*हमारे पतन का कारण*
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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 हमारे पतन का कारण ✍️🐒*
* आप ऊँचाई से नीचे गिर रहे हो -
👪▶️एक बार किसी हवाईजहाज में यात्रा करने वाले यात्री को पता चलता है कि उसके विमान में खराबी आने से वह विमान अत्यन्त ऊँचाई से नीचे गिर रहा है।
फिर इस गिरते हुए विमान में आग भी लग जाती है।
अब आप समझ ही सकते हैं कि इतनी उंचाई से गिरते हुए इस विमान के यात्री के मन में किस तरह के विचार आ रहे होंगे।
क्या ऐसी विकट परिस्थिति में वह उस समय दूसरों को हीन और कमजोर मानने का अभिमान में चूर होगा?
अरे ऐसी विकट परिस्थिति में तो उसे किसी भी तरह के आमोद-प्रमोद का, खाने-पीने का विकल्प भी नहीं आयेगा।
वह तो गिरते ही तत्क्षण समझ जायेगा कि अब मौत अत्यन्त निकट है।
फिर वह बचाओ-बचाओ चिल्लायेगा, किन्तु उसका क्रंदन कोई भी नहीं सुनता है।
तब वह व्यक्ति नीचे गिरते हुए अत्यन्त आकुलित होता हुआ मरण को प्राप्त होता है।
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*🕉️🌞✍️पुण्य वृद्धि के इच्छुक पुण्यात्माओं से निवेदन है कि इस पोस्ट को परिवार, मित्रों और अन्य परिचितों तक इस पोस्ट को भेजकर स्वयं के व उनके पुण्य मे भी वृद्धि करें। धर्मात्मा बंधु पापों को पुण्य मे बदलना चाहते है तो आज ही संस्था से जुड़कर अपना मोक्ष मार्ग को सुरक्षित करें ।जो स्वयं के पुण्य को शीघ्रातिशीघ्र वृद्धिगत करना चाहते है वे सभी अपनी चंचला लक्ष्मी का सदुपयोग संस्था के माध्यम से कर सकते है ।✍️*
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*✍️हे भव्यात्मा, आप भी इस घनघोर कर्म के वायुमंडल में पूर्वजन्म के पुण्य से चतुर्गति के सर्वोत्कृष्ट मनुष्य भव की इस ऊँचाई पर पहुँच चुके हो। अब इस भव में और ऊपर जाने का यानी कि निज आत्म दर्शन करने का या सम्यकदर्शन को पाने का कोई भी कार्य या पुरुषार्थ आपने नहीं किया है।*
अतः अब आप इस सर्वोत्कृष्ट पुण्य की उंचाई से नीचे गिर रहे हो।
लेकिन आपने इतनी मोह रूपी मदिरा पी ली है कि आप बेहोश हो गये हो और बचाओ-बचाओ भी नहीं चिल्ला रहे हो।
हे , फिर भी परमोपकारी श्री सद्गुरू अत्यन्त करूणा से ज्ञानजल के छींटे मारकर आपको जगा कर समझा रहे हैं कि अब भी वक्त है, मेरे पास आ जाओ.
मैं आपको आपके ही अनन्त गुण रूपी घोड़ों से जुते इस अति वैभवशाली विशालकाय अलौकिक चैतन्यरथ में चढ़ा देता हूँ,
जिससे फिर आप को कभी भी गिरने का भय नहीं रहेगा और आप इस चैतन्यरथ पर विराजमान सदाकाल इस अद्भुत वैभव को भोगकर शाश्वत सुख को पा लोगे।
अतः हे भव्यात्मा , अब शीघ्र ही “चेत रे भाई चेत” और अपने आपको समझदार और श्रेष्ठ मानकर दूसरों को कमजोर मानना छोड़कर अपनी इस स्वप्न-अवस्था को जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी त्यागकर अब तो जाग भी जाओ।
फिर शीघ्र ही आपका शाश्वत कल्याण अवश्य ही होगा।
हे वत्स, अब भी चेत जाओ, क्योकि समय बहुत कम है, आयु बहुत सूक्ष्म है; लेकिन अब भी तुम्हारे लिए एक अंतिम मौका बचा है।
मेरी इस देशना को ह्रदयंगम कर संसार के समस्त मिथ्याज्ञान को पूर्णतः त्याग, अपनी सहज निर्विचार, निर्विकार चैतन्य दशा का आश्रय लेकर,
स्वयं के त्रिकालदर्शी, त्रिलोकवर्ती परम शुद्ध चैतन्य स्वरुप में विचरण कर लोक के शिखर मोक्ष महल में विराजमान होने के लिए रत्नत्रय को दृढ़ता पूर्वक धारण करों ,
ताकि तुम आगे आने वाले अनंत काल तक परम सुख में लीन हो सको।
अन्यथा बहुत जल्दी तुम्हारे तीव्र मिथ्यात्व के उदय से वर्तमान की इस त्रस पर्याय का अभाव होगा और फिर तुम पुनः एकेंद्रिय और निगोद के त्रिलोकी अन्धकार के महा विनाशक गर्द में पुनः अनंतकाल के लिए समां कर नष्टप्रायः हो जाओगे।
*विशेष:- भव्य आत्माओं, दुःख में सुख खोज लेना, हानि में लाभ खोज लेना, प्रतिकूलताओं में भी अवसर खोज लेना, इस सबको सकारात्मक दृष्टिकोण कहा जाता है, जीवन का ऐसा कोई बड़े से बड़ा दुःख नहीं जिससे सुख की परछाईयों को ना देखा जा सके, जिन्दगी की ऐसी कोई बाधा नहीं, जिससे कुछ प्रेरणा ना ली जा सके, रास्ते में पड़े हुए पत्थर को आप मार्ग की बाधा भी मान सकते हैं, और चाहें तो उस पत्थर को सीढ़ी बनाकर ऊपर भी चढ़ सकते हैं, जीवन का आनन्द वही लोग उठा पाते हैं, जिनका सोचने का ढंग सकारात्मक होता है!*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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