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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️ जैन प्रवचन सभी के काम के*
*💪👩🚒 धर्म ध्यान कैसे करें ✍️🐒*
आइए आज हम सभी यह समझें कि हम बिना धन व समय के भी अपनी दैनंदिनी में धर्म ध्यान कैसे कर सकते है।
*दुध कड़वा क्यों?मेथी मीठी क्यों?*
👉आचार्यश्री ने एक दिन बताया कि कुछ लोग हमसे पूछते है कि हमको धर्मध्यान करना नहीं आता।तो आज मैं बताता हूँ। धर्मध्यान कैसे किया जाता है। दुसरे का भला एवं अच्छा सोचो यह भी धर्मध्यान है।
धर्मध्यान बहुत सस्ता है।आप आत्मा का ध्यान न कर पाते,लेकिन दूसरों के दुःख दूर हों,सभी सुखी रहें इस प्रकार का तो सोच सकते हैं।यही तो अपाय विचय धर्मध्यान है।
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👉धर्म का अर्थ स्वभाव होता है।शरीर और जगत के स्वभाव का चिंतन करो जिससे संवेग और वैराग्य की प्राप्ति होगी एवं धर्मध्यान भी होगा।
तब किसी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्यश्री जी दूसरों के दुःख देखने में नहीं आते बल्कि दोष देखने में आते हैं।तब आचार्यश्री जी ने कहा कि- अपध्यानी की दृष्टि में मात्र दोष ही देखने में आते हैं, गुण नहीं आते।क्योंकि कषाय के कारण मुनिराज में भी रत्नत्रय नहीं दिखता,दोष ही दिखते हैं। जैसे बुखार के आ जाने पर दूध आदि मीठी वस्तु भी कड़वी लगती है और स्वस्थ्य हो तो मेथी भी मीठी लगती है।
इसलिए अपध्यान एवं कषाय का त्याग करते हुए दूसरों के दोषों को न देखकर सभी का भला हो ऐसा विचार करना चाहिए।सभी का भला सोचने से अपना भला हो ही जाएगा।
जैसे अपने अड़ोस- पड़ोस में यदि भजन चल रहे हो तो हमें भी सुनाई दे सकते हैं।धूपबत्ती की सुगंध आ सकती है एवं धर्मध्यान के योग्य वातावरण मिल सकता है।
*👪🔔⏰🌞🎪विशेष:-भव्य आत्माओं, आज भारत के सत्तर प्रतिशत भारतीय अपने अपने धर्म के अनुसार धार्मिक क्रिया कांड में उलझे हुए है।इस कारण से जो इनमें उलझा है ना ही उसका ओर ना ही उसके निमित्त से अन्य किसी का आत्मकल्याण हो रहा है। हमें उन धार्मिक क्रियाकलापों के साथ स्वयं के अंतरंग का बहिरंग आचरण में भी उनका समावेश होना आवश्यक है। अतः हम सभी को किसी भी जीव को किसी भी प्रकार का दुःख नहीं पहुंचाना चाहिए।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जीत कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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