जैन कैसे मनाएं दीपावली?
आज से 2550 वर्ष पूर्व, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या की भोर में अंतिम तीर्थंकर वीर प्रभु को 72 वर्ष की अवस्था में निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। उसी के स्मरण स्वरुप जैन दीपावली मनाते हैं।
https://youtu.be/F9hTospNwdE?si=eQ-c7ePuhbBhlPrRनिर्वाण अर्थात क्या?
सिद्ध अवस्था को निर्वाण अवस्था कहा जाता है।
जैनधर्मानुसार, शरीर और आत्मा दोनों स्वभाव से ही भिन्न वस्तुएँ हैं। तथा जब ये बाहर में भी भिन्न हो जाते हैं, तब अशरीरी सिद्ध दशा प्रगट होती है।
जब शरीर होता है तो उसके पालन-पोषण हेतु आहार-विहार-निहार होता है। सुबह उठने से शाम सोने तक के सारे काम इस शरीर के लिए ही होते हैं। परंतु जब शरीर का ही अभाव हो जाता है, तो ये सारी क्रियाएँ छूट जाती हैं। यूँ कहें, इनकी आवश्यकता ही नहीं रहती।
संसार के सारे दुख इस शरीर और इसके सम्बन्धियों की ओर दृष्टि करने से होते हैं। पैसे, परिवार और अन्य सब कुछ, इस शरीर से सम्बन्ध मानने से ही हमसे जुड़ते हैं।
सबसे पहले शरीर आदि की दृष्टि (उनमें अपनापन) छूटती है, फिर वे सब बाहर में छूटते हैं (त्याग/ मुनिदशा) और पश्चात इन सबका पूर्णतः त्याग हो कर मुक्त (भगवान) अवस्था प्रगट होती है।
साथ ही उत्पत्ति होती है अनंत सुख की।हाँ, वही सुख जो हम यहाँ संसार के सभी कोनों में खोजते घूम रहे हैं। मात्र सुख ही नहीं, अपितु अनंत गुण- उनकी प्रगटता मोक्ष में होती है।
न वहाँ शरीर होता है, न उसके संयोग और न उनके आश्रय से होने वाला दुख।
ऐसी अनंत सुख स्वरूप दशा है मोक्ष।
पुनः दीपावली पर–
★ भारत में 4 मुख्य पर्व/त्योहार हैं–
रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली, होली
जैनों ने इन पर्वों में से मात्र दो अहिंसक पर्वों को अपनाया– रक्षाबन्धन और दीपावली।
रक्षाबंधन ब्राह्मणों का पर्व माना जाता है और दीपावली वैश्यों का।
रक्षाबंधन के बाद से जीव धर्म कार्यों में प्रवर्तना प्रारम्भ करते हैं और दीपावली के बाद से व्यापार की शुरुआत होती है। अतः इन्हें क्रमशः ब्राह्मणों (धार्मिक/श्रावक जनों) वैश्यों का पर्व कहा जाता है।
★ दीपावली संयोग का नहीं, वियोग का पर्व है।
यह पर्व हमारे पूज्य पिताजी के स्वर्गवास के दिन के समान है।
इस दिन, जो परम पिता हमारे साथ 30 वर्षों से थे, वे हमें छोड़ कर सिद्धालय में विराजमान हो गए थे। अतः यह हमारे लिए वियोग का पर्व है।
साथ ही, यह हमारे लिए आनंद का भी दिन है, क्योंकि इस दिन हमारे प्रभु ने उस लक्ष्य की प्राप्ति की थी, जिसके लिए वे कई भवों से प्रयासरत थे।
अतः इस प्रकार यह हर्ष मिश्रित विषाद का पर्व है।
अन्य शब्दों में कहें, तो, यह पर्व, बेटी की शादी के पश्चात उसकी विदाई की बेला के समान है।
धन्यतेरस क्यों?
तेरस के दिन प्रभु की अंतिम दिव्यध्वनि का लाभ भव्यजनों को प्राप्त हुआ था। अतः, उनकी अपेक्षा से यह तेरस “धन्य” कहलाई।
हम व्यापारी बुद्धि वालों ने इसका सम्बन्ध धन से जोड़ दिया।
रूप चौदस क्यों?
इस दिन दिव्यध्वनि रुकने के पश्चात, मात्र भगवान के दर्शन प्राप्त हो रहे थे। अतः, उनका रूप निरखने के अंतिम मौके की याद स्वरूप यह “रूप-चतुर्दशी” मनायी जाती है।
जैन कैसे मनाएं दीपावली?
जैसी दीपावली भगवान महावीर के प्रमुख शिष्य, उनके प्रथम गणधर, गौतम स्वामी ने मनाई, वैसी ही दीपावली हमें भी मनाना चाहिए।
जैसे ही वीर प्रभु को मोक्ष की प्राप्ति हुई, गौतम स्वामी ने केवलज्ञान की प्राप्ति की। इस प्रकार उन्होंने ज्ञान ज्योति को बुझने नहीं दिया।
उसी प्रकार, हमें भी गांव-गांव घर-घर में प्रत्येक व्यक्ति के अंदर ज्ञान-दीप प्रज्वलित करने हेतु पुरुषार्थ करना चाहिए।
महात्मा गांधी जी ने देश पर जान देने वालों की एक फौज तैयार की थी।
एक बार झंडा लेकर जलूस जा रहा था। हिदायत दी गई- “इसे छोड़कर चले जाओ, वरना गोली चला देंगे”।
बात नहीं मानी गई और गोली चला दी गई। मरने वाले के हाथ से झंडा छूटा तो, परंतु नीचे नहीं गिर पाया। उसे दूसरे व्यक्ति ने थाम लिया। इस प्रकार चलता रहा, चलता रहा। गोलियां खत्म हो गयीं, पर जान देने वाले नहीं।
इसी प्रकार, जैन धर्म के प्रचार का वह झंडा, जिसे महावीर भगवान ने सबसे पहले थामा था, वह आज हमारे हाथ में है।
यदि हमने उसे नहीं थामा और अपनी आगे की पीढ़ी तक नहीं पहुंचाया, तो हम वह अपराध करेंगे जो हमारी 125 पीढ़ियों ने नहीं किया।
★ हम अपने माता-पिता से मिली संपत्ति को, अपने बच्चों तक दुगना,तिगुना और चौगुना करके देना चाहते हैं।
तो हमारे माता-पिता ने जो हमें धर्म के संस्कारों की संपत्ति दी है उसे भी आगे दुगना-चौगुना करके पहुंचाने का हमारा कर्तव्य बनता है।
अगर हमने आज की पीढ़ी को संस्कार नहीं दिए, इस जिनवाणी के बारे में उन्हें नहीं बताया, तो यह बात आगे की पीढ़ी तक नहीं पहुंच पाएगी।
और इसके जिम्मेदार हम होंगे तथा इसकी सजा हमारी आगे की पीढ़ियों को भोगनी पड़ेगी।
अतः हम यह धर्म और उसके संस्कार आगामी पीढ़ी तक पहुंचाएं, आज के दिन हमारा यह कर्तव्य बनता है।
दीप जलाने की परंपरा?
जैसे सूर्य अस्त हो जाने पर छोटे-छोटे दीपक जल जाते हैं।
वैसे ही, जब केवलज्ञान रूपी सूर्य अस्त हो गया, तब प्रकाश के लिए गांव-गांव में छोटे-छोटे दीपक जल गए (विद्वान हो गये)।
हम गांव-गांव में पाठशाला खोलें यह वास्तविक दीपक जलाना है।
लड्डू क्यों चढ़ाना?
उस समय, लोगों के घर में लड्डू बन रहे थे। भगवान के निर्वाण का समाचार सुनकर सब वहां भागे और उदास होकर वे लड्डू वही भगवान के चरणों में समर्पित कर दिए।
तब से ही लड्डू चढ़ाने की परंपरा प्रारम्भ हो गयी।
परंतु, यह मात्र सांकेतिक कथन समझना।
★ लड्डू भगवान आत्मा का प्रतीक है- जिस प्रकार, लड्डू का कोई आरंभ अथवा अंत नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी अनादि-अनंत है, मिष्ट है, रस का कंद है।
वास्तविकता में तो अहिंसक रीति से तैयार, गरी-गोला ही निर्वाण फ़ल के रूप में समर्पित करने योग्य है।
★ अतः, हमें शक्ति अनुसार जैन धर्म का प्रचार-प्रसार-प्रभावना करना चाहिए।
भगवान का शासन तो पंचम काल के अंत तक रहेगा। हम नहीं पढेंगे, तो भी यह जिनवाणी जीवित रहेगी।
परंतु हम और हमारी पीढ़ी इस अमृत से वंचित रह जाएँगे।
इसलिए आज ही हम अपनी जिम्मेदारी समझें।
स्वयं धर्म मार्ग में लगें, इसे समझने का प्रयास करें, तथा अपने बालकों को भी समझाएं।
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