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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩🚒कर्म का उदय*
एक भक्त सुबह सवेरे उठा साफ़ कपड़े पहने और मंदिर (जिनालय) की तरफ चल दिया ताकि भगवान की भक्ति का आनंद प्राप्त कर आज का दिन सार्थक कर सके।
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चलते चलते रास्ते में ठोकर खाकर गिर पड़ा, कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया।
कपड़े बदलकर वापस मंदिर की तरफ रवाना हुआ फिर ठीक उसी जगह ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले, फिर जिनमंदिर की तरफ रवाना हो गया।
जब तीसरी बार उस जगह पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक अज्ञात व्यक्ति लाठी हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।
इस तरह वो शख्स उसे जिनमंदिर के दरवाज़े तक ले आया।
पहले वाले शख्स ने उससे कहा आप भी अंदर आकर मंदिर मे भक्ति कर लें।
लेकिन वो शख्स डंडा हाथ में थामे खड़ा रहा और मंदिर में दाखिल नही हुआ।
दो तीन बार इनकार करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है ...?
दूसरे वाले शख्स ने जवाब दिया "इसलिए क्योंकि मैं इस क्षेत्र का क्षेत्रपाल हूँ।
आपके कर्मफल ने आपके धर्म कार्य मे अंतराय डाला किंतु आपके धर्म पुरषार्थ ने आपकी मदद करने मुझे कहाँ।
ये सुनकर पहले वाले शख्स की हैरत का ठिकाना न रहा।
काल कर्म फल ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मैं ही था जिसने आपको ज़मीन पर गिराया था।
जब आपने घर जाकर दुबारा मंदिर की तरफ रवाना हुए तो भगवान की भक्ति से पुण्य बंध होने से आपके कुछ पाप पुण्य मे बदल गये ।
जब आपको आपके अंतराय कर्म ने दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर फिर कपड़े बदले और फिर दुबारा जाने लगे तो आपकी पंच परमेष्ठी के प्रति दृढता ने आपके पापकर्म को पुण्य मे परिवर्तन कर दिया।
इसलिए मैं आपके पुण्य कर्म से आपको यहाँ तक खुद पहुंचाने आया हूँ।
अब हम देखे कि उस शख्स ने दो बार गिरने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार फिर पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई मेहमान आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम मंदिर छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं।
*क्यों....?*
क्योंकि हम अपने भगवान से ज्यादा दुनिया की चीजों और रिश्तेदारों से ज्यादा प्यार करते हैं।
उनसे ज्यादा मोह हैं। इसके विपरीत वह शख्स दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार फिर घर जाकर कपड़े बदलकर मंदिर चला गया।
क्यों...?
क्योंकि उसे अपने दिल में जिनधर्म के लिए बहुत प्यार था। वह किसी कीमत पर भी अपने श्रावकधर्म का नियम टूटने नहीं देना चाहता था।
इसीलिए पुण्यकर्म ने स्वयं उस शख्स को मंजिल तक पहुँचाया, अंतराय कर्म ने उसे दो बार कीचड़ में गिराया और पंचपरमेष्ठी की भक्ति में रूकावट डाल रहा था, बाधा पहुँचा रहा था !
इसी तरह हम जीव भी जब हम भक्ति भजन करें तब हमारा मन चाहे कितनी ही चालाकी करे या कितना ही बाधित करे, हमें हार नहीं माननी चाहिए और मन का डट कर मुकाबला करना चाहिए।
एक न एक दिन हमारा मन स्वयं हमें भक्तिभजन के लिए उठायेगा और उसमें रस भी लेगा।
बस हमें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और न ही किसी काम के लिए भक्तिभजन में ढील देनी हैं। वह पंचपरमेष्ठी की भक्ति ही हमारे काम सिद्ध और सफल करेगी।
*इसीलिए हमें भी मन से हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए हम पंचपरमेष्ठी की भक्ति दिखावे केलिये नकरें। पंचपरमेष्ठी की भक्ति उनके गुणों की प्राप्ति के लिए करें इससे आपको आजतक जो प्राप्त नहीं हुआ उससे भी अधिक मात्रा में प्राप्ति होगी जो आपसे कोई भी नहीं छुडा सकता ।आप अपने श्रावकधर्म का ध्यान रखें।विश्व की कोई भी शक्ति आपका कुछ अनर्थ नहीं कर सकती।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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