*👨👨👦👦जीवन की खोज-वास्तविक या परछाई⏰*
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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒जीवन की खोज-वास्तविक या परछाई✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 माघ शुक्ल 6 मंगलवार 15 फरवरी 2024 कलिकाल के 13 वें तीर्थंकर बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले मन के सभी विकल्पों को शांत कर जगत में सर्व सुखकारक रत्नत्रय को निर्मलकारी करवाने वाले 1008 श्री विमलनाथ भगवान का केवलज्ञान कल्याणक महोत्सव है।*
*🕉️14 फरवरी को बसंत पंचमी*
*🔔षोडष कारण व्रत 26 जनवरी से 25 फरवरी तक*
*🌞दश लक्षण पर्व 13फरवरी से 23फरवरी तक*
*फरवरी माह में दिनांक 18, 21, 22, 28 को भी तीर्थंकर भगवान के पंच कल्याणक महोत्सव है*
*🔔🪔 यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*जीवन की खोज-वास्तविक या परछाई*
*एक रानी नहाकर अपने महल की छत परबाल सुखाने के लिए गई। उसके गले में एक हीरों का हार था,जिसे उतार कर वहीं आले पर रख दिया और बाल संवारने लगी।*
*इतने में एक कौवा आया।*
*उसने देखा कि कोई चमकीली चीज है, तो उसे लेकर उड़ गया।*
*एक पेड़ पर बैठ कर उसे खाने की कोशिश की, पर खा न सका।कठोर हीरों पर मारते-मारते चोंच दुखने लगी। अंतत: हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ कर वह उड़ गया।*
*जब रानी के बाल सूख गए तो उसका ध्यान अपने हार पर गया, पर वह तो वहां था ही नही इधर-उधर ढूंढा, परन्तु हार गायब।रोती-धोती वह राजा के पास पहुंची, बोली कि हार चोरी हो गई है, उसका पता लगाइए।*
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*✍️राजा ने कहा, चिंता क्यों करती हो,*
*दूसरा बनवा देंगे।*
*लेकिन रानी मानी नहीं, उसे उसी हार की रट थी। कहने लगी,नहीं मुझे तो वही हार चाहिए। अब सब ढूंढने लगे, पर किसी को हार मिले ही नहीं।*
*राजा ने कोतवाल को कहा,*
*मुझ को वह गायब हुआ हार लाकर दो।* *कोतवाल बड़ा परेशान*,
*कहां मिलेगा?* *सिपाही*,
*प्रजा, कोतवाल-* *सब खोजने में लग गए।*
*राजा ने ऐलान किया,*
*जो कोई हार लाकर मुझे देगा,*
*उसको मैं आधा राज्य पुरस्कार में दे दूंगा।*
*अब तो होड़ लग गई प्रजा में।*
*सभी लोग हार ढूंढने लगे आधा राज्य पाने के लालच में।*
*ढूंढते-*
*ढूंढते अचानक वह हार किसी को एक गंदे नाले में दिखा।*
*हार तो दिखाई दे रहा था,* *पर उसमें से बदबू आ रही थी।*
*पानी काला था। परन्तु एक सिपाही कूदा इधर उधर बहुत हाथ मारा पर कुछ नहीं मिला। पता नहीं कहां गायब हो गया।*
*फिर कोतवाल ने देखा,*
*तो वह भी कूद गया।*
*दो को कूदते देखा तो कुछ उत्साही प्रजाजन भी कूद गए।*
*फिर मंत्री कूदा।* *तो इस तरह उस नाले में भीड़ लग गई।*
*लोग आते रहे और अपने कपडे़ निकाल-निकाल कर कूदते रहे।*
*लेकिन हार मिला किसी को नहीं- कोई भी कूदता,*
*तो वह गायब हो जाता।*
*जब कुछ नहीं मिलता,*
*तो वह निकल कर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता*।
*सारे*
*शरीर पर बदबूदार गंदगी,*
*भीगे हुए खडे़ हैं।*
*दूसरी ओर दूसरा तमाशा, बडे़-बडे़ जाने-माने ज्ञानी, मंत्री सब में होड़ लगी है, मैं जाऊंगा पहले, नहीं मैं तेरा सुपीरियर हूं, मैं जाऊंगा पहले हार लाने के लिए।*
*इतने में राजा को खबर लगी। उसने सोचा, क्यों न मैं ही कूद जाऊं उसमें?* *आधे राज्य से हाथ तो नहीं धोना पडे़गा। तो राजा भी कूद गया।*
*इतने में एक संत गुजरे उधर से। उन्होंने देखा तो हंसनेलगे, यह क्या तमाशा है?*
*राजा, प्रजा,मंत्री, सिपाही - *सब कीचड़ मे लथपथ,*
*क्यों कूद रहे हो इसमें?*
*लोगों ने कहा, महाराज! बात यह है कि रानी का हार चोरी हो गई है। वहां नाले में दिखाई दे रहा है। लेकिन जैसे ही लोग कूदते हैं तो वह गायब हो जाता है। किसी के हाथ नहीं आता।*
*संत हंसने लगे, भाई! *किसी ने ऊपर भी देखा?*
*ऊपर देखो, वह टहनी पर लटका हुआ है। नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है।*
*इस कहानी का क्या मतलब हुआ?*
*जिस चीज की हम को जरूरत है,* *जिस परमात्मा को हम पाना चाहते हैं, जिसके लिए हमारा हृदय व्याकुल होता है -वह सुख शांति और आनन्द रूपी हार क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है और*
*यह महसूस होता है कि इस को हम पूरा कर लेंगे। अगर हमारी यह इच्छा पूरी हो जाएगी तो हमें शांति मिल जाएगी, हम सुखी हो जाएंगे। परन्तु जब हम उसमें कूदते हैं, तो वह सुख और शांति प्राप्त नहीं हो पाती*
*इसलिए सभी संत-महात्मा हमें यही संदेश देते हैं कि वह शांति, सुख और आनन्द रूपी हीरों का हार, जिसे हम संसार में परछाई की तरह पाने की कोशिश कर रहे हैं, वह हमारे अंदर ही मिलेगा, बाहर नहीं*
*सदैव प्रसन्न रहिये ! जो प्राप्त है वही पर्याप्त है ! !!*
*जिसका मन मस्त है , उसके पास समस्त है ! !!*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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