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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩🚒महात्माजी का उपदेश💐💐*
*🌐👨👩👧👦 यह कहानी के माध्यम से आज विश्व के सभी सत्ताधारियों की सच्चाई बताई जा रही हैं। आज वर्तमान में कानून व्यवस्था विफलता को प्राप्त हो रही हैं।*
भारत नाम का एक राज्य था। प्रधानमंत्रीजी का शासन चल रहा था।
वे बड़े लापरवाह और कठोर प्रकृति के थे। राज्य में निर्धनता व महगाई आसमान को छू रही थी।
*👨👩👧👦🤝👩🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*
प्रजा प्रधानमंत्रीजी का आदर-सम्मान करना भूल चुकी थी। राजा को प्रणाम-नमस्कार किए बिना लोग अपना मुख मोड़ लेते थे।
प्रजा के व्यवहार से प्रधानमंत्रीजी स्वयं को अपमानित महसूस कर रहा था। प्रजा के इस व्यवहार का कारण प्रधानमंत्रीजी के समझ नहीं पा रहा था।
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एक दिन प्रधानमंत्रीजी ने सलाहकार मंत्री से कहा – ‘मंत्रीवर! आज हमारा मन यहाँ घुटने लगा है। जंगलों में भ्रमण करने से शायद घुटन मिट जाए।
बस वे दोनों अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर जंगल मे बना हुआ विशालकाय मंदिर जो एक बड़े पर्वत पर था वहाँ पहुँचे।
फागुन का महीना था। धूप चढ़ने लगी थी। थोड़ी देर तक सुस्ताने के लिए दोनों एक घने पेड़ के नीचे रुके।
अपने वाहन से उतरते हुए प्रधानमंत्रीजी को एक छोटी सी पर्ण कुटिया दिखाई पड़ी।
घने जंगल में इस पर्वत पर कुटिया! कौन हो सकता है? उन्हें अचरज हुआ।
धीमे कदमों से प्रधानमंत्रीजी कुटिया के पास पहुँचे, पीछे-पीछे सलहाकार भी थे।
कुटिया में एक महात्मा थे। उनको देखकर वे दोनों भाव-विभोर हो उठे।
‘महात्मा जी! मैं भारत राज्य का राजा प्रधानमंत्रीजी हूँ। और ये हमारे सलाहकार अमितजी।’ महात्मा जी को राजा ने अपना व मंत्री का परिचय दिया।
‘कैसे आना हुआ? महात्मा जी ने चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर पूछा।
हम भ्रमण कर रहे थे। इस पेड़ की शीतल छाँव में सुस्ताने यहाँ रुके तो कुटिया दिख पड़ी।
हमारा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हो गए। मंत्री ने कहा।
हाव-भाव व मुख की आभा ही से प्रधानमंत्रीजी समझ गए कि महात्माजी ज्ञान-दर्शन और शास्त्रों में निष्णात हैं।
प्रधानमंत्रीजी ने उनको अपनी व्यथा बताई –
‘महात्माजी! मेरे राज्य की प्रजा मेरा आदर-सम्मान नहीं करती।
प्रजा का तो कर्तव्य बनता है कि वह अपने राजा का आदर करे, किंतु मैं इससे वंचित हूँ।
राजा के व्यवहार से महात्मा जी परिचित थे। अत: उनको माजरा समझते देर नहीं लगी।
‘ प्रधानमंत्रीजी! मैं समझ गया हूँ, आप चलिए मेरे साथ।’ महात्मा जी बोले और दरिया की ओर बढ़ गए।
उनके पीछे-पीछे राजा ओर सलाहकार चल पड़े।
हरी-भरी घास उगी थी। गौ माता घास में लीन थे। कुटिया की पूर्व दिशा में पर्वत श्रृंखलाएँ थीं।
पर्वतों से बहने वाले झरने समतल भूमि में एक साथ मिलकर दरिया बन गए थे।
दरिया के पास एक चट्टान खड़ी थी। चट्टान के पास पहुँचकर महात्मा रुक गए।
प्रधानमंत्रीजी और मंत्री भी अचरज के साथ महात्माजी के पास खड़े थे।
प्रधानमंत्रीजी! एक पत्थर उठाइए और इस चट्टान के ऊपर प्रहार कीजिए। महात्मा ने प्रधानमंत्रीजी से कहा।
प्रधानमंत्रीजी हक्के-बक्के रह गए। पर महात्मा जी का आदेश था। अतएव बिना कुछ जाने-समझे प्रधानमंत्रीजी ने एक पत्थर उठाया और जोर से चट्टान के ऊपर प्रहार किया।
चट्टान पर लगते ही वह नीचे गिर पड़ा।
प्रधानमंत्रीजी! अब दरिया के तट से थोड़ी गीली मिट्टी लेकर आइए।’ महात्माजी ने फिर आदेश दिया।
प्रधानमंत्रीजी एक मुट्ठी गीली मिट्टी के साथ चटपट महात्माजी के पास पहुँचे।
प्रधानमंत्रीजी! अब प्रहार कीजिए।’ महात्मा ने फिर कहा।
प्रधानमंत्रीजी ने जोर लगाकर गीली मिट्टी चट्टान पर फेंकी। गीली मिट्टी नीचे गिरने की बजाय चट्टान पर चिपक गई।
गीली मिट्टी को चिपकी हुई देखकर महात्मा बोले - ‘ प्रधानमंत्रीजी! संसार की यही नियति है। संसार कोमलता को आसानी से ग्रहण कर लेता है। कठोरता को त्याग देता है।
इसलिए चट्टान ने गीली मिट्टी को ग्रहण कर लिया और कठोर पत्थर को त्याग दिया।
प्रधानमंत्री आपके साथ भी ऐसा ही हुआ है।
मेरे साथ! प्रधानमंत्री ने अचरज भरे स्वर में कहा।
हाँ प्रधानमंत्रीजी ! आप अहंकारी व कठोर प्रकृति के हैं। आपका यह व्यवहार राज्य की उन्नति और सुख- शांति में बाधक बना हुआ है।
यह प्रकृति राज्य की प्रजा को स्वीकार नहीं है।
अत: प्रजा आपकी उपेक्षा कर रही है। महात्मा ने संयत स्वर में समझाया। सुनते ही प्रधानमंत्रीजी का सिर झुक गया।
प्रधानमंत्रीजी! अपने व्यवहार में परिवर्तन लाइए आपको आदर- सम्मान सब मिलेगा।
महात्माजी की उपदेश सुनकर ने उन्होंने उनके चरण पकड़ लिए और बोले –
*👨👩👧👦‘महात्मा जी भूल क्षमा हो आपकी शिक्षा शिरोधार्य है।’अब हम अपने शासनकाल में प्रजा को बिजली, पानी , स्वास्थ्य सुविधाओं को सबसे कम दामों पर उपलब्ध करवाकर अपना वोट प्रतिशत जो वर्तमान में 25% से भी कम हो रहा है उसे बढ़ायेंगे।*
विनम्रता से प्रणाम करके दोनों अपने अपने वाहनों पर सवार हो गए और अपने पार्टी कार्यालय की ओर चल पड़े।
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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