सोमवार, 3 जुलाई 2023

गुरु की कृपा से

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*गुरु की कृपा से*
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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 गुरु की कृपा से ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*

*🔔⏰🎪 जैन तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव जुलाई माह में आने वाली दिनांक   05, 12  तारीख को है। यह सभी तिथियां उत्तर पुराण व जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानी।*

मूल शंकर बेहद ही गरीब परिवार में पले – बढ़े उनका पालन – पोषण अभावग्रस्त रहा । गुरुकुल में किसी प्रकार दाखिला मिला मूल शंकर पढ़ने में बड़े ही मेधावी छात्र थे। वह अन्य छात्रों से अलग विचार रखते थे और पढ़ने तथा समाज के बारे में वह विशेष अध्ययन किया करते थे।

शिक्षा गुरुकुल स्तर से जब पूर्ण हुई सभी शिष्य अपने गुरु को गुरु दक्षिणा के रूप में अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ ना कुछ अपने गुरु को अर्पण कर रहे थे। कोई गाय दान कर रहा था , कोई अनाज दान कर रहा था , कोई मुद्राएं दान कर रहा था। किंतु मूल शंकर के सामर्थ्य में इस प्रकार के दान करने की नहीं थी।  मूलशंकर अपने माता के पास पहुंचे और गुरु दक्षिणा का विषय अपनी माता को समझाया। माता को भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह मूल शंकर को गुरु दक्षिणा के लिए क्या भेंट दे ? काफी देर सोच विचार के उपरांत माता ने एक लौंग और सुपारी पीले कपड़े में बांधकर गुरु दक्षिणा के लिए मूल शंकर को दिया।

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मूल शंकर यह भेंट लेकर अपने गुरु के समक्ष प्रस्तुत हुए और गुरु दक्षिणा के रूप में वह पोटली भेंट की। ऐसा देखकर अन्य सहपाठी छात्र मूल शंकर का उपहास करने लगे। मूल शंकर भी लज्जा और गिलानी के भाव के बोझ से दबा हुआ था। पोटली गुरु को अर्पण करते ही वह गुरु के चरणों में जोर – जोर से रोने लगा और गुरु से क्षमा याचना करने लगा यही मेरे सामर्थ्य मे था जो मैंने आपको अर्पण किया।

गुरु ने मूल शंकर के समर्पण भाव को देखकर भरपूर आशीर्वाद दिया और उसे हिम्मत दी और कहा -‘  कौन कहता है तुम्हारे पास देने को कुछ नहीं है । तुम मेरे अनुशासन प्रिय शिष्य हो।जिसकी जितनी शक्ति हो उस व्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार गुरु दक्षिणा देना चाहिए।तुम मुझे अन्य शिष्यों से इसलिए प्रिय हो क्योंकि तुमने अपनी शिक्षा काल में नियमित अध्ययन किया है। इस कारण तुम पढ़ने में सबसे होनहार हो , क्या यह मेरे लिए कम है। मुझे देना ही चाहते हो तो एक वचन दो कि तुम मेरे ज्ञान को समाज के लिए प्रयोग में लाओगे , समाज का कल्याण हो ऐसा प्रयास करोगे , मेरी शिक्षा तभी सफल होगी जब समाज मैं इस शिक्षा का प्रयोग हो सके।’

मूल शंकर उठे और अपने गुरु से आजीवन ब्रह्मचर्य का नियम ग्रहण किया और समाज की सेवा करने का वचन दिया। इतना ही नहीं उन्होंने समाज के उत्थान के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रम चलाए। उन्होंने सभी वर्गों के लिए उच्चतम शिक्षा के गुरुकुल में व्यवस्था की।वेदों की शिक्षा देकर  समाज को एक नई दिशा प्रदान की।

 यही व्यक्ति आगे चलकर दयानंद सरस्वती के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनकी ख्याति देश ही नहीं अपितु विदेश में भी है। इनकी प्रमुख काव्य कृति सत्यार्थ प्रकाश है।

*🕉️⏰👪↔️✍️विशेष  :- भव्य आत्माओं, वर्तमान में जिन व्यक्तियों को गुरु की शरण प्राप्त हो गई उनका जीवन सफल हो गया।जिन व्यक्तियों को गुरु की शरण प्राप्त हो गई किंतु वे गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार आचरण  नहीं कर रहें है उनका संसार का सफर अभी अत्यधिक लंबा व उलझनों वाला है। अतः सभी भव्यात्माओं से नम्र निवेदन है कि स्वयं के आचरण को सुधारते हुए अन्य जीवों के सहयोगी बनकर जीवन सार्थक करें।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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