शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

हीरे से अनमोल रत्न

*हीरे से अनमोल रत्न*
⛳🕉️🌞🕉️🪔⛳
*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨‍👩‍👧‍👦✍️कहानी सभी के काम की*

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*🔔👨‍👩‍👧‍👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी, शनिवार , 14 दिसंबर 2024 कलि काल के 18 वें तीर्थंकर अरनाथ बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले सभी प्रकार से सद्बुद्धि  प्रदान कर उत्तम धर्म को धारण करवा कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री अरनाथ का जन्म कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 मार्गशीर्ष पूर्णिमा, रविवार , 15 दिसंबर 2024 कलि काल के तृतीय तीर्थंकर संभवनाथ गुरु की महादशा को अनुकूल बनाने वाले सभी प्रकार से सद्बुद्धि  प्रदान कर उत्तम धर्म को धारण करवा कर मोक्ष मार्ग प्रशस्त करने वाले श्री संभवनाथ का तप कल्याणक महोत्सव है।*

*🔔 दिसंबर माह में तीर्थंकर भगवन्तों के पंच कल्याणक महोत्सव 10, 11, 14, 15, 17, 26,29 को  कल्याणक महोत्सव है।*
*👨‍👨‍👦‍👦🔔👉 दिसंबर माह में  अष्टमी तिथि  08 व 23 को है। चतुर्दशी तिथि 14 व 29 दिसम्बर को है।*

*🙆इस दिसंबर माह में शुद्ध विवाह मुहूर्त 04, 05, 09, 10, 14, 15 को  है।▶️पंचक 7 से 11 दिसंबर तक है।👨‍👨‍👦‍👦↔️ग्रह प्रवेश मुहूर्त 05,11,25,28 दिसंबर को है।*
 *🌞यह सभी पंच कल्याणक तिथियां उत्तर पुराण के अनुसार है इन तिथियों से सम्पूर्ण विश्व में कल्याणक महोत्सव मनाए जाते है।यह सभी  तिथियां जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*

*🌳हीरे से अनमोल क्या है?🌳*

 *एक दिगंबर संत एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते थे । वो रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काट कर ले जाते देखते थे।*

 *एक दिन उन्होंने लकड़हारे से कहा कि सुन भाई, दिन-भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती । तू जरा आगे क्यों नहीं जाता, वहां आगे चंदन का जंगल है ।*
 *एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा ।*

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*गरीब लकड़हारे को विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है ! जंगल में लकड़ियां काटते-काटते ही तो जिंदगी बीती । यह संत यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा ?*

 *मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो ! फिर झूठ कहेगा भी क्यों ? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है । कभी बोला भी नहीं इसके पहले । एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है ।*

*संत की बातों पर विश्वास कर वह आगे गया । लौटा तो संत के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां के बारे में कौन जानता है ।*

 *मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी । मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था । हम यही जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या ! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही । तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी ।*

*मैं भी कैसा अभागा ! काश, पहले पता चल जाता ! संत ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है । जब जागा तभी सबेरा है । दिन बड़े मजे में कटने लगे ।* 

*एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती।* 

*एक दिन संत ने कहा ; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी । जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए ; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है ?*

 *उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है ?*

*उस संत ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है । लकड़ियाँ-वकडियाँ काटना छोड़ो ।*

 *एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया ।* 

*अब तो वह संत पर भरोसा करने लगा था । बिना संदेह किये भागा । चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या ! चांदी ही चांदी थी ! चार-छ: महीने नदारद हो जाता । एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता ।*

*लेकिन व्यक्ति का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है ।* 

*संत ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझे ही तुम्हें जगाना पड़ेगा ।* 

*आगे सोने की खदान है मूर्ख ! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं ?* 

*अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है । जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल नहीं आता ?*

*उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस बात बन गई, अब और क्या होगा ?* 

*गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। संत ने कहा, थोड़ा और आगे सोने की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है।* 

*फिर और आगे हीरों की खदान है । और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन संत ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया ?* 

*अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे । उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है ?*

*उस संत ने कहा, हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह व्यक्ति मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं ले रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा ! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा ?*

*वह व्यक्ति रोने लगा। संत के चरणों में सिर पटक दिया। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं, मुझे यह सवाल ही नहीं आता।* 

*तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह ख्याल तो मेरे जन्मों-जन्मों में नहीं आ सकता था। कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है। संत ने कहा : उसी धन का नाम ,"रत्नत्रय" यानी सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र है।*

 *अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने "भीतर की खदान"  खोद, जिसमें रत्नत्रय नाम के तीनों रत्न है जिसे कोई भी चुरा नहीं सकता, कोई हरा नहीं सकता यह सबसे आगे है ।*

*👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा  पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता  करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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