🌞🕉️🌞🕉️🌞🕉️🌞🌞🕉️🌞🕉️🌞🕉️🌞
*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩🚒सुखी कौन?💐💐*
एक जिज्ञासु किसी सुखी पुरुष की तलाश में निकला।सबसे पहले वह एक निर्धन किसान के पास पहुंँचा और उसने किसान से पूछा-'किसान भाई! आप तो सुखी होंगे?
⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️
*🕉️🌞✍️पुण्यवृद्धि के इच्छुक पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को पहुचाकर उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्माबंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो संस्था को दान करें।जो पुण्य को बढ़ाना चाहते है वे भी संस्था को दान करें।✍️*
*✍️➡️👨👩👧👦अगर कोई भी पुण्यात्मा श्रावक इस प्रकार की पोस्ट को व्हाट्सएप पर प्राप्त करना चाहते है तो श्री शांति सागर समाधि साधना सेवा केंद्र जयपुर रजिस्टर संस्था के 📲 9461956111 नंबर पर व्हाट्सएप पर कहानियां + शुभनाम+ 【गांव शहर】निवासस्थान लिखकर व्हाट्सएप करें,काल ना करें।*
⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️⬆️
किसान ने कहा-'भाई साहब, मैं तो निर्धन हूंँ, भला मैं कैसे सुखी हो सकता हूंँ। गांँव का धन सम्पन्न व्यक्ति सुखी है आप उसके पास जाइये।तब जिज्ञासु धनाढ्य व्यक्ति के पास पहुंँचा। उसने धनाढ्य व्यक्ति से पूछा- महानुभव आप तो सुखी होंगे?
उसने कहा-'प्यारे भाई,भला मैं कैसे सुखी हो सकता हूंँ क्योंकि मेरे पास तो धन वैभव है,किन्तु उसकी सुरक्षा का कोई समुचित प्रबन्ध नहीं है। दिन-रात चिन्ता और दुख है कि कहीं मेरे धन- वैभव को लुटेरा ले ना जायें।तब जिज्ञासु ने पूछा-'फिर सुखी कौन होगा?
उसने कहा-आप राजा के पास जाइये,वह सुखी होगा। तब जिज्ञासु राजा के पास पहुंँचा तथा नमस्कार कर पूछा-'राजन!आप तो अवश्य सुखी होंगे?
राजा ने कहा-ये भाग्य की कैसी विडम्बना है कि प्रभु ने बहुतों को तो भोग-पदार्थ दिए ही नहीं, तो वह उनके अभाव में दुखी है, किन्तु मेरे पास सब कुछ रहते हुए भी मैं उसका उपभोग नहीं कर सकता, क्योंकि डाक्टरों ने बताया है कि आपको बहुत सारा रोग है।जिसके लिए आपको इन सारे भोग पदार्थ को त्यागना होगा, नहीं तो बीमारी और भी बढ़ जाएगी। इसलिए मैं भी बहुत दुखी हूंँ।
राजा ने फिर कहा-इस धरातल में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं होगा अगर आप सुखी आत्मा की खोज में है तो आप देवराज इन्द्र के पास जाइये।जिज्ञासु इन्द्र के पास भी पहुंँचा तथा उसने अपने पुराना प्रश्न उसके पास भी दोहराया।
देवराज इन्द्र ने कहा-"भाई मेरे,मैं भी चिन्तित और दुखी हूंँ। जिज्ञासु ने विस्मिता होकर पूछा-'आप और दुखी!क्यों कैसे? इन्द्र ने कहा-'मुझे एक ही चिंन्ता दिन-रात सताती रहती है कि कहीं कोई भजन-अभ्यासी साधु भक्त महात्मा भजन-सुमिरण कर मेरे इन्द्रासन को न छीन ले।अतः मैं भी दुखी हूंँ।
जिज्ञासु ने पूछा- जब इतनी भोग सामग्री पाकर आप भी दुखी हैं तो इस संसार में सुखी कौन होगा? इन्द्र ने कहा-'आप ब्रह्मा जी के पास जाइये, शायद वह सुखी हों। जिज्ञासु ब्रह्मा जी के पास पहुंँचा तथा उन्हें प्रणाम कर पूछा-पितामह!आप तो सुखी और निश्चिंत होंगे?
ब्रह्मा जी ने कहा-"भाई!मैंने सारे सृष्टि की रचना की है और यह विधान बनाया गया है कि प्रत्येक पुत्र का यह कर्तव्य है कि वह अपने पिता का आज्ञा की पालन करें, किन्तु मेरी कोई सन्तान मेरी कोई आज्ञा नहीं मानती।अतः मैं भी दुखी हूंँ। आप भगवान शंँकर के पास जाइये,वह सुखी होंगे।
जिज्ञासु भगवान शंँकर के चरणों में उपस्थित हुआ तथा प्रणाम कर पूछा भगवन!"आप तो सुखी होंगे"। शंँकर जी ने कहा-"वत्स! मेरे घर में भी बड़ी समस्या है मेरा पुत्र गणेश जब मेरे पास चूहे की सवारी पर आता है तो मेरी गले का नाग(सर्प)उसके चूहे को खाने भागता है और उसका चूहा बिल में घुस जाता है l
तब अपनी सवारी की बिना गणेश दुखी हो जाता है और जब पुत्र दुखी हो जाता है तब पिता का दुखी होना स्वभाविक ही है। और जब मेरा पुत्र कार्तिकेय मुझसे मिलने आता है तो अपनी सवारी मोर पर बैठकर आता है। उसका मोर मेरे गले के नाग(सर्प)को खाने बढ़ता है और मेरे गले का नाग(सर्प)भाग कर विल में घुस जाता है।तब अपने गले की माला नाग(सर्प)के बिना मैं दुखी हो जाता हूंँ।
और जब पिता दुखी हो जाता है तो स्वभावतः पुत्र भी दुखी हो जाता है।मेरी कुटिया एक है,झोपड़ी भी छोटी है, मेरा वाहन बैल है और मेरी अर्धांगिनी पार्वती का वाहन शेर है।अब उस छोटी सी कुटिया में बैल और शेर को कैसे रखा जाये, क्योंकि शेर का आहार बैल है।पार्वती का शेर दहाड़ता है और मेरा बैल खूटा उखाड़ कर भाग जाता है।अतः हमारे घर में भी बड़ी समस्या है l
हांँ इन समस्याओं से परेशान होकर मैं जब वीतरागी भगवान का ध्यान करता हूंँ तो हमें बड़ी शान्ति मिलती है और मैं सुखी हो जाता हूंँ। तुम विष्णुजी के पास जाओ, "मात्र वही सुखी स्वरुप है"।
जिज्ञासु- विष्णु के पास पहुंँचा और श्री चरणों में प्रणाम कर उनसे निवेदन किया-प्रभु!मैं बहुत भटकता हुआ आपके पास यह जानने के लिए आया हूंँ कि आप तो सुखी होंगें।
जिज्ञासु को समझाते हुए विष्णु कहने लगे-'भाई!मैं भी तो भक्तों के दुख से सदा दुखी रहता हूंँ।न जाने कब कौन दुष्ट मेरे किसी भक्त को दुखी कर दे अतः यदि तुम सुखी पुरुष की तलाश में हो तो सुनो,वीतरागी भगवान का भक्त सुखी है। जिसने ् वीतरागी भगवान के बतायें मार्ग को अपने जीवन का आधार बना लिया है।" विश्व की का एकमात्र दिगंबर जैनधर्म ही जीव को भगवान बनने की कला सिखाता है।
बाकी सारे संसार के विभिन्न धर्मों में भगवान को ही कर्ता माना है इस कारण से जीव दुखी है"।जैनदर्शन कहता है कि जीव जैसा कर्म करेगा उसे वैसा फल प्राप्त होगा।उदाहरण से समझे कोई भी जीव जहर का सेवन करता है तो वह मृत्यु को प्राप्त होता है।
इसलिए किसी सन्त ने कहा है:--
निर्धन कहे धनवान सुखी,
धनवान कहे सुखी राजा हमारा।
राजा कहे महाराजा सुखी,
महाराजा कहे सुखी इन्द्र हमारा।।
इन्द्र कहे ब्रह्मा जी सुखी,
ब्रह्मा जी कहे शिव शंँकर प्यारा।
शंँकर कहे विष्णु जी सुखी,
विष्णु जी कहे सुखी वीतरागी भगवान का भक्त हमारा।।
"भक्त सुखी जो नाम भजे,
और बाकी दुखिया सब संसार।
नानक दुखिया सब संसारा,सुखिया सोई जिन नाम आधारा।।
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌳
*जैनम् जयतु शासनम्*
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें