*गुरु-शिष्य का सच्चा रिश्ता*
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*🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
*🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
*👨👩👧👦✍️कहानी सभी के काम की*
*💪👩🚒 गुरु-शिष्य का सच्चा रिश्ता ✍️🐒*
*🔔👨👩👧👦↔️ जैन तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक महोत्सव की अग्रिम सूचना🔔*
*🔔🪔 मार्गशीर्ष शुक्ल 10 मी, ▶️21 दिसंबर गुरुवार कलिकाल के बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले अरनाथ तीर्थंकर सभी प्रकार से सुख के मार्ग प्रदर्शक 18 वें तीर्थंकर 1008 श्री अरनाथ स्वामी का तप कल्याणक महोत्सव है। 🛕*
*🔔🪔 मार्गशीर्ष शुक्ल ग्यारस, 22 दिसंबर शुक्रवार कलिकाल के केतू की महादशा को अनुकूल बनाने वाले मल्लीनाथ तीर्थंकर सभी प्रकार से असंभव कार्य को संभव बनाने के पथ-प्रदर्शक 19 वें तीर्थंकर 1008 श्री मल्लीनाथ स्वामी का जन्म व तप कल्याणक महोत्सव है। 🛕↔️⛳ आज ही के दिन कलिकाल के बुध की महादशा को अनुकूल बनाने वाले 21वें तीर्थंकर नमिनाथ भगवान का ज्ञान कल्याणक महोत्सव है।*
*🔔🪔 इस दिसंबर माह में 25, 26, 28 तारीख को भी तीर्थंकर भगवन्तों कल्याणक महोत्सव है। यह सभी तिथियां जयपुर पंचांग के अंतर्गत है।विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ते रहे शिक्षाप्रद कहानियां ।*
*गुरु-शिष्य का सच्चा रिश्ता*
बात कुछ इस तरह है, कि जब श्री रामकृष्ण परमहंस जी को कैंसर हुआ था, तब बीमारी के कारण वे खाना नहीं खा पाते थे, और स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु की इस हालात से बहुत ही चिंतित थे।
एक दिन परमहंस जी ने पूछा- नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी)! क्या तुझे वो दिन याद हैं, जब तू अपने घर से मेरे पास मंदिर में आता था, और तूने दो-दो दिनों से कुछ नहीं खाया होता था, परंतु तू अपनी मां से झूठ कह देता था कि तूने अपने मित्र के घर खाना खा लिया है, ताकि तेरी गरीब मां थोड़े-बहुत भोजन को तेरे छोटे भाई को परोस दे ....है ना?
स्वामी विवेकानंद जी ने रोते-रोते हां में सर हिला दिया।
परमहंस जी आगे बोले- और जब तू यहां मेरे पास मंदिर आता था, तो अपने चेहरे पर खुशी का मुखौटा पहन लेता था। लेकिन मैं भी तो कम नहीं था, झट जान जाता था कि तेरे पेट में चूहों का पूरा कबीला धमा-चौकड़ी मचा रहा है और तेरा शरीर भूख से चूर हो रहा है, और फिर तुझे अपने हाथों से लड्डू, पेड़े, मक्खन और मिश्री खिलाता था। है ना?
स्वामी विवेकानंद जी ने सुबकते हुए हां में गर्दन हिलाई।
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अब रामकृष्ण परमहंस जी फिर से मुस्कुराए और पूछा- कैसे जान लेता था मैं यह बात? कभी सोचा है तूने?
स्वामी विवेकानंद जी सिर उठाकर परमहंस जी को देखने लगे, और परमहंस जी ने फिर पूछा- बता न, मैं कैसे तेरी आंतरिक स्थिति को जान लेता था?
स्वामी विवेकानंद जी- क्योंकि आप अंतर्यामी हैं, आप ही सच्चे मित्र हो।
परमहंस जी- अंतर्यामी, अंतर्यामी किसे कहते हैं?
स्वामी विवेकानंद जी- जो सबके अंदर की जान ले।
परमहंस जी- कोई अंदर की भावना कब जान सकता है?
स्वामी विवेकानंद जी- जब वो स्वयं अंदर में ही विराजमान हो।
परमहंस जी- यानि मैं तेरे अंदर भी बैठा हूं, है ना?
स्वामी विवेकानंद जी- जी बिल्कुल! आप मेरे हृदय में समाए हुए हैं।
परमहंस जी- तेरे भीतर में समाकर मैं हर बात जान लेता हूं, हर दुख-दर्द पहचान लेता हूं, तेरी भूख का अहसास कर लेता हूं, तो क्या तेरी भूख मुझ तक नहीं पहुंचती होगी?
स्वामी विवेकानंद जी- मेरी भूख आप तक?
रामकृष्ण परमहंस जी- हां तेरी भूख! जब तू भोजन खाता है और तुझे तृप्ति होती है, क्या वो मुझे तृप्त नहीं करती होगी? अरे पगले! गुरु अंतर्यामी है, अंतर-जगत का स्वामी है। वो अपने शिष्य के भीतर बैठा सब कुछ भोगता है। एक नहीं, हजारों मुखों से खाता हूं। तेरे, लाटू के, काली के, गिरीश के, सबके। याद रखना, गुरु कोई बाहर स्थित एक देह भर नहीं है। वो तुम्हारे रोम-रोम का वासी है। तुम्हें पूरी तरह आत्मसात कर चुका है। अलगाव कहीं है ही नहीं। अगर कल को मेरी यह देह नहीं रही, मैं तब भी जिऊंगा, तेरे जरिए जिऊंगा। मैं तुझमें रहूंगा और तू मुझमें।ऐसा कहते हुए रामकृष्ण जी ने अपना जीवन त्याग दिया।।।।
*ऐसा होता है गुरु-शिष्य का सच्चा रिश्ता*
*👨👩👧👦✍️➡️🕉️ प्रति समय प्रसन्न रहते हुए अपने सच्चे कर्तव्यों ( वह कार्य जो हमें 84 लाख योनियों से मुक्त करने में सहयोग प्रदान करें ) का पालन कीजिये।*
*➡️जैसा हमारा कर्म होगा वैसा ही हमें फल प्राप्त होगा।आज वर्तमान में जो भी हम सभी को प्राप्त हो रहा है वह हमारे द्वारा पूर्वो पार्जित कर्मो का ही फल है।आप किसी भी जीव के मोक्ष मार्ग में सहयोगी नहीं बन सकते तो विरोधी बनकर पाप का संचय मत करो। ना ही किसी बात चिंता करो, अच्छे कर्म करो जो हमसे कोई छुड़ा भी नहीं सकता और चुरा भी नहीं सकता।कर्म यह ऐसी संपत्ति है जो मरने के बाद भी हमारे साथ रहती है।जब जीव जन्म लेता है तो केवल अपने पूर्वो पार्जित कर्मों के साथ ही जन्म लेता है।*
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*जैनम जयतु शासनम*
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