रविवार, 18 दिसंबर 2022

जैन दर्शन की प्रामाणिकता

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️ जैन धर्म के इतिहास की बूंदें*
*💪👩‍🚒 जैनदर्शन की प्रमाणिकता ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️1.कल पौष कृष्ण ग्यारस दिनांक 19 दिसंबर  2022 सोमवार  को अष्टम निधि प्रदाता चन्द्रप्रभ तीर्थंकर व  सभी विघ्नों के हर्ता पार्श्वनाथ तीर्थंकर सभी की मलिनता के विनाशक  1008 श्री चन्द्रप्रभ व पार्श्वनाथ भगवान जी का जन्म व तप कल्याणक  महोत्सव हैं।*
*👨‍👩‍👦‍👦आप सभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्ति अनुसार उत्सव मनाकर जीवन सफल करें।*

यह पहली बार था जब ड्यूसेन  को किसी हिन्दू योगी की एकाग्रता, बोध क्षमता और संयम की शक्ति का परिचय हुआ था। बात उस वक़्त की है जब स्वामी विवेकानंद जर्मनी गए थे। अपने प्रवास के दौरान वे पॉल ड्यूसेन नाम के अत्यंत प्रभावशाली दार्शनिक और विद्वान के घर मेहमान थे।

स्वामी विवेकानंद पॉल ड्यूसेन के अध्ययन कक्ष में बैठे हुए थे और दोनों में कुछ बातचीत हो रही थी। वहीं टेबल पर जर्मन भाषा में लिखी हुई एक किताब पड़ी हुई थी जो संगीत के बारे में थी। इस किताब के बारे में ड्यूसेन ने विवेकानंद से काफी तारीफ़ें की थीं।

स्वामीजी ने ड्यूसेन से वह किताब केवल एक घंटे के लिए देने के लिए कहा ताकि वे इसे पढ़ सकें। लेकिन विवेकनद की इस बात पर उस दार्शनिक को बहुत आश्चर्य हुआ। उनके आश्चर्य का कारण यह था कि एक तो वह किताब जर्मन भाषा में थी जो स्वामी विवेकानंद जानते नहीं थे। दूसरे वह किताब इतनी मोटी थी कि उसे पढ़ने में कई हफ्तों का समय चाहिए था।

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पॉल ड्यूसेन को विवेकानंद की इस बात का बुरा लगा क्योंकि वो खुद इस किताब को कई दिनों से पढ़ रहे थे और अभी आधा भी नहीं पढ़ पाये थे। उन्होने विवेकानंद से कहा-

“क्या केवल एक घंटे में आप इस किताब को पूरा पढ़ लेंगे?” “मैं इस को अभी तक सही से समझ नहीं पा रहा हूँ जबकि मुझे इसे पढ़ते हुए कई हफ्ते बीत चुके हैं। यह बहुत ही उच्च स्तर की किताब है और इसे समझना बहुत कठिन है।”

ड्यूसेन की इन बातों पर स्वामीजी ने उनसे कहा कि “ मैं विवेकानंद हूँ पॉल ड्यूसेन नहीं।“ इसके बाद पॉल ने वह पुस्तक देना स्वीकार कर लिया।

“स्वामी विवेकानंद ने बिना खोले ही किताब को पूरा याद कर लिया”
उस पुस्तक को स्वामी विवेकानंद ने कुछ देर तक अपनी दोनों हथेलियों के बीच दबा कर रखा और फिर पॉल ड्यूसेन के पास लौट आए। विवेकानन्द ने जर्मन दार्शनिक से कहा कि “इस किताब में कुछ खास नहीं है।”

फिर क्या था! उस महाशय के आश्चर्य का ठीकाना न रहा। उन्हे लगा कि विवेकानंद या तो झूठ बोल रहे हैं या उन्हे अपने ज्ञान का घमंड हो गया है। उन्हे यकीन नहीं हुआ कि एक घंटे में ही विवेकानंद उस पुस्तक के बारे में अपनी राय कैसे दे सकते हैं। और वो भी तब जब उन्हे जर्मन भाषा आती भी नहीं है।

अब जर्मन दार्शनिक ने विवेकानंद कि परीक्षा लेने के लिए एक एक कर के स्वामी विवेकानंद से उस किताब के अलग-अलग पन्नों में से पुछना शुरू किया। किन्तु पॉल ड्यूसेन के जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य हुआ जब विवेकानंद ने न केवल उन सभी पन्नों की जानकारियों के बारे में सही-सही बता दिया बल्कि उससे संबन्धित अलग-अलग विचारों को भी उनके सामने रख दिया। विवेकानंद की मानसिक शक्ति ने उस जर्मन दार्शनिक को अंदर से झकझोर दिया।

डरो मत ! स्वामी विवेकानंद प्रेरक प्रसंग
वे पूछ उठे “ यह कैसे संभव है?” इस पर विवेकानंद ने उत्तर दिया-

इसीलिए लोग मुझे स्वामी विवेकानंद कहते हैं।

उन्होने उस पॉल ड्यूसेन को ब्रह्मचर्य, त्याग और संयम व शुद्ध सात्विक भोजन के पालन से मिलने वाली शक्ति के बारे में बताया और कहा कि यदि मनुष्य एक संयमित जीवन जिये तो उसके मन की मेधा, स्मरण और अन्य शक्तियाँ जागृत हो सकती हैं। बाद में पॉल ड्यूसेन ने सनातन संस्कृति अपना कर अपना नाम देव-सेन रख लिया था।

आजकल दिन-प्रतिदिन नई पीढ़ी और युवावर्ग जाने-अनजाने में विदेशी रहन सहन और पाश्चात विचारों को अंधाधुंध अपनाती जा रही है। इतना ही नहीं उन्हे ऐसा करने में प्रतिष्ठा नजर आती है। भले ही वो रहन-सहन हमारे शरीर और मानसिक स्वस्थ्य के लिए हानिकारक ही क्यों न हो।

हमारी युवा पीढ़ी इस बात को भूल सी गयी है कि भारत की संस्कृति, परंपरा और अध्यात्म में जीवन के ऐसे बहुमूल्य अनुभव छुपे हैं जो किसी अन्य देश अथवा संस्कृति के पास नहीं हैं। मन की एकाग्रता, संयम, और त्याग से प्राप्त होने वाली उपलब्धियों के विषय में उनकी कोई इच्छा नहीं है।

किन्तु बार-बार हमारे देश के महान दार्शनिकों और योगियों के ज्ञान और श्रेष्ठता से पश्चिमी देशों के लोग अत्यंत प्रभावित हुए हैं और उन्हे भी यह मानना पड़ा है कि भारतीय जीवन शैली और वैदिक ज्ञान श्रेष्ठ है।

स्वामी विवेकानंद का जीवन हमें निर्भीक, साहसी, संयमी और परिश्रमी बनने की शिक्षा देता है। एक ओर दिगंबर जैनदर्शन के प्राचीन ग्रंथ ज्ञान-विज्ञान के उच्चतम अनुभवों की शिक्षा देते हैं तो दूसरी ओर हमारे अन्य ग्रंथ दैनिक जीवन को मर्यादित और अनुशासित जीने की सलाह देते हैं।

*विशेष :-भव्य आत्माओं आज भी संपूर्ण विश्व में जैन दिंगबर प्राचीन ग्रंथों पर विश्व के वैज्ञानिक शोध कर रहे है। अमेरिका के सबसे बड़ी शोधशाला में आज भी जैन शास्त्रों का भंडार भरा हुआ है। उनकी शोधशाला में भगवान महावीर स्वामी की फोटो लगी हुई है।वे उन्हें सबसे बड़ा वैज्ञानिक मानते है,उनका कहना है कि इस वैज्ञानिक ने 2500 वर्ष पहले जो बात कहीं है उन्हें हम प्रयोग व अध्ययन के द्वारा प्रमाणित कर चुके है। आज भी बहुत सी बातें पर शोध कार्य जारी है। अतः हम सभी भव्य आत्माओं को जैनदर्शन की सच्चाई जानकर अपनी शक्ति अनुसार आचरण में उतारकर जीवन सार्थक करना चाहिए।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन किजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जीत कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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