बुधवार, 19 जनवरी 2022

सफलताओं के महत्वपूर्ण सूत्र

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒"सफलताओं के कुछ रहस्यमय-सूत्र"*

*यह सभी संवाद गांधीजी के शिष्यों की डायरी से लिया गया है।*
स्वतन्त्रता संग्राम के प्रारम्भिक दिनों की बात है। तब तक मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार नहीं हुआ था। एक उत्साही स्वयं सेवक के रूप में गाँव में ही  सामाजिक कार्यकर्ता था। उन दिनों देहातों में गांधीजी को 'करामाती बाबा' मानते थे और कहते थे अंग्रेज पकड़कर जेल में बन्द करते हैं, और वे अपनी करामात से बाहर निकल जाते हैं। हम तो उन्हें स्वतन्त्रता हेतु भारत में अवतरित देवदूत मानते थे ।

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ऐसी ही योगियों की कथा-किवदन्तियां और भी सुन रखी थीं। मन में आया कि योग सीखने के लिए गांधी जी के पास ही चलना चाहिए। साबरमती अहमदाबाद के पते पर पत्र व्यवहार किया। कुछ समय आश्रम में रहने की आज्ञा माँगी। इसे सुयोग ही कहना चाहिए कि मुझे आज्ञा मिल गई, और दैनिक उपयोग के वस्त्र बिस्तर साथ लेकर अहमदाबाद जा पहुंचा। साबरमती आश्रम में अपना नाम दर्ज करा दिया।

दूसरे दिन से अपने लिए काम पूछा- ड्यूटी टट्टियाँ साफ करने एवं आँगन बुहारने की सभी प्रायः प्रथम आगन्तुक को यहाँ यही शिक्षा दी जाती थी, गन्दगी दूर करना और उसके स्थान पर स्वच्छता बनाना।

मैंने टट्टियाँ अपनी बुद्धि के अनुरूप साफ कीं। पर जब निरीक्षक आये तो उन्हें काम पसन्द नहीं आया। जो त्रुटियां रह गई थीं, सो बताई और कहा कि सफाई ऐसी होनी चाहिए, जैसी रसोई घर में होती है। दूसरी बार मैंने उनकी मर्जी जैसा काम कर दिया। नित्य का सिलसिला यही चलता। निरीक्षक की पसन्दगी का काम करने लगा। सूत कातने सम्बन्धी अन्य काम तो दिनचर्या में सम्मिलित थे ही।

एक दिन लकड़ी चीरने का काम दिया गया। चीर दी। निरीक्षक आये। उनने छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे देखे और कहा—यह किसी के पैर में चुभ सकते हैं। सभी को उठाओ और पतले टुकड़ों को ईंधन में रखो, वैसा कर दिया। वह काम कई दिन हमसे कराया गया।

इसके बाद सूत सम्बन्धी काम, प्रार्थना, सफाई, व्यवस्था आदि के काम कराये जाते रहे। प्रातः सायं जो सामूहिक प्रार्थना होती उसमें सम्मिलित होता रहा।

एक दिन मैंने पेड़ पर से दतौन के लिए लम्बी दातौन तोड़ ली और दाँत घिसने लगा। निरीक्षक थीं मीरा बहना वे दूर से इसे देख रही थीं। पास आकर बोलीं-"इतनी लम्बी दातौन नहीं तोड़नी चाहिए। तोड़नी थी तो उसे ऐसे ही कूड़े की तरह नहीं डालना चाहिए। बचे टुकड़े को किसी और की आवश्यकता पूरी करने के लिए देना चाहिए था। पत्तियाँ कूड़े दान में डालनी चाहिए थीं और घिसते समय जो पानी मुह से निकलता है वह फर्श पर नहीं, नाली में डाला जाना चाहिए। अन्यथा मुंह में कोई छूत/बीमारी हो तो दूसरे को लग सकती है। पानी अधिक खर्च नहीं करना चाहिए था।" मैंने भूल मानी और सुधारी और भविष्य में सावधानी बरतने का आश्वासन दिया, पर इस घटना से बड़ी सिखावन हाथ लग गयी। डायरी रोज लिखता और वह गाँधी जी के पास पहुँचती रहती।

इसी प्रकार के कार्यक्रमों में तीन महीने होने को आये। करामाती योगी बनने के उद्देश्य से आया था। दूसरा गांधी बनना चाहता था, पर वैसी कोई. साधना सीखने का कोई अवसर न मिला। जाने के दिन समीप आने पर बहुत बेचैनी रहने लगी। एक दिन हिम्मत बांधकर गांधीजी के सेक्रेटरी महादेव भाई देसाई के दफ्तर में गया और संकोच पर नियन्त्रण करके आने का उद्देश्य कह सुनाया। देसाई जी हंसे और बोले—"भाई ! हम तो करामाती योगी हैं नहीं। गांधीजी हो सकते हैं। सो कल प्रातःकाल तुम उनके साथ टहलने चले जाना और योगी बनने का राज पूछकर अपना समाधान कर लेना।" इस उत्तर से मुझे सन्तोष हो गया।

गांधीजी प्रातःकाल नित्य टहलते समय किसी को साथ ले जाते थे। उसका समाधान भी हो जाता था व गाँधी जी का भ्रमण भी। प्रातःकाल ५ बजे मैं दरवाजे पर जा खड़ा हुआ और जैसे ही गांधी जी जाये उनके पीछे-पीछे चलने लगा। महादेव भाई ने उन्हें मेरी बात बता दी थी। गाँधी जी ने मुड़ कर पीछे देखा और अपनी टहलने वाली चाल में चल पड़े। रास्ते में पूछा "तुम्हीं गाँधी जी बनने की योग साधना सीखने आये थे!" मैंने हाँ कह दिया। दूसरा प्रश्न पूछा गया -"वैसा कुछ सिखाया गया या नहीं?" मैंने तीन महीने का कार्य विवरण संक्षेप में सुना दिया। *वे बोले- यही है गाँधी बनने की विद्या, जो तुम सीखते रहे।* जिज्ञासा समाधान न होते देख कर उनने टहलते टहलते मुझे एक ऐतिहासिक घटना सुनाई। वैज्ञानिक थामस डेवी की एक घटना। वह लड़का एक गरीब घर में जन्मा। वैज्ञानिक बनने की इच्छा थी। विधिवत् वैज्ञानिक शिक्षा दिलाने की परिवार में परिस्थितियाँ न थीं।

डेवी ने सुझाया, मुझे किसी वैज्ञानिक के यहाँ छोड़ दो।

उसका घरेलू काम काज करता रहूँगा और जो वे सिखा दिया करेंगे, सीखता रहूँगा? ऐसा सुयोग देखने के लिए उसकी माँ कितने ही वैज्ञानिकों के पास ले गई पर सभी ने ऐसा झंझट सिर पालने से स्पष्ट मना कर दिया। एक वैज्ञानिक ने कहा "इसे कल लाना, काम का होगा तो रख लेंगे।"

डेवी की माँ उसे लेकर दूसरे दिन पहुंची। उस वैज्ञानिक ने हाथ में बुहारी थमाई और घर की सफाई करने को कहा। डेवी ने इतनी दिलचस्पी से बुहारी लगाई कि कोई कोना, छत, फर्नीचर, सामान गन्दा न रहा। सब वस्तुए सफाई के बाद इस तरह रखी कि वे सुसज्जित जैसी लगती थी। वैज्ञानिक ने ताड़ लिया कि इसमें काम के प्रति दिलचस्पी तन्मयता और व्यवस्था का माद्दा है। इसे सिखाना सार्थक हो सकता है। यह इस गुण के कारण ही उपयोगी हो सकता है और वैज्ञानिक बन सकता है। लड़के को उनने पास में रख लिया। घरेलू काम करता रहा और पढ़ता रहा क्रमशः उसकी मौलिक जिज्ञासु बुद्धि विकसित होने लगी एवं वह अन्ततः उच्च कोटि का वैज्ञानिक बन गया। उसने कितने ही आविष्कार किये।

*यह प्रसंग सुनाते हुए गाँधी जी ने कहा "यहाँ जो भी काम तुम से कराये गये हैं वे सभी ऐसे थे जिसमें काम के प्रति जिम्मेदारी और दिलचस्पी बढ़े। हमारे अन्दर यही विशेषता है। इसी के सहारे हमारी आदर्शवादिता उठाकर हमें यहाँ तक ले आई है। हमारी सफलता का इतना ही रहस्य है। तुम इस रास्ते पर चलोगे तो जो भी कार्य अपनाजोगे उसमें प्रवीण और सफल होकर रहोगे। चाहे धर्मक्षेत्र हो, राजनीति अथवा अपना पारिवारिक जीवन, सफलता का यही एक राजमार्ग है।"*

बात समाप्त हो गई। *सच्चे योगाभ्यास का रहस्य मेरे हाथ लग गया कि मनुष्य को आदर्शवादी कार्यक्रम हाथ में लेने चाहिए। जो करना है उसे पूरी दिलचस्पी और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए।* तीन महीने साबरमती आश्रम में रहकर मैंने इसी प्रक्रिया का अभ्यास किया। निरीक्षकों ने उसमें जो त्रुटियाँ रहती थीं वे ठीक कराई ।

मैं करामाती योगी बनने का उद्देश्य लेकर आया था। वह बचपन जैसी उमँग हवा में उड़ गई। ऐसा कोई योगी नहीं होता जो जादूगरों जैसी करामात दिखा सके । गाँधीजी भी वसे नहीं थे। वे महापुरुष थे ।

तीन महीने का समय पूरा हुआ, मैं सभी को विदाई का प्रणाम, अभिवादन करके घर लौट आया। गांधीजी के बताए सूत्र गिरह बांध लिए। आदशों को अपनाया जो काम हाथ में लिया उसे प्राण-पण से किया हमारी सफलताओं के मूल में दैवीय अनुदानों साथ वैयक्तिक पराक्रम की भी भूमिका रही है। इसी को विविध सफलताओं का रहस्य कहा जा सकता है।

*"अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।"*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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