शनिवार, 10 सितंबर 2022

जैसा अन्न वैसा मन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒जैसा अन्न वैसा मन👨‍👩‍👧‍👦👑*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️🔔 1. आश्विन कृष्ण पक्ष दोज। 12 सप्टेम्बर 2022   ् सोमवार  को 22 वें तीर्थंकर 1008 श्री नमिनाथ भगवान का गर्भ कल्याणक  महोत्सव हैं।*
*👨‍👩‍👧‍👦आपसभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार उत्सव कर जीवन सफल करें।*

आज की कहानी से हमसभी शिक्षा लेकर अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त कर सकते है।वर्तमान में कुछ जैनसमुदाय के लोग गरीब हो रहे है।वे धर्म में पैसा तो खर्च करते है किंतु अभक्ष्य भोजन सेवन करने से पात्र(शरीर) अशुध्द होने से वे निम्नता को प्राप्त होते है ।

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-भव्य महान आत्माओं आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कहानियों से कुछ धर्म के आत्मकल्याण के संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से शुभफल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक शुभफल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

एक साधु ने देशाटन की योजना बनाई। वह एक गांव से दूसरे गांव चले जा रहे थे। इसी तरह सिलसिला शुरू हुआ।

जहां रात हो जाती उसी गांव में किसी घर में आसरा ले लेते।

एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। गांव की सीमा पर जो पहला घर दिखा वहां पहुंचे आश्रय मांगने। 

घर बड़ा था और उस घर में बस दो जन रहते थे। घर के मालिक ने साधु को रात बिताने की अनुमति दे दी।

गृहस्वामी ने साधु को भोजन के लिए भी कहा। वैसे तो साधु स्वयं पकाकर ही खाते थे लेकिन उस दिन उन्होंने उसके घर का भोजन स्वीकार कर लिया और फिर बरामदे में पड़ी खाट पर लेट गए।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्षमार्ग को सुरक्षित करें ।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से  करें।✍️*
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घर के अहाते में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा भी बंधा था ।साधु उसे निहारने लगे। 

साधु के मन में विचार आया- यदि यह घोड़ा मेरा हो जाए तो देशाटन कितना सरल हो जाता। एक दिन में कई-कई गांव सरलता से घूम लेता।

इन्हीं विचारों में डूबे थे। उन्होंने तय किया कि जैसे गृहस्वामी सो जाता है, मैं आधी रात को घोड़ा लेकर चुपके से निकल लूंगा। 

जैसा सोचा वैसा ही किया भी। साधु वह घोड़ा ले उडा।

गांव से काफी आगे निकल जाने पर साधु ने पेड़ से घोड़ा बांधा और फिर सो गया 

प्रातः उठकर उसने नित्यकर्म निपटाया और वापस घोड़े के पास आया तो फिर उसे रात की बातें याद आने लगीं।

उन्हें पछतावा हुआ-अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्यों सुझी? 

उसने घोड़ा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा।

गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोड़ां लौटा दिया। 

साधु ने सोचा कल मैंने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं?

जिज्ञासा से गृहस्वामी से पूछा- आप काम क्या करते हैं, आपकी आजिविका क्या है?’ 

सकुचाते हुए गृहस्वामी ने पहले टालने की कोशिश की फिर साधु जानकर सच्चाई बता दी।

वह बोला- महात्माजी मैं लूटखोर व चोर हूँ और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूं’। 

साधु की शंका का समाधान हो गया। चोरी से जुटाया अन्न पेट में पहुंचा तो उसने मन में कुबुद्धि पैदा कर दी। 

प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के अंश बाहर आते ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

जैसा आहार लेंगे, वैसा व्यवहार हो जाएगा। जो सात्विक भोजन करते हैं उनके विचार सात्विक रहते हैं। बात-बात पर क्रोध नहीं आता, किसी का बुरा करने के विचार नहीं आते।

जिनका आहार दूषित होता है उनकी बुद्धि नीति-अनीति का अंतर कुशलता से नहीं कर पाती। 

इसे ऐसे समझें कि मांस-मदिरा के सेवन के पश्चात स्वभाव में उग्रता आती है किंतु जैसे ही वह आहार शरीर से बाहर जाता है व्यवहार पर पछतावा होने लगता है..!!

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए पूर्वोपार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्षमार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात की चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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