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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩🚒प्रार्थना*
सूफी फकीर अलहिल्लास से किसी ने पूछा कि तू इतनी प्रार्थना करता है, इतना परमात्मा को पुकारता है, तुझे कभी उत्तर मिलता है या नहीं?
उसने कहा: तुम भी पागल हो! उत्तर चाहता कौन है? मैं उसे कष्ट देना चाहता हूं? उत्तर तो मेरे प्रश्न के पहले मुझे मिल गया है। प्रार्थना तो मेरा धन्यवाद है; मेरी मांग नहीं, मेरी वासना नहीं।
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उससे मुझे कुछ चाहिए थोड़े ही। उसने इतना दिया मेरे मांगने के पहले, इसका धन्यवाद है। उसके प्रसाद का स्वीकार है। दे तो वह चुका है। पहले ही, मेरे मांगने के पहले। उससे मुझे कुछ चाहिए नहीं। कोई उत्तर भी नहीं चाहिए।
क्या तुम सोचते हो, तुम्हारी प्रार्थना परमात्मा के हृदय को बदलने के लिए है? अक्सर लोग यही सोचते हैं। जब तुम मंदिर से जाते हो और कहते हो हे प्रभु, नौकरी नहीं मिलती, कि पत्नी बीमार है, कि बेटा नालायक हुआ जा रहा है, कुछ करो, तो तुम क्या कर रहे हो? तुम यह कर रहे हो कि प्रार्थना से परमात्मा का हृदय बदलने की कोशिश कर रहे हो। नहीं; यह प्रार्थना नहीं है। वस्तुतः प्रार्थना में प्रार्थना करने वाले का हृदय बदलता है; परमात्मा का हृदय बदलने का कोई सवाल नहीं है। प्रार्थना करने में ही हृदय बदल जाता है।
विवेकानंद के जीवन में उल्लेख है। विवेकानंद के पिता मरे। पिता मौजी आदमी थे। मौजी रहे होंगे, तभी विवेकानंद जैसा बेटा पैदा हो सका। कुछ बचाया नहीं, जिंदगी भर लुटाते रहे। कमाया बहुत, मगर लुटाते रहे। जब मरे तो कर्ज छोड़ कर मरे। जो कुछ था वह कर्ज में चला गया। घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने को भी दो रोटी जुटाना मुश्किल। विवेकानंद अपनी मां को यह कहकर चले जाते कि आज मुझे किसी के घर निमंत्रण किला है और रास्तों पर भूखे घूमते रहते। लौट कर आते हाथ फेरते हुए, डकार लेते हुए। कहीं कोई मित्र ने निमंत्रण दिया नहीं है। मां को बताने के लिए कि पेट भी गया है, तू फिकर मत कर, जो थोड़ा बहुत घर में है, तू अब भोजन कर ले। क्योंकि वह इतना थोड़ा होता या तो विवेकानंद कर ले या मां कर ले। मस्त तगड़े आदमी थे, काफी भोजन चाहिए पड़ता। मां यह सोचकर कि बेटा भोजन कर आया है, भोजन कर लेती जो भी रूखा-सुखा होता।
रामकृष्ण को खबर लगी तो रामकृष्ण ने एक दिन विवेकानंद को कहा कि तू पागल है! तू जा कर मंदिर में काली को क्यों नहीं कहता? यहां-वहां क्या भटक रहा है? एक दफा जा कर दे, सब मामला हल हो जाएगा। तू जा प्रार्थना कर।
अब रामकृष्ण कहे तो विवेकानंद इनकार कैसे करें? गए। घंटा-भर लग गया। बाहर रामकृष्ण बैठे हैं चबूतरे पर, राह देख रहे हैं। जब निकले विवेकानंद गदगद आंखों से आंसुओं की धार बह रही है, मस्ती की तरंग छाई हुई। तीन दिन के भूखे हैं, यह तो भूल ही गए हैं। बड़े आनंद-मग्न हैं। आकर रामकृष्ण के चरणों में गिर पड़े। रामकृष्ण ने कहा: दूसरी बात पीछे होगी, तूने कह दिया न? तूने प्रार्थना कर ली न?
विवेकानंद ने कहा: अरे! मैं तो भूल ही गया। मैं प्रार्थना में ऐसा मस्त हो गया!
रामकृष्ण ने कहा: फिर से जा। ऐसा तीन बार हुआ और तीसरी बार विवेकानंद बाहर आए और रामकृष्ण को देखा और कहा कि माफ करें, यह शायद हो नहीं सकेगा। जैसे ही मैं वहां जाता हूं, प्रार्थना ऐसा घेर लेती है कि छोटी-छोटी बातें करने का सवाल ही नहीं उठता। और छोटी-छोटी बातें करूं, यह बात बेहूदी लगती है, अभद्र लगती है। यह मुझसे नहीं हो सकेगा रामकृष्ण। परमहंसदेव, क्षमा कर दें! यह मुझसे नहीं हो सकेगा।
रामकृष्ण ने छाती से लगा लिया विवेकानंद को और कहा: इसीलिए तीन बार भेजा, मैं देखना चाहता था, क्या प्रार्थना में तू कुछ मांग सकता है अब भी या नहीं? मगर नहीं मांग सकता तो तू प्रार्थना की कला सीख गया। अब मैं निश्चित हूं। तुझे प्रार्थना आ गई। प्रार्थना मांग नहीं है, हालांकि प्रार्थना शब्द का ही अर्थ हमने मांगना कर लिया है। मांगने वाले को प्रार्थी कहते हैं। वह शब्द का अर्थ ही हमने भ्रष्ट कर लिया।
प्रार्थी का अर्थ मांगनेवाला नहीं, प्रार्थी का अर्थ झुकनेवाला है। प्रार्थना का अर्थ मांगना नहीं है, प्रार्थना का अर्थ है अहोभाव।
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम्*
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