गुरुवार, 9 जून 2022

जीवनोपयोगी

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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी बड़े काम की*
*💪👩‍🚒जीवनोपयोगी बातें 👨‍👩‍👧‍👦💪*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🕉️ ज्येष्ठ शुक्ल बारस 11 जून 2022   शनिवार  को सप्तम व तीर्थंकर 1008 श्री     धर्म सुपार्श्वनाथजी भगवान का जन्म व तप कल्याणक महोत्सव  हैं।इस महोत्सव पर आपसभी सपरिवार इष्टमित्रों के साथ अपनी शक्तिनुसार उत्सव कर जीवन सफल करें।*

दो भाई परस्पर बडे़ ही स्नेह तथा सद्भावपूर्वक रहते थे।

 दोनो भाई जब भी कोई वस्तु लाते तो एक दूसरे के परिवार के लिए भी अवश्य ही लाते, छोटा भाई भी सदा उनको आदर तथा सम्मान की दृष्टि से देखता !
 
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एक दिन किसी बात पर दोनों में कहा सुनी हो गई। बात इतनी बढ़ गई कि छोटे भाई ने बडे़ भाई के प्रति अपशब्द कह दिए। बस फिर क्या था ?

दोनों के रिश्तों के बीच दरार पड़ गई। उस दिन से ही दोनों अलग-अलग रहने लगे और दोनों के बीच बोलचाल भी बंद। 

इसीतरह कई वर्ष बीत गये !

मार्ग में जब दोनों आमने सामने भी पड़ जाते तो कतराकर दृष्टि बचा जाते।

कुछ वर्षों बाद छोटे भाई की कन्या का विवाह आया। उसने सोचा बडे़ आखिर बडे़ ही होते हैं, जाकर मना लाना चाहिए ,अब ऐसी भी क्या नाराजगी !

 वह बडे़ भाई के पास गया और पैरों में पड़कर पिछली बातों के लिए क्षमा माँगने लगा । बोला, "अब चलिए और विवाह कार्य संभालिए !"

पर बड़ा भाई न पसीजा, उसके घर चलने से साफ मना कर दिया। 
  
छोटे भाई को बहुत दुःख हुआ। अब वह इसी चिंता में रहने लगा कि कैसे भाई को मनाया जाए।

 इधर विवाह के भी बहुत ही थोडे दिन रह गये थे। बाकी सगे संबंधी आने लगे थे !

एक सम्बन्धी ने बताया, "तुम्हारा बडा भाई एक संत के पास प्रतिदिन जाता है और उनका बहुत आदर भी करता है औऱ कहना भी मानता है!"

छोटा भाई उन संत के पास पहुँचा और पिछली सारी बातें बताते हुए अपनी गलती के लिए क्षमा याचना की तथा गहरा पश्चात्ताप व्यक्त किया और उनसे प्रार्थना की, ''आप किसी भी तरह मेरे भाई को मेरे यहाँ आने के लिए राज़ी कर दे !''

दूसरे दिन जब बडा़ भाई सत्संग में गया तो संत ने उससे पूछा, "क्यों तुम्हारे छोटे भाई के यहाँ कन्या का विवाह है ? तुम क्या-क्या काम संभाल रहे हो ?"

 "मैं तो विवाह में सम्मिलित ही नही हो रहा गुरुदेव । कुछ वर्ष पूर्व मेरे छोटे भाई ने मुझे ऐसे कड़वे वचन कहे थे, जो आज भी मेरे हृदय में काँटे की तरह खटक रहे हैं  ! 
''बड़े भाई ने कहा।

संत जी ने कहा, "सत्संग के बाद मुझसे मिल कर जाना..जरूर काम है....!"

सत्संग समाप्त होने पर वह संत के पास पहुँचा, उन्होंने पूछा, "मैंने गत रविवार को जो प्रवचन दिया था उसमें मैंने क्या कहा था...ज़रा याद करके बताओ...?"

अब बड़ा भाई बिलकुल मौन!

काफी देर सोचने के बाद हाथ जोड़ कर बोला, " माफी चाहता हूँ गुरुदेव ,कुछ याद नहीं आ रहा कौन सा विषय था ?"

संत बोले, "देखा! मेरी बताई हुई अच्छी बातें तो तुम्हें आठ दिन भी याद न रहीं और छोटे भाई के कडवे बोल जो की वर्षों पहले कहे गये थे, वे तुम्हें अभी तक हृदय में चुभ रहे है। जब तुम अच्छी बातों को याद ही नहीं रख सकते, तब उन्हें जीवन में कैसे उतारोगे"

 "और जब जीवन नहीं  सुधारा तब सत्सग में आने का लाभ ही क्या रहा ? अतः कल से यहाँ मत आया करो...बेकार अपना समय व्यर्थ मत करो... !''

अब बडे़ भाई की आँखें खुली।उसने आत्म-चिंतन किया और स्वीकार किया   _"मैं वास्तव में ही गलत मार्ग पर हूँ !"_

उसके बाद वह अपने छोटे भाई के घर गया औऱ उसे अपने गले से लगा लिया।दोनों भाईयों के आँखों में खुशी के आँसू थे.......!!

हमारे साथ भी ऐसा ही होता है ।अक्सर दूसरों की कही किसी बात का हम बुरा मान जाते हैं और बेवजह उससे दूरी बना लेते हैं। 

जबकि हमें ये चाहिए कि हम आपसी बातचीत से मन में उपजी कटुता को भुलाकर सौहार्द पूर्ण वातावरण बनाएं। 

*न स्वयं किसी से रूठें न किसी को रूठने का मौका दें।*         

*तो शुभ काम में देरी क्यों !कृपया आप किसी भी जीव की निंदा मत करो,आप किसी भी जीव की निंदा मत सुनो।इससे आपका समय बचेगा और फायदे की बात करें तो➡️1. आपका समय बचेगा 2. आप हमेशा सकारात्मक रहेंगे 3. आपकी निंदा कोई भी जीव नहीं करेगा 4. आपका जीवन उन्नति की ओर अग्रसर रहेगा 5. आप जब भी भगवान की पूजन करेंगे तो आपका मन पूजन में लगा रहेगा , जिससे पुण्य का बंध ही होगा।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️सदैव प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें )का पालन किजिये।*
*जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हमसभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा किये गए कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने किये हुए कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम् जयतु शासनम*
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