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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 राजा का भरोसेमंद नौकर ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️1. पौष शुक्ल दसमी दिनांक एक जनवरी 2023 रविवार को सोलवें तीर्थंकर सभी को आंतरिक शांति प्रदान करने वाले 1008 श्री शांतिनाथ भगवान जी का ज्ञान कल्याणक महोत्सव हैं। तीर्थंकर शांतिनाथ जी का ज्ञान कल्याणक , हस्तिनापुर में हुआ था | आज के ही दिन नंद्दावर्त वृक्ष के नीचे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी |*
*🕉️2. पौष शुक्ल ग्यारस दिनांक दो जनवरी 2023 सोमवार को दूसरे तीर्थंकर सभी को सहनशीलता प्रदान करने वाले 1008 श्री अजित नाथ भगवान जी का ज्ञान कल्याणक महोत्सव हैं।*
*👨👩👦👦आप सभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्ति अनुसार उत्सव मनाकर जीवन सफल करें।*
एक राजा था और उसका एक बड़ा प्यारा नौकर था। नौकर से उसे बहुत प्रेम था और उस नौकर के भक्ति-भाव से, उसके अनन्य समर्पण से कि राजा उसे अपने ही कमरे में सुलाता था। उस पर ही एक भरोसा था उसको।
दोनों एक दिन शिकार करके लौटते थे, राह भटक गये, भूख लगी। एक वृक्ष के नीचे दोनों खड़े थे। एक फल लगा था–अपरिचित, अनजान। राजा ने तोड़ा। जैसी उसकी आदत थी, चाकू निकालकर उसने एक टुकड़ा काटकर अपने नौकर को दिया, जो वह हमेशा देता था, पहले उसे देता था फिर खुद खाता था। नौकर ने खाया। बड़े अहोभाव से कहा कि “एक कली और…! एक कली और दे दी, उसने फिर कहा, “एक कली और…!’ तो तीन हिस्से वह ले चुका, एक हिस्सा ही बचा। राजा ने कहा, “अब एक मेरे लिए छोड़।’ पर उसने कहा कि नहीं मालिक, यह फल तो पूरा ही मैं खाऊंगा। राजा को भी जिज्ञासा बढ़ी कि इतना मधुर फल है, ऐसा इसने कभी आग्रह नहीं किया! तो छीना-झपटी होने लगी। लेकिन नौकर ने छीन ही लिया उसके हाथ से।
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उसने कहा, “रुक! अब यह जरूरत से ज्यादा हो गयी बात। तीन हिस्से तू खा चुका। एक ही फल है वृक्ष पर। मैं भी भूखा हूं। और मेरे मन में भी जिज्ञासा उठती है कि इतनी तो तूने कभी किसी चीज के लिए मांग नहीं की। यह मुझे दे दे वापस।
नौकर ने कहा “मालिक, मत लें, मुझे खा लेने दें।’
पर राजा न माना तो उसे देना पड़ा। उसने चखा तो वह तो जहर था। ऐसी कड़वी चीज उसने अपने जीवन में कभी चखी ही न थी। उसने कहा, “पागल! यह तो जहर है, तूने कहा क्यों नहीं।’
तो उसने कहा कि जिन हाथों से इतने स्वादिष्ट फल मिले, उन हाथों से एक कड़वे फल की क्या शिकायत!
शिकायत दूर ले जाएगी, धन्यवाद पास लाएगा।
थोड़ा सोचो: उस दिन वह नौकर राजा के हृदय के जितने करीब आ गया…। राजा रोने लगा। वह तो बिलकुल जहर था फल। वह तो मुंह में ले जाने योग्य न था। और उसने इतने अहोभाव से, इतनी प्रसन्नता से उसे स्वीकार किया, छीना-झपटी की! वह नहीं चाहता था कि राजा चखे। क्योंकि चखेगा तो राजा को पता चल जाएगा कि फल कड़वा था। यह तो कहने का ही एक ढंग हो जाएगा कि फल कड़वा है–न कहा लेकिन कह दिया। यह तो शिकायत हो जाएगी। इसलिए छीन-झपटी की। जिन हाथों से इतने मधुर फल मिले, उस हाथ से एक कड़वे फल की क्या चर्चा करनी! यह बात ही उठाने की नहीं है।
आपने ने इतना दिया है कि जो शिकायत करता है वह अंधा है।
थोड़ी लहरें आती हैं, उन लहरों में डूबो! और लहरें आएगी।
धन्यवाद, अनुग्रह का भाव: बड़ी लहरें आएगी। एक दिन सागर का सागर तुम में उतर आएगा। एक दिन तुम्हें बहाकर ले जाएगा। सब कुछ-किनारे लग जाएंगे।
*विशेष : -भव्य आत्माओं, आज हमें कुछ निमित्तो के माध्यम से बहुत कुछ प्राप्त हो रहा है।वह प्राप्त फल हमारे कर्म व पुरुषार्थ पर आधारित है। हमें अपनी आवश्यकता अनुसार फल प्राप्त नहीं होने पर हमें अपने पुरुषार्थ की कमी को दूर करना चाहिए।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जीत कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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