शनिवार, 6 मई 2023

मनुष्य का स्वभाव

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*मनुष्य का स्वभाव*
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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 मनुष्य का स्वभाव ✍️🐒*

*🔔⏰🎪 जैन तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव मई माह में आने वाली दिनांक 11, 14, 16, 18, 19,  23,  तारीख को है। मई माह में दो तीर्थंकर भगवन्तो के मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।यह सभी तिथियां उत्तर पुराण व जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानी।*

✍️एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वात्सल्य एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य भगवान  की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ व स्तुति करता था।

एक दिन भगवान के रक्षक देव ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये तथा कहा -- "राजन् मैं आपकी भगवत भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा है?"

प्रजा को चाहने वाला राजा बोला -- "हे रक्षक देव मेरे पास भगवान का दिया सब कुछ है उनकी  कृपा से राज्य में सब प्रकार से सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही इच्छा है कि जैसे आपने मुझे भगवान की भक्ति वश प्रसन्न होकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर प्रसन्न कर दीजिये।"

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"यह तो सम्भव नहीं है" -- ऐसा कहते हुए भगवान के रक्षक देव ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान के रक्षक देव  से जिद्द् करने लगा।
आखिरकार भगवान के रक्षक देव ने राजा की भगवत भक्ति  के सामने झुकना पडा और वे बोले -- "ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाड़ी के ऊपर से सभी को प्रसन्न कर दूंगा ।"
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान के रक्षक देव को धन्यवाद दिया।

  अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुंचे, वहां आप सभी को भगवान के रक्षक देव आप सबको प्रसन्न कर देंगे। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाड़ी की ओर चलने लगा।

चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड़ दिखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस और भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान के रक्षक देव से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।

परन्तु लोभ-लालच के वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे के सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि और चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें, भगवान के रक्षक देव से तो फिर कभी मिल ही लेंगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस और भागने लगे और चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान के रक्षक देव से तो फिर कभी मिल ही जायेंगे। 

 इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस और भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
"देखो कितने लोभी हैं ये लोग। भगवान के रक्षक देव से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं।

वे रक्षक देव सभी को कुछ सहयोग प्रदान करेंगे जिससे हम सभी भगवान के बताए मार्ग पर चलकर स्वयं की आत्मा को परमात्मा बना सकें।

सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखेरता हुआ हीरों का एक पहाड़ है। अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण में वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि और विरक्ति हुई ।

 बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।
वहां सचमुच भगवान के रक्षक देव खड़े उनका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान के रक्षक देव मुस्कुराये और पूछा -- "कहां है आपकी प्रजा और आपके प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।" राजा ने शर्म और आत्मग्लानि से अपना सर झुका दिया। 
तब भगवान के रक्षक देव ने राजा को समझाया --
"राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को जीवन का सुख मानते हैं, उन्हें कदाचित भगवत भक्ति की प्राप्ति नहीं होती और वह संसार की चौरासी लाख योनियों का सुख भोगते हुए कभी तृप्त नहीं हो पाते।

राजा ने संसार असार जानकर दिगंबर मुनिराज के पास जाकर दिगंबर दीक्षा ग्रहण कर आत्म कल्याण के मार्ग पर चलकर जीवन सफल किया।

जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में आते हैं, और
सर्व लौकिक सम्बंधों को छोड़ कर पांच इंद्रियों के सुखों को शक्ति अनुसार जीतकर भगवान द्वारा बताए मोक्ष मार्ग का आचरण करते है। वे जीव वह सुख प्राप्त करते है जिसकी कल्पना भी आज का मनुष्य कर ही नहीं सकता।

*🙏👪⏰⛳🎪विशेष:-भव्य‌‌‌ आत्माओं, आज हमारे कर्मों ने जिस स्थान,जाति व समुदाय में हमें जन्म दिया है। हमें उसी स्थान पर रहकर किसी भी जीव को किसी प्रकार की कोई कष्ट ना देते हुए अपने आचरण पर ध्यान देते हुए जीवन व्यतीत करना चाहिए।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रतिसमय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जीत कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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