शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

विजयादशमी

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*🌞विजयादशमी🌞*

🕉ह्रीं नम:
*श्री ज्योतिष ऋषि सेवाव्रतीस्वामीजी*
👪"सच्चा मित्र"👪
श्रीसिध्दांतवैदिक यंत्र-तंत्र-मंत्र भारतीयज्योतिष अनुसंधान केन्द्र जयपुर (राजस्थान)

*।। रावण ।। 🔵 ।। रावण ।।*

जैन रामायण के अनुसार रावण बहुत *ज्ञानी, बुद्धिशाली और विद्याधारी* इन्सान थे । रावण कोई राक्षस नही थे, अपितु उनका वंश राक्षसवंश था। वे बहुत ही *चारित्रवान और नियम के पक्के* थे । रावण ने जैन धर्म के पालन करने वालों पर बहुत ही सहयोग किया था, जब भी किसी श्रावक के ऊपर किसी प्रकार का संकट आता था रावण तत्परता से उसकी मदद करता था और जैन साधुओं की भी उसने बहुत सुरक्षा की है। उसने यह  नियम मुनिराज लिया था की *पराई स्त्री को उसकी ईच्छा के विरुद्ध हाथ नही लगाऊंगा* ।  उन्होंने सीताजी को स्पर्श भी नही किया था ।

आगम के अनुसार,जैन रामायण 20 वे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत स्वामी जी के समकालीन थी । *रावण जैन श्रावक* थे । वे *कैलाश पर्वत पर श्री 1008 आदिनाथ भगवान की भक्ति* करने जाते थे । एक बार भक्ति करते करते उनकी पत्नी मंदोदरी भक्ति भाव से संगीत पर नृत्य कर रही थी तब वाद्य का तार टूट गया तब भक्ति में विक्षेप न पड़े इसलिए अपने हाथ की नस काटकर तार की जगह जोड़ कर *प्रभु भक्ति जारी* रखी, जिस कारण *तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध* किया और वे भवभवों में *मुक्त होकर तीर्थंकर बनेगे* ।भरत क्षेत्र में सोलहवें तीर्थंकर बनेगे वर्तमान में नरक वास भोग रहे है । *ऐसे रावण को बुरा बताकर हम जैन उनका पुतला कैसे जला सकते है जबकि वे तो भावी तीर्थंकर बनने वाले है। और इसके अलावा हम अनंत जीवों के घात के कारण पाप का बंध भी करेंगे ।*

*यह संकल्पी हिंसा है और हम जैन इसके त्यागी होते है । कृत, कारित और अनुमोदना से भी पाप का बंध होता है । अतः हमे न अनुमोदना करनी चाहिए, न देखना चाहिए।*

यदि विजया दशमी के दिन कुछ *जलाना है तो, हमारे शरीर, मन के अंदर  रहे अहंकार, क्रोध, आडम्बर, हमारे अंदर रहे बुरे विचारो को, बदले की भावना को, किसी को नीचा दिखाने की प्रवृति, किसी की निंदा करने की, अपने से निर्बल को  सताने की प्रवृति, बड़े बुजुर्गो के तिरस्कार करने की प्रवृति को जलाना होगा तो हमारा मन शरीर निर्मल होगा ।*

*हम सभी भी क्या रावण से कम है । क्या हममें से किसी ने भी कभी भी क्या नजरों से, मन में विकार भाव नहीं लाये ? तो फिर रावण ही क्यों ?*
*🙆‍♀✍नोट  :  -  जैन दर्शन के अनुसार रावण के 10 सिर नहीं थे । उसका एक ही सिर था किंतु वह नौरत्नों का हार पहनता था उसमें उसके 9 सिर दिखते थे और एक उसका वास्तविक इसीलिए उसको दशानन कहते थे।  रावण की मृत्यु लक्ष्मण के द्वारा हुई थी राम के द्वारा नहीं यही जैन शास्त्रों की  सच्चाई है ।*

*हमें तो मोक्ष पाना है । विचार करें, चिंतवन करें । ज्ञानी है तो फिर अज्ञानता के कार्य क्यों, क्यों और क्यो*

_*जलने से पहले जलना छोडो़ ।*_

_*राग हटाओ कष्ट मिटाओ ।*_

_*जो है सो है ।*_

_*सबके दिन एक से नहीं होते ।*_
         
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🐢🚩🕉👪आपसभी मंगलमय🍏☎🍭🔆आचरण को प्राप्त करकें यह जीवन सफल बनायें⚽🌲🌞🌍
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