*उपवास का चमत्कार*
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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 उपवास का चमत्कार ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 कार्तिक पूर्णिमा , शुक्रवार , 15 नवम्बर 2024 कलिकाल के तृतीय तीर्थंकर संभवनाथ भगवान गुरु की महादशा को अनुकूल बनाने वाले सभी प्रकार से बौध्दिक संपदा प्रदान कर उत्तम धर्म को धारण करवा कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री संभवनाथ भगवान जी का जन्म कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔 नवंबर माह में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 15, 25 को कल्याणक महोत्सव है।अष्टान्हिका शाश्वत पर्व,8 से15 नवम्बर तक*
*👨👨👦👦🔔👉 नवंबर माह में अष्टमी तिथि 09 व 23 को है। चतुर्दशी तिथि 14 व 30 नवम्बर को है।*
*🙆इस नवम्बर माह में शुद्ध विवाह मुहूर्त 12,13,16,17,18,22,23,25,26,28,29 को है।▶️पंचक 9 से 13 नवम्बर तक है।👨👨👦👦↔️ग्रह प्रवेश मुहूर्त 8,13,16,18,25 नवम्बर को है।*
*🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी तिथियां जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
🔔 *उपवास का चमत्कार* 🔔
*अंत में पिता का सहयोग लिया तो परिवार की उन्नति हुई*
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*एक छोटे से शहर में एक गरीब परिवार रहा करता था, जो रोज़ सब्ज़ियाँ ख़रीद और बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट भर रहा था।*
*मोहन उस परिवार का मुखिया था। उसके परिवार में उसकी पत्नी और उसका एकमात्र बेटा सोहन था।* *मोहन रोज़ 100 रुपये की सब्ज़ी ख़रीदकर लाता और उसे 200 रुपये में बेच देता। उन 200 रुपयों में से वह अगले दिन के लिए 100 रुपये सब्ज़ियाँ ख़रीदने के लिए पहले निकालकर रख लेता और फिर बचे हुए 100 रुपये से अपने घर का ख़र्च पूरा करता ।*
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*ऐसे ही उसकी गुज़र बसर चल रही थी। उसे कभी कभी भविष्य की चिंता होती थी कि कभी किसी आकस्मिक खर्च की अगर जरूरत आई, या मंहगाई बढ़ गई तो उसकी व्यवस्था वह कैसे करेगा। वह जब भी कुछ अतिरिक्त पैसे इकट्ठा करता था, कोई न कोई आवश्यकता भी आ जाती थी। ईश्वर की कृपा से कोई विशेष समस्या नहीं आई और ऐसे ही समय गुजरता गया।*
*एक दिन उसके बेटे का विवाह हो गया। परिवार का खर्च बढ़ गया किंतु आय की व्यवस्था वैसी ही थी। मोहन ने एक दिन अपने बेटे को बुला कर कहा- "बेटा, मैं अब बूढ़ा हो रहा हूँ। तुम चाहो तो जो काम मैं करता आ रहा था, उसे ही संभाल सकते हो या फिर कोई और धंधा करके जीवन चला सकते हो। मेरे धंधे को ही अगर चलाना चाहो तो उसका सबक ले लो कि -*
*प्रतिदिन 100 रूपये की सब्ज़ियाँ ले आना और उनको 200 रूपये में बेचना। इतना अवश्य याद रखना कि पहले उन सौ रुपयों में से अगले दिन के धंधे के लिए 100 रूपए निकालने के बाद ही खर्च के लिए रुपए निकालना है। जो भी खर्च करना है वो मुनाफे के पैसे से ही करना है। कभी भी अगले दिन के व्यापार के लिए बचाए जाने वाले पैसे में से कोई खर्च मत करना।'*
*इसी सबक को याद करके मैंने अपनी जिन्दगी काटी है और तुम्हें भी बता रहा हूं। अब मैं तीर्थाटन में जाऊंगा और लौटने पर अपने गुरु के पास रहूंगा। कभी कोई बहुत बड़ी मुसीबत आ जाए और कुछ समाधान ना मिले तब मेरे पास आना, वरना छोटी मोटी समस्या ख़ुद से ही सुलझा लेना।"*
*बेटे ने व्यापार का सूत्र समझकर पिता को आश्वस्त किया कि वह उनकी आज्ञा का पालन करता रहेगा। फिर मोहन निश्चिंत होकर अपनी धार्मिक यात्रा पर निकल पड़ा।*
*अब उसका बेटा भी वैसा ही करता जैसे मोहन ने बताया था। उसकी ज़िंदगी शांति से गुज़रने लगी थी। एक दिन मोहन के बेटे की पत्नी ने रात्रि होने पर उससे मिठाई खाने की इच्छा बताकर ले आने को कहा। मोहन का बेटा सोचने लगा कि अगर मिठाई खरीदनी होगी तो खर्च के रूपये तो आज समाप्त हो चुके हैं। परंतु अब पत्नी ने कुछ खाने को आज कहा है तो उसे पूरा करना भी उसी का दायित्व है। उसने अगले दिन के व्यापार के लिए रखे 100 रुपए में से ही मिठाई ख़रीद लाने की योजना बनाई। उसने सोचा कि 10 रुपये में कुछ नहीं होगा और मिठाई ले आया। उसकी पत्नी बहुत प्रसन्न हुई।*
*किंतु उस दिन उसके 110 रुपये खर्च हो गए थे और अब 90 रुपये ही व्यापार के लिए बच पाए थे। वह अगले दिन 90 रुपयों की ही सब्ज़ियाँ ले आया और 180 रुपये में बेच दिया। किंतु 100 रूपए का उसके घर का खर्चा नियमित था, तो अगले दिन के धंधे के लिए केवल 80 रुपये ही बच पाए।*
*अगले दिन सोहन 80 रुपये की सब्ज़ी लाया, जिसे 160 रुपये में बेचने पर 100 रूपए घर का खर्चा निकालने पर अब 60 रुपये ही बच रहे थे। 60 रुपये देख कर अब सोहन को चिंता होने लगी। वह सोचने लगा कि कल 60 रूपये की सब्ज़ियाँ ला कर 120 की बेचूँगा तो घर का खर्चा 100 रूपये निकालकर केवल 20 रूपये ही बचेंगे।*
*अब उसे पत्नी को मिठाई खिलाने के लिए अपनी धंधे की राशि खर्च करने का निर्णय लेना गलत लगने लगा। उसने पहले नहीं सोचा था कि केवल 10 रूपये की मिठाई इतनी महँगी पड़ जाएगी।*
*उसे अपने पिताजी का सबक याद आने लगा कि सबसे पहले सब्ज़ियों को खरीदने के लिए रुपए को अलग रखना, लेकिन उसने तो उसमें से 10 रूपये खर्च कर के गलती कर दी है।*
*अब आने वाले कल की सोच कर सोहन को नींद नहीं आ रही थी। कोई और उपाय न देखकर उसे फिर अपने पिताजी की कही यह बात भी याद आयी कि जब बहुत बड़ी मुसीबत आए तो मेरे पास आना। रात को ही सोहन अपने पिता से मिलने निकल पड़ा। पिताजी को उसने सारी बात बता दी ।*
*बेटे की बात सुनकर मोहन पहले तो नाराज़ हुआ फिर बोला- "अब लौटकर घर जा और घर में सबको बोलना कि आज सब मिल कर लक्ष्मी माता का निराहार व्रत रखेंगे, जिससे लक्ष्मी जी की कृपा होगी।"*
*मोहन के बेटे सोहन ने ऐसा ही किया, और घर जाकर सबको अगले दिन व्रत रखने के लिए कहा। फिर वह 60 रूपए की सब्ज़ियाँ लाया, जो 120 रूपए की बिकी। घर पर सबका व्रत होने से घर का खर्च कुछ नहीं हुआ। अगले दिन वह उन पूरे 120 रुपयों की सब्ज़ियाँ ले आया। अब उन्हें बेचने से 240 रू. की आमदनी हो गई और उसमें से 100 रुपये खर्च निकालने पर भी सोहन के पास 140 रुपये बचे थे। जब उसने इन 140 रुपयों की सब्ज़ियाँ लेकर उन्हें 280 की बेची तो घर का खर्च निकालकर सोहन के पास 180 रुपये बचे थे ! अब सोहन की आमदनी बढ़ती जा रही थी। अब वह मिठाई भी ला सकता था, धीरे धीरे वह बेहतर ज़िंदगी जीने लगा।*
*इस तरह पिता की सलाह ने सोहन की ज़िंदगी ही बदल दी। असल ज़िंदगी में हर कोई मोहन और सोहन है, अपनी इच्छाओं को मारना ही व्रत है। लोगों को ऐसे ही मिठाई खाने का मन करता है। जैसे जैसे हम पांच इंद्रियों की पूर्ति में अर्थात गाड़ी, घर, दैनिक आनंद की ज़िंदगी में ज़रूरत के पैसे बिना आमदनी को सोचे ही खर्च कर देते हैं और फिर ज़िंदगी वहीं ठहर जाती है।*
*अगर हम सभी सच्चे देव शास्त्र गुरु की जिनवाणी का अध्ययन करें तो कुछ समय के लिए अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में कर तो आगे की ज़िंदगी बेहतर हो सकती है। यही हम सभी का सच्चा मोक्ष मार्ग है।
आवश्यकताओं की पूर्ति संभव है
इच्छाओं की नहीं।
*🎪👨👨👦👦🔔🙏 विशेष :- भव्य आत्माओं, नित्य निगोद से निकलने के बाद हमारी आत्मा ने दो हजार सागर की कितने बार भोगी इसकी गिनती नहीं है।इसका मुख्य कारण चौरासी लाख योनियों में जहां भी जन्म हुआ हमनें वहां पर अपनी इंद्रियों की पूर्ति में ही समय व्यतीत कर दिया। असंख्यात भवों के पुण्य संचय से सच्चे देव शास्त्र गुरु का सानिध्य प्राप्त हुआ है। किंतु यहां भी पांचों इंद्रियों के विषयों में आसक्त होकर समय व्यतीत कर रहे है।अब सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त करना है तो सच्चे शास्त्र से सम्यक दर्शन- सम्यक ज्ञान- सम्यक चारित्र को जानकर शक्ति अनुसार आचरण करना होगा।*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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