रविवार, 15 अगस्त 2021

कर्म ही कर्ता है

.            *🌞🕉️वसुनंदी गुरुवे नमः🕉️🌞*
.                *🌞✍️सच्चा साथी✍️🌞*
.                 *👨‍👩‍👧‍👦कहानी बड़े काम की*

*🕉️आज 1008 पार्श्वनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक महामहोत्सव पर विशेष*

.                 *✍️कर्ता कौन*

*☸️  संसार को चलाने वाला मै या जीव का कर्म**

✍️👨‍👩‍👧‍👦➡️एक घर के मुखिया को यह अभिमान हो गया कि उसके बिना उसके परिवार का काम नहीं चल सकता।

उसकी छोटी सी दुकान थी। उससे जो आय होती थी, उसी से उसके परिवार का गुजारा चलता था। 

चूँकि कमाने वाला वह अकेला ही था इसलिए उसे लगता था कि उसके बगैर कुछ नहीं हो सकता। वह लोगों के सामने डींगें हांँका करता था।

एक दिन वह एक संत के सत्संग में पहुंचा। संत कह रहे थे --
             "दुनिया में किसी के बिना किसी का काम नहीं रुकता। यह अभिमान व्यर्थ है कि मेरे बिना परिवार या समाज ठहर जाएगा। सभी को अपने भाग्य के अनुसार प्राप्त होता है।" 

सत्संग समाप्त होने के बाद मुखिया ने संत से कहा -- "मैं दिन भर कमाकर जो पैसे लाता हूंँ उसी से मेरे घर का खर्च चलता है। मेरे बिना तो मेरे परिवार के लोग भूखे मर जाएंगे।"

संत बोले -- "यह तुम्हारा भ्रम है। हर कोई अपने भाग्य का खाता है।"

इस पर मुखिया ने कहा -- "आप इसे प्रमाणित करके दिखाइए।"

संत ने कहा -- "ठीक है। तुम बिना किसी को बताए घर से एक महीने के लिए गायब हो जाओ।" उसने ऐसा ही किया। 

संत ने सारे गाँव में यह बात फैला दी कि उसे बाघ ने खा लिया है। 

मुखिया के परिवार वालों ने कई दिनों तक शोक मनाया। गाँंव वाले आखिरकार उनकी मदद के लिए सामने आए। 

एक सेठ ने उसके बड़े लड़के को अपने यहाँ नौकरी दे दी। गाँव वालों ने मिलकर लड़की की शादी कर दी। एक व्यक्ति छोटे बेटे की पढ़ाई का खर्च देने को तैयार हो गया। 

एक महीने बाद मुखिया छिपता-छिपाता रात के वक्त अपने घर आया। घर वालों ने भूत समझकर दरवाजा नहीं खोला। 

जब वह बहुत गिड़गिड़ाया और उसने सारी बातें बताईं , तो उसकी पत्नी ने दरवाजे के भीतर से ही उत्तर दिया...

"हमें तुम्हारी जरूरत नहीं है। अब हम पहले से ज्यादा सुखी हैं। उस व्यक्ति का सारा अभिमान उतर गया,......."

.    "संसार कभी किसी के लिए भी नही रुकता।"

    "हम स्वयं ही कर्ता पने का बोझ लिये घूमते है।"

  *👨‍👩‍👧‍👦✍️➡️☸️नोट :-  तीन लोक संबंधित सभी जीव कर्मो के अनुसार सुख-दुःख भोग रहे है।हमारे मोक्ष मार्ग में वे सभी जीव सहायक व बाधक हमारे स्वयं के विचारों से बनते है।अतः हमें अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपना मनुष्य भव सार्थक करना चाहिए।*  
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