*🌞✍️सच्चा राही ✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 सत्य घटना ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔👨👨👦👦🐎🔑 माघ शुक्ल तिथि 6, शनिवार 24 जनवरी 2026 कलि काल के 13 वें तीर्थंकर श्री विमलनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से बुध की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से मांगलिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री विमलनाथ भगवान जी का केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔 जनवरी 2026 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 08,15,17,18,20,22,24,28 व 30( 30 को बारस+तेरस समाहित तिथि )तारीख को कल्याणक महोत्सव है।*
*👨👨👦👦🔔🐎इस जनवरी माह में अष्टमी तिथि 11 व 26 जनवरी को है। चतुर्दशी तिथि 17 व 31 जनवरी को है।*
*🔔🐎षोडष कारण महापर्व 04 जनवरी से 02 फरवरी को है।*
*✅🔔 बसंत पंचमी 23 जनवरी*
*🎪🪔दशलक्षण महापर्व 22 से 31 जनवरी 👉30 जनवरी से 01 फरवरी रत्नत्रय व्रत*
*👨👨👦👦🔔👉 शुद्ध विवाह मुहूर्त जनवरी माह में नहीं है बसंत पंचमी का 23 जनवरी को स्वयं सिद्ध मुहूर्त है 🔔👉 वाहन खरीद मुहूर्त 01,04,12,14,19,21,28 व 29 जनवरी 🏠👉 प्रापर्टी मुहूर्त 03040708,13,14,23,24 व 29 जनवरी ✅👉 गृह प्रवेश मुहूर्त इस माह नहीं है।*
*🐎✍️ पंचक 20 से 25 जनवरी को है।*
*🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*👨👨👦👦🔑सत्य कहानी🔑👨👨👦👦*
*सच्चा प्रेम याने जहां वासना नहीं होती उसे ही सच्चा प्रेम कहते है। जहां वासना है वहां प्रेम नहीं वह व्यक्ति विशेष का पतन का द्वार है। सच्चा प्रेम किसी भी व्यक्ति में हो सकता है जैसे:- गुरु शिष्य,भाई बहन, पति-पत्नी, रिश्ता कोई भी हो सकता है।इस रिश्ते में एक दूसरे के आत्मकल्याण का लक्ष्य आवश्यक है।*
*प्रेम जो मृत्यु से भी हार नहीं मानता*
यह कहानी नही, एक सत्य घटना है 2013 की । शायद आप में से कई ने इस घटना को पढ़ा सुना भी होगा ।
पति–पत्नी के रिश्ते में प्रेम क्या होता है, यदि उसे समझना हो तो अजमेर निवासी विजेंद्र सिंह राठौड़ के जीवन को पढ़ना चाहिए। यह कथा केवल एक बिछड़न की दास्तान नहीं है, बल्कि उस प्रेम की गाथा है जो समय, परिस्थिति और प्रकृति—तीनों से लड़ गया।
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वर्ष 2013 की बात है।
विजेंद्र की धर्मपत्नी लीला ने एक सरल-सी इच्छा व्यक्त की—
“मैं चारधाम यात्रा करना चाहती हूँ।”
न कोई योजना, न कोई संकोच।
दोनों ने श्रद्धा और विश्वास के साथ अपना बोरिया-बिस्तर बाँधा और निकल पड़े केदारनाथ की ओर।
जहाँ आस्था थी, वहाँ प्रेम भी था।
केदारनाथ पहुँचकर वे एक लॉज में ठहरे। किसी काम से विजेंद्र लीला को वहीं छोड़कर थोड़ी ही दूरी पर गए थे कि अचानक सब कुछ बदल गया।
चारों ओर हाहाकार मच गया।
उत्तराखंड में आई भीषण बाढ़ का उफनता जल, केदारनाथ पर मृत्यु बनकर टूट पड़ा।
विजेंद्र किसी तरह अपनी जान बचाने में सफल हो गए।
जब पानी का वेग थमा और मौत का तांडव शांत हुआ, तो वे बदहवास होकर उसी लॉज की ओर दौड़े—
जहाँ उन्होंने लीला को छोड़ा था।
पर वहाँ पहुँचकर जो दृश्य दिखाई दिया, उसने आत्मा तक को हिला दिया।
सब कुछ बह चुका था…
लॉज, सामान, लोग…
तो क्या लीला भी…?
“नहीं… नहीं… ऐसा नहीं हो सकता।”
विजेंद्र ने खुद को संभालते हुए कहा।
अंतरात्मा बार-बार यही कह रही थी—
“वह जीवित है।”
बरसों का साथ यूँ एक पल में समाप्त नहीं हो सकता।
चारों ओर केवल लाशें थीं, टूटी हुई ज़िंदगियाँ थीं, पर लीला कहीं नहीं थी।
विजेंद्र के पास उसकी एक तस्वीर थी—जो हमेशा उनके पर्स में रहती थी।
वही तस्वीर हाथ में लेकर वे दिन-रात घटनास्थल पर भटकते रहे।
हर व्यक्ति से एक ही प्रश्न—
“भाई, इसे कहीं देखा है?”
और हर बार एक ही उत्तर—
“नहीं…”
दो सप्ताह बीत गए। राहत कार्य चल रहे थे। फौज के अफसरों से बातचीत हुई।
लगभग सभी का निष्कर्ष यही था—
लीला बाढ़ में बह चुकी है।
पर विजेंद्र ने मानने से इनकार कर दिया।
घर फोन किया। बच्चों को हादसे की सूचना दी।
रोती-बिलखती बिटिया ने डरते हुए पूछा—
“पापा… क्या अब माँ नहीं रही?”
विजेंद्र ने कठोर स्वर में कहा—
“ऐसा दोबारा मत कहना… वह ज़िंदा है।”
एक महीना बीत गया।
पर तलाश रुकी नहीं।
हाथ में तस्वीर, दिल में अडिग विश्वास।
इसी बीच सरकारी विभाग से फोन आया—
लीला को मृत घोषित कर दिया गया था।
मुआवज़ा लेने के लिए बुलाया गया।
विजेंद्र ने साफ इंकार कर दिया।
परिजन समझाने लगे—
“अब तो सरकार भी मान चुकी है…”
विजेंद्र का उत्तर फिर वही था—
“वह जीवित है।”
और वे फिर निकल पड़े—
उत्तराखंड के शहर-शहर, गाँव-गाँव।
करीब 1000 से अधिक गाँव—
एक ही तस्वीर, एक ही सवाल, एक ही उम्मीद।
19 महीने बीत गए।
27 जनवरी 2015
उत्तराखंड के गंगोली गाँव में एक राहगीर से उन्होंने फिर पूछा—
“भाई, इसे कहीं देखा है?”
राहगीर ने तस्वीर को गौर से देखा और बोला—
“हाँ… देखा है।
यह औरत तो हमारे गाँव में घूमती रहती है… कुछ बौराई सी…”
विजेंद्र दौड़ते हुए उस गाँव पहुँचे।
एक चौराहे के कोने पर एक स्त्री बैठी थी…
वही आँखें…
जिनसे आँखें मिलने को तरस गई थीं…
वह लीला थी।
विजेंद्र ने उसका हाथ पकड़ा और छोटे बच्चे की तरह रो पड़े।
19 महीनों का दर्द, प्रतीक्षा और संघर्ष—
सब आँसुओं में बह निकला।
लीला की मानसिक स्थिति उस समय स्थिर नहीं थी।
वह उस व्यक्ति को भी नहीं पहचान पाई
जो उसे इस संसार में सबसे अधिक प्रेम करता था।
विजेंद्र ने बिना कोई शिकायत, बिना कोई प्रश्न—
उसे उठाया और घर ले आए।
12 जून 2013 से बिछड़े बच्चे
19 महीने बाद अपनी माँ को देख रहे थे।
आज के समय में, जहाँ पति–पत्नी के रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर उलझ जाते हैं, जहाँ अहंकार संवाद से बड़ा हो जाता है और तकरार प्रेम पर भारी पड़ने लगती है—वहाँ यह कथा एक आईना बनकर खड़ी होती है। ज़रा सोचिए, जब असहमति या नाराज़गी के कारण रिश्ते टूटने लगते हैं, तब विजेंद्र का यह अटूट विश्वास हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम सुविधा का मोहताज नहीं होता। प्रेम वह नहीं जो साथ रहने में आसान हो, बल्कि वह है जो बिछड़ने के बाद भी हार न माने। आज जो लोग छोटी-छोटी बातों में मन-मुटाव कर बैठते हैं, उनके लिए यह कहानी एक मौन सीख है—कि रिश्ते निभाने के लिए तर्क नहीं, समर्पण चाहिए।
ये 19 महीने विजेंद्र सिंह राठौड़ के जीवन का सबसे कठिन समय थे।
पर इन कठिनाइयों के बीच
एक धागा था जो उन्हें बाँधे रहा—
*प्रेम का धागा।*
एक पति का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और समर्पण
जिसने प्रकृति के आदेश को भी चुनौती दे दी।
केदारनाथ की बाढ़ में बह जाने वाले
अधिकतर लोग कभी लौटकर नहीं आए—
पर लीला लौट आई।
शायद विजेंद्र हर दिन प्रभु से यही कहते रहे—
“वह जीवित है।”
और शायद प्रभु को भी
इस प्रेम के आगे अपना निर्णय बदलना पड़ा
*विशेष संदेश:- “जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ दूरी हार जाती है और जहाँ विश्वास अडिग हो, वहाँ समय भी झुक जाता है।”यह कथा एक पति के प्रेम की पराकाष्ठा को समर्पित है।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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