रविवार, 31 अक्टूबर 2021

चतुर चिडिया

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒चतुर चिड़िया💐💐*

एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर रहम करने को तैयार नहीं होता। तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है। तब गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे हरा दिया तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा।
 
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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*

*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है। चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ ख़त्म नहीं होता वह उसे नहीं मरेगा। गरुड़ इस बात पर राजी हो जाता है।

दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।

*शिक्षा:-*
कठिन परिस्थितियों में हालातों पर रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी हालत में जीत सकते है।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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भगवान का वास

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒भगवान का वास ..*

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार संस्था के नंबर पर व्हाट्सएप करते हुए अवश्य ही भेजे।संस्था का एकमात्र उद्देश्य यह है कि इस भव मे आपसभी के रत्नत्रय मे दिन दुगुनी रात चौगुनी वृद्धि हो ओर समाधि मरण हो।*

*एक सन्यासी घूमते-फिरते  एक दुकान पर आये । दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे ।*
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*सन्यासी ने  एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए* *दुकानदार से  पूछा, "इसमें क्या है?"*

*दुकानदार ने कहा, "इसमें नमक है।"*

*सन्यासी ने फिर पूछा, "इसके* *पास वाले में क्या है ?"*

*दुकानदार ने कहा, "इसमें हल्दी है।"*

*इसी प्रकार सन्यासी पूछ्ते गए और दुकानदार बतलाता रहा।*

*अंत में पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया, सन्यासी ने पूछा,* *"उस अंतिम डिब्बे में क्या है?"*

*दुकानदार बोला, "उसमें भगवान हैं।"*

*सन्यासी ने हैरान होते हुये पूछा, "भगवान !! भला यह* *"भगवान" किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के* *किसी सामान के बारे में कभी नहीं सुना !"*

*दुकानदार सन्यासी के भोलेपन पर हंस कर बोला,* *"महात्मन ! और डिब्बों मे तो* *भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं | पर यह* *डिब्बा खाली है| हम खाली को खाली नहीं कहकर* *भगवान कहते हैं !"*

*संन्यासी की आंखें खुली की* *खुली रह गई ! जिस बात के* *लिये मैं दर-दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यापारी से समझ आ रही है।*

*वो सन्यासी उस छोटे से किराने के दुकानदार के आगे नतमस्तक हो गया , ओह, तो खाली में भगवान रहता है !*

 *सत्य है ! भरे हुए में भगवान को स्थान कहाँ ?*

*काम, क्रोध, लोभ, मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली-बुरी, सुख-दुख की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा ?*

*भगवान यानी 'महावीर' तो खाली यानी साफ-सुथरे मन में ही निवास करते है।अतः हमसभी को पांच इंद्रियों के विषयों को क्रमशः शक्ति अनुसार छोड़ते हुए व्रत-संयम को अंगीकार करके मोक्षमार्ग मे आगे बढ़ना चाहिए।*

*एक छोटी सी दुकान वाले ने सन्यासी को बहुत बड़ी बात समझा दी थी।*

✋ *मन जब खाली होगा यानि भूतकाल की यादों से मुक्त, भविष्य की कल्पनाओं , कामनाओं, विकारों से रिक्त ..तभी ईश्वर का वास होगा ..तभी ईश्वर के दर्शन होगें।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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जन्मदिन

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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*💪👩‍🚒*माँ का जन्मदिन...*

मम्मी.....आपका जन्मदिन कब आता है...
बारह साल के मोहन ने अपनी मां से पूछा... मां ने उसकी इस बात पर मुस्कुरा दिया... मोहन अक्सर ही ये सवाल मां से पूछता और मां जवाब में बस मुस्कुरा देती थी.... लेकिन आज मोहन ने ठान लिया था वो बिना जवाब जाने मानने वाला नही है....

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आखिर बेटे की जिद के आगे मां ने कहा...
"हमारे जमाने मे जन्मदिन कहां मनाया जाता था मोहन बेटा.... 
पहले के लोगो को तो तारीख भी याद नही रहती थी आज कल ये सब चीजें चलन में आई है....
पहले हमारे बुजुर्ग माता पिता बच्चों के जन्म होली से एक महीना पहले हुआ था....या ये दशहरे के दो दिन बाद ....दीवाली पर हुई थी ....या उस दिन पूर्णिमा थी ....यही कुछ याद रखते थे ....सच कहूं तो मुझे याद नही है मोहन .....
मां की बात सुन के मोहन सोच में पड़ गया....
मम्मी मेरा जन्मदिन कितने धूमधाम से मानती है... तरह-तरह के पकवान बनाती है...
केक कटता है, पार्टी होती है....
काश.... मैं भी अपनी मम्मी का जन्मदिन मना पाता.....

देखते-देखते समय बीतता गया बारह वर्ष का मोहन आज 35 साल का एक सफल बिजनेसमैन बन गया... इन तेइस साल में बहुत कुछ बदल गया था... 
उसकी सुधा से शादी हो गई थी और आराध्या जैसी एक प्यारी बिटिया उनकी जिंदगी में आ गई थी...
मां आज भी मोहन के साथ रहती थी कलतक जो मां मोहन की हर पसंद नापसंद का ख्याल रखती थी आज मोहन अपनी मां का रखता था ....वैसे घर ...शहर गाडी ...वक्त और उम्र ....बदल चुके थे
बस एक ही चीज नही बदली थी वो थी मां का प्यार...
वो आज भी अपने बेटे मोहन का जन्मदिन धूमधाम से मानती...
 बुढ़ापे की वजह से वो ज्यादा भाग दौड़ तो नही कर पाती थी लेकिन मोहन के पसंद की हर चीजे बनाती, अनाथालय जा कर वहां के बच्चो में मिठाइयां और केक बटवाती...
मंदिर में जा कर गरीबों को भोज करवाती...
जब मोहन पैदा हुआ था तब मां की खुशी का ठिकाना नही था... पहली बार मां बनने का एहसास उसे मोहन ने ही तो करवाया था, जब वो रुई की तरह मखमल सा बेटा उसकी गोद मे आया था वो दुनिया ही भूल गई थी...
सारी खुशी एक तरफ और मां बनने की खुशी एक तरफ... इसीलिए उसे मोहन के जन्मदिन से बेहद लगाव है....
मोहन के बिजनेस शुरू करते ही वो अपने काम में व्यस्त हो गया....वो मां को अधिक समय भी नही दे पाता था... वैसे तो सुधा बहुत अच्छी बहु थी वह अपनी मां स्वरूप सासूमां का ख्याल रखती थी ........

रोज देर से आनेवाला मोहन आज शाम को जल्दी घर आ गया था....देखा तो सुधा आराध्या को होमवर्क करा रही थी....
अचानक आराध्या ने सुधा से पूछा "मम्मा आपका बर्थडे कब आता है.....
सुधा ने जवाब दिया "जिस दिन मेरी आरु का बर्थडे आता है उसी दिन मम्मा का भी बर्थडे आता है....
क्योंकि आराध्या जब आई तभी तो मैं मम्मा बनी....
दोनो की बात सुन के मोहन अतीत में चला गया, बचपन से जो सवाल मां से पूछता आ रहा है उसका जवाब आज उसे मिल गया था....
आज मोहन का जन्मदिन है......
वो मां के साथ मंदिर गया ....अनाथालय गया ....जैसा मां चाहती थी बिल्कुल वैसा ही करता गया ......
शाम को जब मां सहित वो घर लौटा तो घर पहुचते ही उसने देखा कि घर फूलों से सजा है बिजलियों वाले झूमर जगह-जगह लगे है, तरह a-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही है, अंदर हॉल में गुलाब की पंखुड़िया बिखरी हुई है और बीचोबीच बड़े से टेबल में केक रखा हुआ है और बहुत से मेहमानों से घर भरा है मां आश्चर्य से देख रही थी तभी सुधा आ के मां को तैयार करने कमरे में ले गई...
मां सोच में थी कि आखिर बात क्या है, तभी वो तैयार हो कि नीचे आती है....मोहन माइक पकड़ के कहना शुरू करता है...
"मां.... मैने हमेशा आपसे पूछा था कि आपका जन्मदिन कब आता है, मेरा मन करता था कि जिस तरह आप मेरा जन्मदिन मानती है वैसे मैं भी मनाऊ...
आपने मेरे लिए कितना कुछ नही किया, आज मैं जो भी हूं आपकी वजह से ही तो हूं.... 
आपने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया है... मेरी छोटी छोटी खुशियों को इतना बड़ा बनाया है...
 मैं हमेशा सोचता कि आपको मेरे जन्मदिन से इतना प्यार क्यों है.... 
जवाब अब मुझे मिला... एक मां की जिंदगी का सबसे बड़ा पल आता है जब वो अपने बच्चे को पहली बार गोद मे ले कर गले लगती है, आज ही का तो दिन था ना मां जब मैं आपकी जिंदगी में आया था... 
मां आज ही के दिन तो आप भी मुझे मिली थी... आज ही के दिन तो मैं भी बेटा बना था... आज ही के दिन तो मैं आपकी गोद मे आया था... आज ही के दिन तो मुझे भी ममता का सागर मिला था... ...
इसलिए आज से ये दिन सिर्फ मेरा नही आपका भी है क्योंकि...'' तुम से ही तो मैं हूं.....'
आज एक मां और एक बेटे का जन्मदिन है....
मोहन की बात सुन के मां की आँखों मे आंसू आ गए, मुंह से कोई बोल नही निकले बस दिल से दुआएं निकल रही थी.... इतना मार्मिक दृश्य देख कर हर कोई रोने लगा था
मां ने अपने बेटे मोहन को गले लगा लिया...
दोनों ने मिल कर अपने जन्मदिन का केक काटा.....
दोस्तो जिसदिन हमारा जन्म हुआ उसी क्षण एक मां का एक पिता का भी जन्म होता है उन्हें भी वो सुख मिलता है ...दोस्तो मेरी पोस्ट का सार्थक प्रयास बस इतना है स्वयं को कामयाब मानते हो आज जो कुछ भी उपलब्धि आपने हासिल की है उसमें आपकी परवरिश के लिए स्वयं की ख्वाहिश को नजरअंदाज करते आपकी इच्छाओं को पूरा करने वाले माता पिता का भी है ....बस आप उन्हें सम्मान दीजिए समय दीजिए और प्यार से उनकी बातों को सुनिए ....उन्हें इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए होता .....
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*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

निरोगी का रहस्य

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒निरोगी जीवन का रहस्य*

✍️▶️बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में शंकर नाम का एक वृद्ध व्यक्ति रहता था। उसकी उम्र अस्सी साल से भी ऊपर थी पर वो चालीस साल के व्यक्ति से भी स्वस्थ लगता था। लोग बार बार उससे उसकी सेहत का रहस्य जानना चाहते पर वो कभी कुछ नहीं बोलता था । एक दिन राजा को भी उसके बारे में पता चला और वो भी उसकी सेहत का रहस्य जाने के लिए उत्सुक हो गए। राजा ने अपने गुप्तचरों से शंकर पर नज़र रखने को कहा। गुप्तचर भेष बदल कर उस पर नज़र रखने लगे।

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अगले दिन उन्होंने देखा की शंकर भोर में उठ कर कहीं जा रहा है , वे भी उसके पीछे लग गए। शंकर तेजी से चलता चला जा रहा था , दो मील चलने के बाद वो एक पहाड़ी पर चढ़ने लगा और अचानक ही गुप्तचरों की नज़रों से गायब हो गया। गुप्तचर वहीँ रुक उसका इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद वो लौटा , उसने मुट्ठी में कुछ छोटे-छोटे फल पकड़ रखे थे और उन्हें खाता हुआ चला जा रहा था। गुप्तचरों ने अंदाज़ा लगाया कि हो न हो , शंकर इन्ही रहस्यमयी फलों को खाकर इतना स्वस्थ है।

अगले दिन दरबार में उन्होंने राजा को सारा किस्सा कह सुनाया। राजा ने उस पहाड़ी पर जाकर उन फलों का पता लगाने का आदेश दिया , पर बहुत खोज-बीन करने के बाद भी कोई ऐसा असाधारण फल वहां नहीं दिखा। अंततः थक-हार कर राजा शंकर को दरबार में हाज़िर करने का हुक्म दिया। राजा – शंकर , इस उम्र में भी तुम्हारी इतनी अच्छी सेहत देख कर हम प्रसन्न हैं , बताओ , तुम्हारी सेहत का रहस्य क्या है ?

शंकर कुछ देर सोचता रहा और फिर बोला , ” महाराज , मैं रोज पहाड़ी पर जाकर एक रहस्यमयी फल खाता हूँ , वही मेरी सेहत का रहस्य है। “ठीक है चलो हमें भी वहां ले चलो और दिखाओ वो कौन सा फल है। सभी लोग पहाड़ी की और चल दिए , वहां पहुँच कर शंकर उन्हें एक बेर के पेड़ के पास ले गया और उसके फलों को दिखाते हुए बोला, हुजूर , यही वो फल है जिसे मैं रोज खाता हूँ।

राजा क्रोधित होते हुए बोले , ” तुम हमें मूर्ख समझते हो , यह फल हर रोज हज़ारों लोग खाते हैं , पर सभी तुम्हारी तरह सेहतमंद क्यों नहीं हैं ?” शंकर विनम्रता से बोला , ” महाराज , हर रोज़ हजारों लोग जो फल खाते हैं वो बेर का फल होता है , पर मैं जो फल खाता हूँ वो सिर्फ बेर का फल नहीं होता …वो मेरी मेहनत का फल होता है। इसे खाने के लिए मैं रोज सुबह दो मील पैदल चलता हूँ जिससे मेरे शरीर की अच्छी वर्जिश हो जाती है और सुबह की स्वच्छ हवा मेरे लिए जड़ी-बूटियों का काम करती है। बस यही मेरी सेहत का रहस्य है।

राजा शंकर की बात समझ चुके थे , उन्होंने शंकर को स्वर्ण मुद्राएं देते हुए सम्मानित किया। और अपनी प्रजा को भी शारीरिक श्रम करने की नसीहत दी।

*💐शिक्षा*💐:-

*मित्रों, आज टेक्नोलॉजी ने हमारी ज़िन्दगी बिलकुल आसान बना दी है , पहले हमें छोटे -बड़े सभी कामों के लिए घर से निकलना ही पड़ता था , पर आज हम Internet के माध्यम से घर बैठे-बैठे ही सारे काम कर लेते हैं। ऐसे में जो थोड़ा बहुत Physical Activity के मौके होते थे वो भी खत्म होते जा रहे हैं , और इसका असर हमारी सेहत पर भी साफ़ देखा जा सकता है। WHO के मुताबिक , आज दुनिया में 20 साल से ऊपर के 35% लोग Overweight हैं और 11 % Obese हैं। ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी सेहत का ध्यान रखें और रोज़-मर्रा के जीवन में शारीरक श्रम को महत्त्व दे।।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

परमात्मा से

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
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*💪👩‍🚒परमात्मा से सम्बन्ध* 

एक बार एक पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पांच हजार  रुपये रख दिए। उन्होंने सोचा कि जब मेरी बेटी की शादी होगी तो मैं ये पैसा ले लूंगा।

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कुछ सालों के बाद जब बेटी सयानी हो गई, तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गए। लेकिन दुकानदार ने नकार दिया और बोला- आपने कब मुझे पैसा दिया था?
बताइए! क्या मैंने कुछ लिखकर दिया है?

पंडित जी उस दुकानदार की इस हरकत से बहुत ही परेशान हो गए और बड़ी चिंता में डूब गए।
फिर कुछ दिनों के बाद पंडित जी को याद आया,
कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दूं।
ताकि वे कुछ फैसला कर देंगे और मेरा पैसा मेरी बेटी के विवाह के लिए मिल जाएगा।

फिर पंडित जी राजा के पास पहुंचे और अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा- कल हमारी सवारी निकलेगी और तुम उस दुकानदार की दुकान के पास में ही खड़े रहना।

दूसरे दिन राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूलमालाएं पहनाईं और किसी ने आरती उतारी।

पंडित जी उसी दुकान के पास खड़े थे। जैसे ही राजा ने पंडित जी को देखा, तो उसने उन्हें प्रणाम किया और कहा- गुरु जी! आप यहां कैसे? आप तो हमारे गुरु हैं।
आइए! इस बग्घी में बैठ जाइए।

वो दुकानदार यह सब देख रहा था।उसने भी आरती उतारी और राजा की सवारी आगे बढ़ गई।

थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को बग्घी से नीचे उतार दिया और कहा- पंडित जी! हमने आपका काम कर दिया है। अब आगे आपका भाग्य।

उधर वो दुकानदार यह सब देखकर हैरान था,कि पंडित जी की तो राजा से बहुत ही अच्छी सांठ-गांठ है। कहीं वे मेरा कबाड़ा ही न करा दें। दुकानदार ने तत्काल अपने मुनीम को पंडित जी को ढूंढ़कर लाने को कहा।

पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार-विमर्श कर रहे थे। मुनीम जी बड़े ही आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले आए।

दुकानदार ने आते ही पंडित जी को प्रणाम किया और बोला- पंडित जी! मैंने काफी मेहनत की और पुराने खातों को‌ देखा, तो पाया कि खाते में आपका पांच हजार  रुपया जमा है। और पिछले दस सालों में ब्याज के एक लाख दस हजार रुपए भी हो गए हैं। पंडित जी! आपकी बेटी भी तो मेरी बेटी जैसी ही है। अत: 11 हजार रुपये आप मेरी तरफ से ले जाइए, और उसे बेटी की शादी में लगा दीजिए।

इस प्रकार उस दुकानदार ने पंडित जी को एक लाख इक्कीस हजार पांच सौ रुपए देकर बड़े ही प्रेम के साथ विदा किया।

*तात्पर्य* ✍

जब मात्र एक राजा के साथ सम्बन्ध होने भर से हमारी विपदा दूर जो जाती है, तो हम अगर इस दुनिया के राजा यानि कि परमात्मा से अपना सम्बन्ध जोड़ लें, तो हमें कोई भी समस्या, कठिनाई या फिर हमारे साथ किसी भी तरह के अन्याय का तो कोई प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होगा.

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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

सहयोग से

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒खाई औऱ ब्रिज (पूल) 💐💐*

    दो भाई साथ साथ खेती करते थे। मशीनों की भागीदारी और चीजों का व्यवसाय किया करते थे।

 चालीस साल के साथ के बाद एक छोटी सी ग़लतफहमी की वजह से उनमें पहली बार झगडा हो गया था झगडा दुश्मनी में बदल गया था।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*

*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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एक सुबह एक बढई बड़े भाई से काम मांगने आया. बड़े भाई ने कहा “हाँ ,मेरे पास तुम्हारे लिए काम हैं। उस तरफ देखो, वो मेरा पडोसी है, यूँ तो वो मेरा भाई है, पिछले हफ्ते तक हमारे खेतों के बीच घास का मैदान हुआ करता था पर मेरा भाई बुलडोजर ले आया और अब हमारे खेतों के बीच ये खाई खोद दी, जरुर उसने मुझे परेशान करने के लिए ये सब किया है अब मुझे उसे मजा चखाना है, तुम खेत के चारों तरफ बाड़ बना दो ताकि मुझे उसकी शक्ल भी ना देखनी पड़े."

“ठीक हैं”, बढई ने कहा। 
बड़े भाई ने बढई को सारा सामान लाकर दे दिया और खुद शहर चला गया, शाम को लौटा तो बढई का काम देखकर भौंचक्का रह गया, बाड़ की जगह वहा एक पुल था जो खाई को एक तरफ से दूसरी तरफ जोड़ता था. इससे पहले की बढई कुछ कहता, उसका छोटा भाई आ गया। 

छोटा भाई बोला “तुम कितने दरियादिल हो , मेरे इतने भला बुरा कहने के बाद भी तुमने हमारे बीच ये पुल बनाया, कहते कहते उसकी आँखे भर आईं और दोनों एक दूसरे के गले लग कर रोने लगे. जब दोनों भाई सम्भले तो देखा कि बढई जा रहा है।

रुको! मेरे पास तुम्हारे लिए और भी कई काम हैं, बड़ा भाई बोला।  

मुझे रुकना अच्छा लगता ,पर मुझे ऐसे कई पुल और बनाने हैं, बढई मुस्कुराकर बोला और अपनी राह को चल दिया. 

दिल से मुस्कुराने के लिए जीवन में पुल की जरुरत होती हैं खाई की नहीं। छोटी छोटी बातों पर अपनों से न रूठें। 

"दीपावली आ रही है घरेलू रिश्तों के साथ साथ सभी दोस्ती के रिश्तों पर जमी धूल भी साफ कर लेना, खुशियाँ चार गुनी हो जाएंगी"।

 *आने वाली दीपावली आप सभी के लिए खुशियाँ ले कर आए, यह शुभकामनाएं !* 

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

चारित्रवान

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*💪👩‍🚒चरित्रहीन कौन💐💐*

संन्यास लेने के बाद  सन्यासी ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। एक बार वे एक गांव गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली आप तो कोई राजकुमार लगते हैं। क्या मैं जान सकती हूँ कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है ?

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 सन्यासी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया।

 सन्यासी ने कहा- हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है वह जल्दी ही वृद्ध होगा फिर बीमार व अंत में मृत्यु के मुंह में चला जाएगा। मुझे वृद्धावस्था, बीमारी व मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है।

सन्यासी के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई।

गांववासी  सन्यासी के पास आए और आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं क्योंकि वह चरित्रहीन है।  सन्यासी ने गांव के मुखिया से पूछा- क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है ? मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है।आप उसके घर न जाएं।

सन्यासी ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा। मुखिया ने कहा- मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपके द्वारा पकड़ लिया गया है।  सन्यासी बोले इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है जब तक कि इस गांव के पुरुष चरित्रहीन न हो अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहाँ के पुरुष जिम्मेदार हैं l

अब कोई व्यक्ति या समाज  किसी पर अंगुली उठाये उस से पहले खुद में झांकना बहुत जरूरी है।

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रविवार, 24 अक्टूबर 2021

कर्म

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*💪👩‍🚒मेरा कर्म ही मेरा असली धन*

“एक आदमी मर गया. जब उसे महसूस हुआ तो उसने देखा कि भगवान उसके पास आ रहे हैं और उनके हाथ में एक सूट केस है.

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भगवान ने कहा --पुत्र चलो अब समय हो गया.

आश्चर्यचकित होकर आदमी ने जबाव दिया -- अभी इतनी जल्दी? अभी तो मुझे बहुत काम करने हैं. मैं क्षमा चाहता हूँ किन्तु अभी चलने का समय नहीं है. आपके इस सूट केस में क्या है?

भगवान ने कहा -- तुम्हारा सामान.

मेरा सामान? आपका मतलब है कि मेरी वस्तुएं, मेरे कपडे, मेरा धन?

भगवान ने प्रत्युत्तर में कहा -- ये वस्तुएं तुम्हारी नहीं हैं. ये तो पृथ्वी से सम्बंधित हैं.

आदमी ने पूछा -- मेरी यादें?

भगवान ने जबाव दिया -- वे तो कभी भी तुम्हारी नहीं थीं. वे तो समय की थीं.

फिर तो ये मेरी बुद्धिमत्ता होंगी?

भगवान ने फिर कहा -- वह तो तुम्हारी कभी भी नहीं थीं. वे तो परिस्थिति जन्य थीं.

तो ये मेरा परिवार और मित्र हैं?

भगवान ने जबाव दिया -- क्षमा करो वे तो कभी भी तुम्हारे नहीं थे. वे तो राह में मिलने वाले पथिक थे.

फिर तो निश्चित ही यह मेरा शरीर होगा?

भगवान ने मुस्कुरा कर कहा -- वह तो कभी भी तुम्हारा नहीं हो सकता क्योंकि वह तो राख है.

तो क्या यह मेरी आत्मा है?

नहीं वह तो अजरअविनाशी है --- भगवान ने कहा.

भयभीत होकर आदमी ने भगवान के हाथ से सूट केस ले लिया और उसे खोल दिया यह देखने के लिए कि सूट केस में क्या है. वह सूटकेस में जीव के कर्मो का लेखाजोखा  था।

आदमी की आँखों में आंसू आ गए और उसने कहा -- मेरे पास कभी भी कुछ नहीं था.हाँ आप केवल अपने कर्मों को लेकर ही आये थे।उनके अनुसार ही आपको सबकुछ प्राप्त हुआ था।आप यहाँ पाँच इंद्रियों मे इतने मस्त हो गये थे कि आपको अपने आत्मकल्याण के लिए समय का ध्यान ही नहीं रहा।अब आपको कर्मोंके अनुसार ही चौरासीलाख योनियों में सबकुछ निर्धारित किया गया है।

भगवान ने जबाव दिया -- यही सत्य है. प्रत्येक क्षण जो तुमने जिया, वही तुम्हाराअपना कर्म था. जिंदगी क्षणिक है और वे ही क्षण तुम्हारे हैं.

इस कारण जो भी समय आपके पास है, उसे भरपूर जियें. आज में जियें. अपनी जिंदगी जिए.

खुश होना कभी न भूलें, यही एक बात महत्त्व रखती है.

भौतिक वस्तुएं और जिस भी चीज के लिए आप यहाँ लड़ते हैं, मेहनत करते हैं...आप यहाँ से कुछ भी नहीं ले जा सकते।

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शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

चार पैसे का

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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*💪👩‍🚒*4 पैसे का महत्व*

 आज से जानिये 4 पैसे क्यों ज़रूरी है ? 

बचपन में बुजुर्गों से एक कहानी सुनते थे कि...
इंसान 4 पैसे कमाने के लिए मेहनत करता है या... 
बेटा कुछ काम करोगे तो 4 पैसे घर में आएँगे या... 
आज चार पैसे होते तो कोई ऐसे ना बोलता, 
आदि-आदि ऐसी बहुत सी बातें हम अक्सर सुनते थे।

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आख़िर क्यों चाहिए ये चार पैसे और चार ही क्यों तीन या पाँच क्यों नहीं? 

तीन पैसों में क्या कमी हो जायेगी या पाँच से क्या बढ़ जायेगा? 

आइये... 
समझते हैं कि इन चार पैसों का क्या करना है?

*पहला पैसा खाना है,* 
*दूसरे पैसे से पिछला क़र्ज़ उतारना है,*
*तीसरे पैसे का आगे क़र्ज़ देना है और...* 
*चौथे पैसे को कुएं में डालना है।*

*4 पैसों का रहस्य*

*1) खाना:-*
अर्थात अपना तथा अपने परिवार पत्नी, बच्चों का भरण-पोषण करना, पेट भरने के लिए।

*2) पिछला क़र्ज़ उतारना:-*
अपने माता-पिता की सेवा के लिए उनके द्वारा किए गये हमारे पालन-पोषण क़र्ज़ उतारने के लिए।

*3) आगे क़र्ज़ देना:-*
सन्तान को पढ़ा-लिखा कर क़ाबिल बनाने के लिए ताकि आगे वृद्धावस्था में वे आपका ख़्याल रख सके।

*4) कुएं में डालने के लिए:-*
अर्थात शुभ कार्य करने के लिए दान, सन्त सेवा, असहायों की सहायता करने के लिए, यानि निष्काम सेवा करना, क्योंकि हमारे द्वारा किए गये इन्ही शुभ कर्मों का फल हमें इस जीवन के बाद भी मिलने वाला है।यह चार नंबर का कर्म ही हमें भगवान बनाने में सहायक है।इसकर्म से ही मोक्षमार्ग का रास्ता साफ-साफ दिखाई देता है।

इन कार्यों के लिए हमें चार पैसों की ज़रूरत पड़ती है,
यदि तीन पैसे रह गए तो कार्य पूरे नहीं होंगे और पाँचवे पैसे की ज़रूरत ही नहीं है..!! 
          
*यही है 4 पैसों का गणित*

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शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

गलत कौन

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➡️हेलो भाईसाहब टिकट ले लिजिए टिकट.. 
👤बस कंडक्टर ने उस आदमी से कहा।
✍️उस आदमी ने पीछे मुड़कर देखा और रौबदार आवाज में बोला, मैं टिकट नहीं लेता। दुबले-पतले कंडक्टर ने उस 6 फुट लम्बे और बाॅडी बिल्डर आदमी को देखा तो उसकी दुबारा बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई।

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➡️ वह चुपचाप आगे बढ़ गया। अगले दिन वह आदमी फिर मिल गया। कंडक्टर ने फिर उससे टिकट के लिए पुछा, मैं कभी टिकट नहीं लेता। फिर वहीं उत्तर मिला।
🔯 अगले दिन वह बस में फिर चढ़ा और फिर उसने टिकट नहीं लिया। अगले कई दिनों तक यहीं सिलसिला चलता रहा। उसके टिकट ना लेने से कंडक्टर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती लेकिन उसके हट्टे कट्टे शरीर को देखकर उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता। 
🤵एक दिन कंडक्टर के भीतर का मर्द जाग उठा, उसने सोचा कि आखिर कब तक इसके डर से नुकसान उठाते रहेंगे। अब तो इज्जत का सवाल है। 

➡️आखिरकार कंडक्टर ने एक महीने की छुट्टी ले कर अखाड़े में भर्ती हो गया। 

💪अखाड़े में उसने खुब मेहनत की खुब पसीने बहाएं। एक महीने बाद फिर वह अपने काम पर वापस आया तो उसकी खुब बाॅडी बन चुकी थी और उसका आत्मविश्वास भी बढ गया था। 

➡️हां भाई टिकट के पैसे निकालो, कंडक्टर ने सोच लिया था कि आज इससे टिकट ले कर रहूंगा।

▶️ मैं टिकट नहीं लेता, फिर वहीं जवाब मिला। अबे ऐसे कैसे नहीं लेगा। 
✍️कंडक्टर ने रोबदार आवाज में बोला। क्योंकि मैंने एक साल के लिए पास बनवा रखा है। 
➡️यह कहते हुए उसने पास निकाल कर बढ़ा दिया। अब तो कंडक्टर की ऐसी स्थिति हो गई जैसे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। 

👨‍👩‍👧‍👦▶️☸️*सीख*  ऐसा अक्सर हमारे साथ होता है कि हम बिना जाने-समझे सामने वाले के प्रति अपनी राय बना लेते हैं। ये अच्छा है वो बुरा है,ये गलत है,वो सही है। इस प्रकार से हम मन ही मन कल्पनाओं के पहाड़ खड़े करते रहते हैं। मगर जब परिणाम सामने निकलता है तो हमें या तो शर्मिन्दा होना पड़ता है या पछताना पड़ता है। इसलिए हमें ऐसी नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए।

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गुरुवार, 21 अक्टूबर 2021

संस्कार

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒 संस्कार से 💐💐*

एक राजा था जिसका नाम रामधन था उनके जीवन में सभी सुख थे | राज्य का काम काज भी ऐशो आराम से चल रहे था | राजा के नैतिक गुणों के कारण प्रजा भी बहुत प्रसन्न थी | और जिस राज्य में प्रजा खुश रहती हैं वहाँ की आर्थिक व्यवस्था भी दुरुस्त होती हैं इस प्रकार हर क्षेत्र में राज्य का प्रवाह अच्छा था 
इतने सुखों के बाद भी राजा दुखी था क्यूंकि उसकी कोई संतान नहीं थी यह गम राजा को अंदर ही अंदर सताता रहता था |

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 प्रजा को भी इस बात का बहुत दुःख था | वर्षों के बाद राजा की यह मुराद पूरी हुई और उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई | पुरे नगर में कई दिनों तक जश्न मना | नागरिको को राज महल में दावत दी गई | राजा की इस ख़ुशी में प्रजा भी झूम रही थी।
समय बितता जा रहा था राज कुमार का नाम नंदनसिंह रखा गया | पूजा पाठ एवम इन्तजार के बाद राजा को सन्तान प्राप्त हुई थी इसलिये उसे बड़े लाड़ प्यार से रखा जाता था लेकिन अति किसी बात की अच्छी नहीं होती अधिक लाड़ ने नंदन सिंह को बहुत बिगाड़ दिया था | बचपन में तो नंदन की सभी बाते दिल को लुभाती थी पर बड़े होते होते यही बाते बत्तमीजी लगने लगती हैं | नंदन बहुत ज्यादा जिद्दी हो गया था उसके मन में अहंकार आ गया था वो चाहता था कि प्रजा सदैव उसकी जय जयकार करे उसकी प्रशंसा करें | उसकी बात ना सुनने पर वो कोलाहल मचा देता था | बैचारे सैनिको को तो वो पैर की जुती ही समझता था | आये दिन उसका प्रकोप प्रजा पर उतरने लगा था | वो खुद को भगवान के समान पूजता देखना चाहता था | आयु तो बहुत कम थी लेकिन अहम् कई गुना बढ़ चूका था |
नन्दन के इस व्यवहार से सभी बहुत दुखी थे | प्रजा आये दिन दरबार में नन्दन की शिकायत लेकर आती थी जिसके कारण राजा का सिर लज्जा से झुक जाता था | यह एक गंभीर विषय बन चूका था ।
एक दिन राजा ने सभी खास दरबारियों एवम मंत्रियों की सभा बुलवाई और उनसे अपने दिल की बात कही कि वे राज कुमार के इस व्यवहार से अत्यंत दुखी हैं , राज कुमार इस राज्य का भविष्य हैं अगर उनका व्यवहार यही रहा तो राज्य की खुशहाली चंद दिनों में ही जाती रहेगी | दरबारी राजा को सांत्वना देते हैं और कहते हैं कि आप हिम्मत रखे वरना प्रजा निसहाय हो जायेगी | मंत्री ने सुझाव दिया कि राजकुमार को एक उचित मार्गदर्शन एवम सामान्य जीवन के अनुभव की जरुरत हैं | आप उन्हें गुरु राधागुप्त के आश्रम भेज दीजिये सुना हैं,वहाँ से जानवर भी इंसान बनकर निकलता हैं | यह बात राजा को पसंद आई और उसने नन्दन को गुरु जी के आश्रम भेजा |

अगले दिन राजा अपने पुत्र के साथ गुरु जी के आश्रम पहुँचे | राजा ने गुरु राधा गुप्त के साथ अकेले में बात की और नन्दन के विषय में सारी बाते कही | गुरु जी ने राजा को आश्वस्त किया कि वे जब अपने पुत्र से मिलेंगे तब उन्हें गर्व महसूस होगा | गुरु जी के ऐसे शब्द सुनकर राजा को शांति महसूस हुई और वे सहर्ष अपने पुत्र को आश्रम में छोड़ कर राज महल लौट गये |
अगले दिन सुबह गुरु के खास चेले द्वारा नंदन को भिक्षा मांग कर खाने को कहा गया जिसे सुनकर नंदन ने साफ़ इनकार कर दिया | चेले ने उसे कह दिया कि अगर पेट भरना हैं तो भिक्षा मांगनी होगी और भिक्षा का समय शाम तक ही हैं अन्यथा भूखा रहना पड़ेगा | नंदन ने अपनी अकड़ में चेले की बात नहीं मानी और शाम होते होते उसे भूख लगने लगी लेकिन उसे खाने को नहीं मिला | दुसरे दिन उसने भिक्षा मांगना शुरू किया | शुरुवात में उसके बोल के कारण उसे कोई भिक्षा नहीं देता था लेकिन गुरुकुल में सभी के साथ बैठने पर उसे आधा पेट भोजन मिल जाता था | धीरे-धीरे उसे मीठे बोल का महत्व समझ आने लगा और करीब एक महीने बाद नंदन को भर पेट भोजन मिला जिसके बाद उसके व्यवहार में बहुत से परिवर्तन आये |
इसी तरह गुरुकुल के सभी नियमों ने राजकुमार में बहुत से परिवर्तन किये जिसे राधा गुप्त जी भी समझ रहे थे एक दिन राधा गुप्त जी ने नंदन को अपने साथ सुबह सवेरे सैर पर चलने कहा |दोनों सैर पर निकल गये रास्ते भर बहुत बाते की | गुरु जी ने नंदन से कहा कि तुम बहुत बुद्धिमान हो और तुममे बहुत अधिक उर्जा हैं जिसका तुम्हे सही दिशा मे उपयोग करना आना चाहिये | दोनों चलते-चलते एक सुंदर बाग़ में पहुँच गये | जहाँ बहुत सुंदर-सुंदर फूल थे जिनसे बाग़ महक रहा था | गुरु जी ने नंदन को बाग़ से पूजा के लिये गुलाब के फुल तोड़ने कहा | नंदन झट से सुंदर-सुंदर गुलाब तोड़ लाया और अपने गुरु के सामने रख दिये | अब गुरु जी ने उसे नीम के पत्ते तोड़कर लाने कहा | नंदन वो भी ले आया | अब गुरु जी ने उसे एक गुलाब सूंघने दिया और कहा बताओ कैसा लगता हैं नंदन ने गुलाब सुंघा और गुलाब की बहुत तारीफ की | फिर गुरु जी उसे नीम के पत्ते चखकर उसके बारे में कहने को कहा | जैसे ही नंदन ने नीम के पत्ते खाये उसका मुंह कड़वा हो गया और उसने उसकी बहुत निंदा की | और जतर क़तर पीने का पानी ढूंढने लगा |
नन्दन की यह दशा देख गुरु जी मुस्कुरा रहे थे | पानी पिने के बाद नंदन को राहत मिली फिर उसने गुरु जी से हँसने का कारण पूछा | तब गुरु जी ने उससे कहा कि जब तुमने गुलाब का फुल सुंघा तो तुम्हे उसकी खुशबू बहुत अच्छी लगी और तुमने उसकी तारीफ की लेकिन जब तुमने नीम की पत्तियाँ खाई तो तुम्हे वो कड़वी लगी और तुमने उसे थूक दिया और उसकी निंदा भी की | गुरु जी से नन्दन को समझाया जिस प्रकार तुम्हे जो अच्छा लगता हैं तुम उसकी तारीफ करते हो उसी प्रकार प्रजा भी जिसमे गुण होते हैं उसकी प्रशंसा करती हैं अगर तुम उनके साथ दुर्व्यवहार करोगे और उनसे प्रशंसा की उम्मीद करोगे तो वे यह कभी दिल से नही कर पायेंगे | इस प्रकार जहाँ गुण होते हैं वहाँ प्रशंसा होती हैं |
नंदन को सभी बाते विस्तार से समझ आ जाती हैं और वो अपने महल लौट जाता हैं | नंदन में बहुत परिवर्तन आता हैं और वो बाद में एक सफल राजा बनता हैं |

*कहानी की शिक्षा*

गुरु की सीख ने नंदन का जीवन ही बदल दिया वो एक क्रूर राज कुमार से एक न्याय प्रिय दयालु राजा बन गया |इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती हैं कि हममे गुण होंगे तो लोग हमें हमेशा पसंद करेंगे लेकिन अगर हम अवगुणी हैं तो हमें प्रशंसा कभी नहीं मिल सकती ।अतः हमसभी पूर्वाचार्यों के लिखीत शास्त्रों से( आचार्य समतंभद्र द्वारा रचित रत्नकंरड श्रावकाचार ) श्रावकधर्म के बारे में जानकर उसका पालन करके यह मनुष्य भव सफल करें।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

प्रतिध्वनि

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*💪👩‍🚒अपनी प्रतिध्वनि बुद्धिमता से चुनें*💐💐

एक आदमी अपने बेटे को पास के जंगल में सैर पर ले जाता है। लड़का यात्रा करता हुआ अचानक तेज दर्द महसूस करता है, वह चिल्लाता है "आहह!" लड़का आश्चर्यचकित होकर पहाड़ से आने वाली आवाज़ सुनता है, "आहह!" यह उसका प्रतिध्वनि (Echo) का पहला अनुभव था।

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जिज्ञासा से भरकर, वह चिल्लाता है: "तुम कौन हो?", लेकिन उसे वापिस एक ही जवाब मिला, "तुम कौन हो?"

इससे वह क्रोधित हो गया, इसलिए वह चिल्लाया, "तुम कायर हो!" और आवाज ने जवाब दिया "तुम कायर हो!" उसने अपने पिता की ओर देखा और पूछा "पिताजी ये क्या हो रहा है। यह कौन कैसे मुझसे बात कर रहा है?"

"बेटा," आदमी जवाब देता है, "ध्यान दो। उसे कुछ अच्छा कहो।"

फिर वह चिल्लाता है, "मैं तुमसे प्यार करता हूँ!" आवाज जवाब देती है, मैं तुमसे प्यार करता हूँ!

अपने बेटे के भ्रम को महसूस करते हुए आदमी ने प्रकृति के साथ बातचीत की और "तुम बहुत लाजवाब हो!" और आवाज ने उत्तर दिया, तुम बहुत लाजवाब हो!"

लड़का रोमांचित हो उठा लेकिन फिर भी समझ नहीं पाया कि क्या हो रहा है।

पिता बताते हैं, बेटा, लोग इसे प्रतिध्वनि (Echo) कहते हैं, लेकिन वास्तव में यही जीवन है। जीवन हमेशा आपको वही देता है जो आप देते हैं। जीवन आपके कार्यों का दर्पण है।

यदि आप अधिक प्यार चाहते हैं, तो अधिक प्यार दें। यदि आप अधिक दयालुता चाहते हैं, तो अधिक दयालुता दें। यदि आप समझ और सम्मान चाहते हैं, तो समझ और सम्मान दें। यदि आप क्षमा चाहते हैं तो उन लोगों को क्षमा करें, जिन्होंने आपको चोट पहुंचाई है। यदि आप चाहते हैं कि लोग आपके साथ धैर्य रखें, तो उनके साथ धैर्य रखें ।

प्रकृति का यह नियम हमारे जीवन के हर पहलू पर लागू होता है।

 एक प्रतिध्वनि प्रकृति का तरीका है कि हम दूसरों को यह सिखाएं कि हम उनसे जो चाहते हैं, वह करें और दूसरों के लिए भी अच्छी कामना करें।

जीवन हमेशा आपको वही देता है जो आप बाहर देते हैं ...

आपका जीवन एक संयोग नहीं है, बल्कि आपके स्वयं के कार्यों का दर्पण है।"

*अपनी प्रतिध्वनि चुनें! आशीर्वाद भेजें और बदले में आशीर्वाद प्राप्त करें।*

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लोभ का कुआँ

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*💪👩‍🚒लोभ का कुंआ*🌹🌹

एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ' ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?' इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

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आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है,वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे।राज पंडित को जबाव नहीं मिला था।निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा -" आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा।इसपर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -" पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।" राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला -" मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगे।बस,पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।"

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए  तैयार हो गया।

गड़रिया बोला -" *पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा - गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" ठीक है,दूध पीने को तैयार हूं,आगे क्या करना है?"

गड़रिया बोला-" अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।

राजपंडित ने कहा -" तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?" तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को ।"

गड़रिया बोला-" वह बात गयी।अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा,उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा।तब मिलेगा पारस। नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।"

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-" है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं।

*गड़रिया बोला-" मिल गया जवाब। यही तो कुआं है!लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए*

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रविवार, 17 अक्टूबर 2021

कहानी

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*💪👩‍🚒पुण्य का फल देखना चाहता हूं*💐💐

एक सेठ बस से उतरे, उनके पास कुछ सामान था।आस-पास नजर दौडाई, तो उन्हें एक मजदूर दिखाई दिया।

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सेठ ने आवाज देकर उसे बुलाकर कहा- "अमुक स्थान तक इस सामान को ले जाने के कितने पैसे लोगे?'
'आपकी मर्जी, जो देना हो, दे देना, लेकिन मेरी शर्त है कि जब मैं सामान लेकर चलूँ, तो रास्ते में या तो मेरी सुनना या आप सुनाना ।
सेठ ने डाँट कर उसे भगा दिया और किसी अन्य मजदूर को देखने लगे, लेकिन आज वैसा ही हुआ जैसे राम वन गमन के समय गंगा के किनारे केवल केवट की ही नाव थी।

मजबूरी में सेठ ने उसी मजदूर को बुलाया । मजदूर दौड़कर आया और बोला - "मेरी शर्त आपको मंजूर है?"

सेठ ने स्वार्थ के कारण हाँ कर दी। 

सेठ का मकान लगभग 500मीटर की दूरी पर था । मजदूर सामान उठा कर सेठ के साथ चल दिया और बोला, सेठजी आप कुछ सुनाओगे या मैं सुनाऊँ। सेठ ने कह दिया कि तू ही सुना।

मजदूर ने खुश होकर कहा- 'जो कुछ मैं बोलू, उसे ध्यान से सुनना , यह कहते हुए मजदूर पूरे रास्ते बोलता गया । और दोनों मकान तक पहुँच गये।

मजदूर ने बरामदे में सामान रख दिया , सेठ ने जो पैसे दिये, ले लिये और सेठ से बोला! सेठजी मेरी बात आपने ध्यान से सुनी या नहीं ।
सेठ ने कहा, मैने तेरी बात नहीं सुनी, मुझे तो अपना काम निकालना था।
मजदूर बोला-" सेठजी! आपने जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी, कल ठीक सात बजे आपकी मौत होने वाली है"।

सेठ को गुस्सा आया और बोले: तेरी बकवास बहुत सुन ली, जा रहा है या तेरी पिटाई करूँ:
मजदूर बोला: मारो या छोड दो, कल शाम को आपकी मौत होनी है, अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो ।
अब सेठ थोड़ा गम्भीर हुआ और बोला: सभी को मरना है, अगर मेरी मौत कल शाम होनी है तो होगी , इसमें मैं क्या कर सकता हूं ।  मजदूर बोला:  तभी तो कह रहा हूं कि अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो। सेठ बोला: सुना, ध्यान देकर सुनूंगा ।

मरने के बाद आप ऊपर जाओगे तो आपसे यह पूछा जायेगा कि "हे मनुष्य ! पहले पाप का हफल भोगेगा या पुण्य का "क्योंकि मनुष्य अपने जीवन में पाप-पुण्य दोनों ही करता है, तो आप कह देना कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।
इतना कहकर

मजदूर चला गया । दूसरे दिन ठीक सात बजे सेठ की मौत हो गयी। सेठ ऊपर पहुँचा तो यमराज ने मजदूर द्वारा बताया गया प्रश्न कर दिया कि 'पहले पाप का फल भोगना चाहता है कि पुण्य का' । सेठ ने कहा 'पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन जो भी जीवन में मैंने पुण्य किया हो, उसका फल आंखों से देखना चाहता हूं।

यमराज बोले-" हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, यहाँ तो दोनों के फल भुगतवाए जाते हैं।" 
सेठ ने कहा कि फिर मुझसे पूछा क्यों, और पूछा है तो उसे पूरा करो, धरती पर तो अन्याय होते देखा है, पर यहाँ पर भी अन्याय है।
यमराज ने सोचा, बात तो यह सही कह रहा है, इससे पूछकर बड़े बुरे फंसे, मेरे पास कोई ऐसी पावर ही नहीं है, जिससे इस जीव की इच्छा पूरी हो जाय, विवश होकर यमराज उस सेठ को ब्रह्मा जी के पास ले गये , और पूरी बात बता दी

ब्रह्मा जी ने अपनी पोथी निकालकर सारे पन्ने पलट डाले, लेकिन उनको कानून की कोई ऐसी धारा या उपधारा नहीं मिली, जिससे जीव की इच्छा पूरी हो सके।

ब्रह्मा भी विवश होकर यमराज और सेठ को साथ लेकर भगवान के पास पहुचे और समस्या बतायी । भगवान ने यमराज और ब्रह्मा से कहा: जाइये , अपना -अपना काम देखिये , दोनों चले गये।

भगवान ने सेठ से कहा- "अब बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?
सेठ बोला- "अजी साहब, मैं तो शुरू से एक ही बात कह रहा हूं कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।

भगवान बोले- "धन्य है वो सदगुरू(मजदूर) जो तेरे अंतिम समय में भी तेरा कल्याण कर गया , अरे मूर्ख ! उसके बताये उपाय के कारण तू मेरे सामने खडा है, अपनी आँखों से इससे और बड़ा पुण्य का फल क्या देखना चाहता है। मेरे दर्शन से तेरे सभी पाप भस्मीभूत हो गये।
 
  इसीलिए बचपन से हमको सिखाया जाता है कि, गुरूजनों की बात ध्यान से सुननी चाहिए , पता नहीं कौन सी बात जीवन में कब काम आ जाए?

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शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

बंद मुठ्ठी

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एक समय एक राज्य में  राजा ने घोषणा की कि वह राज्य के मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए अमुक दिन जाएगा।
 इतना सुनते ही  मंदिर के पुजारी ने मंदिर की रंग रोगन और सजावट करना शुरू कर दिया, क्योंकि राजा आने वाले थे। इस खर्चे के लिए उसने  ₹6000/- का कर्ज लिया ।

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 नियत तिथि पर राजा मंदिर में दर्शन ,पूजा, अर्चना के लिए पहुंचे और पूजा अर्चना करने के बाद आरती की थाली में *चार आने दक्षिणा* स्वरूप रखें और अपने महल में प्रस्थान कर गए।
 पूजा की थाली में चार आने देखकर पुजारी बड़ा नाराज हुआ, उसे लगा कि राजा जब मंदिर में आएंगे तो काफी दक्षिणा मिलेगी पर चार आने।
बहुत ही दुखी  हुआ कि कर्ज कैसे चुका पाएगा, इसलिए उसने एक उपाय सोचा।
 गांव भर में ढिंढोरा पिटवाया की राजा की दी हुई वस्तु को वह नीलाम कर रहा है। नीलामी पर उसने अपनी मुट्ठीमें चार आने रखे पर मुट्ठी बंद रखी और किसी को दिखाई नहीं।।
 लोग समझे की राजा की दी हुई वस्तु बहुत अमूल्य होगी इसलिए बोली रु10,000/- से शुरू हुई।
रु 10,000/- की बोली बढ़ते बढ़ते रु50,000/- तक पहुंची और पुजारी ने वो वस्तु फिर भी देने से इनकार कर दिया। यह बात राजा के कानों तक पहुंची ।
राजा ने अपने सैनिकों से पुजारी को बुलवाया और पुजारी से निवेदन किया कि वह मेरी  वस्तु को नीलाम ना करें मैं तुम्हें रु50,000/-की बजाय *सवा लाख रुपए* देता हूं और इस प्रकार राजा ने सवा लाख रुपए देकर अपनी प्रजा के सामने अपनी इज्जत को बचाया ।
तब से यह कहावत बनी *बंद मुट्ठी सवा लाख की*
यह मुहावरा आज भी प्रचलन में है।

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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2021

औरत की कहानी

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*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒माता-बहनों के लिए विशेष*

#लड़कियां_यह_पोस्ट_ध्यान_से_पढ़ना_एक_बार

मेरी पोस्ट उन तमाम लड़कियों के लिए है जिनको ये शिकायत है कि हमको ससुराल में बेटी नही समझा जाता.......

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पहले ये जानना जरूरी है कि बेटी थी तब क्या रोल था आपका घर में.....
आप आराम से उठती थी देर तक सोती रहती थी...
खाना चाय नाश्ता सब मम्मी बना देती थी और बाकी काम मेड करती थी कभी कभार आप घर के काम मे हाथ बंटाती थी....
अब बताएं कि आप की मम्मी भी यदि यही सोचती की मैं भी ससुराल में बेटी की तरह रहूंगी तो क्या आपको ये आराम मिलता .....नही....
शादी से पहले आप मां बाप की जिम्मेदारी है इसलिए वो आपकी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते है...
शादी के बाद आपके ऊपर भी आपकी माँ की तरह जिम्मेदारी आती है तो आपको भी वो करना होगा जो माँ घर मे करती थी हमने लोग अपनी शादी से पहले की ज़िंदगी खूब ऐश के साथ काटकर आते है अब जब हम पर जिम्मेदारी आयी तो घबराना क्यों....
क्यों शिकायत करना....
अब मुझे बताएं यदि आप पीहर आएं आपकी भाभी देर तक सोती रहे मम्मी रसोई में काम करें तो क्या आप उस भाभी की तारीफ करेंगी....कभी नहीं .....
ब्लकि आप मां से कहेंगी की आप क्यो रसोई में खटती है भाभी को करने दिया करो....
कौन लड़की ऐसी है जो भाभी से ये कहे कि भाभी आप खूब आराम करो मम्मी सब कर लेगी....
अब एक बात जो वो कहती है कि हम सिर्फ सास ससुर पति और अपने बच्चों का करेंगे दूसरों का नही ...
मतलब..... देवर ननद जेठ ......
अब इसका मुझे जवाब दें कि आपके भाई की शादी पहले हो गयी और भाभी आ गयी वो सब का खाना बनाए और आपका नही तो क्या आप या आपके मां बाप को सहन होगा ....बिल्कुल नहीं...
इसलिए यदि जो आप चाह रही है वो आपकी भाभी आपके साथ करे तो बुरा नही लगना चाहिए...
आपको अपनी ननद उनके बच्चों का आना बुरा लगता है तो आप भी सोच लीजिये आप की भाभी भी आपके आने से खुश नही होगी....
कभी सोचा है आपने अपनी मां को घर मे पीहर की तरह महसूस करवाया है....
यदि नही तो आप कैसे उम्मीद करती है कि आपको महसूस हो....
क्या माँ ने कभी ये शिकायत की कि मुझे जल्दी उठना पड़ता था...
काम करना पड़ता था....
शायद कभी नहीं .......
वो तो सर दर्द होने पर भी आप लोगो के लिए खाना बनाती थी.....
हर जगह का अपना महत्व है इसलिए दोनों को महत्व दीजिये....
और जो लड़कियां समझती है वो तारीफ के काबिल है वही घर परिवार और सांमजस्य की परिभाषा को समझती है ऐसी सभी माताओं बहनों और तमाम गृहिणियों को नमन

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

परिवार

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒*दो परिवार*

दो परिवार एक दूसरे के पड़ोस में ही रहते थे। एक परिवार हर वक्त लड़ता था जबकि दूसरा परिवार शांति से और मैत्रीपूर्ण रहता था।

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*

*✍️➡️👨‍👩‍👧‍👦अगर कोई भी श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
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एक दिन, झगड़ालू परिवार की पत्नी ने शांत पडोसी परिवार से ईर्ष्या महसूस करते हुए अपने पति से कहा, “अपने पडोसी के वहा जाओ और देखो की इतने अच्छे तरीके से रहने के लिए वो क्या करते हैं।”
पति वहा गया, और छुप के चुपचाप देखने लगा।

उसने देखा कि एक औरत फर्श पर पोछा लगा रही हैं। अचानक किचन से कुछ आवाज आने पर वो किचन में चली गई।

तभी उसका पति एक रूम कि तरफ भागा। उसका ध्यान नहीं रहने के कारण फर्श पर रखी बाल्टी से ठोकर लगाने के कारण बाल्टी का सारा पानी फर्श पर फेल गया।

उसकी पत्नी किचन से वापिस आयी और अपने पति से बोली, “आई एम सॉरी, डार्लिंग। यह मेरी गलती थी कि मेने रास्ते से बाल्टी को नहीं हटाया।”
पति ने जवाब दिया, ” नहीं डार्लिंग, आई एम सॉरी। क्योकि मेने इस पर ध्यान नहीं दिया।”

झगड़ालू परिवार का पति जो छुपा हुआ था वापस घर लोट आया। तो उसकी पत्नी ने पडोसी की खुशहाली 
का राज पूछा।

पति ने जवाब दिया, “उनमे और हम में बस यही अंतर हैं कि हम हमेशा खुद सही होने कि कोशिश करते हैं… एक दूर को गलती के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि वो हर चीज़ के लिए खुद जिम्मेदार बनते हैं और अपनी गलती मानने के लिए तैयार रहते हैं।”

दोस्तों एक खुशहाल और शांतिपूर्ण रिलेशन के लिए जरुरी हैं कि हम अपने अहंकार(Ego) को साइड में रखे और अपने स्वयं के हिस्से के लिए व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी को ध्यान में रखे।
एक दूसरे को दोषी ठहराने से दोनों का नुकसान होता हैं और अपने रिलेशन भी खराब हो जाते हैं।
दोस्तों परिवार में दूसरे की जीत भी अपनी जीत होती हैं। अगर हम बहस करके दूसरे सदस्य को नीचा दिखा दे, ये उसकी हार नहीं बल्कि आपकी हार हैं।

इसीलिए परिवार को तोडना नहीं जोड़ना सीखे, ऐसा करने से आप एक खुशहाल और शांति पूर्ण परिवार का हिस्सा बन जायेंगे।

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

परिग्रह

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒क्या जाएगा साथ💐💐*
गांव-देहात में एक कीड़ा पाया जाता है, जिसे गोबरैला कहा जाता है।

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उसे गाय, भैंसों के ताजे गोबर की बू बहुत भाती है! वह सुबह से गोबर की तलाश में निकल पड़ता है और सारा दिन उसे जहां कहीं गोबर मिल जाता है, वहीं उसका गोला बनाना शुरू कर देता है। शाम तक वह एक बड़ा सा गोला बना लेता है। फिर उस गोले को ढ़केलते हुए अपने बिल तक ले जाता है।

लेकिन बिल पर पहुंच कर उसे पता चलता है कि गोला तो बहुत बड़ा बन गया मगर उसके बिल का द्वार बहुत छोटा है। बहुत परिश्रम और कोशिशों के बाद भी वह उस गोले को बिल के अंदर नहीं ढ़केल पाता, और उसे वहीं पर छोड़कर बिल में चला जाता है।

यही हाल हम मनुष्यों का भी है। पूरी जिंदगी हम दुनियाभर का माल-मत्ता जमा करने में लगे रहते हैं, और जब अंत समय आता है, तो पता चलता है कि ये सब तो साथ नहीं ले जा सकते। और तब हम उस जीवन भर की कमाई को बड़ी हसरत से देखते हुए इस संसार से विदा हो जाते हैं।।

पुण्य किसी को दगा नहीं देता और पाप किसी का सगा नहीं होता।

जो कर्म को समझता है, उसे धर्म को समझने की जरूरत नहीं पड़ती।

संपत्ति के उत्तराधिकारी कोई भी या अनेक हो सकते हैं,लेकिन कर्मों के उत्तराधिकारी केवल और केवल हम स्वयं ही होेते हैं।

 इसलिए उसकी खोज में रहे जो हमारे साथ जाना है, उसे हासिल करने में ही समझदारी है।
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

समर्पण

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒श्रद्धा और समर्पण🌹🙏🏻*

*✍एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी।* 
*उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है।*
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*वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी।* 
*वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई।*
*वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया।* 
*तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था।* 
*उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे।* 
*वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी।* 
*वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका।* 
*वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के* *अंदर धंसने लगा।* 

*दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए।* 
*दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे।*
*गाय के करीब होने के* *बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था।*

*थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है?* 

*बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।* 

*गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है?*

*उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है*

*गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढ़ते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा?*

*थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया।*
*जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे।*
*वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।*

*गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है।* 
*बाघ अहंकारी मन है* और 
*मालिक सद्गुरु का प्रतीक है।*
 *कीचड़ यह संसार है।* और 
*यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है।*
 *किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है लेकिन* 
*आपको किसी मित्र, किसी गुरु, किसी सहयोगी की हमेशा ही जरूरत होती है।जब तक हमें समिचीन मार्गदर्शन नहीं मिलेगा तब तक हम संंसार मे चौरासीलाख योनियों का सुख ही भोगते रहेंगे।अतः हमें सच्चे देव शास्त्र गुरु पर श्रद्धा रखते हुए स्वयं का आचरण सुधारना है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

आत्मविश्वास

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒आत्मविश्वास का दीपक*

एक घर मे *पांच दिए* जल रहे थे।

एक दिन पहले एक दिए ने कहा -

इतना जलकर भी *मेरी रोशनी की* लोगो को *कोई कदर* नही है...

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*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक श्रावकों से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें।✍️*

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तो बेहतर यही होगा कि मैं बुझ जाऊं।

वह दिया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया । 

जानते है वह दिया कौन था ?

वह दिया था *उत्साह* का प्रतीक ।

यह देख दूसरा दिया जो *शांति* का प्रतीक था, कहने लगा -

मुझे भी बुझ जाना चाहिए।

निरंतर *शांति की रोशनी* देने के बावजूद भी *लोग हिंसा कर* रहे है।

और *शांति* का दिया बुझ गया । 
*उत्साह* और *शांति* के दिये के बुझने के बाद, जो तीसरा दिया *हिम्मत* का था, वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया।

*उत्साह*, *शांति* और अब *हिम्मत* के न रहने पर चौथे दिए ने बुझना ही उचित समझा।

*चौथा* दिया *समृद्धि* का प्रतीक था।

सभी दिए बुझने के बाद केवल *पांचवां दिया* *अकेला ही जल* रहा था।

हालांकि पांचवां दिया सबसे छोटा था मगर फिर भी वह *निरंतर जल रहा* था।

तब उस घर मे एक *लड़के* ने प्रवेश किया।

उसने देखा कि उस घर में सिर्फ *एक ही दिया* जल रहा है।
वह खुशी से झूम उठा।
चार दिए बुझने की वजह से वह दुखी नही हुआ बल्कि खुश हुआ।
यह सोचकर कि *कम से कम* एक दिया तो जल रहा है।

उसने तुरंत *पांचवां दिया उठाया* और बाकी के चार दिए *फिर से* जला दिए ।

जानते है वह *पांचवां अनोखा दिया* कौन सा था ?

वह था *आत्मविश्वास* का दिया...

इसलिए *अपने घर में* अपने *मन में* हमेशा आत्मविश्वास  का दिया जलाए रखिये ।

चाहे *सब दिए बुझ जाए* लेकिन *आत्मविश्वास का दिया* नही बुझना चाहिए ।

ये एक ही दिया *काफी* है बाकी *सब दियों* को जलाने के लिए ....
 
ख़ुशियाँ आएँगी, सब कुछ जल्द सामान्य होगा , *आत्मविश्वास का दिया जलाए रखें*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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रविवार, 10 अक्टूबर 2021

कर्म फल

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒*भगवान की प्लानिंग*

एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है, *भगवान-आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे ?*

*👨‍👩‍👧‍👦🤝👩‍🦰नोट:-महानुभावों आपने इस प्रकार की कहानियां हजारों बार पढ़ ली होगी।फिर भी इस प्रकार की कहानियां आपको बार बार भेजी जा रही है।इसका कारण यह है कि जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण सुधार लिया वे तो धन्य है।जिन महानुभावों ने कहानियां पढकर अपना आचरण नहीं सुधारा कोई बात नहीं, आपके आत्मा पर कुछ संस्कार तो पढगये जब वे उदय मे आयेंगे तो नियम से फल की प्राप्ति होगी।हाँ जितना हमारा समीचीन पुरषार्थ होगा उतना ही लाभदायक फल हमें प्राप्त होगा।अतः आप अपने किमती समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं की आत्मा पर अच्छे संस्कार डालकर यह मनुष्य भव सफल करें।हाँ आप हमें अपने विचार अवश्य ही भेजे।*

एक दिन के लिए मैं आपकी जगह *मूर्ति* बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा *रूप धारण* कर घूम आओl

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*भगवान मान जाते हैं*, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग *प्रार्थना* करने आयें, तुम बस उनकी *प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं।*

*मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता हैl*

सबसे पहले *मंदिर में बिजनेस मैन आता है* और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे *खूब सफल करना।* 

वह *माथा टेकता है*, तो उसका *पर्स नीचे गिर* जाता है l *वह बिना पर्स लिये ही चला जाता हैl*

*सेवक बेचैन हो जाता है*, वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि *पर्स गिर* गया, *लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाताl*

इसके बाद एक *गरीब आदमी* आता है और *भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो।*

तभी उसकी *नजर पर्स* पर पड़ती है, वह *भगवान का शुक्रिया अदा करता* है और पर्स लेकर चला जाता हैl

अब *तीसरा व्यक्ति* आता है, वह *नाविक* होता
है l वह *भगवान* से कहता है कि *मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं,यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान..*

तभी पीछे से *बिजनेस मैन पुलिस के साथ आता* है और कहता है कि मेरे बाद ये *नाविक* आया हैl

इसी ने *मेरा पर्स चुरा* लिया है,  *पुलिस नाविक को ले जा रही होती है  तभी सेवक बोल पड़ता है।*

अब पुलिस सेवक के कहने पर उस *गरीब आदमी* को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है।

*रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता हैl*

*भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा हैl*

वह *व्यापारी गलत धंधे* करता है,अगर उसका *पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था।*

इससे उसके *पाप ही कम होते*, क्योंकि वह *पर्स गरीब इंसान को मिला था*. पर्स मिलने पर *उसके बच्चे भूखों नहीं मरते !*

रही बात *नाविक* की, तो वह जिस *यात्रा* पर जा रहा था, वहां *तूफान आनेवाला था*, अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती, उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती, *तुमने सब गड़बड़ कर दीl*

कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी परेशानी आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआl

*लेकिन इसके पीछे भगवान की प्लानिंग होती हैl*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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*शिक्षा: जब भी कोई परेशानी आये. उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है,अच्छे के लिए होता है..!!*
   
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शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

अनुभव

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
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*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒अनमोल सुख* 

*हम सुख के पीछे भाग रहे है पर सुख और कहीं नहीं हमारे अंदर ही छुपा है एक आदमी के पास बहुत धन था। इतना कि अब और धन पाने से कुछ सार नहीं था।जितना था, उसका भी उपयोग नहीं हो रहा था।*

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*मौत करीब आने लगी थी। न बेटे थे, न बेटियां थीं, कोई पीछे न था। और जीवन धन बटोरने में बीत गया। वह तथाकथित महात्माओं के पास, कि मुझे कुछ आनंद का सूत्र दो। महात्मा, पंडित, पुरोहित, सब के द्वार खटखटाए। खाली हाथ लौटा।*

*फिर किसी ने कहा कि एक साधू को हम जानते हैं, शायद वही कुछ कर सके। उनके ढंग जरूर अनूठे हैं; इसलिए चौंकना मत। उनके रास्ते उनके निजी हैं; उनकी समझाने की विधियां भी थोड़ी बेढब होती हैं। मगर अगर कोई न समझा सके, तो जिनका कहीं कोई इलाज नहीं है, उस तरह के लोगों को हम वहां भेज देते हैं।*

*जिनका कहीं कोई इलाज नहीं, उनके लिए सुनिश्चित यहां उपाय है। उस धनी ने एक बड़ी झोली भरी हीरे—जवाहरातों से और गया साधू के पास। साधू बैठे थे एक झाड़ के नीचे। पटक दी उसने झोली उनके सामने और कहा कि इतने हीरे—जवाहरात मेरे पास हैं, मगर सुख का कण भी मेरे पास नहीं। मैं कैसे सुखी होऊं ?*

*साधू ने आव देखा न ताव, उठाई झोली और भागे ! वह आदमी तो एक क्षण समझ ही नहीं पाया कि यह क्या हो रहा है। महात्मागण ऐसा नहीं करते ! एक क्षण तो ठिठका रहा, अवाक ! फिर उसे होश आया कि इस साधू ने तो लूट लिया, मारे गए, सारी जिंदगी भर की कमाई ले भागा।*

*हम सुख की तलाश में आए थे, और दुःखी हो गए। भागा, चिल्लाया कि लुट गया, बचाओ ! चोर है, बेईमान है, भागा जा रहा है ! पूरे गांव में उस साधू ने चक्कर लगवाया। साधू का गांव तो जाना—माना था, गली—कूंचे से पहचान थी, इधर से निकले, उधर से निकल जाए।*

*भीड़ भी पीछे हो ली— भीड़ तो साधू को जानती थी ! कि जरूर होगी कोई विधि ! गांव तो साधू से परिचित था, उसके ढंगों से परिचित था। धीरे—धीरे आश्वस्त हो गया था कि वह जो भी करे, वह चाहे कितना बेबूझ मालूम पड़े, भीतर कुछ राज होता है।*

*लेकिन उस आदमी को तो कुछ पता नहीं था। वह पसीना—पसीना, कभी भागा भी नहीं था जिंदगी में इतना, थका—मांदा, साधू उसे भगाता हुआ, दौड़ाता हुआ, पसीने से लथपथ करता हुआ वापिस अपने झाड़ के पास लौट आया।*

*जहां उसका घोड़ा खड़ा था। लाकर उसने थैली वहीं पटक दी झाड़ के पीछे छिप कर खडे हो गए। वह आदमी लौटा; झोला पड़ा था, घोड़ा खड़ा था; उसने झोला उठा कर छाती से लगा लिया और कहा कि  हे परमात्मा ! तेरा धन्यवाद !*

*आज मुझ जैसा प्रसन्न इस दुनिया में कोई भी नहीं ! साधु  वृक्ष के उस तरफ से झांके और , कहा : कुछ सुख मिला ? यही राज है। यही झोली तुम्हारे पास थी, इसी को लिए तुम फिर रहे थे, और सुख का कोई पता नहीं था। यही झोली वापिस तुम्हारे हाथ में है, लेकिन बीच में फासला हो गया, थोड़ी देर को झोली तुम्हारे हाथ में न थी, थोड़ी देर को झोली से तुम वंचित हो गए थे, अब तुम कह रहे हो आनंद आ गया—शर्म नहीं आती तुम्हे कह रहे हो कि हे प्रभु, धन्यवाद तेरा कि आज मैं आह्लादित हूं, आज पहली दफा आनंद की थोड़ी झलक मिली। अरे पागल आदमी ये झोली जिसमे तुझे सुख दिखने लगा प्रभु ने पहले से तुम्हे दी हुई थी पर तुझे उसका मूल्य नहीं था खोने पर अकल आ गई। बैठो घोड़े पर और भाग जाओ, नहीं तो मैं झोली फिर छीन लूंगा। रास्ते पर लगो ! रास्ता तुम्हें मैंने बता दिया।*

*लोग ऐसे हैं,लोग ही नहीं, सारा अस्तित्व ऐसा है। हम जिसे गंवाते हैं,बाद में उसका मूल्य पता चलता है। जब तक गंवाते नहीं तब तक मूल्य पता नहीं चलता। जो तुम्हें मिला है, उसकी तुम्हें दो कौड़ी कीमत नहीं है। जो खो गया, उसके लिए तुम रोते हो। जो खो गया, उसका अभाव खलता है।व्यक्ति के जाने के बाद उसकी याद आती है कमी खलती है महत्व समझता है तो उसके रहते में रिश्ते में गर्मी लाओ न। उसको पूरा मान सम्मान दो न। रिश्ते में अहसास कराओ कि आप का होना जिंदगी में बहुत जरूरी हैं..!!*

*✍️▶️अतः हमसभी के पास जो वर्तमान में समय है इसे व्यर्थ न जाने दो।जिन निमित्तों से हमारा स्वयं का आत्मकल्याण हो सकता है।उन निमित्तों का समय पर फायदा लें।समय निकल जाने पर स्वयं के शरीर में शक्ति नहीं रहेगी कि हम आत्मकल्याण केलिए कुछ नहीं कर पाये।*
 
*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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