क्षमावाणी पर्व पर विशेष http://vishvahindusanyuktmahasabha.blogspot.com/2018/09/blog-post_60.html
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*🕉️क्षमावाणी ☸️ पर्व पर 🔯 विशेष*
*🙏क्षमा वीरस्य भुषणं🙏*
🕉ह्रीं नम:
श्री ज्योतिष ऋषि सेवाव्रतीस्वामीजी
👪"सच्चा मित्र"👪
*श्रीसिध्दांतवैदिक यंत्र-तंत्र-मंत्र भारतीयज्योतिष अनुसंधान केन्द्र जयपुर (राजस्थान)*
*तीन लोक संबंधी त्रिकालवर्ती अरहन्त जी, सिद्ध जी, आचार्य जी, उपाध्याय जी, सर्वसाधुजी, जैन धर्म ,जिनागम ,जिनचैत्य , जिन चैत्यालय को मेरा मन से- वचन से -काया से बारंबार कोटि कोटि नमस्कार हो,हे प्रभु मैं आप सभी के ध्यान से व आप सभी के गुणों के गुणगान से मेरे पापों का क्षय हो मुझे सद्बुद्धि की प्राप्ति हो।*
*मेरे द्वारा नित्यनिगोद से निकलने के बाद 8400000 योनियों में भ्रमण किया 👉आज तक मैंने एक इंद्रियों से पांच इंद्रियों जीवों को किसी भी प्रकार का, किसी को मेरे द्वारा मन से वचन से काय से जो भी कष्ट पहुंचा हो और उन सभी बातों के लिए मैं उत्तमक्षमा को धारण करता हूं। एक इंद्रीय से पांच इंद्रीय जीवो ने नित्यनिगोद से निकलने के बाद आज तक मुझे किसी प्रकार का कोई कष्ट दिया हो तो मैं उन सभी जीवो को क्षमा प्रदान करता हूं। मेरा किसी जीव से राग द्वेष नहीं है। मैं प्रयास करता हूं कि किसी भी जीव का उत्तम समाधि मरण हो और उसका मैं सहयोगी बनू। मैं यही भावना भाता हूं , मैं सभी जीवो से जो भी मेरे विरोधी बने हैं उन सभी के प्रति क्षमा भाव धारण करता हूं तथा जो भी मेरे आत्मा को परमात्मा बनने में सहयोगी हैं उन सभी के प्रति मैं क्षमा को धारण करता हूं और मैं यह भावना भाता हूं कि, किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में मैं पूर्णतया सहयोगी बनू। इन्हीं सद्भावना के साथ शेष शुभ*.....
आप सभी का शुभचिंतक
सेवाव्रती
👏उत्तम क्षमा👏
👏उत्तम क्षमा👏
👏उत्तम क्षमा👏
👏 उत्तम क्षमा👏
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*उत्तमक्षमा*
-*एक सत्य घटना से*
*एक साधक ने अपने दामाद को तीन लाख रूपये व्यापार के लिये दिये। उसका व्यापार बहुत अच्छा जम गया लेकिन उसने रूपये ससुर जी को नहीं लौटाये। आखिर दोनों में झगड़ा हो गया। झगड़ा इस सीमा तक बढ़ गया कि दोनों का एक दूसरे के यहाँ आना जाना बिल्कुल बंद हो गया। घृणा व द्वेष का आंतरिक संबंध अत्यंत गहरा हो गया। साधक हर समय हर संबंधी के सामने अपने दामाद की निंदा, निरादर व आलोचना करने लगे। उनकी साधना लड़खड़ाने लगी। भजन पूजन के समय भी उन्हें दामाद का चिंतन होने लगा। मानसिक व्यथा का प्रभाव तन पर भी पड़ने लगा। बेचैनी बढ़ गयी। समाधान नहीं मिल रहा था। आखिर वे एक संत के पास गये और अपनी व्यथा कह सुनायी।*
*संत श्री ने कहाः 'बेटा ! तू चिंता मत कर। ईश्वरकृपा से सब ठीक हो जायेगा। तुम कुछ फल व मिठाइयाँ लेकर दामाद के यहाँ जाना और मिलते ही उससे केवल इतना कहना, बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा कर दो।'*
*साधक ने कहाः "महाराज ! मैंने ही उसकी मदद की है और क्षमा भी मैं ही माँगू !"*
*संत श्री ने उत्तर दियाः "परिवार में ऐसा ☸️ भी संघर्ष नहीं हो सकता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो। चाहे एक पक्ष की भूल एक प्रतिशत हो दूसरे पक्ष की निन्यानवे प्रतिशत, पर भूल दोनों तरफ से होगी।"*
*साधक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उसने कहाः "महाराज ! मुझसे क्या भूल हुई ?"*
*"बेटा ! तुमने मन ही मन अपने दामाद को बुरा समझा – यह है तुम्हारी भूल। तुमने उसकी निंदा, आलोचना व तिरस्कार किया – यह है तुम्हारी दूसरी भूल। क्रोध पूर्ण आँखों से उसके दोषों को देखा – यह है तुम्हारी तीसरी भूल। अपने कानों से उसकी निंदा सुनी – यह है तुम्हारी चौथी भूल। तुम्हारे हृदय में दामाद के प्रति क्रोध व घृणा है – यह है तुम्हारी आखिरी भूल। अपनी इन भूलों से तुमने अपने दामाद को दुःख दिया है। तुम्हारा दिया दुःख ही कई गुना हो तुम्हारे पास लौटा है। जाओ, अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगो। नहीं तो तुम न चैन से जी सकोगे, न चैन से मर सकोगे। क्षमा माँगना बहुत बड़ी साधना है।"*
*साधक की आँखें खुल गयीं। संत श्री को प्रणाम करके वे दामाद के घर पहुँचे। सब लोग भोजन की तैयारी में थे।* *उन्होंने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा उनके दोहते ने खोला। सामने नाना जी को देखकर वह अवाक् सा रह गया और खुशी से झूमकर जोर जोर से चिल्लाने लगाः "मम्मी ! पापा !! देखो तो नाना जी आये हैं, नाना जी आये हैं....।"*
*माता पिता ने दरवाजे की तरफ देखा। सोचा, 'कहीं हम सपना तो नहीं देख रहे !' बेटी हर्ष से पुलकित हो उठी, 'अहा !पन्द्रह वर्ष के बाद आज पिता जी आये हैं।' प्रेम से गला रूँध गया, कुछ बोल न सकी। साधक ने फल व मिठाइयाँ टेबल पर रखीं और दोनों हाथ जोड़कर दामाद को कहाः "बेटा ! सारी भूल मुझसे हुई है, मुझे क्षमा करो।"*
*"क्षमा" शब्द निकलते ही उनके हृदय का प्रेम अश्रु बनकर बहने लगा। दामाद उनके चरणों में गिर गये और अपनी भूल के लिए रो-रोकर क्षमा याचना करने लगे।* *ससुरजी के प्रेमाश्रु दामाद की पीठ पर और दामाद के पश्चाताप व प्रेममिश्रित अश्रु ससुरजी के चरणों में गिरने लगे। पिता पुत्री से और पुत्री अपने वृद्ध पिता से क्षमा माँगने लगी। क्षमा व प्रेम का अथाह सागर फूट पड़ा। सब शांत, चुप ! सबकी आँखों सके अविरल अश्रुधारा बहने लगी। दामाद उठे और रूपये लाकर ससुर जी के सामने रख दिये। ससुरजी कहने लगेः "बेटा ! आज मैं इन कौड़ियों को लेने के लिए नहीं आया हूँ। मैं अपनी भूल मिटाने, अपनी साधना को सजीव बनाने और द्वेष का नाश करके प्रेम की गंगा बहाने आया हूँ।*
*मेरा आना सफल हो गया, मेरा दुःख मिट गया। अब मुझे आनंद का एहसास हो रहा है।"*
*दामाद ने कहाः "पिताजी ! जब तक आप ये रूपये नहीं लेंगे तब तक मेरे हृदय की तपन नहीं मिटेगी। कृपा करके आप ये रूपये ले लें।" साधक ने दामाद से रूपये लिये और अपनी इच्छानुसार बेटी व नातियों में बाँट दिये। सब कार में बैठे, घर पहुँचे।*
*पन्द्रह वर्ष बाद उस अर्धरात्रि में जब माँ-बेटी, भाई-बहन, ननद-भाभी व बालकों का मिलन हुआ तो ऐसा लग रहा था कि मानो साक्षात् प्रेम ही शरीर धारण किये वहाँ पहुँच गया हो। सारा परिवार प्रेम के अथाह सागर में मस्त हो रहा था। क्षमा माँगने के बाद उस साधक के दुःख, चिंता, तनाव, भय,निराशारूपी मानसिक रोग जड़ से ही मिट गये और साधना सजीव हो उठी।*
*🙏क्षमा वीरस्य भुषणं🙏*
*🙏🙏उत्तम क्षमा🙏🙏*
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🌲⏰मेरे कर्मफल⏰🌲
*शादी की सुहागसेज पर बैठी एक स्त्री का पति जब भोजनका थाल लेकर अंदर आया तो पूरा कमरा उस स्वादिष्ट भोजन की खुशबू से भर गया रोमांचित उस स्त्री ने अपने पति से निवेदन किया कि मांजी को भी यहीं बुला लेते तो हम तीनों साथ बैठकर भोजन करते।*
*पति ने कहा छोड़ो उन्हें वो खाकर सो गई होंगी आओ हम साथ में भोजन करते है प्यार से,उस स्त्री ने पुनः अपने पति से कहा कि नहीं मैंने उन्हें खाते हुए नहीं देखा है, तो पति ने जवाब दिया कि क्यों तुम जिद कर रही हो शादी के कार्यों से थक गयी होंगी इसलिए सो गई होंगी, नींद टूटेगी तो खुद भोजन कर लेंगी।तुम आओ हम प्यार से खाना खाते हैं। उस स्त्री ने तुरंत divorce लेने का फैसला कर लिया और divorce लेकर उसने दूसरी शादी कर ली और इधर उसके पहले पति ने भी दूसरी शादी कर ली। दोनों अलग- अलग सुखी घर गृहस्थी बसा कर खुशी खुशी रहने लगे।*
*इधर उस स्त्री के दो बच्चे हुए जो बहुत ही सुशील और आज्ञाकारी थे। जब वह स्त्री 60 वर्ष की हुई तो वह बेटों को बोली में शिखरजी, अयोध्या की यात्रा करना चाहती हूँ ताकि तुम्हारे सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना कर सकूँ। बेटे तुरंत अपनी माँ को लेकर शिखरजी, अयोध्या की यात्रा पर निकल गये। अयोध्या नगरी में एक जगह तीनों माँ बेटे भोजन के लिए रुके और बेटे भोजन परोस कर मां से खाने की विनती करने लगे।* *उसी समय उस स्त्री की नजर सामने एक फटेहाल, भूखे और गंदे से एक वृद्ध पुरुष पर पड़ी जो इस स्त्री के भोजन और बेटों की तरफ बहुत ही कातर नजर से देख रहा था।उस स्त्री को उस पर दया आ गईं और बेटों को बोली जाओ पहले उस वृद्ध को नहलाओ और उसे वस्त्र दो फिर हम सब मिलकर भोजन करेंगे। बेटे जब उस वृद्ध को नहलाकर कपड़े पहनाकर उसे उस स्त्री के सामने लाये तो वह स्त्री आश्चर्यचकित रह गयी वह वृद्ध वही था जिससे उसने शादी की सुहागरात को ही divorce ले लिया था।*
*उसने उससे पूछा कि क्या हो गया जो तुम्हारी हालत इतनी दयनीय हो गई तो उस वृद्ध ने नजर झुका के कहा कि सब कुछ होते ही मेरे बच्चे मुझे भोजन नहीं देते थे, मेरा तिरस्कार करते थे,मुझे घर से बाहर निकाल दिया।*
*उस स्त्री ने उस वृद्ध से कहा कि इस बात का अंदाजा तो मुझे तुम्हारे साथ सुहागरात को ही लग गया था जब तुमने पहले अपनी बूढ़ी माँ को भोजन कराने के बजाय उस स्वादिष्ट भोजन की थाल लेकर मेरे कमरे में आ गए और मेरे बार-बार कहने के बावजूद भी आप ने अपनी माँ का तिरस्कार किया। उसी का फल आज आप भोग रहे हैं।*
*जैसा व्यहवार हम अपने बुजुर्गों के साथ करेंगे उसी*
*देखा-देख कर हमारे बच्चों*
*में भी यह गुण आता है कि*
*शायद यही परंपरा होती है।*
*सदैव माँ बाप की सेवा ही*
*हमारा दायित्व बनता है।*
*जिस घर में माँ बाप हँसते है,*
*वहीं प्रभु बसते है।*
*नोट :- इस पोस्ट के माध्यम से अगर आप के परिणामों में निर्मलता आती है तो यह मेरा सौभाग्य है और अगर आपके समाधि मरण में कोई मुझसे सेवा हो तो अवश्य ही आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं* धन्यवाद .....
*आप या आपके परिवार को इस पोस्ट के पढ़ने से परिणाम निर्मल होते हैं तो यह मेरा सौभाग्य रहेगा* धन्यवाद.....
🐢🚩🕉👪 *आपसभी मंगलमय🍏☎🍭🔆आचरण को प्राप्त करकें यह जीवन सफल बनायें* ⚽🌲🌞🌍
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