बुधवार, 7 जनवरी 2026

आत्मा के प्रति कर्तव्य

*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 आत्मा के प्रति कर्तव्य ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔👨‍👨‍👦‍👦🐎🔑  माघ कृष्ण षष्ठी तिथि, गुरुवार 8 जनवरी 2026 कलि काल के  6 वें तीर्थंकर  श्री पद्मप्रभ भगवान जी जिनकी आराधना से सूर्य की महादशा  अनुकूल हो  जाती है और सभी प्रकार से मांगलिक संपदा प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर  दृढ़ता पूर्वक विचरण करता है। मोक्ष प्रशस्त करने वाले श्री पद्मप्रभ  भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔 जनवरी 2026 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 08,15,17,18,20,22,24,28 व 30( 30 को बारस+तेरस समाहित तिथि )तारीख को  कल्याणक महोत्सव है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔🐎इस जनवरी माह में अष्टमी तिथि 11 व 26  जनवरी को है। चतुर्दशी तिथि 17 व 31 जनवरी  को है।*

*🔔🐎षोडष कारण महापर्व 04 जनवरी से 02 फरवरी को है।* 
*✅🔔 बसंत पंचमी 23 जनवरी*
*🎪🪔दशलक्षण महापर्व 22 से 31 जनवरी 👉30 जनवरी से 01 फरवरी रत्नत्रय व्रत* 
*👨‍👨‍👦‍👦🔔👉 शुद्ध विवाह मुहूर्त  जनवरी माह में  नहीं है बसंत पंचमी का 23 जनवरी को स्वयं सिद्ध मुहूर्त है 🔔👉 वाहन खरीद मुहूर्त 01,04,12,14,19,21,28 व 29 जनवरी 🏠👉 प्रापर्टी मुहूर्त 03040708,13,14,23,24 व 29 जनवरी ✅👉 गृह प्रवेश मुहूर्त इस माह नहीं है।*
*🐎✍️ पंचक  23 से 26 जनवरी को है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*

*✅आत्मा के प्रति कर्तव्य✅*
मनुष्य जीवन भर बाहर की दुनिया को गिनता-परखता रहता है—सुख, दुःख, संबंध, धन और उपलब्धियाँ। पर इस गिनती में वह स्वयं को ही भूल जाता है। प्रस्तुत कहानी उसी विस्मृति की ओर संकेत करती है, जहाँ सब कुछ होते हुए भी भीतर एक अभाव बना रहता है। *“आत्मा के प्रति कर्तव्य ”* हमें यह समझाती है कि वास्तविक कमी बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर आत्मा की उपेक्षा में छिपी है।
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बारह यात्री एक नगर से दूसरे नगर की ओर जा रहे थे। चलते-चलते उनके सामने एक गहरी नदी आ गई। न कोई पुल था, न नाव। पार जाना आवश्यक था, पर उपाय सूझ नहीं रहा था।
तभी उनमें से एक सयाने व्यक्ति ने कहा,
“घबराओ मत। सब एक-दूसरे का हाथ थाम लो। मिलकर चलेंगे, तो नदी पार हो जाएगी।”
सभी ने एक-दूसरे का हाथ मजबूती से पकड़ लिया और सावधानीपूर्वक नदी पार कर ली। दूसरे किनारे पहुँचकर स्याना बोला,
“अब गिनती कर लो, कहीं कोई साथी नदी में तो नहीं रह गया?”
एक ने कहा,
“तू ही सबसे बुद्धिमान है, तू ही गिन।”
स्याना गिनने लगा—
“एक, दो, तीन, चार, पाँच, छः, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह…”
वह स्वयं को गिनना भूल गया। घबराकर बोला,
“अरे! हम तो ग्यारह ही हैं। एक साथी कहाँ गया?”
दूसरे ने गिनती की, उसने भी स्वयं को छोड़ दिया। फिर तीसरे, चौथे—सबने गिना, पर हर बार संख्या ग्यारह ही निकली। सब रोने-बिलखने लगे कि एक साथी खो गया है।
तभी वहाँ से एक राहगीर गुज़रा। उसने उनके दुःख का कारण पूछा।
स्याने ने सारी कथा सुना दी।
राहगीर ने उन्हें ध्यान से देखा और मन-ही-मन गिन लिया—वे पूरे बारह थे।
वह मुस्कराकर बोला,
“अगर मैं तुम्हारा बारहवाँ साथी खोज दूँ, तो?”
वे बोले,
“तो हम तुम्हें भगवान मान लेंगे।”
राहगीर ने कहा,
“सब ज़मीन पर बैठ जाओ। मैं एक-एक को हल्की चपत मारूँगा। जिसे चपत लगे, वह क्रम से गिनता जाए।”
जैसे-जैसे चपत पड़ती गई, गिनती होती गई—
एक… दो… तीन… और देखते-देखते बारह पूरे हो गए।
सब खुशी से चिल्ला उठे—
“आप तो सचमुच भगवान हैं!”
हमें इन यात्रियों पर हँसी आती है,
पर सच्चाई यह है कि हम स्वयं भी यही भूल दोहराते हैं।
हम अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों—
(आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा)
और पाँच कर्मेन्द्रियों—
(हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ, गुदा)
को तो पहचानते हैं।
ग्यारहवें मन को भी मान लेते हैं,
पर बारहवीं आत्मा को भूल जाते हैं।
हम इन्द्रियों और मन की तृप्ति में उलझे रहते हैं, दुनिया-भर के बखेड़े करते हैं,
पर आत्मा के लिए कुछ नहीं करते।
इसी गिनती की भूल में मनुष्य दुःखी और अशान्त बना रहता है।
*🎪⏰✅👨‍👨‍👦‍👦विशेष :- जो व्यक्ति इन्द्रियों और मन से ऊपर उठकर अपनी आत्मा को पहचान कर आत्मकल्याण के लिए पुरुषार्थ करते  है, वही सच्चे अर्थों में पूर्ण होता है। बाहरी संसार की गिनती छोड़कर जब हम भीतर झाँकते हैं, तभी जीवन में शांति, संतुलन और वास्तविक सुख का अनुभव होता है।आत्मा के प्रति अपने कर्तव्यों को भूलना ही सबसे बड़ी कमी है, और उसे पहचान कर पुरुषार्थ करना सबसे बड़ी उपलब्धि।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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