*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 स्वयं के कर्मों का फल ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 श्रावण शुक्ल पौर्णिमा , शनिवार 09 अगस्त 2025 कलि काल के 11वें तीर्थंकर क्षेयांसनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक शक्ति प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करवाने वाले श्री क्षेयांसनाथ भगवान जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔श्रावण शुक्ल पौर्णिमा , शनिवार 09 अगस्त 2025 के ही दिन 700 मुनिराजों का पारना हुआ था इस कारण से रक्षाबंधन पर्व याने दान दिवस स्व व पर के उपकार के लिए मनाया जाता है।🙏*
*🎪 अगस्त 2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 09, 15,29, व 31 तारीख को है।*
*👨👨👦👦🔔🐎 अगस्त माह में अष्टमी तिथि 16 तारीख को है।👉चतुर्दशी तिथि 08 व 23 अगस्त को है।*
*👨👨👦👦🔔👉 दिनांक 10 अगस्त से 08 सितंबर तक षोडश कारण महापर्व 🔔*
*👨👨👦👦✅ दस लक्षण महापर्व 28 अगस्त से 06 सितंबर तक 👉 अनंत चतुर्दशी 06 सितंबर को 🐎*
*🐎✍️ पंचक 10 से 14 अगस्त तक है।*
*✅🔔⏰🐎 नोट अगस्त माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह आदि शुभ कार्यों के मुहूर्त नहीं है।*
*🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
हमारे स्वयं के कर्म सदा न्यायकारी हैं, अर्थात वह जीव को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं। अच्छे कर्मों का अच्छा और बुरे कर्मों का बुरा फल देना ही ईश्वरीय न्याय कहलाता है। मनुष्य कभी-कभी बिना कर्म के सुख चाहता है या दूसरों को दुःख देकर स्वयं सुखी होना चाहता है, जो कर्मों की न्याय व्यवस्था में असंभव है। संसार में मानव न्याय व्यवस्था दोषपूर्ण हो सकती है, परंतु स्वयं के कर्मों का न्याय सदा निष्पक्ष और पूर्ण होता है। जो छल-कपट से सुख या सुविधाएं प्राप्त करते हैं, वे अंततः भय, तनाव व ग्लानि से घिर जाते हैं। इसलिए ईमानदारी से परिश्रम करें, दूसरों को सुख दें, तभी सच्चा सुख प्राप्त होगा। यही स्वयं के कर्मों न्याय ही जीवन का सार है।
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*कर्मों का न्याय*
अब हम प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इस कहानी के माध्यम से कर्म व्यवस्था को समझते है।
एक दिन एक महात्मा अपने शिष्य के साथ यात्रा पर निकले। गुरु ज्ञान के भंडार होने से उनका शांत स्वभाव था और व्यर्थ की बातों से दूर रहते थे, जबकि शिष्य अत्यंत चंचल और जिज्ञासु स्वभाव का था। चलते-चलते वे एक तालाब के पास पहुँचे जहाँ एक धीवर (मछुआरा) मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल डाल रहा था। यह दृश्य देखकर शिष्य के भीतर करुणा उमड़ पड़ी और वह उसे अहिंसा का उपदेश देने लगा।
धीवर ने पहले टालने की कोशिश की, पर जब शिष्य की बातें बढ़ती गईं, तो दोनों में विवाद होने लगा। यह देखकर महात्मा वापस लौटे और शिष्य को समझा-बुझाकर वहाँ से ले गए। उन्होंने कहा, "बेटा, हमारा कार्य केवल समझाना है, न्याय करना यह स्वयं के कर्मों का कार्य है। हमें दंड देने के लिए नहीं, मार्ग दिखाने के लिए इस धरती पर जन्म प्राप्त हुआ है।"
शिष्य ने पूछा, "गुरुदेव, अगर न कोई राजा और न ही हम उसे दंड देंगे तो उसे दंड कौन देगा?" गुरुजी ने मुस्कराकर उत्तर दिया, "स्वयं के कर्मों का चक्र चोबीस घंटे निरंतर चल रहा है बस इस बात को समझ कर जो जीवन व्यतीत करता है वहीं सच्चा मोक्ष का राही कहलाता है। वह हर जीव के कर्मों का लेखा-जोखा रखता है और उसका न्याय अचूक होता है। हर प्राणी को उसके कर्मों का फल आज नहीं तो कल अवश्य ही मिलता है।"
समय बीता। दो वर्ष बाद वही गुरु-शिष्य फिर उसी तालाब के पास से गुज़रे। इस बार उन्होंने देखा कि एक ज़ख्मी साँप को चींटियाँ काट-काट कर खा रही थीं। यह देख शिष्य का मन द्रवित हो गया और वह साँप की सहायता को दौड़ पड़ा, परंतु गुरुजी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले, "बेटा, इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो। यदि तुम इसे बचाओगे तो यह दुःख इसे अगले जन्म में भोगना पड़ेगा।"
शिष्य चकित होकर बोला, "गुरुदेव! यह कौन है और कौन से कर्म का फल भोग रहा है?" गुरुजी ने उत्तर दिया, "यह वही धीवर है जिसे तुमने दो वर्ष पूर्व समझाने का प्रयास किया था। यह वही मछलियाँ हैं जो आज चींटियों का रूप लेकर इसका प्रतिकार कर रही हैं।"
शिष्य यह सुनकर स्तब्ध रह गया और बोला, "गुरुदेव, यह तो बहुत ही गहरा और रहस्यमय न्याय है!" गुरुजी बोले,
"स्वयं के कर्मों का न्याय गूढ़ अवश्य है, परंतु अन्याय कभी नहीं होता। इसी जीवन में स्वर्ग और नरक दोनों के दर्शन होते हैं। मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है – चाहे वह शुभ हो या अशुभ। इसलिए हमेशा सत्कर्मों का चयन करो।"
शिष्य की आँखें खुल चुकी थीं। उसने निश्चय किया कि जीवन के हर क्षण को श्रेष्ठ कर्मों में लगाएगा, क्योंकि अब उसे समझ आ गया था कि स्वयं के कर्म फल न्यायकारी है, और न्याय का आधार केवल और केवल हमारे कर्म हैं।
*🔔👨👨👦👦🌞🐎विशेष: -भव्य आत्माओं, स्वयं के कर्मों के न्याय से कोई बच नहीं सकता। अतः हमेशा ऐसा कर्म करें जो न केवल हमें, बल्कि दूसरों को भी सुख दे, क्योंकि वही सच्चा धर्म और ईश्वर की सच्ची पूजा है।▶️हां हम सभी जीवों ने चौरासी लाख योनियों में असंख्यात बार भ्रमण करते हुए अनेक प्रकार के कर्मों की गठरी बांध ली है।उस गठरी को समाप्त करने के लिए हमें सच्चे देव शास्त्र गुरु की शरण जाना आवश्यक है। सच्चे गुरु का मार्गदर्शन व स्वयं का प्रायश्चित ही सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा हमारा तीन काल में आत्मकल्याण संभव नहीं है।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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