*🎪पंच कल्याणक महोत्सव की सूचना व उपयोगी कहानी🔔*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 स्वयं के कर्मों का फल ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 श्रावण कृष्ण 2 , शनिवार 12 जुलाई 2025 कलि काल के 20 वें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ भगवान जी जिनकी आराधना से शनि की महादशा अनुकूल हो जाती है और सभी प्रकार से बौध्दिक शक्ति प्राप्ति कर उत्तम धर्म को धारण कर भव्य जीव मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता पूर्वक विचरण करवाने वाले श्री मुनिसुव्रतनाथ भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*
*🎪 जुलाई 2025 में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 01,02 12,20,26 ,30 व 31 तारीख को है।*
*👨👨👦👦🔔🐎 जुलाई माह में अष्टमी तिथि 3 व 18 तारीख को है।👉चतुर्दशी तिथि 09 व 23 जुलाई को है।*
*🐎✍️ पंचक 11 से 17 जुलाई तक है।*
*✅🔔⏰🐎 नोट जुलाई माह से अक्टूबर तक किसी भी प्रकार से विवाह + वाहन व प्रापर्टी खरीदने का शुभ मुहूर्त नहीं है।*
*🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर जैन पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*स्वयं के कर्मों का फल*
माण्डव्य ऋषि गहन तपस्या में लीन थे। एक दिन, कुछ चोर राजकोष लूटकर भागते हुए उनकी कुटिया के पास से गुज़रे। पीछा कर रहे सिपाहियों से बचने के लिए चोरों ने सारा लूटा हुआ धन ऋषि की कुटिया में छिपा दिया और स्वयं जंगल में भाग निकले।
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थोड़ी ही देर में सिपाही वहाँ पहुँचे। कुटिया की तलाशी ली गई। चोर तो मिले नहीं, पर लूट का धन वहीं पड़ा मिला। सिपाहियों ने सोचा—सामने जो साधु बैठा है, वही चोर है। शायद पकड़े न जाने के लिए इसने तपस्वी का वेश धर रखा है।
बिना कोई सोच-विचार किए सिपाही ऋषि को पकड़ कर राजा के सामने ले गए। राजा ने भी बिना कोई जाँच किए, न कोई प्रश्न, न कोई सुनवाई—माण्डव्य ऋषि को सूली पर चढ़ा देने का आदेश सुना दिया।
सूली पर लटकते हुए भी ऋषि शांत थे। उनके मन में एक ही प्रश्न था—"आखिर मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है जिसका यह दंड मिल रहा है?" ऋषि तो आत्म ज्ञानी थे। उन्होंने अपने इस जीवन की गहराई से समीक्षा की, फिर पिछले जन्मों की ओर ध्यान केंद्रित किया। सौ जन्म तक का अवलोकन करने पर भी कुछ भी ऐसा दिखाई नहीं दिया कि कोई पाप किया है ।
आखिरकार उन्होंने भगवान की शरण ली।
तब एक दिव्य वाणी हुई— "ऋषिवर, अपना एक सौ एक (101)वां जन्म देखो।"
ध्यान गहराया। एक दृश्य उभरा— एक आठ-दस वर्ष का बालक है। उसके एक हाथ में एक कीट (कीड़ा) है, दूसरे हाथ में नुकीला काँटा। बालक खेल-खेल में उस कीट को बार-बार चुभाता है। कीट तड़प रहा है, और बालक इस पीड़ा को देखकर आनंदित हो रहा है।
माण्डव्य ऋषि का हृदय काँप उठा। उन्होंने समझ लिया—वह निर्दोष नहीं हैं। उस बालक की क्रूरता आज उन्हें तपस्वी होकर भी सूली तक ले आई है।
विचार उठे—"क्या मेरी वर्षों की तपस्या भी उस एक क्षण की क्रूरता को मिटा नहीं सकी?" परंतु वे मौन थे, शांत थे।
उधर, कुछ सज्जन जिन्होंने ऋषि को वर्षों से तपस्या में देखा था, राजा के पास पहुँचे। उन्होंने राजा को सारी सच्चाई बताई। राजा को जब अपनी भूल का अहसास हुआ तो वह काँप उठा। उसने स्वयं ऋषि से क्षमा माँगी और उन्हें सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया।
मगर तब तक माण्डव्य ऋषि के भीतर बहुत कुछ बदल चुका था। उन्होंने सूक्ष्मतम न्याय की गहराई को अनुभव कर लिया था। उन्होंने आँखें मूँद लीं, भीतर से उस कीट से क्षमा माँगी, और ईश्वर से प्रार्थना की भगवान अब वर्तमान से मैं किसी भी जीव को किसी भी प्रकार से तकलीफ नहीं दुंगा पुनः अपने आत्म ध्यान में लीन हो गए।
*👨👨👦👦🎪⏰🔔विशेष:-भव्य आत्माओं,गुरुवर कहते है कि शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि कर्म चाहे छोटे हों या बड़े,उनका फल निश्चित है। स्वयं के कर्मों का न्याय बहुत सूक्ष्म होता है—वह न समय देखता है, न उम्र, न रूप, न परिस्थिति। सभी कर्मों का फल तुरंत नहीं मिलता। कुछ चीजें समय लेती हैं, लेकिन यह तय है कि हर कर्म का फल कभी न कभी अवश्य मिलता है।*
*🔔जो जैसा बोता है, अंततः उसे वैसा ही फल मिलता है। अतः हम सभी आज और अभी से ही सावधानी पूर्वक अपने मन वचन और शरीर का नियंत्रण चौबीस घंटे करना है। अन्यथा आज हम जितने भी दुखी है उससे करोड़ों गुना दुःख भोगना पड़ेगा।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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