😃पढ़िए और स्वयं का विश्लेषण कीजिए .....

✍एक किस्सा सुना था, लोग रेल यात्रा कर रहे थे। एक व्यक्ति खडा हुआ और खिडकी खोल दी, थोडी ही देर में दूसरा यात्री उठा और उसने खिडकी बंद कर दी। पहले को उस का यह बंद करना नागवार गुजरा और उठ कर खिडकी पुनः खोल दी।
🐱एक बंद करता दूसरा खोल देता। नाटक शुरु हो गया। यात्रियों का मनोरंजन हो रहा था, लेकिन अंततः सभी तंग आ गये। टी टी को बुलाया गया, टी टी ने पुछा- "महाशय ! यह क्या कर रहे हो ?
🌝क्यों बार बार खोल-बंद कर रहे हो ?"

👩🦰पहला यात्री बोला :- क्यों न खोलूं, "मैं गर्मी से परेशान हूँ, खिडकी खुली ही रहनी चाहिए"।
😇टी टी ने दूसरे यात्री को कहा- "भाई आप को क्या आपत्ति है, अगर खिडकी खुली रहे"।
😛इस पर दूसरे यात्री ने कहा मुझे ठंड लग रही है, मुझे ठंड सहन नहीं होती। टी टी बेचार परेशान एक को गर्मी लग रही है तो दूसरे को ठंड।
👨👨👦👦टी टी यह सोचकर खिडकी के पास गया कि कोई बीच का रास्ता निकल आए। उसने देखा और मुस्करा दिया। खिडकी में शीशा था ही नहीं। वहाँ तो मात्र फ़्रेम थी।
✍वह बोला :- "कैसी गर्मी या कैसी ठंडी ? यहां तो शीशा ही गायब है, आप दोनो तो मात्र फ़्रेम को ही उपर नीचे कर रहे हो"।
🤗मित्रो वस्तुतः दोनों यात्री न तो गर्मी और न ही ठंडी से परेशान थे। वे परेशान थे तो मात्र अपने अभिमान से। अपने अहं पोषण में लिप्त थे, गर्मी या ठंडी का अस्तित्व ही नहीं था।
🌞अधिकांश कलह मात्र इसलिये होते है कि अहंकार को चोट पहुँचती है। और *आदमी को सबसे ज्यादा आनंद दूसरे के अहंकार को चोट पहुँचाने में आता है। *
*😓साथ ही सबसे ज्यादा क्रोध अपने अहंकार पर चोट लगने से होता है। *
💪जो दूसरो के अहंकार को चोट पहुँचाने में सफ़ल होता है, वह मान लेता है उसने बहुत ही बड़ा गढ़ जीत लिया, वह यह मानकर चलता है कि दूसरों के स्वाभिमान की रेखा को काट पीट कर ही वह सम्मानित बन सकता है।
➡️⏰किन्तु परिणाम अज्ञानता भरी शर्म से अधिक कुछ नहीं होता ..... अधिकांश लडाईयों के पीछे कारण एक छोटा सा अहम् ही होता है।
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*🕉️धर्म आराधना से अहम और वहम से ऊपर उठकर अर्हम को प्राप्त करने का प्रयास करे हम ....*

*🕉️अहिंसामयी विश्वधर्म की जय हो⏰*
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