रविवार, 22 जनवरी 2023

संस्कारवान बहू


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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 संस्कारवान बहू ✍️🐒*

*🔔⏰🎪 जैन तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव जनवरी माह में आगामी 25,27 व 31 तारीख को है। विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानी।*

एक धनी सेठ के सात बेटे थे। छः का विवाह हो चुका था। सातवीं बहू आयी, वह सत्संगी माँ-बाप की बेटी थी। बचपन से ही सत्संग में जाने से सत्संग के सुसंस्कार उसमें गहरे उतरे हुए थे। छोटी बहू ने देखा कि घर का सारा काम तो नौकर चाकर करते हैं, जेठानियाँ केवल खाना बनाती हैं उसमें भी खटपट होती रहती है। बहू को सुसंस्कार मिले थे कि अपना काम स्वयं करना चाहिए और प्रेम से मिलजुल कर रहना चाहिए। अपना काम स्वयं करने से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है।

उसने युक्ति खोज निकाली और सुबह जल्दी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर पहले ही रसोईघर में जा बैठी। जेठानियों ने टोका लेकिन फिर भी उसने बड़े प्रेम से रसोई बनाई और सबको प्रेम से भोजन कराया। सभी बड़े तृप्त व प्रसन्न हुए।

दिन में सास छोटी बहू के पास जाकर बोली "बहू ! तू सबसे छोटी है, तू रसोई क्यों बनाती है ? तेरी छः जिठानियाँ हैं।"

बहू "मांजी ! कोई भूखा अतिथि घर आ जाय तो उसको आप भोजन क्यों कराते हो ?"

"बहू ! शास्त्रों में लिखा है कि अतिथि भगवान का स्वरूप होता है। भोजन पाकर वह तृप्त होता है तो भोजन कराने वाले को बड़ा पुण्य मिलता है।"

"मांजी ! अतिथि को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? अतिथि में भगवान का स्वरूप है तो घर के सभी लोग भी तो भगवान का स्वरूप है क्योंकि भगवान का निवास तो जीव में ही है।वह दुसरो की धर्म के अनुसार सेवा करते हुए अपने आत्मा को परमात्मा बना सकता है। अन्न आपका, बर्तन आपके सब चीजें आपकी हैं, मैं जरा सी मेहनत करके सबमें भगवन के गुणों का चिंतवन करते हुए  रसोई बनाकर खिलाने की थोड़ी-सी सेवा कर लूं तो मुझे पुण्य होगा कि नहीं होगा ? सब प्रेम से भोजन करके तृप्त होंगे, प्रसन्न होंगे तो कितना लाभ होगा ! इसलिए मांजी ! आप रसोई मुझे बनाने दो। कुछ मेहनत करुंगी तो स्वास्थ्य भी बढ़िया रहेगा।"

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सास ने सोचा कि ʹबहु बात तो ठीक कहती है। हम इसको सबसे छोटी समझते हैं पर इसकी बुद्धि सबसे अच्छी है।ʹ

दूसरे दिन सास सुबह जल्दी स्नान करके रसोई बनाने बैठ गई। बहुओं ने देखा तो बोलीं- "मांजी ! आप परिश्रम क्यों करती हो ?"

सास ने विनम्रतापूर्वक बोला "तुम्हारी उम्र से मेरी उम्र ज्यादा है। मैं जल्दी मर जाऊंगी। मैं अभी पुण्य नहीं करुंगी तो फिर कब करुंगी ?"

बहुएं बोलीं- "मांजी ! इसमें पुण्य क्या है ? यह तो घर का काम है।"

सास बोली "घर का काम करने से पाप होता है क्या ? जब भूखे व्यक्तियों को, साधुओं को भोजन कराने से पुण्य होता है तो क्या घरवालों को भोजन कराने से पाप होता है ? सभी में ईश्वर बनने की शक्ति  है।"

सास की बातें सुनकर सब बहुओं को लगा कि ʹइस बात का तो हमने कभी ख्याल ही नहीं किया। यह युक्ति बहुत बढ़िया है !ʹ अब जो बहू पहले जग जाय वही रसोई बनाने बैठ जाएं। पहले जो भाव था कि ʹआप रसोई बना....ʹ तो छः बारी बंधी थीं लेकिन अब ʹमैं बनाऊं, मैं बनाऊं...ʹ यह भाव हुआ तो आठ पारी बंध गई। दो और बढ़ गए सास और छोटी बहू। काम करने में ʹ तू कर, तू कर....ʹ इससे काम बढ़ जाता है और आदमी कम हो जाते हैं पर ʹ मैं करू, मैं करु....ʹ इससे काम हलका हो जाता है और आदमी बढ़ जाते हैं।

छोटी बहू उत्साही थी, सोचा कि ʹ अब तो रोटी बनाने में चौथे दिन बारी आती है, फिर क्या किया जाय ?ʹ घर में गेहूं पीसने की चक्की पड़ी थी, उसने उससे गेहूं पीसने शुरु कर दिये। मशीन की चक्की का आटा गर्म-गर्म बोरी में भर देने से जल जाता है, उसकी रोटी स्वादिष्ट नहीं होती लेकिन हाथ से पीसा गया आटा ठंडा और अधिक पौष्टिक होता है तथा उसकी रोटी भी स्वादिष्ट होती है। छोटी बहू ने गेहूं पीसकर उसकी रोटी बनायी तो सब कहने लगे की ʹआज तो रोटी का जायका बड़ा विलक्षण है !ʹ

सास बोली "बहू ! तू क्यों गेहूं पीसती है ? अपने पास पैसों की कमी नहीं है।"

"माऔजी ! हाथ से गेहूं पीसने से व्यायाम हो जाता है और बीमारी नहीं आती। दूसरा, रसोई बनाने से भी ज्यादा पुण्य गेहूं पीसने का है।"

सास और जेठानियों ने जब सुना तो लगा कि बहू ठीक कहती है। उन्होंने अपने-अपने पतियों से कहा ʹघर में चक्की ले आओ, हम सब गेहूं पिसेंगी।ʹ रोजाना सभी जेठानियां चक्की में दो ढाई सेर गेहूं पीसने लगीं।

घर में झाड़ू लगाने नौकर आता था। अब छोटी बहू ने सुबह जल्दी उठकर झाड़ू लगा दी। सास ने पूछा " बहू ! झाड़ू तूने लगाई है ?"

"मांजी ! आप मत पूछीये। आपको बोलती हूं तो मेरे हाथ से काम चला जाता है।"

"झाड़ू लगाने का काम तो नौकर का है, तू क्यों लगाती है ?"

"मांजी ! ʹरामायणʹ में आता है कि वन में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि रहते थे लेकिन भगवान उनकी कुटिया में न जाकर पहले शबरी की कुटिया में गए। क्योंकि शबरी रोज चुपके-से झाड़ू लगाती थी, रास्ता साफ करती थी कि कहीं आते-जाते ऋषि-मुनियों के पैरों में कंकड़ न चुभ जाए।"

सास ने देखा कि यह छोटी बहू तो सबको लूट लेगी क्योंकि यह सबका पुण्य अकेले ही ले लेती है। अब सास और सब बहुओं ने मिलके झाड़ू लगानी शुरू कर दी।

जिस घर में आपस में प्रेम होता है वहां लक्ष्मी बढ़ती है और जहां कलह होता है वहां निर्धनता आती है। सेठ का तो धन दिनों दिन बढ़ने लगा। उसने घर की सब स्त्रियों के लिए गहने और कपड़े बनवा दिए। अब छोटी बहू ससुर से मिले गहने लेकर बड़ी जेठानी के पास गई और बोली "आपके बच्चे हैं, उनका विवाह करोगी तो गहने बनवाने पड़ेंगे। मेरे तो अभी कोई बच्चा है नहीं। इसलिए इन गहनों को आप रख लीजिये।"

गहने जेठानी को देकर बहू ने कुछ पैसे और कपड़े नौकरों में बांट दिए। सास ने देखा तो बोली "बहू ! यह तुम क्या करती हो ? आपके ससुर ने सबको गहने बनवाकर दिए हैं और आपने वे जेठानी को दे दिए और पैसे, कपड़े नौकरों में बांट दिए !"

"मांजी ! मैं अकेले इतना संग्रह करके क्या करुंगी ? अपनी वस्तु किसी जरूरतमंद के काम आये तो आत्मिक संतोष मिलता है और दान करने का तो अमिट पुण्य होता ही है !"

सास को बहू की बात लग गई। वह सेठ के पास जाकर बोली "मैं नौकरों में धोती-साड़ी बांटूगी और आसपास में जो गरीब परिवार रहते हैं उनके बच्चों को फीस मैं स्वयं भरुंगी। अपने पास कितना धन है, किसी के काम आये तो अच्छा है। न जाने कब मौत आ जाय और सब यहीं पड़ा रह जाय ! जितना अपने हाथ से पुण्य कर्म हो जाए अच्छा है।"

सेठ बहुत प्रसन्न हुआ कि पहले नौकरों को कुछ देते तो लड़ पड़ती थी पर अब कहती है कि ʹ मैं खुद दूंगी।ʹ सास दूसरों को वस्तुएं देने लगी तो यह देख के दूसरी बहुएं भी देने लगीं। नौकर भी खुश हो के मन लगा के काम करने लगे और आस-पड़ोस में भी खुशहाली छा गई।

*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।*
*स यत्प्रमाणं कुरूते लोकस्तदनुवर्तते।।*

ʹश्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं।ʹ

छोटी बहू ने जो आचरण किया उससे उसके घर का तो सुधार हुआ ही, साथ में पड़ोस पर भी अच्छा असर पड़ा, उनके घर में भी सुधार हुआ । देने के भाव से आपस में प्रेम-भाईचारा बढ़ गया। इस तरह बहू को सत्संग से मिली सूझबूझ ने उसके घर के साथ अनेक घरों को खुशहाल कर दिया !

सेठजी व सभी बच्चों ने सलाह कर अपने नगर में विशाल पत्थरों का भव्य मंदिर बनवाया। उसमें आदिनाथ भगवान की वीतरागी प्रभु को पंचकल्याणक महोत्सव करवाने से नगर में राम राज्य की स्थापना हो गई।

*🔔👪⏰🎪↔️विशेष : -भव्य‌‌‌ आत्माओं, हमें अपनी सात पीढ़ी को संस्कारवान व सुरक्षित रखने केलिए अपनी आमदनी का छठवां हिस्सा सच्चे धर्म कार्यो में खर्च करना आवश्यक है।वह धर्म के अलावा हमारा साथी कोई नहीं है।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जीत कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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