन होकर शरीर के भीतर पहले रस बनता है, रस से खून बनता है, खून से माँस बनता है, मांस से मेदा बनती है, मेदा से अस्थि (हड्डी) तैयार होती है, अस्थि का सार अंश मज्जा (चर्बी) बनती है और मज्जा से वीर्य उत्पन्न होता है। जो भोजन आज किया जावे, चालीसवें  वे दिन जाकर उससे वीर्य बन पाता है। अतः वीर्य सबसे श्रेष्ठ धातु है। मनुष्य यदि दो मन दूध पीवे तो उससे सिर्फ दो तोले वीर्य बनता है।

शरीर में और दिमाग में जो मूल शक्ति है वह वीर्य के कारण ही प्राप्त होती है। जो मनुष्य मैथुन द्वारा वीर्य पतन करते हैं उनके शरीर और दिमाग की शक्ति क्षीण हो जाती है।एक बार संभोग करने में दसलाख जीवों की हिंसा होती है। और वे बलहीन होकर अनेक रोगों के शिकार बन जाते हैं, ऐसे बलहीन मनुष्य ही राजयक्ष्मा क्षयरोग (तपेदीक टी.बी.) के भी पँजे में फँस जाते हैं और अकाल में मृत्यु के ग्रस्त बन जाते हैं।

इस कारण बलवान स्वस्थ दीर्घजीवन प्राप्त करने के लिये मनुष्य को अपने वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। उसको व्यर्थ नष्ट न करना चाहिए। क्योंकि वीर्य शरीर का राजा हैं। जैसे कि राजा के बलवान रहते हुए प्रजा को कोई भी व्यक्ति दुःख नहीं पहुँचा सकता, इसी तरह वीर्य के बलवान रहने पर शरीर को कोई भी रोग कष्ट नहीं पहुँचा सकता।

जो व्यक्ति पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं कर सकता, उसको यथा सम्भव ब्रह्मचर्य व्रत पालन कराने के उद्देश्य से विवाह संस्कार द्वारा स्वदार संतोष या परस्त्री त्याग व्रत ग्रहण कराया जाता है। विवाहित पुरुष को अपनी पत्नी के सिवाय संसार की शेष सभी स्त्रियों में से अपनी आयु से छोटी स्त्रियों को अपनी पुत्री समान, समान आयुवाली स्त्री को अपनी बहिन के समान एवं अपने से बड़ी आयु वाली महिलाओं को अपनी माता के समान समझ कर मन से, वचन से तथा काय से उनके साथ कामवासना का त्याग करना चाहिये, शरीर द्वारा मैथुन का त्याग तो अवश्य करना चाहिये।

इसी प्रकार विवाहित स्त्रियों को भी अपने पति के सिवाय शेष सभी पुरुषों को अपने से छोटों को पुत्र समान, अपनी बराबर वालों को भाई के समान और अपनी आयु से बड़े पुरुषों को पिता के समान समझना चाहिये।

विवाहित स्त्री पुरुषों (पति-पत्नी) को भी अच्छी गुणवान, रूपवान, विद्वान्, सुशील, धर्मात्मा संतान उत्पन्न करने के लिये ही ऋतु समय में मैथुन नहीं करना चाहिये, जिससे अपना शरीर स्वस्थ रहे और सुयोग्य संतान उत्पन्न हो।ऋतु समय में मैथुन करने से अगर गर्भ रूक जाता है तो संतान अपंग, मानसिक विकार वाली ,कुल का नाश करने वाली उत्पन्न होती है। गर्भाधान हो जाने पर पति पत्नी को ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये जिससे गर्भस्थ शिशु को हानि न पहुँचे और वह कुशील स्वभाव का न हो। क्योंकि गर्भाधान के बाद माता पिता के प्रत्येक आचरण का प्रभाव गर्भ को संतान पर पड़ता रहता है।जिस महिला ने गर्भावस्था के नौ महीने जैनशास्त्रो के अनुसार व्यतीत किये वह संतान हमेशा वृद्धि को प्राप्त होती है। उस समय भी जो स्त्री पुरुष सदाचार से नहीं रहते उनकी संतान भी सदाचारी नहीं होती, दुराचारी व्यभिचारी होती है।

इसके सिवाय बीमारी तथा निर्बलता की अवस्था में भी ब्रह्मचर्य को भंग नहीं करना चाहिये अन्यथा रोगी शरीर में और भी अधिक निर्बलता आ जाती है। स्त्री रोगग्रस्त हो तो उसके साथ मैथुन करने से उसको क्षयरोग हो सकता है। यदि पुरुष रोगी हालत में ब्रह्मचर्य से न रहे तो वह तपेदिक (क्षय) का शिकार हो सकता है। इस कारण शारीरिक निर्बलता के समय ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है।

*👩‍🦰↔️वर्तमान में कुछ महिलाऐं मंदिरजी मे लिपस्टिक क्रीम व अन्य सामग्रियों द्वारा शरीर को सजाकर आती है।इससे उन्हें भविष्य में सुंदर शरीर की जगह कुरूप शरीर की प्राप्ति होती है।जैनदर्शन के अनुसार सिर से लेकर पैर की बिछयाँ तक आभूषण से श्रृंगार करके मंदिर आ सकती है।मेंहदी भी लगाकर आ सकती है व आहार दान भी दे सकती है।केवल शरीर पर अन्य वस्तुओं द्वारा लीपापोती नहीं करना चाहिए।वस्त्र ऐसे होना चाहिये जिससे सामने वाले की वासना जाग्रत ना हो।ऐसा करने से तिर्यंच व निम्न गति का बंध होता है।*

मनुष्य का वीर्य 18 वर्ष की आयु में पक जाता है और स्त्री का 14-15 वर्ष की आयु में पक जाता है। इस आयु से पहले न तो पुरुष, स्त्री का विवाह होना चाहिये और न मैथुन होना चाहिये। 21 वर्ष का लड़का और 18 वर्ष की कन्या विवाह के लिये श्रेष्ठ है।वर्तमान में उत्कृष्ट विवाह शास्त्रों के अनुसार चक्रवर्ती विवाह को ही महत्व है।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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