रविवार, 5 मई 2024

सभी के तीन प्रश्न

*सभी के तीन प्रश्न*
⛳🕉️🌞🕉️🪔⛳
*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩‍🚒 सभी के तीन प्रश्न  ✍️🐒*

*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 वैशाख कृष्ण 13, सोमवार , 6 मई  2024 कलिकाल के 15 वें तीर्थंकर धर्मनाथ भगवान बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले सभी प्रकार के अरिष्टों को समाप्त करने की शक्ति प्रदान कर उत्तम धर्म को धारण करवा कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री धर्मनाथ भगवान जी का गर्भ कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 वैशाख कृष्ण चतुर्दशी शाश्वत पर्व, मंगलवार 7 मई  2024 कलिकाल के 21 वें तीर्थंकर नमिनाथ भगवान बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले सभी प्रकार के अरिष्टों को समाप्त करने की शक्ति प्रदान कर उत्तम धर्म को धारण करवा कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री नमिनाथ भगवान जी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 वैशाख शुक्ल एकम, बुधवार  , 8 मई  2024 कलिकाल के 17 वें तीर्थंकर कुंथुनाथ भगवान बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले सभी प्रकार के अरिष्टों को समाप्त करने की शक्ति प्रदान कर उत्तम धर्म को धारण करवा कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री कुंथुनाथ भगवान जी का जन्म , तप व मोक्ष कल्याणक महोत्सव है। आज के तारीख में अमावस्या व एकम दोनों तिथि मान्य है।*
*🔔मई माह में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव   8, 10, 13,15, 16,18, 29 इन दिनांकों में है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔👉मई माह में  शुक्ल पक्ष में एकम तिथि का क्षय है। अष्टमी तिथि  पंद्रह मई को है। चतुर्दशी तिथि सात व बाईस मई को है।*
*⛳10 मई को प्रथम दान दिवस याने प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का प्रथम पारणा, अक्षय तृतीया व रोहिणी व्रत*।
*🙆इस माह कोई भी विवाह मुहूर्त नहीं है। विवाह मुहूर्त 9 जुलाई से प्रारंभ होकर 15 जुलाई तक ही है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*

विख्यात रूसी साहित्यकार “टालस्टाय” अपनी कहानी “तीन प्रश्न” में लिखते हैं कि किसी राजा (वर्तमान में सभी व्यक्ति विशेष राजा ही है। जैनदर्शन के अनुसार राजा वह है जिसने पांच इंद्रियों के विषयों को स्वयं के आचरण से काबू में रखा हुआ है।) के मन में तीन प्रश्न अक्सर उठा करते थे जिनके उत्तर पाने के लिए वह अत्यंत अधीर था इसलिए उसने अपने राज्यमंत्री से परामर्श किया और अपने सभासदों की एक बैठक बुलाई। राजा ने उस सभा में जो अपने तीनों प्रश्न सबके सम्मुख रखे; वे थे —

1. सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य क्या होता है?

2. परामर्श के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति कौन होता है?

3. किसी भी निश्चित कार्य को करने का महत्त्वपूर्ण समय कौन सा होता है?

कोई भी राजा के प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर न दे पाया लेकिन उस सभा में राजा को एक ऐसे संन्यासी के बारे में पता चला जो सुदूर जंगल में एक कुटिया में रहते थे और सबकी जिज्ञासा का समाधान करने में समर्थ थे।

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 राजा भी साधारण वेष में अपने कुछ सैनिकों एवं गुप्तचरों को साथ लेकर चल दिया उस संन्यासी के दर्शनों के लिए। दिल में एक ही आस थी कि अब उसे अपने प्रश्नों के उत्तर अवश्य ही मिल जायेंगे। जब वे सब सन्यासी की कुटिया के समीप पहुंचे तो राजा ने अपने सभी सैनिकों एवं गुप्तचरों को कुटिया से दूर रहने का आदेश दिया और स्वयं अकेले ही आगे बढ़ने लगा।

राजा ने देखा कि अपनी कुटिया के समीप ही सन्यासी खेत में कुदाल चला रहे हैं। कुछ ही क्षणों में उनकी दृष्टि राजा पर पड़ी। कुदाल चलाते-चलाते ही उन्होंने राजा से उसके आने का कारण पूछा और राजा ने भी बड़े आदर से अपने वही तीनों प्रश्न संन्यासी को निवेदित कर दिए। राजा अपने प्रश्नों के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा लेकिन यह क्या? साधु ने तो उत्तर देने की बजाय राजा को उसकी कुदाल लेने का संकेत कर डाला और राजा भी कुदाल लेकर खेत जोतने लगा। आख़िरकार राजा को अपने प्रश्नों के उत्तर भी तो चाहिए थे।

राजा के खेत जोतते-जोतते संध्या हो गयी। इतने में ही एक घायल व्यक्ति जो खून से लथपथ था और जिसके पेट से खून की धार बह रही थी, उस संन्यासी की शरण लेने आया। अब संन्यासी एवं राजा दोनों ने मिलकर उस घायल की मरहम पट्टी की। दर्द से कुछ राहत मिली तो घायल सो गया। प्रातः जब वह घायल आगंतुक राजा से क्षमायाचना करने लगा तो राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। आगन्तुक राजा की स्थिति देख तत्काल अपना परिचय देते हुए बोला – “कल तक आपको मैं अपना घोर शत्रु मानता था क्योंकि आपने मेरे भाई को आजीवन कारावास की सज़ा दी थी। बदले का अवसर ढूढ़ता रहता था। कल मुझे पता लग गया था कि आप साधारण वेषभूषा में इस साधु के पास आये हैं। आपको मारने के उद्देश्य से मैं यहाँ आया था और एक झाड़ी के पीछे छिपकर बैठा था लेकिन आपके गुप्तचर मुझे पहचान गये और घातक हथियारों से मुझे चोट पहुँचाई लेकिन आपने अपना शत्रु होने के बावजूद भी मेरे प्राणों की रक्षा की। परिणामतः मेरे मन का द्वेष समाप्त हो गया है। अब मैं आपके चरणों का सेवक बन गया हूँ। आप चाहे दण्ड दें अथवा मुझे क्षमादान दें, यह आपकी इच्छा।”

घायल की बात सुनकर राजा स्तब्ध रह गया और मन ही मन इस अप्रत्याशित ईश्वरीय सहयोग के लिए के लिये प्रभु का धन्यवाद करने लगा। संन्यासी मुस्कुराया और राजा से कहने लगा – “राजन्, क्या अभी भी आपको अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले ?”

राजा कुछ दुविधा में दिखाई दे रहा था इसलिए संन्यासी ने ही बात आगे बढ़ाई – आपके पहले प्रश्न का उत्तर है — सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य वही होता है जो हमारे सामने होता है; जैसे आपने मुझे खेत जोतने में सहयोग दिया। यदि आप मुझे सहानुभूति न दिखाते तो आपके जीवन की रक्षा न हो पाती। जिस प्रकार के सुख हम चाहते है हमें भी उसी प्रकार का बीज बोना चाहिए।

आपका दूसरा प्रश्न था कि परामर्श के लिए कौन महत्त्वपूर्ण होता है जिसका उत्तर आपको स्वयं ही मिल चुका है कि जो व्यक्ति हमारे पास उपस्थित होता है, उसी से परामर्श मायने रखता है। जैसे उस घायल व्यक्ति को सहायता की आवश्यकता थी जिसके प्राण आपने बचाये। इस तरह आपका शत्रु भी आपका मित्र बन गया।जो भी व्यक्ति विशेष चाहे आपके परिवार का हो या अनुभवी हो जो आपकी समस्याओं को सुलझाने में आपका मार्गदर्शन करें उस व्यक्ति विशेष से अपने मन की दुविधाएं कहना चाहिए।

तीसरे प्रश्न का उत्तर यही है कि किसी भी निश्चित कार्य को करने का महत्त्वपूर्ण समय होता है “ हमारा वर्तमान”। स्थिति परिस्थिति व स्वयं की योग्यता अनुसार ही किसी भी योग्य जीव की सहायता की जा सकती है।वह पेड़ पौधे हो या व्यक्ति विशेष।

*🎪🔔👨‍👨‍👦‍👦🙏⛳विशेष :- भव्य आत्माओं,, महान् रूसी साहित्यकार टालस्टाय की यह कहानी हमें सावधान करती है कि वर्तमान के महत्त्व को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। भविष्य की चिंता में वर्तमान यदि बिगड़ गया तो हम हाथ ही मलते रह जायेंगे। प्रस्तुत कार्य को मनोयोग से करना अथवा समय का सदुपयोग ही न केवल उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं की नींव होता है अपितु यही सर्वांगीण प्रगति का मूलमंत्र भी है..!!*


*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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