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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩🚒भतेरी की आत्मकथा💐💐*
*👩🦰भतेरी अपने मजदूर माँ बाप की दो लड़कियों के बाद तीसरी औलाद थी| तीन लड़कियों के पैदा होने से दुखी होकर उसके पिता ने उसका नाम भतेरी रख दिया था| भतेरी का अर्थ था “बहुत” और भतेरी के माता पिता अब चोथी लडकी नहीं चाहते थे| खैर “भतेरी” का नाम सार्थक हुआ उसके बाद एक लड़के का जन्म हुआ| लेकिन भतेरी अभी भी एक बोझ ही थी| जब भतेरी छ: वर्ष की हुई तभी उसका बाप मर गया| पिता की मौत के बाद घर में अब उसकी माँ विमला और दादी रज्जो ही थे जो इन चारो भाई बहनों का भरण पोषण कर रहे थे|*
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भतेरी की दादी रज्जो को आज भी बेटे की मौत से ज्यादा दुःख ये था, की भतेरी का बाप अपने पीछे तीन-तीन लड़कियों को छोड़ गया था| वो अक्सर कहा करती थी “खुद तो मुक्ति पा ली….अब पता नही मेरी बुलाव कद होगी, कद भगवान इन नरको से मुझे मुकति देगा”|”
भतेरी ने लड़की होने के कारण अपनी पूरी जिन्दगी अपने परिवार की घृणा और दुत्कार ही सही पति की मौत के बाद भतेरी की माँ विमला भी भाव शुन्य हो गयी थी| उसे भी अब अपनी तीनो बेटियां जिम्मेवारी नहीं बोझ ही दिखाई देती थीl
जब भतेरी 12 वर्ष की हुई तो उसे ब्लड कैंसर हो गया| डाक्टर ने बताया की काफी रुपया भी लगेगा और परिवार में से ही किसी को अपना मेरुरज्जा (किडनी) देना पड़ेगा| डाक्टर ने साफ़ कहा था की देने वाले की जान को कोई खतरा नहीं होगा| 12 साल की लड़की के ब्लड कैंसर होने की खबर जैसे ही गाँव वालों को लगी तो भतेरी के लिए गाँव वालों का दिल पसीज गया| घर की माली हालत देख भतेरी के इलाज का पूरा खर्चा गाँव वालों ने उठाने का फैसला किया| लेकिन यहाँ समस्या पैसे की नहीं आ रही थी, ग्रामीण समाज आज भी भावनात्मक समाज है, कई व्यक्ति थे जो भतेरी के इलाज के लिए पैसा खर्च करने को तैयार थे| लेकिन इस बोझ के लिए परिवार में कोई भी अपने शरीर का मज्जा देने को तैयार नहीं था| भतेरी की 65 वर्षीया दादी को भी आज अपनी जिन्दगी के बचे हुए कुछ वर्ष भतेरी की जन्दगी से ज्यादा कीमती लगे| वो लड़की थी इसलिए उसके परिवार के लिए उसकी जिन्दगी बोझ थी|
*अपनी बीमारी से घुटती भतेरी आज मर चुकी थी| घर पर काफी लोग जमा थे| सब भतेरी की माँ और दादी को ढाढस बंधा रहे थे, और उनकी गरीबी को कोस रहे थे| आज मृत भतेरी का चेहेरा शांत था| उसने अपनी जिंदगी में बस अपने परिवार की दुत्कार सही थी, और बाद के कुछ समय बीमारी की पीड़ा….. लेकिन आज वो शांत लग रही थी|*
क्या इच्छा रही होगी उसकी अंत समय में?
*एक बार उसे कहते सुना था “माँ आदमी मरने के बाद अलग-अलग रूप में जनम लेवै है.. कुत्ता, कीड़ा, चूहा या डांगर (पालतू पशु)| माँ मै तो डांगर या कीड़ा बन जाउंगी पर आदमी ना बनू| “देखिये जानवरों कुत्तो पताइ ना होत्ता उनकी औलाद में कौन सा लड़का कौन सी लड़की…आदमियों कुई पता हो यो फर्क तो बस”|*
उसका बाल सुलभ मन मानव की इस वृत्ति का प्रतिकार नहीं कर सकता था लेकिन जिन्दगी भर जो घृणा उसने अपने प्रति देखी थी उसे वो जरुर महसूस कर सकती थी|
*शायद भगवान उसकी अंतिम इच्छा पूरी कर देगा… उसे मानव नहीं पशु योनी में जन्म देगा|*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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