सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

शेर व सवाशेर

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒 सेर को सवा सेर* 💐💐
एक समय की बात है। चंदनपुर में कालू नाम का एक ठग रहा करता था। वह राहगीरों को खूब ठगा करता था। गांव वाले उसकी हरकत से परेशान थे, लेकिन ऐसी कोई तरकीब नहीं निकाल पा रहे थे कि कालू को सबक सिखाया जा सके। 

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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एक दिन कालू खेतों की ओर जाती पगडंडी पर खड़ा था कि उसे दूसरी ओर से आता एक नौजवान नजर आया। उसके एक हाथ में घोड़े की लगाम थी और दूसरे हाथ में बकरी की रस्सी। अजनबी को पास आते देख कालू मुस्कराते हुए बोला, “राम-राम भैया। लगता है बड़ी दूर से आ रहे हो।” 

“हां, मैं दूर गांव का रहने वाला हूं। श्याम नगर अपनी ससुराल जा रहा हूं। मो कछ रुपयों की आवश्यकता है, इसलिए मैं यह बकरी बेचना चाहता हूं।” अजनबी ने जवाब दिया। यह सुनते ही कालू की आंखों में चमक आ गई। उसने तरंत उस अजनबी को ठगने की योजना बना ली। वह बोला. “अच्छा या दस घोड़े के साथ जो बकरी है, वह कितने की दोगे?” 

अजनबी बोला, “पांच सौ रुपये की।” 

“ठीक है मुझे सौदा मंजूर है, यह लो पांच सौ रुपये। चलो अब घोड़े से उतरो, यह घोड़ा भी मेरा हुआ।” ठग ने कहा। 

“क्या?” अजनबी चौंकते हुए बोला, “तुमने सिर्फ बकरी ली है, घोड़ा नहीं।” 

“अरे, घोड़ा कैसे नहीं दोगे? मैंने तुमसे पहले ही पूछ लिया था कि इस घोड़े के साथ जो यह बकरी है, वह कितने की दोगे? यानी घोड़े और बकरी दोनों की कीमत पांच सौ रुपये थी, जो मैंने तुम्हें दे दी है।” कालू बोला। अब तक वहां काफी लोग जमा हो चुके थे। उन्होंने भी कालू की बात पर हामी भरी। कालू के चेहरे पर विजयी भाव थे। वह अजनबी से घोड़ा और बकरी लेकर शान से अपने घर की ओर जाने लगा। तभी अजनबी ने उसे रोका, “सुनो भैया।” 

उसकी आवाज सुनकर कालू रुक गया और बोला, “क्या बात है?” 

“बात दरअसल यह है कि मेरा घोड़ा और बकरी तो तुमने ले ली है। अब मैं क्या मुंह लेकर अपनी ससुराल जाऊंगा। अतः मैं अपनी यह रेशमी पगड़ी तुम्हें बेचना चाहता हूं और इस पगड़ी की कीमत मैं सिर्फ एक मुट्ठी चावल लूंगा।”

यह सुनकर कालू सोचने लगा, वाह आज का दिन तो बहुत बढ़िया है। यह तो निरा काठ का उल्लू निकला। अपनी प्रसन्नता को छुपाते हुए कालू सहजता से बोला, “ठीक है। जब तुम इतना निवेदन कर रहे हो, तो मैं ठुकरा नहीं सकता। सामने ही मेरा घर है। मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें एक मुट्ठी चावल दिलवा देता हूं।” 

घर पहुंचते ही कालू ने अपनी पत्नी को आवाज लगाई, “सुनती हो भाग्यवान, जरा एक मुट्ठी चावल लाना। इस अजनबी से मैंने उसकी पगड़ी एक मुट्ठी चावल के बदले खरीदी है।” 

उसकी पत्नी जैसे ही एक मुट्ठी चावल उस अजनबी को देने लगी, उसने तुरंत कालू की पत्नी का हाथ पकड़ लिया और चाकू निकालकर उसकी मुट्ठी काटने के लिए बढ़ने लगा। यह देख कालू चिल्लाया, “अरे यह क्या कर रहे हो?” 

“मैं यह मुट्ठी काट रहा हूं। तुम इस एक मुट्ठी चावल के बदले पगड़ी का सौदा कर चुके हो।” अजनबी बोला। 

यह सुनकर कालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई। सभी गांव वाले उस अजनबी की चतुराई देखकर वाह-वाह ! करने लगे। क्योंकि आज सेर को सवा सेर मिल गया था। कालू गिड़गिड़ाकर उस अजनबी से कहने लगा, “मुझे माफ कर दो भैया। मैं अपनी भूल स्वीकार करता हूं, यह लो तुम्हारा घोड़ा और बकरी । यह पांच सौ रुपये भी तुम ही रखो। किंतु मेरी पत्नी को छोड़ दो।” 

“हूं, ठीक है। अब आई तुम्हारी अक्ल ठिकाने।” यह कहकर अजनबी पुनः अपनी यात्रा पर चल दिया। 
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य  जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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रविवार, 27 फ़रवरी 2022

धार्मिक शिक्षा का महत्व

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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*💪👩‍🚒*धार्मिक शिक्षा का महत्व💐💐*

एक बार एक युवक संत कबीरजी के पास आया और कहने लगा, ‘गुरु महाराज! मैंने अपनी शिक्षा से पर्याप्त ज्ञान ग्रहण कर लिया है।

मैं विवेकशील हूं और अपना अच्छा-बुरा भली-भांति समझता हूं, किंतु फिर भी मेरे माता-पिता मुझे निरंतर धार्मिक शिक्षा की सलाह देते रहते हैं।
जब मैं इतना ज्ञानवान और विवेकयुक्त हूं,  तो मुझे रोजधार्मिक शिक्षा  की क्या जरूरत है?  

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' कबीर साहब ने उसके प्रश्न का मौखिक उत्तर न देते हुए एक हथौड़ी उठाई और पास ही जमीन पर गड़े एक खूंटे पर मार दी। युवक अनमने भाव से चला गया अगले दिन वह फिर कबीर साहब के पास आया और बोला, ‘मैंने आपसे कल एक प्रश्न पूछा था, किंतु आपने उत्तर नहीं दिया।

क्या आज आप उत्तर देंगे?’

 कबीर साहब ने पुन: खूंटे के ऊपर हथौड़ी मार दी। किंतु बोले कुछ नहीं। युवक ने सोचा कि संत पुरुष हैं, शायद आज भी मौन में हैं वह तीसरे दिन फिर आया और अपना प्रश्न दोहराया। कबीर ने फिर से खूंटे पर हथौड़ी चलाई। 

अब युवक परेशान होकर बोला,
‘आखिर आप मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? 

मैं तीन दिन से आपसे प्रश्न पूछ रहा हूं।’ तब कबीर साहब ने कहा, ‘मैं तो तुम्हें रोज जवाब दे रहा हूं।
मैं इस खूंटे पर हर दिन हथौड़ी मारकर
जमीन में इसकी पकड़ को मजबूत कर
रहा हूं। यदि मैं ऐसा नहीं करूंगा तो इससे बंधे पशुओं द्वारा खींचतान से या किसी की ठोकर लगने से अथवा जमीन में थोड़ीसी हलचल होने पर यह निकल जाएगा।
यही काम हमारे लिए सच्चा धर्म करता है। वह हमारे मनरूपी खूंटे पर निरंतर प्रहार करता है, ताकि हमारी पवित्र भावनाएं दृढ़ रहें। युवक को कबीर ने सही दिशा-बोध करा दिया। धार्मिक शिक्षा  हर रोज नित्यप्रति हृदय में सत् को दृढ़ कर असत् को मिटाता है,

*👨‍👩‍👧‍👦इसलिए धार्मिक शिक्षा हमारी जीवन चर्या का अनिवार्य अंग होना चाहिए।क्यों कि लौकिक शिक्षा से हम धन तो कमा सकते है।शान्ति की प्राप्ति हमें अपने सच्चे धर्म के अनुसार गुरू की शरण में ही मिलेगी।*

*🤝आज भारत में लोकतंत्र में जो भी पार्टी सत्ता में आती है वह धर्म के अनुसार कानून नहीं बना रही है।इस कारण से सोने की चिडिय़ा जैसे हम सभी के भारत देश के हालात खराब हो रहे है।इसी कारण से पांच साल में सत्ता परिवर्तन हो रही है।सत्ता के अधिकारी तो  एक बार सेवा करके  हमसभी के दिये गये टेक्स की पेंशन आजीवन प्राप्त करते है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

महात्माजी का उपदेश

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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*💪👩‍🚒महात्माजी का उपदेश💐💐*
*🌐👨‍👩‍👧‍👦 यह कहानी के माध्यम से आज विश्व के सभी सत्ताधारियों की सच्चाई बताई जा रही हैं। आज वर्तमान में कानून व्यवस्था विफलता को प्राप्त हो रही हैं।*
भारत नाम का एक राज्य था।  प्रधानमंत्रीजी  का शासन चल रहा था।

वे बड़े लापरवाह और कठोर प्रकृति के थे। राज्य में निर्धनता व महगाई आसमान को छू रही थी। 
*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*
प्रजा प्रधानमंत्रीजी  का आदर-सम्मान करना भूल चुकी थी। राजा को प्रणाम-नमस्कार किए बिना लोग अपना मुख मोड़ लेते थे। 

प्रजा के व्यवहार से  प्रधानमंत्रीजी स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा था। प्रजा के इस व्यवहार का कारण  प्रधानमंत्रीजी के समझ नहीं पा रहा था।
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एक दिन प्रधानमंत्रीजी ने सलाहकार मंत्री से कहा – ‘मंत्रीवर! आज हमारा मन यहाँ घुटने लगा है। जंगलों में भ्रमण करने से शायद घुटन मिट जाए।

बस वे दोनों अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर जंगल मे बना हुआ विशालकाय  मंदिर जो एक बड़े पर्वत पर था वहाँ  पहुँचे। 

फागुन का महीना था। धूप चढ़ने लगी थी। थोड़ी देर तक सुस्ताने के लिए दोनों एक घने पेड़ के नीचे रुके। 

अपने वाहन से उतरते हुए  प्रधानमंत्रीजी  को एक छोटी सी पर्ण कुटिया दिखाई पड़ी। 

घने जंगल में इस पर्वत पर कुटिया! कौन हो सकता है? उन्हें अचरज हुआ।

धीमे कदमों से प्रधानमंत्रीजी  कुटिया के पास पहुँचे, पीछे-पीछे सलहाकार भी थे। 

कुटिया में एक महात्मा थे। उनको देखकर वे दोनों भाव-विभोर हो उठे।

‘महात्मा जी! मैं भारत राज्य का राजा प्रधानमंत्रीजी  हूँ। और ये हमारे सलाहकार अमितजी।’ महात्मा जी को राजा ने अपना व मंत्री का परिचय दिया।

‘कैसे आना हुआ? महात्मा जी ने चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर पूछा।

हम भ्रमण कर रहे थे। इस पेड़ की शीतल छाँव में सुस्ताने यहाँ रुके तो कुटिया दिख पड़ी। 

हमारा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हो गए। मंत्री ने कहा।

हाव-भाव व मुख की आभा ही से प्रधानमंत्रीजी समझ गए कि महात्माजी ज्ञान-दर्शन और शास्त्रों में निष्णात हैं। 

 प्रधानमंत्रीजी ने उनको अपनी व्यथा बताई –
‘महात्माजी! मेरे राज्य की प्रजा मेरा आदर-सम्मान नहीं करती।

प्रजा का तो कर्तव्य बनता है कि वह अपने राजा का आदर करे, किंतु मैं इससे वंचित हूँ।

राजा के व्यवहार से महात्मा जी परिचित थे। अत: उनको माजरा समझते देर नहीं लगी। 

‘ प्रधानमंत्रीजी! मैं समझ गया हूँ, आप चलिए मेरे साथ।’ महात्मा जी बोले और दरिया की ओर बढ़ गए। 

उनके पीछे-पीछे राजा ओर सलाहकार चल पड़े।

हरी-भरी घास उगी थी। गौ माता घास में लीन थे। कुटिया की पूर्व दिशा में पर्वत श्रृंखलाएँ थीं।

पर्वतों से बहने वाले झरने समतल भूमि में एक साथ मिलकर दरिया बन गए थे।

दरिया के पास एक चट्टान खड़ी थी। चट्टान के पास पहुँचकर महात्मा रुक गए। 

 प्रधानमंत्रीजी और मंत्री भी अचरज के साथ महात्माजी के पास खड़े थे। 

प्रधानमंत्रीजी! एक पत्थर उठाइए और इस चट्टान के ऊपर प्रहार कीजिए। महात्मा ने प्रधानमंत्रीजी से कहा।

प्रधानमंत्रीजी  हक्के-बक्के रह गए। पर महात्मा जी का आदेश था। अतएव बिना कुछ जाने-समझे प्रधानमंत्रीजी  ने एक पत्थर उठाया और जोर से चट्टान के ऊपर प्रहार किया।

चट्टान पर लगते ही वह नीचे गिर पड़ा। 

  प्रधानमंत्रीजी! अब दरिया के तट से थोड़ी गीली मिट्टी लेकर आइए।’ महात्माजी ने फिर आदेश दिया।

 प्रधानमंत्रीजी एक मुट्ठी गीली मिट्टी के साथ चटपट महात्माजी के पास पहुँचे। 

  प्रधानमंत्रीजी! अब प्रहार कीजिए।’ महात्मा ने फिर कहा।

 प्रधानमंत्रीजी ने जोर लगाकर गीली मिट्टी चट्टान पर फेंकी। गीली मिट्टी नीचे गिरने की बजाय चट्टान पर चिपक गई।

गीली मिट्टी को चिपकी हुई देखकर महात्मा बोले - ‘ प्रधानमंत्रीजी! संसार की यही नियति है। संसार कोमलता को आसानी से ग्रहण कर लेता है। कठोरता को त्याग देता है।

इसलिए चट्टान ने गीली मिट्टी को ग्रहण कर लिया और कठोर पत्थर को त्याग दिया।

प्रधानमंत्री  आपके साथ भी ऐसा ही हुआ है। 

मेरे साथ! प्रधानमंत्री ने अचरज भरे स्वर में कहा।

हाँ प्रधानमंत्रीजी ! आप अहंकारी व कठोर प्रकृति के हैं। आपका यह व्यवहार राज्य की उन्नति और सुख- शांति में बाधक बना हुआ है। 
यह प्रकृति राज्य की प्रजा को स्वीकार नहीं है। 

अत: प्रजा आपकी उपेक्षा कर रही है। महात्मा ने संयत स्वर में समझाया। सुनते ही  प्रधानमंत्रीजी का सिर झुक गया।

प्रधानमंत्रीजी! अपने व्यवहार में परिवर्तन लाइए आपको आदर- सम्मान सब मिलेगा।

महात्माजी की उपदेश सुनकर  ने उन्होंने उनके चरण पकड़ लिए और बोले –
*👨‍👩‍👧‍👦‘महात्मा जी भूल क्षमा हो आपकी शिक्षा शिरोधार्य है।’अब हम अपने शासनकाल में प्रजा को बिजली, पानी , स्वास्थ्य सुविधाओं को सबसे कम दामों पर उपलब्ध करवाकर  अपना वोट प्रतिशत जो वर्तमान में 25% से भी कम हो रहा है उसे बढ़ायेंगे।*

विनम्रता से प्रणाम करके दोनों अपने अपने वाहनों पर सवार हो गए और अपने पार्टी कार्यालय की ओर चल पड़े।

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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

आशीर्वाद का फल

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि.. 

बेटा मेरे पास धनसंपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है। 

तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।

बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने आयु के अंतिम समय में पंचपरमेष्ठी का स्मरण करते हुए प्राण त्याग  दिए।
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अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया। 

धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।

अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है। 

क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। 

और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी। 

एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?

धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।

इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद! 

धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता। 

एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।

तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो। 

मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।

तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।

जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं। 

भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।

परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।

नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।

जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को। 

उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।

उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है?

उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं।

सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं। 

सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने ल

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है। 

उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।

सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई। 

अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।

धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी।

सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है। 

मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।

इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ, इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।

धर्मपाल ने कहा कि: लौंग!

सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी।

जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?

धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं। 

मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।

सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब?

धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें। 

उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।

ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो..

धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।

अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: वाह खुदा आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।

धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है, कि पिता के आशीर्वाद हों, तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी। 

*पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं है वह अनमोल धरोहर है।*

*बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है।* 

*अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

स्वयं का मूल्यांकन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒स्वयं का मूल्यांकन💐💐*
*एक शहर में बहुत ही ज्ञानी प्रतापी साधु महाराज आये हुए थे, बहुत से दीन दुखी, परेशान लोग उनके पास उनकी कृपा दृष्टि पाने हेतु आने लगे. ऐसा ही एक दीन दुखी, गरीब आदमी उनके पास आया और साधु महाराज से बोला ‘महाराज में बहुत ही गरीब हूँ, मेरे ऊपर कर्जा भी है, मैं बहुत ही परेशान हूँ। मुझ पर कुछ उपकार करें’. साधु महाराज ने उसको एक चमकीला नीले रंग का पत्थर दिया, और कहा ‘कि यह कीमती पत्थर है, जाओ जितनी कीमत लगवा सको लगवा लो। वो आदमी वहां से चला गया और उसे बचने के इरादे से अपने जान पहचान वाले एक फल विक्रेता के पास गया और उस पत्थर को दिखाकर उसकी कीमत जाननी चाही।*
 
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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फल विक्रेता बोला ‘मुझे लगता है ये नीला शीशा है, महात्मा ने तुम्हें ऐसे ही दे दिया है, हाँ यह सुन्दर और चमकदार दिखता है, तुम मुझे दे दो, इसके मैं तुम्हें 1000 रुपए दे दूंगा। वो आदमी निराश होकर अपने एक अन्य जान पहचान वाले के पास गया जो की एक बर्तनों का व्यापारी था. उनसे उस व्यापारी को भी वो पत्थर दिखाया और उसे बचने के लिए उसकी कीमत जाननी चाही। बर्तनो का व्यापारी बोला ‘यह पत्थर कोई विशेष रत्न है में इसके तुम्हें 10,000 रुपए दे दूंगा. वह आदमी सोचने लगा की इसके कीमत और भी अधिक होगी और यह सोच वो वहां से चला आया।

उस आदमी ने इस पत्थर को अब एक सुनार को दिखाया, सुनार ने उस पत्थर को ध्यान से देखा और बोला ये काफी कीमती है इसके मैं तुम्हें 1,00,000 रूपये दे दूंगा। वो आदमी अब समझ गया था कि यह बहुत अमुल्य है, उसने सोचा क्यों न मैं इसे हीरे के व्यापारी को दिखाऊं, यह सोच वो शहर के सबसे बड़े हीरे के व्यापारी के पास गया। उस हीरे के व्यापारी ने जब वो पत्थर देखा तो देखता रह गया, चौकने वाले भाव उसके चेहरे पर दिखने लगे. उसने उस पत्थर को माथे से लगाया और और पुछा तुम यह कहा से लाये हो. यह तो अमुल्य है. यदि मैं अपनी पूरी सम्पति बेच दूँ तो भी इसकी कीमत नहीं चुका सकता।

*👨‍👩‍👧‍👦▶️शिक्षा:-*
*👩हम अपने आप को कैसे आँकते हैं.  क्या हम वो हैं जो राय दूसरे हमारे बारे में बनाते हैं। आपका जीवन  अमूल्य है आपके जीवन का कोई मोल नहीं लगा सकता। आप वो कर सकते हैं जो आप अपने बारे में सोचते हैं। कभी भी दूसरों के नकारात्मक विचारों से अपने आप को कम मत आंकियें।आप सभी इस मनुष्य भव में रत्नत्रय नामक अमूल्य रत्न को अपने जीवन में धारण कर यह जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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बुधवार, 23 फ़रवरी 2022

विध्याभ्यास

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒विद्याभ्यास  💐💐*

*👨‍👩‍👧‍👦आज की यह कहानी उनसभी वर्ग  के लिए है जिनकी याददाश्त कमजोर है।सतत अभ्यास के लिए हमारा भोजन भी शाकाहारी व सात्विक होना चाहिए।*

👨‍👩‍👧‍👦🤝प्राचीनकाल में एक गुरुकुल से एक विद्यार्थी स्नातक की उपाधि प्राप्त करके जब घर जाने लगा, तो गुरुजी ने उसे उपदेश दिया कि प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य पढ़ना और पढ़ाना चाहिए।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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*शिष्य ने गुरु की बात गांठ बांध ली। घर वापस आकर उसने प्रतिदिन अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया। लेकिन गुरु की आज्ञा के अनुसार प्रतिदिन पढ़ाना भी आवश्यक था। इसके लिए उसने गांव के बच्चों को पढ़ाने का विचार किया।*

*उसने ग्रामीणों से बात की तो वे अपने बच्चों को उसके पास भेजने को तैयार हो गए। विद्यालय से वापस आकर बच्चे उस स्नातक के पास अध्ययन के लिए आने लगे। धीरे-धीरे वे बच्चे इतने होशियार हो गए कि विद्यालय में अपने शिक्षकों के पढ़ाने में भी कमियां निकालने लगे।*

*शिक्षकों ने सोचा कि ये अचानक इतने तेज कैसे हो गए ? पता करने पर पता चला कि गांव में एक स्नातक आया है जो रोज इन बच्चों को पढ़ाता है। शिक्षकों ने सोचा कि वही इन्हें सिखाता होगा कमियां निकालने के लिए।*

*इसलिए सभी शिक्षकों ने मिलकर विचार किया कि बच्चों को इसके पास जाने से रोका जाए। सभी ने किसी बच्चे को प्रलोभन देकर तो किसी को भय दिखाकर स्नातक के पास पढ़ने जाने से रोक दिया।*

*दूसरे दिन बच्चे उसके पास पढ़ने नहीं गए। तब दूसरे दिन शिक्षकों ने सोचा कि चलकर देखना चाहिए कि अब वह स्नातक क्या कर रहा है ? जब वे लोग उसके घर पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उसके घर के सामने दस-बारह खूंटे गड़े हैं और वह उनके सामने बैठकर विद्याभ्यास कर रहा है।*

*शिक्षकों ने उससे पूछा कि यह क्या है ? तब उसने उत्तर दिया कि मुझे केवल विद्याभ्यास से मतलब है। जब बच्चे नहीं आ रहे हैं तो मैं इन खूँटों के सामने ही अभ्यास कर रहा हूँ। यह सुनकर सभी शिक्षकों को आभास हुआ कि यह सच्चा विद्याध्यायी है।* 

*उन्होंने उसे आचार्य की उपाधि प्रदान की। संस्कृत में खूंटे को शंकु कहा जाता है। इसलिए उसका नाम आचार्य शंकुक पड़ा। जो कि काव्यशास्त्र एवं न्यायशास्त्र के मूर्धन्य विद्वान माने जाते हैं। जिनका रस संबंधी अभिमत- अनुमितिवाद (चित्र- तुरगन्याय) आज भी पढ़ा और पढ़ाया जाता है।*

*किसी भी विद्या अथवा कला का नियमित अभ्यास आवश्यक है। अन्यथा वह क्षीण हो जाती है। इसलिए विद्यार्थियों, विद्वानों एवं कलाकारों को नियमित अभ्यास अवश्य करना चाहिए।"*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

जीव का मोह

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒जीव का मोह💐💐*

*👨‍👩‍👧‍👦आज हम इस कहानी के माध्यम से समझ सकते है कि हमारा स्वयं का मोह कितना हैं।*
राजा परीक्षित को श्री पुराण सुनातें हुए जब शुकदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और तक्षक (सर्प) के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ। अपने मरने की घड़ी निकट आता देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था।

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तब शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।  

राजन! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया, संयोगवश वह रास्ता भूलकर घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि हो गई और वर्षा होने लगी। राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।

कुछ दूरी पर उसे एक दीपक जलता हुआ दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था, अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था।

वह झोंपड़ी बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त थी। उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहरने देने के लिए प्रार्थना की।
बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी - कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं।

उन्हें इस झोंपड़ी की गंध ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ, इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।
राजा ने प्रतिज्ञा की, कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, उसे तो सिर्फ एक रात काटनी है।

तब बहेलिये ने राजा को वहाँ ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली करने की शर्त को दोहरा दिया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा।

सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह जब उठा तो वही सबसे परम प्रिय लगने लगा। राजा जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा। और बहेलिये से वहीं ठहरने की प्रार्थना करने लगा।

इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा।

राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने "परीक्षित" से पूछा, "परीक्षित" बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था?

परीक्षित ने उत्तर दिया, भगवन् ! वह राजा कौन था, उसका नाम तो बताइये? मुझे वह तो मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक वहाँ रहना चाहता है। उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है।

श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा, हे राजा परीक्षित! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।

इस मल-मूत्र की गठरी "देह(शरीर)" में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?"

राजा परीक्षित का ज्ञान जाग गया और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।

"वस्तुतः यही सत्य है।"

*जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि, हे भगवन् ! मुझे यहाँ (इस कोख) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा। और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो (उस राजा की तरह हैरान होकर) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया (और पैदा होते ही रोने लगता है) फिर धीरे धीरे उसे उस गंध भरी झोंपड़ी की तरह यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

एकता का बल

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒एकता का बल💐💐*
एक वन में बहुत बडा़ अजगर रहता था। वह बहुत अभिमानी और अत्यंत क्रूर था। जब वह अपने बिल से निकलता तो सब जीव उससे डरकर भाग खड़े होते। 
उसका मुंह इतना विकराल था कि खरगोश तक को निगल जाता था। 
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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एक बार अजगर शिकार की तलाश में घूम रहा था। सारे जीव अजगर को बिल से निकलते देखकर भाग चुके थे । जब अजगर को कुछ न मिला तो वह क्रोधित होकर फुफकारने लगा और इधर-उधर खाक छानने लगा।

 वहीं निकट में एक हिरणी अपने नवजात शिशु को पत्तियों के ढेर के नीचे छिपाकर स्वयं भोजन की तलाश में दूर निकल गई थी। अजगर की फुफकार से सूखी पत्तियां उड़ने लगी और हिरणी का बच्चा नजर आने लगा।

 अजगर की नजर उस पर पड़ी हिरणी का बच्चा उस भयानक जीव को देखकर इतना डर गया कि उसके मुंह से चीख तक न निकल पाई। अजगर ने देखते-ही-देखते नवजात हिरण के बच्चे को निगल लिया। तब तक हिरणी भी लौट आई थी, पर वह क्या करती ? आंखों में आंसू भरके दूर से अपने बच्चे को काल का ग्रास बनते देखती रही।

 हिरणी के शोक का ठिकाना न रहा। उसने किसी-न किसी तरह अजगर से बदला लेने की ठान ली। हिरणी की एक नेवले से दोस्ती थी। शोक में डूबी हिरणी अपने मित्र नेवले के पास गई और रो-रोकर उसे अपनी दुखभरी कथा सुनाई।

 नेवले को भी बहुते दु:ख हुआ। वह दुख-भरे स्वर में बोला मित्र, मेरे बस में होता तो मैं उस नीच अजगर के सौ टुकडे़ कर डालता। पर क्या करें, वह छोटा-मोटा सांप नहीं है, जिसे मैं मार सकूं वह तो एक अजगर है। 

अपनी पूंछ की फटकार से ही मुझे अधमरा कर देगा। लेकिन यहां पास में ही चीटिंयों की एक बांबी हैं। वहां की रानी मेरी मित्र हैं। उससे सहायता मांगनी चाहिए। 

हिरणी ने निराश स्वर में विलाप किया “पर जब तुम्हारे जितना बडा़ जीव उस अजगर का कुछ बिगाड़ने में समर्थ नहीं हैं तो वह छोटी-सी चींटी क्या कर लेगी?” नेवले ने कहा 'ऐसा मत सोचो। उसके पास चींटियों की बहुत बडी़ सेना हैं। संगठन में बडी़ शक्ति होती हैं।' हिरणी को कुछ आशा की किरण नजर आई। नेवला हिरणी को लेकर चींटी रानी के पास गया और उसे सारी कहानी सुनाई। चींटी रानी ने सोच-विचार कर कहा 'हम तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे ।

 हमारी बांबी के पास एक संकरीला नुकीले पत्थरों भरा रास्ता है। तुम किसी तरह उस अजगर को उस रास्ते पर आने के लिए मजबूर करो।

 बाकी काम मेरी सेना पर छोड़ दो। नेवले को अपनी मित्र चींटी रानी पर पूरा विश्वास था इसलिए वह अपनी जान जोखिम में डालने पर तैयार हो गया। दूसरे दिन नेवला जाकर सांप के बिल के पास अपनी बोली बोलने लगा। 

अपने शत्रु की बोली सुनते ही अजगर क्रोध में भरकर अपने बिल से बाहर आया। नेवला उसी संकरे रास्ते वाली दिशा में दौड़ाया। अजगर ने पीछा किया। 

अजगर रुकता तो नेवला मुड़कर फुफकारता और अजगर को गुस्सा दिलाकर फिर पीछा करने पर मजबूर करता। इसी प्रकार नेवले ने उसे संकरीले रास्ते से गुजरने पर मजबूर कर दिया। नुकीले पत्थरों से उसका शरीर छिलने लगा। 

जब तक अजगर उस रास्ते से बाहर आया तब तक उसका काफ़ी शरीर छिल गया था और जगह-जगह से ख़ून टपक रहा था। उसी समय चींटियों की सेना ने उस पर हमला कर दिया। चींटियां उसके शरीर पर चढ़कर छिले स्थानों के नंगे मांस को काटने लगीं। अजगर तड़प उठा। 

उसके शरीर से खुन टपकने लगा जिससे मांस और छिलने लगा और चींटियों को आक्रमण के लिए नए-नए स्थान मिलने लगे। अजगर चींटियों का क्या बिगाड़ता? वे हजारों की गिनती में उस पर टूट पढ़ रही थीं। कुछ ही देर में क्रूर ने अजगर तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया।
*सीख- संगठन शक्ति बड़े-बड़ों को धूल चटा देती है। क्योंकि*
*संगठन में - कायदा नहीं, व्यवस्था होती है।*
*संगठन में - सुचना नहीं, समझ होती है।*
*संगठन में - क़ानून नहीं, अनुशासन होता है।*
*संगठन में - भय नहीं, भरोसा होता है।*
*संगठन में - शोषण नहीं, पोषण होता है।*
*संगठन में - आग्रह नहीं, आदर होता है।*
*संगठन में - संपर्क नहीं, सम्बन्ध होता है।*
*संगठन में - अर्पण नहीं, समर्पण होता है।*

*इस लिए स्वयं को संगठन से जोड़े रखें।*
*संगठन सामूहिक हित के लिए होता है।*
*व्यक्तिगत स्पर्धा और स्वार्थ के लिए नहीं।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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रविवार, 20 फ़रवरी 2022

सच्चे गुरु का महत्व

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒सच्चे गुरु का महत्व 💐💐*

एक सदगुरु रोज अपने शिष्यों को सच्चाज्ञान ( रत्नत्रय ) पढ़ाते थे। सभी शिष्य इससे खुश थे लेकिन एक शिष्य चिंतित दिखा। संत ने उससे इसका कारण पूछा। 

शिष्य ने कहा- गुरुदेव, मुझे आप जो कुछ पढ़ाते हैं, वह समझ में नहीं आता, मैं इसी वजह से चिंतित और दुखी हूं। गुरु ने कहा- कोयला ढोने वाली टोकरी में जल भर कर ले आओ। शिष्य चकित हुआ, आखिर टोकरी में कैसे जल भरेगा?
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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 लेकिन चूंकि गुरु ने यह आदेश दिया था, इसलिए वह टोकरी में नदी का जल भरा और दौड़ पड़ा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जल टोकरी से छन कर गिर पड़ा। उसने टोकरी में जल भर कर कई बार गुरु जी तक दौड़ लगाई लेकिन टोकरी में जल टिकता ही नहीं था। तब वह अपने गुरुदेव के पास गया और बोला- गुरुदेव, टोकरी में पानी ले आना संभव नहीं, कोई फायदा नहीं। गुरु बोले- फायदा है। टोकरी में देखो। शिष्य ने देखा- बार बार पानी में कोयले की टोकरी डुबाने से स्वच्छ हो गई है। उसका कालापन धुल गया है।

 गुरु ने कहा- ठीक जैसे कोयले की टोकरी स्वच्छ हो गई और तुम्हें पता भी नहीं चला। उसी तरह सच्चाज्ञान  बार बार सुनने से ही कृपा शुरू हो जाती है । भले ही अभी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा है लेकिन तुम सच्चाज्ञान  का लाभ अपने जीवन मे जब आचरण मे उतारोगे तब जरुर महसूस करोगे और हमेशा गुरु की कृपादृष्टि तुम पर बनी रहेगी! इससे तुम चाहते हुए भी गलत कार्यों में लिप्त नहीं हो पाओगे।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

जीवों की पहचान

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦उपयोगी काम की बातें*
*💪👩‍🚒जीवों की पहचान*

*👨‍👩‍👧‍👦विशेष महत्वपूर्ण उपयोगी जानकारी*

*✍️माँसाहारी या शाकाहारी* -
    *कैसे पहचानेंगे??*

#आज हमें एक शिशु मन्दिर में जाना हुआ तो बच्चों में बड़ा उत्साह था जैसे किसी जादूगर के आने पर होता है,,
*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

बात शुरू हुई तो मैंने बच्चों से पूछा – आप लोग कहीं जा रहे हैं, सामने से कोई कीड़ा मकोड़ा या कोई साँप छिपकली या कोई गाय भैंस या अन्य कोई ऐसा विचित्र जीव दिख गया जो आपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा, तो प्रश्न यह है कि आप कैसे पहचानेंगे कि वह जीव *अंडे* देता है *या  बच्चे*?  क्या पहचान है उसकी?

बच्चे मौन रहे बस आंतरिक खुसर फुसर चलती रही..... 

मिनट दो मिनट बाद मैंने ही बताया कि बहुत आसान है,, जिनके भी *कान बाहर* दिखाई देते हैं *वे सब बच्चे देते हैं* और जिन जीवों के *कान बाहर नहीं* दिखाई देते *वे अंडे* देते हैं.... 

फिर दूसरा प्रश्न पूछा – ये बताइए आप लोगों के सामने एकदम कोई प्राणी आ गया,, आप कैसे पहचानेंगे की यह *शाकाहारी है या मांसाहारी?*  क्योंकि आपने तो उसे भोजन करते देखा नहीं है, बच्चों में फिर वही कौतूहल और खुसर फ़ुसर की आवाजें..... 

मैंने कहा – देखो भाई बहुत आसान है,, जिन जीवों की *आँखों की बाहर की यानी ऊपरी संरचना गोल है वे सब माँसाहारी हैं*  जैसे कुत्ता, बिल्ली, बाज, चिड़िया, शेर, भेड़िया, चील,, या अन्य कोई भी आपके आस पास का जीव जंतु जिसकी आँखे गोल हैं वह माँसाहारी है,, ठीक उसी तरह जिसकी *आँखों की बाहरी संरचना लंबाई लिए हुए है, वे सब शाकाहारी हैं*  जैसे हिरन,, गाय, हाथी, बैल, भैंस, बकरी,, इनकी आँखे बाहर की बनावट में लंबाई लिए होती है  .... 

अब ये बताओ कि मनुष्य की आँखें गोल हैं या लंबाई वाली,,, सब बच्चों ने कहा कि लंबाई वाली,, मैंने फिर पूछा कि यह बताओ इस हिसाब से मनुष्य शाकाहारी जीव हुआ या माँसाहारी??सबका उत्तर था #शाकाहारी,,
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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फिर दूसरी बात यह बताई कि जिन भी *जीवों के नाखून तीखे नुकीले होते हैं वे सब माँसाहारी* होते हैं  जैसे शेर बिल्ली, कुत्ता बाज गिद्ध या अन्य कोई तीखे नुकीले नाखूनों वाला जीव.... 

जिनके *नाखून चौड़े चपटे होते हैं वे सब शाकाहारी* होते हैं  जैसे गाय, घोड़ा, गधा, बैल, हाथी, ऊँट, बकरी..... 

अब ये बताओ बालकों कि मनुष्य के नाखून तीखे नुकीले हैं या चौड़े चपटे??

बालकों ने कहा कि चौड़े चपटे,, अब ये बताओ इस हिसाब से मनुष्य कौनसे जीवों की श्रेणी में हुआ??सब बालकों ने कहा कि शाकाहारी,,,

फिर तीसरी बात बताई,, जिन भी *जीवों पशु प्राणियों को पसीना आता है वे सब शाकाहारी* होते हैं जैसे घोड़ा बैल गाय भैंस खच्चर आदि अनेकों प्राणी... 

*माँसाहारी जीवों को पसीना नहीं आता है, इसलिए कुदरती तौर पर वे जीव अपनी #जीभ निकालकर लार टपकाते हुए हाँफते रहते हैं* इस प्रकार वे अपनी शरीर की गर्मी को नियंत्रित करते हैं.... 

तो प्रश्न यह है कि मनुष्य को पसीना आता है या जीभ से एडजस्ट करता है??

बालकों ने कहा कि पसीना आता है,अच्छा यह बताओ कि इस बात से मनुष्य कौनसा जीव सिद्ध हुआ, सबने एकसाथ कहा – शाकाहारी... 

ऐसे ही अनेकों विषयों पर बच्चों से बात की, आनंद आ गया.... 

*#सभी लोग विशेषकर अध्यापन से जुड़े भाई बहन चाहें तो बच्चों को सीखने पढ़ाने के लिए इस तरह बातचीत की शैली विकसित कर सकते हैं, इससे जो वे समझेंगे सीखेंगे वह उन्हें जीवनभर काम आएगा याद रहेगा, पढ़ते वक्त बोर भी नहीं होंगे....*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

महत्त्वपूर्ण संदेश

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒महत्वपूर्ण संदेश💐💐*

*👨‍👩‍👧‍👦वर्तमान के राजकुमारों जो अपनी राजकुमारी की तलाश जारी है।उनके लिए यह विशेष संदेश। विवाह एक खेल नहीं बल्कि स्वयं, परिवार, समाज, राष्ट्र को मजबूत करने का साधन है।यह हँसी खेल नहीं ,यह वर्तमान की आवश्यकता है।*

एक युवा युगल के पड़ोस में एक वरिष्ठ नागरिक युगल रहते थे , जिनमे पति की आयु लगभग अस्सी वर्ष थी , और पत्नी की आयु उनसे लगभग पांच वर्ष कम थी .
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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युवा युगल उन वरिष्ठ युगल से बहुत अधिक लगाव रखते थे , और उन्हें दादा दादी की तरह सम्मान देते थे . इसलिए हर रविवार को वो उनके घर उनके स्वास्थ्य आदि की जानकारी लेने और कॉफी पीने जाते थे .

युवा युगल ने देखा कि हर बार दादी जी जब कॉफ़ी बनाने रसोईघर में जाती थी तो कॉफ़ी की शीशी के ढक्कन को दादा जी से खुलवाती थी .

इस बात का संज्ञान लेकर युवा पुरुष ने एक ढक्कन खोलने के यंत्र को लाकर दादी जी को उपहार स्वरूप दिया ताकि उन्हें कॉफी की शीशी के ढक्कन को खोलने की सुविधा हो सके .

उस युवा पुरुष ने ये उपहार देते वक्त इस बात की सावधानी बरती की दादा जी को इस उपहार का पता न चले ! उस यंत्र के प्रयोग की विधि भी दादी जी को अच्छी तरह समझा दी .

उसके अगले रविवार जब वो युवा युगल उन वरिष्ठ नागरिक के घर गया तो वो ये देख के आश्चर्य में रह गया कि दादी जी उस दिन भी कॉफी की शीशी के ढक्कन को खुलवाने के लिए दादा जी के पास लायी ! 

युवा युगल ये सोचने लगे कि शायद दादी जी उस यंत्र का प्रयोग करना भूल गयी या वो यंत्र काम नही कर रहा !

जब उन्हें एकांत में अवसर मिला तो उन्होंने दादी जी से उस यंत्र के प्रयोग न करने का कारण पूछा . दादी जी के उत्तर ने उन्हें निशब्द कर दिया..! 

दादी जी ने कहा - "ओह ! कॉफी की शीशी के ढक्कन को मैं स्वयं भी अपने हाथ से , बिना उस यंत्र के प्रयोग के आसानी से खोल सकती हूँ , पर मैं कॉफी की शीशी का ढक्कन उनसे इसलिए खुलवाती हूँ कि उन्हें ये अहसास रहे कि आज भी वो मुझसे ज्यादा मजबूत हैं . और मैं उन्हीं पर आश्रित हूँ , इसीलिए वे हमारे घर के पुरुष हैं ! 

इस बात से मुझे भी ये लाभ मिलता है कि मैं ये महसूस करती हूँ कि मैं आज भी उन पर निर्भर हूँ , और वो मेरे लिए आज भी बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं . यही बात हम दोनों के स्नेह के बंधन को शक्ति प्रदान करती है .

किसी भी युगल की एकजुटता ही उनके सम्बन्ध की बुनियाद होती है ! अब हम दोनों के पास अधिक आयु नही बची है , इसलिए हमारी एकजुटता हम दोनों के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ."
*👨‍👩‍👧‍👦▶️नोट : - पुराने जमाने में सभी के उपर संस्कार रहने के कारण परिवार के सदस्य अपने कर्तव्यों का पालन करते थे।वर्तमान में संस्कार विहीन होने से विवाह के पहले कुंडली मिलान किया जाता है।कारण यह है कि कम से कम पति-पत्नी दोनों के बीच में सामंजस्य बना रहे।यह विशेष कारण से विवाह के पहले कुंडली मिलान करना आवश्यक है।अन्यथा आज वर्तमान में अनेक परिवार का शादी के कुछ समय बाद ही तलाक हो जाता है।*

*शिक्षा:-*
उस युवा युगल को एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीख मिली. वरिष्ठ नागरिक चाहे घर में किसी भी प्रकार की आमदनी का कोई सहयोग ना दे रहे हों, पर उनके अनुभव हमें पल पल महत्वपूर्ण सीख देते रहते है..!!
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

संस्कारवान बेटी

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒संस्कारवान बेटी💐💐*

*👨‍👩‍👧‍👦एक पिता ने अपनी बेटी की सगाई करवाई!!*
लड़का बड़े अच्छे घर से था!
तो पिता बहुत खुश हुए!
लड़के ओर लड़के के माता पिता का स्वभाव~~!!
बड़ा अच्छा था!
तो पिता के सिर से बड़ा बोझ उतर गया~~!!
एक दिन शादी से पहले!
लड़के वालो ने लड़की के पिता को खाने पे बुलाया~~!!

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पिता की तबीयत ठीक नहीं थी~~!!
फिर भी वह ना न कह सके!
लड़के वालो ने बड़े ही आदर सत्कार से उनका स्वागत किया~~!!
फ़िर लडकी के पिता के लिए चाय आई~~!!
शुगर कि वजह से लडकी के पिता को चीनी वाली चाय से दुर रहने को कहा गया था~~!!

लेकिन लड़की के होने वाली ससुराल घर में थे तो चुप रह कर चाय हाथ में ले ली~~!!
चाय कि पहली चुस्की लेते ही वो चोक से गये!चाय में चीनी बिल्कुल ही नहीं थी~~!! 
और इलायची भी डली हुई थी!

वो सोच मे पड़ गये कि ये लोग भी हमारी जैसी ही चाय पीते हैं~~!!

दोपहर में खाना खाया वो भी बिल्कुल उनके घर जैसा दोपहर में आराम करने के लिए दो तकिये पतली चादर!उठते ही सोंफ का पानी पीने को दिया गया~~!!

वहाँ से विदा लेते समय उनसे रहा नहीं गया तो पुछ बैठे मुझे क्या खाना है~~!!
क्या पीना है!मेरी सेहत के लिए क्या अच्छा है!
ये परफेक्टली आपको कैसे पता है!
.
तो बेटी कि सास ने धीरे से कहा कि कल रात को ही आपकी बेटी का फ़ोन आ गया था~~!!

ओर उसने कहा कि मेरे पापा स्वभाव से बड़े सरल हैं!
बोलेंगे कुछ नहीं प्लीज अगर हो सके!
तो आप उनका ध्यान रखियेगा!
.
पिता की आंखों मे वहीँ पानी आ गया था~~!!
लड़की के पिता जब अपने घर पहुँचे तो घर के हाल में लगी अपनी स्वर्गवासी माँ के फोटो से हार निकाल दिया~~!!

जब पत्नी ने पूछा कि ये क्या कर रहे हो!
तो लडकी का पिता बोले-मेरा ध्यान रखने वाली मेरी माँ इस घर से कहीं नहीं गयी है~~!!
बल्कि वो तो मेरी बेटी!
के रुप में इस घर में ही रहती है!

और फिर पिता की आंखों से आंसू झलक गये ओर वो फफक कर रो पड़े~~!!

दुनिया में सब कहते हैं ना!
कि बेटी है~~!!
एक दिन इस घर को छोड़कर चली जायेगी!

मगर मैं दुनिया के सभी माँ-बाप से ये कहना चाहता हूँ,
कि बेटी कभी भी अपने माँ-बाप के घर से नहीं जाती,
बल्कि वो हमेशा उनके दिल में रहती।
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

भक्ति का अर्थ

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒जानिये भक्ति का अर्थ* 

*👨‍👩‍👧‍👦🇳🇵✍️एक बड़ी सुंदर कहानी के माध्यम से ही हम सभी समझ सकते है कि हमारे अंदर भक्ति है या नहीं   ।* 
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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एक राजा था जो एक आश्रम को संरक्षण दे रहा था। यह आश्रम एक जंगल में था। इसके आकार और इसमें रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी और इसलिए राजा उस आश्रम के लोगों के लिए भोजन और वहां की इमारत आदि के लिए आर्थिक सहायता दे रहा था। यह आश्रम बड़ी तेजी से विकास कर रहा था। जो योगी इस आश्रम का सर्वेसर्वा था वह मशहूर होता गया और राजा के साथ भी उसकी अच्छी नजदीकी हो गई। ज्यादातर मौकों पर राजा उसकी सलाह लेने लगा। ऐसे में राजा के मंत्रियों को ईर्ष्या होने लगी और वे असुरक्षित महसूस करने लगे। एक दिन उन्होंने राजा से बात की – ‘हे राजन, राजकोष से आप इस आश्रम के लिए इतना पैसा दे रहे हैं। आप जरा वहां जाकर देखिए तो सही। वे सब लोग अच्छे खासे, खाते-पीते नजर आते हैं। वे आध्यात्मिक लगते ही नहीं।’ राजा को भी लगा कि वह अपना पैसा बर्बाद तो नहीं कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर योगी के प्रति उसके मन में बहुत सम्मान भी था। उसने योगी को बुलवाया और उससे कहा- ‘मुझे आपके आश्रम के बारे में कई उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिली हैं। ऐसा लगता है कि वहां अध्यात्म से संबंधित कोई काम नहीं हो रहा है। वहां के सभी लोग अच्छे-खासे मस्तमौला नजर आते हैं। ऐसे में मुझे आपके आश्रम को पैसा क्यों देना चाहिए?’ योगी बोला- ‘हे राजन, आज शाम को अंधेरा हो जाने के बाद आप मेरे साथ चले, मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं।’

रात होते ही योगी राजा को आश्रम की तरफ लेकर चला। राजा ने भेष बदला हुआ था। सबसे पहले वे राज्य के मुख्यमंत्री के घर पहुंचे। दोनों चोरी-छिपे उसके शयनकक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने एक बाल्टी पानी उठाया और उस पर फेंक दिया। मंत्री चौंककर उठा और गालियां बकने लगा। वे दोनों वहां से भाग निकले। फिर वे दोनों एक और ऐसे शख्स के यहां गए जो आश्रम को पैसा न देने की वकालत कर रहा था। वह राज्य का सेनापति था। दोनों ने उसके भी शयनकक्ष में झांका और एक बाल्टी पानी उस पर भी उड़ेल दिया। वह व्यक्ति और भी गंदी भाषा का प्रयोग करने लगा। 

इसके बाद योगी राजा को आश्रम ले कर गया। बहुत से संन्यासी सो रहे थे।

भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है।उन्होंने एक संन्यासी पर पानी फेंका। वह चौंककर उठा और उसके मुंह से निकला – शिव-शिव। फिर उन्होंने एक दूसरे संन्यासी पर इसी तरह से पानी फेंका। उसके मुंह से भी निकला – हे शंभो। योगी ने राजा को समझाया – ‘महाराज, अंतर देखिए। ये लोग चाहे जागे हों या सोए हों, इनके मन में हमेशा भक्ति रहती है। आप खुद फर्क देख सकते हैं।’ तो भक्त ऐसे होते हैं।

भक्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दिन और रात आप पूजा ही करते रहें। भक्त वह है जो बस हमेशा लगा हुआ है, अपने मार्ग से एक पल के लिए भी विचलित नहीं होता। वह ऐसा शख्स नहीं होता जो हर स्टेशन पर उतरता-चढ़ता रहे। वह हमेशा अपने मार्ग पर होता है, वहां से डिगता नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो यात्रा बेवजह लंबी हो जाती है।

भक्ति की शक्ति कुछ ऐसी है कि वह सृष्टा का सृजन कर सकती है। जिसे मैं भक्ति कहता हूं उसकी गहराई ऐसी है कि यदि ईश्वर नहीं भी हो, तो भी वह उसका सृजन कर सकती है, उसको उतार सकती है। जब भक्ति आती है तभी जीवन में गहराई आती है। भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है। उसे भक्ति के लिए किसी देवता की आवश्यकता नहीं होती और वहां ईश्वर मौजूद रहेंगे। भक्ति इसलिए नहीं आई, क्योंकि भगवान हैं। चूंकि भक्ति है इसीलिए भगवान है।
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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

उपयोगी काम की बातें

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*💪👩‍🚒झाड़ू को उल्‍टा रखना क्यों बुरा होता है* ......         
                                                  अक्सर बङे-बुजुर्ग घर में मौजूद चीजों को लेकर ज्ञान की बातें बताते रहते हैं। जिनका अच्छा और बुरा दोनों महत्व होता है। झाडू भी इन्हीं में से एक हैं जिसे लगाने और रखने के दौरान कई बातों ध्यान रखना जरूरी होता है। ऐसा कहा जाता है झाड़ू को उल्‍टा रखना बुरा होता है जबकि झाड़ू पर पैर मारने से मां लक्ष्‍मी नाराज हो जाती हैं। वास्‍तुशास्त्र में भी झाड़ू को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। तो आइए जानते हैं इसे लगाने और रखने के कुछ नियम…

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
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* पौराणिक ग्रंथों की मानें तो अंधेरा होने के बाद घर में कभी झाड़ू नहीं लगाना चाहिए। इसे अशुभ माना जाता है।
* जब कभी भी घर का सदस्य घर से बाहर जाए तो भी तुरंत झाड़ू नहीं लगाना चाहिए। इसे अशुभ माना जाता है। जब किसी के बाहर जाने के बाद झाडू लगाना जरूरी हो तो भी कम से कम 1 से 2 घंटे का इंतजार करना चाहिए।
* कभी भी झाड़ू पर न तो पैर रखना चाहिए और न ही झाड़ू पर पैर मारना चाहिए। ऐसा करने पर लक्ष्‍मी मां नाराज हो जाती है। जिस घर में झाडू का आदर किया जाता है उस घर में मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
* घर में कभी भी झाड़ू को उल्टा नहीं रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है इससे घर में कलह बढ़ती है।
* इस बात का ध्यान रखें की झाडू कभी घर से बाहर या छत पर नहीं रखी हो। इससे घर में चोरी होने का खतरा बना रहता है।
* झाडू को रखने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जहां से झाडू घर या बाहर के किसी भी सदस्य की नजर में न आए।
* जब कभी भी घर का कोर् छोटा बच्चा अचानक झाड़ू लगाने लगे तो इसका अर्थ होता है कि घर में कोई अनचाहा मेहमान आ सकता है।
* नया घर बनाने के बाद उसमें पुराना झाड़ू ले जाना अपशकुन माना जाता है।
* सपने में अगर कोई नई झाड़ू लेकर खड़ा दिखे तो यह सौभाग्य का प्रतीक होता है।
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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उपयोगी काम की बातें

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️उपयोगी बातें बड़े काम की*
*💪👩‍🚒झाड़ू को उल्‍टा रखना क्यों बुरा होता है* ......         
                                                  अक्सर बङे-बुजुर्ग घर में मौजूद चीजों को लेकर ज्ञान की बातें बताते रहते हैं। जिनका अच्छा और बुरा दोनों महत्व होता है। झाडू भी इन्हीं में से एक हैं जिसे लगाने और रखने के दौरान कई बातों ध्यान रखना जरूरी होता है। ऐसा कहा जाता है झाड़ू को उल्‍टा रखना बुरा होता है जबकि झाड़ू पर पैर मारने से मां लक्ष्‍मी नाराज हो जाती हैं। वास्‍तुशास्त्र में भी झाड़ू को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। तो आइए जानते हैं इसे लगाने और रखने के कुछ नियम…

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक  पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*
*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान  लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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* पौराणिक ग्रंथों की मानें तो अंधेरा होने के बाद घर में कभी झाड़ू नहीं लगाना चाहिए। इसे अशुभ माना जाता है।
* जब कभी भी घर का सदस्य घर से बाहर जाए तो भी तुरंत झाड़ू नहीं लगाना चाहिए। इसे अशुभ माना जाता है। जब किसी के बाहर जाने के बाद झाडू लगाना जरूरी हो तो भी कम से कम 1 से 2 घंटे का इंतजार करना चाहिए।
* कभी भी झाड़ू पर न तो पैर रखना चाहिए और न ही झाड़ू पर पैर मारना चाहिए। ऐसा करने पर लक्ष्‍मी मां नाराज हो जाती है। जिस घर में झाडू का आदर किया जाता है उस घर में मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
* घर में कभी भी झाड़ू को उल्टा नहीं रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है इससे घर में कलह बढ़ती है।
* इस बात का ध्यान रखें की झाडू कभी घर से बाहर या छत पर नहीं रखी हो। इससे घर में चोरी होने का खतरा बना रहता है।
* झाडू को रखने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जहां से झाडू घर या बाहर के किसी भी सदस्य की नजर में न आए।
* जब कभी भी घर का कोर् छोटा बच्चा अचानक झाड़ू लगाने लगे तो इसका अर्थ होता है कि घर में कोई अनचाहा मेहमान आ सकता है।
* नया घर बनाने के बाद उसमें पुराना झाड़ू ले जाना अपशकुन माना जाता है।
* सपने में अगर कोई नई झाड़ू लेकर खड़ा दिखे तो यह सौभाग्य का प्रतीक होता है।
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*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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सोमवार, 14 फ़रवरी 2022

निस्वार्थ सेवा से.......

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒निस्वार्थ सेवा से.......💐💐*
एक बार एक गांव में जगत सिंह नाम का व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता था। वह अपने गांव से शहर की ओर जाने वाली डेली बस में कंडक्टर का काम करता था। वह रोज सुबह जाता था और शाम को अंतिम स्टेशन पर उतरकर घर वापिस चला आता था।
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एक दिन की बात है कि जब शाम को बस का अंतिम स्टेशन आ गया तो उसने देखा कि बस के सभी यात्री उतर चुके हैं, परंतु अंतिम सीट पर एक बुजुर्ग महिला एक पोट्ली लिये हुए अभी तक बैठी हुई है । जगत सिंह ने उस महिला के पास जाकर कहा,” माता जी, यह अंतिम स्टेशन आ गया है। गाड़ी आगे नहीं जाएगी इसलिये आप उतर जाइए।“ यह सुनते ही वह बुजुर्ग महिला उदास हो गयी और कहने लगी,” बेटा मैं कहॉ जाउंगी? मेरा कोई नहीं घर नही और कोइ सगा भी नही।” जगत सिह ने उसके परिवार/अता-पता पूछा लेकिन महिला कुछ भी बता नही पा रही थी। जब काफी देर हो गयी तो जगत सिह ने सोचा कि इस बुजुर्ग बेसहारा महिला को अपने साथ घर ले चलूं। फिर उसने कहा,” माता जी आप मेरे घर चलो। यह सुनकर महिला अपनी पोट्ली साथ लेकर चल पडी।
घर जाकर जगत सिह ने पत्नी को सारा किस्सा सुनाया। पहले तो उसकी पत्नि सुलोचना उस बुजुर्ग महिला को घर पर रखने को तैयार न थी लेकिन जगत सिह के समझाने के बाद वह मान गयी। अब घर पर एक कमरा जो खाली था, उसी में वह बुजुर्ग महिला रहने लगी। जगत सिंह और सुलोचना दोनो उसका ख्याल रखने लगे। सुलोचना प्रतिदिन उसे खाना देती थी, उसकी सेवा करती थी। इस तरह वे नि:स्वार्थ भाव से उसकी सेवा करते रहे। इस तरह दो साल बीत गये और फिर एक दिन उस बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो ग़यी। उस महिला के पास जो पोट्ली थी, उसे अभी तक किसी ने खोला नही था। बुजुर्ग महिला का अंतिम संस्कार करने के बाद जब जगत सिह ने पोट्ली को खोला तो उसकी आंखे फटी रह गयी। वह पोट्ली नोटों से व पुराने गहनों से भरी थी। जब नोट गिने तो दस लाख रुपये ओर पांच लाख के आभूषण निकले। जगत सिह और उसकी पत्नि को यकीन ही नही हो रहा था कि जिस बुजुर्ग महिला को वह बेसहारा समझ कर बिना किसी स्वार्थ के सेवा कर रहे थे, वह उनके लिये इतना धन छोड कर जायेगी।

*मनुष्य द्वारा समाज व देश में समय-समय पर अनेक प्रकार की सेवाएं की जाती हैं लेकिन उनमें यदि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप कहीं स्वार्थ छुपा हुआ है तो वह सेवा, सेवा नहीं कहलाती । धर्मग्रन्थों के अनुसार अपने तन-मन-धन का अभिमान त्याग कर निष्काम व निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही फलदायी साबित होती है। निस्वार्थ भाव की सेवा ही प्रभु भक्ति का उत्कृष्ट नमूना है। जो सेवा स्वार्थ भाव से की जाए तो स्वार्थपूर्ती होते ही उस सेवा का फल भी समाप्त हो जाता है। निस्वार्थ सेवा करते रहिए शायद आप का रंग औरों पर भी चढ़ जाये,जिसे भी आवश्यकता हो निःस्वार्थ सेवा भाव से उसकी मदद करें। आपको एक विशिष्ट शांति प्राप्त होगी।*

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निस्वार्थ सेवा से.......

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एक बार एक गांव में जगत सिंह नाम का व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता था। वह अपने गांव से शहर की ओर जाने वाली डेली बस में कंडक्टर का काम करता था। वह रोज सुबह जाता था और शाम को अंतिम स्टेशन पर उतरकर घर वापिस चला आता था।
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एक दिन की बात है कि जब शाम को बस का अंतिम स्टेशन आ गया तो उसने देखा कि बस के सभी यात्री उतर चुके हैं, परंतु अंतिम सीट पर एक बुजुर्ग महिला एक पोट्ली लिये हुए अभी तक बैठी हुई है । जगत सिंह ने उस महिला के पास जाकर कहा,” माता जी, यह अंतिम स्टेशन आ गया है। गाड़ी आगे नहीं जाएगी इसलिये आप उतर जाइए।“ यह सुनते ही वह बुजुर्ग महिला उदास हो गयी और कहने लगी,” बेटा मैं कहॉ जाउंगी? मेरा कोई नहीं घर नही और कोइ सगा भी नही।” जगत सिह ने उसके परिवार/अता-पता पूछा लेकिन महिला कुछ भी बता नही पा रही थी। जब काफी देर हो गयी तो जगत सिह ने सोचा कि इस बुजुर्ग बेसहारा महिला को अपने साथ घर ले चलूं। फिर उसने कहा,” माता जी आप मेरे घर चलो। यह सुनकर महिला अपनी पोट्ली साथ लेकर चल पडी।
घर जाकर जगत सिह ने पत्नी को सारा किस्सा सुनाया। पहले तो उसकी पत्नि सुलोचना उस बुजुर्ग महिला को घर पर रखने को तैयार न थी लेकिन जगत सिह के समझाने के बाद वह मान गयी। अब घर पर एक कमरा जो खाली था, उसी में वह बुजुर्ग महिला रहने लगी। जगत सिंह और सुलोचना दोनो उसका ख्याल रखने लगे। सुलोचना प्रतिदिन उसे खाना देती थी, उसकी सेवा करती थी। इस तरह वे नि:स्वार्थ भाव से उसकी सेवा करते रहे। इस तरह दो साल बीत गये और फिर एक दिन उस बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो ग़यी। उस महिला के पास जो पोट्ली थी, उसे अभी तक किसी ने खोला नही था। बुजुर्ग महिला का अंतिम संस्कार करने के बाद जब जगत सिह ने पोट्ली को खोला तो उसकी आंखे फटी रह गयी। वह पोट्ली नोटों से व पुराने गहनों से भरी थी। जब नोट गिने तो दस लाख रुपये ओर पांच लाख के आभूषण निकले। जगत सिह और उसकी पत्नि को यकीन ही नही हो रहा था कि जिस बुजुर्ग महिला को वह बेसहारा समझ कर बिना किसी स्वार्थ के सेवा कर रहे थे, वह उनके लिये इतना धन छोड कर जायेगी।

*मनुष्य द्वारा समाज व देश में समय-समय पर अनेक प्रकार की सेवाएं की जाती हैं लेकिन उनमें यदि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप कहीं स्वार्थ छुपा हुआ है तो वह सेवा, सेवा नहीं कहलाती । धर्मग्रन्थों के अनुसार अपने तन-मन-धन का अभिमान त्याग कर निष्काम व निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही फलदायी साबित होती है। निस्वार्थ भाव की सेवा ही प्रभु भक्ति का उत्कृष्ट नमूना है। जो सेवा स्वार्थ भाव से की जाए तो स्वार्थपूर्ती होते ही उस सेवा का फल भी समाप्त हो जाता है। निस्वार्थ सेवा करते रहिए शायद आप का रंग औरों पर भी चढ़ जाये,जिसे भी आवश्यकता हो निःस्वार्थ सेवा भाव से उसकी मदद करें। आपको एक विशिष्ट शांति प्राप्त होगी।*

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रविवार, 13 फ़रवरी 2022

वर्तमान की बहुरानी

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒वर्तमान की बहुरानी💐💐*

आज प्रातःकाल फ़ोन की घंटी तो सुनी मगर आलस की वजह से रजाई में ही लेटी रही। उसके पति उत्तमजैन को आखिर उठना ही पड़ा। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी ।
 
इतनी सुबह कौन हो सकता है जो सोने भी नहीं देता, इसी चिड़चिड़ाहट में उसने फ़ोन उठाया। “हेल्लो, कौन” तभी दूसरी तरफ से आवाज सुन सारी नींद खुल गयी।

“जयजिनेन्द्र पापाजी।” “बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ग्यारह बजे की गाड़ी से जयपुर आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम दोपहर चार बजे की गाड़ी से वापिस लौट जायेंगे। ठीक है।” “हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।”
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फ़ोन रख कर वापिस कमरे में आ कर उसने रचना को बताया कि मम्मी पापा ग्यारह बजे की गाड़ी से आ रहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे ।

रजाई में घुसी रचना का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। “कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है।” गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। उत्तम हक्का बक्का हो उसे देखता ही रह गया।

जब वो बाहर आयी तो उत्तम  ने पूछा “क्या बनाओगी।” गुस्से से भरी रचना ने तुनक के जवाब दिया “अपने को तल के खिला दूँगी।” उत्तम चुप रहा और मुस्कराता हुआ तैयार होने में लग गया, स्टेशन जो जाना था।

थोड़ी देर बाद ग़ुस्सैल रचना को बोल कर कि वो मम्मी पापा को लेने स्टेशन जा रहा है वो घर से निकल गया। 

रचना गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी।

दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं की परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे तलने लगी तो कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ ख़तम किया ।

फुरसत की सांस लेते हुए सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी। उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ , खाएँ और वापिस जाएँ ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने उत्तम के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें उत्तम स्टेशन से लाया था। 

मम्मी ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा “अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है।
 
क्या उत्तम ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं।” जैसे मानो रचना के नींद टूटी हो “नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…. रर… रर। चलो आप अंदर तो आओ।” उत्तम तो अपनी मुस्कुराहट रोक नहीं पा रहा था। 

कुछ देर इधर उधर की बातें करने में बीत गया। थोड़ी देर बाद पापा ने कहाँ “रचना, गप्पे ही मारती रहोगी या कुछ खिलाओगी भी।” यह सुन रचना को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी-पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है। 

रचना बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी-पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। खाना ख़तम कर सब ड्राइंग रूम में आ बैठे। उत्तम  कुछ काम है अभी आता हुँ कह कर थोड़ी देर के लिए बाहर निकल गया।

उत्तम के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या  उत्तम ने बताया नहीं था की हम आ रहे हैं।”

तो अचानक रचना के मुँह से निकल गया “उसने सिर्फ यह कहाँ था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।” 

फिर क्या था रचना की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि ये मामला है।

बहुत दुखी मन से उन्होंने रचना को समझाया “बेटी, हम हों या उसके मम्मी-पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी-पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी।

जैसे उत्तम हमारी इज़्ज़त करता है उसी तरह तुम्हे भी उसके माता-पिता और सम्बन्धियों की इज़्ज़त करनी चाहिए। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना।”

रचना की आँखों में ऑंसू आ गए और अपने को शर्मिंदा महसूस कर उसने मम्मी को वचन दिया कि आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा ।

निश्चित ही हमे विचार करना होगा क्या यह ठीक है ।क्या.... ? यह घटना 10 में से 8 घरों में होती है ?..

*_हम ही अपने बड़े-बुजुर्गों माता-पिता का सम्मान नही करेंगे तो हमारा सम्मान कौन करेगा हम और आप भी तो एक दिन बूढ़े होंगे तब अगर यही काम हमारे बच्चे हमारे साथ करेंगे तो क्या हमें अच्छा लगेगा ?.._*

नही न ..!

*तो आओ हम  सब मिलकर समाज,राष्ट्र,देश ही नही पूरी दुनियां को एक नई दिशा दें जो कि हमारी संस्कृति है l*

*नोट :- आज समाज में इसप्रकार की विकृति आने का मुख्य कारण यह है कि एकल परिवार व अधिक उम्र में विवाह होना।कुंडली का सही मिलान नहीं होना, उम्र अधिक होने से अपनी मनमर्जी से चलना।जैनधर्म के संस्कारों को दबाकर रखना।पहले संयुक्त परिवार होने से संस्कार बने रहते थे।*
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शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

सत्यकथा

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
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राजस्थान में अलवर जिले के एक राजा थे, जिनका नाम महाराजा जयसिंह प्रभाकर था।
घटना करीब 1920 के समय की है, तब महाराजा जय सिंह लंदन में थे। 
*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*
एक बार की बात है जब वे राजा की पोशाक ना पहन कर साधारण वस्त्रों में ही लंदन घूमने हेतु चले गए थे। लन्दन में घूमते हुए उनकी दृष्टि Rolls Royce के शोरूम पर पड़ गयी। इस शोरूम के भीतर एक लक्ज़री गाड़ी खड़ी थी, जो कि राजा को बहुत पसंद आयी, तब वे उसे देखने के लिए शोरूम के भीतर चले गए अंदर चले गए लेकिन वह राजा आम कपड़ों में थे अतः उस शो रूम के कर्मचारियों ने उनको नहीं पहचाना तथा उन्हें कोई गरीब व्यक्ति जानकर शोरूम के बाहर निकल जाने को कह दिया।

राजा को उनके साथ हुआ यह तिरस्कृत व्यवहार बहुत बुरा लगा और यह बात उनके दिल में चुभ गई। फिर उन्होंने निश्चय कर लिया कि वह ‘रोल्स रॉयस’ से अपने इस अपमान का बदला लेकर रहेंगे इसलिए फिर महाराजा जय सिंह प्रभाकर पुनः अपने राजा की पोशाक में ही ‘रोल्स रॉयस’ शोरूम के-के भीतर गए। 

शो-रूम के कर्मचारियों को पहले से ही बता दिया गया था कि अलवर के महाराजा इस शोरूम से गाड़ी खरीदने आ रहे हैं, अतः उन कर्मचारियों ने राजा जय सिंह का बहुत स्वागत सत्कार किया। राजा ने अपना समय व्यर्थ किए बिना ‘रोल्स रॉयस’ की कई सारी गाड़ियाँ एक साथ ख़रीदने का फरमान दे दिया।

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कहा जाता है कि राजा ने उन सभी गाड़ियों को नकद रुपये देकर खरीदा था। शोरूम के सारे कर्मचारी बहुत प्रसन्न हो गए क्योंकि आज इनको इतना बड़ा ऑर्डर मिला था लेकिन, वे कर्मचारी नहीं जानते थे कि महाराजा जय सिंह उनकी इन शाही गाड़ियों के साथ क्या करने वाले थे।

वे तो यही सोच रहे थे कि राजा को उन की गाड़ियाँ बहुत पसंद आई इसलिए उन्होंने उनकी गाड़ियाँ खरीदी। इसके बाद जैसे ही गाड़ियाँ भारत में पहुँची, महाराजा जय सिंह ने यह सभी गाड़ियाँ नगरपालिका को दे दी और उनको यह भी आदेश दिया कि आज से इन गाड़ियों में ही कचरा उठाने का कार्य किया जाएगा।

राजा ने जब नगरपालिका को इस तरह का आदेश दिया, तब इस के बाद ‘रोल्स रॉयस’ की गाड़ियों का सभी मज़ाक उड़ाने लगे। लोग इन खरीदना पसंद नहीं करते थे सब सोचते थे कि जिन गाड़ियों में भारत के लोग कचरा ढोते हैं ऐसी गाड़ियों को हम क्यों खरीदें। 

ऐसा कहा जाता है कि बाद में इस कंपनी ने राजा जयसिंह को एक माफी पत्र लिखा और अपने कर्मचारियों द्वारा किए गए ऐसे बुरे व्यवहार के लिए उनसे माफी भी मांगी थी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी निवेदन किया कि रोल्स रॉयस कंपनी की गाड़ियों से कचरा उठाने का कार्य बंद करवा दिया जाए।

महाराजा जय सिंह ने कंपनी का यह निवेदन स्वीकार किया और उसे माफ़ कर दिया, साथ ही उन्होंने इन गाड़ियों से कचरा उठाने का कार्य भी बंद करवा दिया। 

महाराजा जयसिंह के इस कार्य से ऐसे लोगों को अच्छा सबक मिला था जो मनुष्यों की पहचान उसके वस्त्रों से करते हैं। 

किसी मनुष्य की पहचान उसके कपड़ों से नहीं होती है। किसी गरीब व्यक्ति का तिरस्कार करना भी ठीक नहीं है, हमें गरीब अमीर ऊंच-नीच जैसे भेद नहीं रखनी चाहिए।

आप सभी से अनुरोध की बच्चों तथा सभी पाश्चात्य प्रेरित परिचित लोगो को ये सत्य घटना अवश्य बताये जिससे कि भारतीयों में विदेशी ‘रोल्स रॉयस’ जैसे वाहनों के झूठे आडम्बर को मिटाया जा सके।
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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